राज कॉमिक्स के सबसे लोकप्रिय सुपरहीरो नागराज की कहानियाँ आमतौर पर रोमांच, जासूसी और फंतासी का जबरदस्त मेल होती हैं। लेकिन ‘सो जा नागराज’ (अंक संख्या 635) इन सबसे थोड़ा अलग रास्ता पकड़ती है। यह कहानी एक मनोवैज्ञानिक थ्रिलर और हल्के हॉरर का स्वाद देती है। जॉली सिन्हा द्वारा लिखी गई और अनुपम सिन्हा द्वारा बनाई गई यह कॉमिक्स नागराज की जिंदगी के उन मुश्किल पलों को दिखाती है, जहाँ उसका सामना किसी बाहरी ताकत से नहीं, बल्कि अपने ही दिमाग और नींद से है। यह समीक्षा इस 50-पन्नों की शानदार कॉमिक्स के हर पहलू—कहानी, चित्रकारी, किरदारों और उसके संदेश—को विस्तार से समझने की कोशिश करेगी।
कथानक का विस्तार (Plot Analysis):
कहानी की शुरुआत ही एक डरावने और रहस्यमयी माहौल से होती है। नागराज को भयानक सपने आने लगते हैं। ये साधारण सपने नहीं हैं। इन सपनों में एक अजीब सा ‘काष्ठ-सर्प’ यानी लकड़ी का बना सांप दिखाई देता है, जो महानगर में तबाही मचा रहा है। जब नागराज की नींद खुलती है, तो उसे लगता है कि यह बस एक बुरा सपना था। लेकिन जल्दी ही उसे पता चलता है कि मामला इतना आसान नहीं है—उसके सपने सच बनते जा रहे हैं।

कहानी की असली ताकत एक खतरनाक उलझन (Paradox) में छिपी है।
अगर नागराज सोता है, तो उसके अवचेतन मन से डरावने राक्षस जन्म लेते हैं, जो महानगर के मासूम लोगों की जान ले लेते हैं।
और अगर वह खुद को सोने से रोकता है, तो लगातार नींद न मिलने के कारण कुछ ही दिनों में उसकी जान जा सकती है।
यानि हालत बिल्कुल ‘चेकमेट’ जैसी हो जाती है। न सो सकता है, न जाग सकता है।
इसी बीच विसर्पी, जो नागराज की प्रेमिका और नागद्वीप की राजकुमारी है, अचानक महानगर में एक विशाल नाग-नौका के साथ प्रकट होती है। बाद में वही नाग-नौका उस भयानक ‘नावसर्प’ में बदल जाती है, जिसे नागराज ने अपने सपने में देखा था। नागराज पूरी ताकत से उस राक्षस से लड़ता है और बड़ी मुश्किल से उसे खत्म करता है। लेकिन इस लड़ाई में वह विसर्पी को अपनी आंखों के सामने मरते हुए देखता है। बाद में पता चलता है कि यह सब एक भ्रम था, पर उस पल की पीड़ा पाठकों को भीतर तक हिला देती है।
कहानी में असली मोड़ तब आता है जब खुलासा होता है कि इसके पीछे ‘जुलू’ नाम का एक पुराना और चालाक दुश्मन है। जुलू ने बड़ी होशियारी से नागराज को ‘स्वप्न बूटी’ का अर्क पिला दिया था। यहाँ लेखक ने पल्स पोलियो अभियान का संदर्भ लेकर कहानी में एक दिलचस्प मोड़ जोड़ा है। जुलू एक पल्स पोलियो कर्मचारी का भेष बनाकर आया और उसी बहाने नागराज को वह अर्क पिला दिया, जिससे उसका दिमाग जुलू के दिमाग से जुड़ गया।
अब लड़ाई सिर्फ ताकत की नहीं, दिमाग की थी।

आखिर में नागराज को ‘ल्यूसिड ड्रीमिंग’ यानी सचेत सपने देखने की तकनीक अपनानी पड़ती है। वह जानबूझकर सोने का फैसला करता है, ताकि अपने ही सपने की दुनिया में जाकर जुलू का सामना कर सके। सपनों की उस दुनिया में एक जबरदस्त मानसिक युद्ध होता है। वहाँ नागराज अपनी इच्छाशक्ति और ‘इन्फ्रारेड दृष्टि’ जैसी नई ताकतों का इस्तेमाल करता है। यह लड़ाई सिर्फ शरीर की नहीं, आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती की भी है। अंत में नागराज जुलू को हरा देता है और उसे कोमा की हालत में पहुँचा देता है।
चरित्र चित्रण (Characterization):
नागराज: इस कॉमिक्स में नागराज हमेशा की तरह अजेय और अडिग नहीं दिखता। यहाँ वह एक ऐसा इंसान नजर आता है जो डरता है, टूटता है और अपनी कमजोरी महसूस करता है। जब वह डॉक्टर सस्सी के सामने अपनी परेशानी और बेबसी बताता है, तो वह पल उसे और भी मानवीय बना देता है। पाठक महसूस करता है कि सुपरहीरो भी इंसान ही होता है, जिसे नींद, डर और दर्द सब कुछ महसूस होता है।

जुलू (खलनायक): जुलू ऐसा विलेन है जो मांसपेशियों से नहीं, दिमाग और चालाकी से वार करता है। वह जानता है कि सीधे मुकाबले में नागराज को हराना मुश्किल है। इसलिए वह उसे नींद के जाल में फँसाकर मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश करता है। उसकी योजना यह दिखाती है कि असली खतरा हमेशा बाहरी ताकत नहीं, बल्कि अंदरूनी कमजोरी भी हो सकती है।
डॉक्टर सस्सी और भारती: भारती हमेशा की तरह नागराज का मजबूत सहारा बनकर खड़ी रहती है। वह भावनात्मक ताकत देती है। वहीं डॉक्टर सस्सी का किरदार वैज्ञानिक सोच को सामने लाता है। उनकी बातों से कहानी सिर्फ जादू-टोने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मनोविज्ञान और विज्ञान से भी जुड़ती है।
भीलराज अकोला: उनका किरदार कहानी में परंपरा और पुराने ज्ञान की झलक देता है। आयुर्वेद और आदिम ज्ञान के जरिए वह इस संघर्ष को आध्यात्मिक आधार भी देते हैं, जिससे कहानी और गहराई पकड़ती है।
कला और चित्रण (Art and Illustration Review):

अनुपम सिन्हा को यूँ ही नागराज का ‘गॉडफादर’ नहीं कहा जाता, और ‘सो जा नागराज’ में उनका काम सच में अपने बेहतरीन दौर में नजर आता है। इस कॉमिक्स में नावसर्प और वैम्पायर प्लांट जैसे राक्षसों का डिज़ाइन इतना डिटेल और डरावना है कि पहली नजर में ही असर छोड़ देता है। खासकर लकड़ी के तख्तों से बने सांप की कल्पना को जिस तरह पन्नों पर उतारा गया है, वह काबिल-ए-तारीफ है। वह सिर्फ एक राक्षस नहीं लगता, बल्कि किसी बुरे सपने से निकलकर आया हुआ डर लगता है।
नागराज के चेहरे पर नींद की कमी, थकान और डर को जिस तरह दिखाया गया है, वह कहानी के तनाव को और गहरा बना देता है। उसकी आंखों के नीचे हल्के, माथे पर पसीना और चेहरे की बेचैनी साफ नजर आती है। एक्शन सीन में खून के छींटे, सही शारीरिक बनावट और तेज मूवमेंट वाले पैनल्स कहानी में जबरदस्त ऊर्जा भर देते हैं। लड़ाई के दृश्य इतने जीवंत लगते हैं कि जैसे सब कुछ आंखों के सामने हो रहा हो।
रंग संयोजन में सुनील पांडेय का योगदान भी बहुत अहम है। सपनों वाले दृश्यों में बैंगनी और गुलाबी रंगों का इस्तेमाल असली दुनिया और सपनों की दुनिया के फर्क को साफ दिखाता है। वहीं डर और खतरे वाले पलों में गहरे और भारी रंग माहौल को और भी सिहरन भरा बना देते हैं। कुल मिलाकर चित्रकारी सिर्फ कहानी का साथ नहीं देती, बल्कि उसे और ज्यादा असरदार बना देती है।
सामाजिक संदेश और नवीनता:

इस कॉमिक्स की एक बड़ी खासियत ‘पल्स पोलियो अभियान’ का जिक्र है। जिस समय यह कॉमिक्स आई थी, उस वक्त भारत में पोलियो को खत्म करना एक बड़ा राष्ट्रीय लक्ष्य था। ऐसे समय में नागराज जैसे लोकप्रिय किरदार के जरिए पल्स पोलियो की बात करना एक समझदारी भरा कदम था। भले ही कहानी में यह विलेन की चाल का हिस्सा हो, लेकिन बच्चों तक इस अभियान का नाम और महत्व पहुँचाने का यह एक असरदार तरीका था।
इसके अलावा ‘ल्यूसिड ड्रीमिंग’ यानी सपनों को समझकर और नियंत्रित करके लड़ना, उस दौर की हिंदी कॉमिक्स के लिए बिल्कुल नया विचार था। सपनों की दुनिया में जाकर दुश्मन से लड़ना, अपने ही अवचेतन मन का सामना करना—यह कॉन्सेप्ट बहुत आगे की सोच दिखाता है। बाद में आई हॉलीवुड फिल्म ‘Inception’ की याद आना स्वाभाविक है, लेकिन यह कॉमिक्स अपने समय से काफी आगे थी।
सकारात्मक पहलू (Pros):

यह कहानी सिर्फ ‘सुपरहीरो बनाम दानव’ की साधारण लड़ाई नहीं है। यह एक गहरी मानसिक जंग है, जो पाठक को शुरुआत से आखिर तक बांधे रखती है। कला और चित्रकारी का स्तर इतना मजबूत है कि हर पन्ना देखने लायक बन जाता है। नागराज का अपनी सीमाओं को समझना और ‘इन्फ्रारेड विजन’ जैसी नई शक्ति पाना उसके किरदार के विकास को दिखाता है।
हालांकि ‘स्वप्न अर्क’ जैसी थोड़ी जटिल बातें छोटे पाठकों के लिए मुश्किल हो सकती हैं। कहानी धीरे-धीरे बहुत विस्तार से आगे बढ़ती है, लेकिन अंत में जुलू की हार थोड़ी जल्दी हो जाती है, जिससे कुछ पाठकों को लग सकता है कि क्लाइमेक्स थोड़ा और खिंच सकता था। फिर भी यह कमियां कहानी की ताकत के सामने छोटी लगती हैं।
गहन समीक्षा (In-depth Critique):

‘सो जा नागराज’ सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बनी है, बल्कि यह इंसानी दिमाग की ताकत और कमजोरी दोनों को दिखाती है। जॉली सिन्हा ने यह साफ किया है कि सुपरहीरो भी इंसान ही होता है। अगर उसे उसकी सबसे जरूरी जरूरत—नींद—से दूर कर दिया जाए, तो वह भी टूट सकता है।
कॉमिक्स का नाम ‘सो जा नागराज’ अपने आप में एक अलग सा एहसास देता है। आमतौर पर हम नायक से कहते हैं कि जागते रहो और लड़ो, लेकिन यहाँ जीत का रास्ता सोने से होकर गुजरता है। यह सोच अपने आप में अनोखी है। एक तरफ तंत्र-मंत्र और रहस्यमयी अर्क की बात है, तो दूसरी तरफ ईईजी मशीन और दिमाग की गतिविधि के प्रिंट-आउट भी दिखाए गए हैं। परंपरा और विज्ञान का यह मेल कहानी को और दिलचस्प बनाता है।
नागराज की हालत तब सबसे ज्यादा दर्दनाक हो जाती है जब उसे एहसास होता है कि उसके अपने ही सपने मासूम लोगों की मौत का कारण बन रहे हैं। जिन लोगों की रक्षा की उसने कसम खाई थी, वही उसके कारण खतरे में हैं। यह पछतावा उसे अंदर से तोड़ देता है और मानसिक दबाव और बढ़ जाता है। यही भावनात्मक संघर्ष कहानी को खास बनाता है।
निष्कर्ष:
कुल मिलाकर ‘सो जा नागराज’ राज कॉमिक्स की एक यादगार और क्लासिक कहानी है। यह हिम्मत, समझदारी और मजबूत इरादों की कहानी है। यह हमें बताती है कि दुश्मन चाहे हमारे दिमाग के अंदर ही क्यों न छिपा हो, अगर हमारे पास सही सलाह (जैसे डॉक्टर सस्सी और भीलराज) और मजबूत इच्छाशक्ति हो, तो हम हर मुश्किल को पार कर सकते हैं।
अगर आप कॉमिक्स पढ़ने के शौकीन हैं और कुछ ऐसा पढ़ना चाहते हैं जो सस्पेंस, डर और भावनाओं से भरपूर हो, तो ‘सो जा नागराज’ जरूर पढ़नी चाहिए। यह नागराज की सिर्फ उसकी शक्तियों का नहीं, बल्कि उसके इंसानी जज़्बे और हौसले का जश्न है।
