बांकेलाल कॉमिक्स | comicsbio.com https://comicsbio.com/tag/बांकेलाल-कॉमिक्स Welcome to ComicsBio, your one-stop destination for a vibrant world of comics, movies, anime, and spotlight features! Sat, 28 Mar 2026 18:59:46 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.4.8 https://comicsbio.com/wp-content/uploads/2023/12/cropped-comicsbio-favicon-32x32.png बांकेलाल कॉमिक्स | comicsbio.com https://comicsbio.com/tag/बांकेलाल-कॉमिक्स 32 32 बांकेलाल और मुर्दा शैतान: जब कायर नायक ने जगाया खौफनाक कंकाल | 90s की सबसे डरावनी-कॉमेडी क्लासिक कॉमिक्स रिव्यू https://comicsbio.com/bankelal-aur-murda-shaitan-comics-review-raj-comics https://comicsbio.com/bankelal-aur-murda-shaitan-comics-review-raj-comics#respond Sat, 28 Mar 2026 18:59:05 +0000 https://comicsbio.com/?p=14205 बांकेलाल की कॉमिक्स सिर्फ एक कहानी नहीं होती, बल्कि हास्य, व्यंग्य और लोककथाओं का ऐसा शानदार मिश्रण होती है जो पाठक को शुरुआत से अंत तक बांधे रखता है। ‘बांकेलाल और मुर्दा शैतान’ इसी कड़ी का एक ऐसा नगीना है, जो केवल अपनी अजीब और दिलचस्प कहानी के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इसमें [...]

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बांकेलाल की कॉमिक्स सिर्फ एक कहानी नहीं होती, बल्कि हास्य, व्यंग्य और लोककथाओं का ऐसा शानदार मिश्रण होती है जो पाठक को शुरुआत से अंत तक बांधे रखता है। ‘बांकेलाल और मुर्दा शैतान’ इसी कड़ी का एक ऐसा नगीना है, जो केवल अपनी अजीब और दिलचस्प कहानी के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इसमें मौजूद डर और कॉमेडी का संतुलन इसे एक कल्ट क्लासिक बना देता है। इस कॉमिक्स का मुखपृष्ठ ही इतना असरदार है कि एक कंकाल को पहलवान के सामने खड़ा देखकर किसी भी बच्चे के मन में जिज्ञासा और हल्की सिहरन पैदा होना स्वाभाविक था। बेदी जी के शानदार चित्रांकन और तरुण कुमार वाही की लेखनी ने मिलकर विक्रमगढ़ के उस काल्पनिक संसार को जीवंत बना दिया है, जहाँ हर मोड़ पर एक नया षड्यंत्र बांकेलाल का इंतजार करता नजर आता है।

विक्रमगढ़ की माटी और दारा पहलवान का प्रचंड खौफ

कहानी की शुरुआत विक्रमगढ़ के उस धूल भरे अखाड़े से होती है जहाँ मल्लविद्या का उत्सव चल रहा है। दारापुर का मशहूर पहलवान दारा अपनी अजेय ताकत के घमंड में डूबा हुआ है। वह केवल पहलवानों को हराकर नहीं छोड़ रहा, बल्कि विक्रमगढ़ की प्रतिष्ठा को भी खुली चुनौती दे रहा है। यहाँ लेखक ने दारा के चरित्र को इतना विशाल और ताकतवर दिखाया है कि राजा विक्रम सिंह भी चिंता में पड़ जाते हैं। दारा का व्यक्तित्व किसी पहाड़ की तरह मजबूत है और उसके दांव-पेंच इतने खतरनाक हैं कि सामने वाला प्रतिद्वंद्वी अपनी हड्डियां तुड़वाने के अलावा कुछ नहीं कर पाता।

जब विक्रमगढ़ का अंतिम पहलवान चिलप्पो भी हार जाता है, तो राज्य के मान-सम्मान पर बात आ जाती है। यहीं से बांकेलाल की एंट्री की भूमिका तैयार होती है। दारा की जोरदार हंसी और उसकी उभरी हुई मांसपेशियां बेदी जी के आर्टवर्क में साफ दिखाई देती हैं, जो पाठक को यह महसूस कराने के लिए काफी है कि संकट कितना बड़ा है। यह दृश्य नब्बे के दशक के उन मल्ल-युद्धों की याद दिलाता है जिन्हें हम अक्सर लोक कथाओं में पढ़ा करते थे।

बांकेलाल की कायरता और षड्यंत्र का जाल

बांकेलाल कोई आम नायक नहीं है; वह ऐसा ‘एंटी-हीरो’ है जिसके मन में हमेशा राजा विक्रम सिंह का बुरा करने की इच्छा रहती है। जब राजा उसे दारा से लड़ने का आदेश देते हैं, तो बांकेलाल के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। यहाँ बांकेलाल का मानसिक संघर्ष बहुत दिलचस्प तरीके से दिखाया गया है। एक तरफ मौत जैसा खतरनाक दारा पहलवान खड़ा है और दूसरी तरफ राजा का आदेश।

बांकेलाल की खासियत यह है कि वह मुश्किल समय में अपनी बुद्धि का इस्तेमाल लड़ने के लिए नहीं, बल्कि बचकर निकलने के लिए करता है। उसके चेहरे पर दिखने वाला डर, पसीने की बूंदें और आंखों की शरारत को आर्टिस्ट ने बहुत बारीकी से उकेरा है। बांकेलाल का यही चरित्र चित्रण उसे पाठकों का प्रिय बनाता है, क्योंकि वह हमारी तरह डरता है, हमारी तरह कमजोर है, लेकिन उसकी किस्मत उसे हमेशा नायक बना देती है। बांकेलाल का भागने की कोशिश करना और धोबी के भेस में महल से निकलना उसके धूर्त स्वभाव को साफ दिखाता है।

घोर अंधकार और मुर्दा शैतान का खौफनाक पुनर्जन्म

जब बांकेलाल सैनिकों से बचकर जंगल की ओर भागता है, तो कहानी हास्य से अचानक डरावने माहौल की तरफ मुड़ जाती है। एक पुराने पेड़ के कोटर में छिपने की कोशिश करते हुए बांकेलाल एक रहस्यमयी गुफा में जा गिरता है। यहाँ का माहौल किसी डरावनी फिल्म से कम नहीं लगता। मकड़ी के जाले, धूल से भरी पुरानी संदूकें और चारों तरफ फैली खामोशी के बीच जब बांकेलाल का खून गलती से एक कंकाल पर गिरता है, तो ‘मुर्दा शैतान’ जाग जाता है।

यह पात्र इस कॉमिक्स का सबसे बड़ा आकर्षण बनकर सामने आता है। सौ साल की नींद के बाद जागे इस शैतान की शक्तियां असीमित हैं। उसका सिर्फ हड्डियों का ढांचा होना और फिर भी बात करना पाठकों के मन में सिहरन पैदा कर देता है। मुर्दा शैतान की खूनी प्यास और उसका डरावना व्यक्तित्व इस कॉमिक्स को एक अलौकिक थ्रिलर बना देता है। यहाँ बांकेलाल की चतुराई अपने चरम पर दिखाई देती है, जब वह अपनी जान बचाने के लिए मुर्दा शैतान से दारा पहलवान का खून पिलाने का सौदा कर लेता है।

खूनी प्यास और दहशत का मंजर

बांकेलाल और मुर्दा शैतान का यह गठबंधन एक विनाशकारी नतीजे की ओर बढ़ता है। मुर्दा शैतान की भूख सामान्य नहीं है, उसे इंसानी खून चाहिए। बांकेलाल उसे अखाड़े की ओर ले आता है जहाँ दारा पहलवान जीत का जश्न मना रहा होता है। अचानक एक जीवित कंकाल का अखाड़े में आना पूरी प्रजा और सैनिकों के बीच भगदड़ मचा देता है।

यहाँ बेदी जी ने जिस तरह के एक्शन दृश्य बनाए हैं, वे आज के दौर के एनिमेशन को टक्कर देते नजर आते हैं। सैनिकों पर मुर्दा शैतान का हमला, हवा में उछलते लोग और चारों तरफ गूंजती चीखें दहशत का ऐसा माहौल बनाती हैं जिसे पढ़ते समय पाठक की धड़कनें तेज हो जाती हैं। मुर्दा शैतान की शक्तियां उसे किसी भी हमले से बेअसर बनाती हैं क्योंकि वह पहले से ही मृत है। उसका यह म्यूटेंट जैसा स्वभाव और अलौकिक ताकत उसे राज कॉमिक्स के सबसे यादगार खलनायकों में शामिल कर देती है।

बेदी का जादुई चित्रांकन और नब्बे के दशक का जादू

इस समीक्षा में अगर बेदी जी के काम की चर्चा न की जाए, तो यह अधूरी रह जाएगी। बेदी राज कॉमिक्स के उन स्तंभों में से एक हैं जिन्होंने पात्रों को असली पहचान दी। उनके चित्रों में एक खास तरह की गतिशीलता होती है। जब बांकेलाल हवा में उछलता है या जब मुर्दा शैतान अपनी हड्डियां चटकाता है, तो ऐसा लगता है जैसे आवाजें पन्नों से बाहर आ रही हों। रंगों का चयन, खासकर मुर्दा शैतान के सफेद ढांचे के पीछे का गहरा बैकग्राउंड, एक मजबूत विजुअल कॉन्ट्रास्ट बनाता है।

नब्बे के दशक की कॉमिक्स की एक और खासियत उनका ‘हैंड-लेटरिंग’ फोंट था। संवादों के पीछे बने बादल और बांकेलाल की सोच को दिखाने वाले गोल घेरे हमें उस मासूम दौर में वापस ले जाते हैं, जहाँ मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन यही कागजी पन्ने थे। उस समय की आर्टवर्क में जो बारीकी होती थी, वह पात्रों के चरित्र को और भी मजबूत बना देती थी।

अखाड़े में महासंग्राम और नियति का अटूट खेल

कहानी का चरमोत्कर्ष (Climax) बेहद नाटकीय है। जब मुर्दा शैतान दारा पहलवान पर हमला करता है, तो दृश्य सचमुच देखने लायक बन जाता है। दारा, जो खुद को सबसे ताकतवर समझता था, एक हड्डियों के ढांचे के सामने बेबस नजर आने लगता है। लेकिन यहीं बांकेलाल का वह मशहूर ‘लक’ या शिव का वरदान काम करता है। अनजाने में हुए संघर्ष के दौरान दारा का वह हाथ, जो काफी समय से बेकार था, मुर्दा शैतान के प्रहार से अचानक ठीक हो जाता है। यह बांकेलाल की कॉमिक्स का वही सिग्नेचर ट्विस्ट है जहाँ बांकेलाल बुरा करना चाहता है, लेकिन नतीजा हमेशा अच्छा ही निकलता है।

मुर्दा शैतान का समय पूरा होना और उसका फिर से धूल में मिल जाना बुराई के अंत का प्रतीक बन जाता है। लेकिन बांकेलाल के लिए यह एक और ‘दुखद’ जीत होती है, क्योंकि उसे फिर से राजा का प्रिय बनना पड़ता है और उसे सम्मान मिलता है, जिसे वह कभी चाहता ही नहीं था।

पात्रों की मनोवैज्ञानिक गहराई और रणनीतिक दांव-पेंच

अगर गहराई से देखें, तो बांकेलाल की रणनीतियां किसी शतरंज के खिलाड़ी जैसी लगती हैं, बस फर्क इतना है कि वह अपनी बिसात खुद ही बिगाड़ देता है। इस कॉमिक्स में बांकेलाल ने मुर्दा शैतान को अपनी ढाल बनाकर इस्तेमाल करने की कोशिश की, ताकि वह दारा और राजा दोनों से छुटकारा पा सके। नायक की यह रणनीति कि ‘शत्रु का शत्रु मित्र होता है’, यहाँ बहुत दिलचस्प तरीके से फेल होती है।

दारा पहलवान का चरित्र भी सिर्फ एक बाहुबली तक सीमित नहीं है। अंत में उसका बांकेलाल के प्रति सम्मान दिखाना और अपनी हार स्वीकार करना उसके व्यक्तित्व को और मजबूत बनाता है। महामंत्री धर्मसिंह की समझदारी और राजा विक्रम सिंह का भोलापन इस पूरी कहानी को एक पारिवारिक ड्रामा जैसा अनुभव भी देते हैं। हर पात्र अपने आप में पूरा है और कहानी को आगे बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभाता है।

एक कालजयी रचना का अविस्मरणीय निष्कर्ष

‘बांकेलाल और मुर्दा शैतान’ सिर्फ एक हास्य कॉमिक्स नहीं है, बल्कि यह मानव स्वभाव की विडंबनाओं को भी दिखाती है। यह कहानी बताती है कि किस्मत के आगे सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ा षड्यंत्र भी फेल हो सकता है। बांकेलाल का रोना और अंत में उसका यह सोचना कि ‘मेरी योजना की टांग फिर टूट गई’, पाठकों को हंसने पर मजबूर कर देता है।

राज कॉमिक्स ने इस कहानी के जरिए जो फैंटेसी और एडवेंचर की दुनिया बनाई है, वह आज भी उतनी ही मजेदार और प्रासंगिक लगती है जितनी तीस साल पहले थी। यह कॉमिक्स उन सभी के लिए जरूरी पढ़ाई है जो अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं और उस दौर की सरल लेकिन मनोरंजक कहानियों का आनंद लेना चाहते हैं। यदि आपने इसे बचपन में पढ़ा है, तो इसे दोबारा पढ़ना आपको उन सुनहरी यादों में वापस ले जाएगा, जहाँ बांकेलाल की शरारतें ही सबसे बड़ा मनोरंजन हुआ करती थीं।

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