“युगान्धर और काखा” इस कॉमिक्स के लेखक टीकाराम सिप्पी हैं, जबकि इसके चित्रांकन की जिम्मेदारी विजय कदम और नीता बोराडे ने संभाली है। इस कहानी का नायक युगान्धर ऐसा चरित्र है जो सिर्फ अपनी शारीरिक ताकत के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी मजबूत नैतिकता और गहरी बुद्धिमानी के लिए भी जाना जाता है। वह हर हाल में सही और गलत के बीच फर्क समझता है और उसी के अनुसार निर्णय लेता है।
कथानक का विस्तार: प्रतिशोध की ज्वाला
कहानी की शुरुआत एक बेहद भयावह और कठोर प्रतिज्ञा से होती है। राक्षसराज काखा, जो दैत्य नगरी के पूर्व शासक दुर्दान्त का भाई है, अपने भाई की मौत का बदला लेने की कसम खाता है। दुर्दान्त का अंत युगान्धर के हाथों हुआ था, और काखा उसी कटे हुए सिर को सामने रखकर यह शपथ लेता है कि जब तक वह युगान्धर का खून अपने गुरु के कमंडल में नहीं भर देता, तब तक उसे चैन नहीं मिलेगा। यह प्रतिज्ञा काखा के भीतर जल रही बदले की आग को साफ दिखाती है।

कहानी के साथ-साथ हमें दैत्य कन्या खूबी से भी परिचित कराया जाता है। खूबी सिर्फ रूप से सुंदर नहीं है, बल्कि उतनी ही क्रूर, चालाक और स्वार्थी भी है। अपनी सत्ता और मनोरंजन के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है। वह शिकारियों को एक खतरनाक खेल में फँसाती है, जहाँ हारने वाले को सीधे मौत की सज़ा मिलती है। जब खूबी और काखा साथ आते हैं, तो खलनायकों की ताकत और भी ज़्यादा बढ़ जाती है।
दूसरी तरफ, युगान्धर अपने गुरु महागुरु के प्रथम श्राद्ध के लिए आश्रम जाने की तैयारी कर रहा होता है। इसी दौरान तड़ीपार नाम का एक राक्षसी लुटेरा अपने साथियों—तड़ीबाज और तड़ीचोर—के साथ युगान्तपुरी में आतंक फैलाने लगता है। युगान्धर उसका सामना करता है और उसे पराजित भी करता है, लेकिन यहीं से उसके जीवन में षड्यंत्रों और धोखे का सिलसिला शुरू हो जाता है।
षड्यंत्र और भ्रम का जाल
कहानी का सबसे रोमांचक और चौंकाने वाला मोड़ तब आता है, जब युगान्धर को उसकी बहन तारा के स्वयंवर के बहाने धोखे से बुलाया जाता है। यहाँ खूबी अपनी जादुई शक्तियों और रूप बदलने की कला का इस्तेमाल करती है। वह तारा का रूप धरकर युगान्धर को भ्रम में डाल देती है। कॉमिक्स में यह एक बेहद भावुक और तनाव से भरा दृश्य है, जहाँ युगान्धर को यह लगने लगता है कि उसकी अपनी बहन उससे विवाह करना चाहती है। यह मानसिक आघात उसे भीतर तक तोड़ देता है।

इसके बाद राजा शरीफ सिंह की हत्या और उससे जुड़े घटनाक्रम कहानी की रफ्तार को और तेज़ कर देते हैं। युगान्धर को दोषी ठहराकर उसे ‘कलंकित’ घोषित कर दिया जाता है। यह आरोप उसे गहरे आत्मग्लानि और पीड़ा में डुबो देता है। लेकिन जब सच्चाई सामने आती है, तो उसका दबा हुआ क्रोध ज्वालामुखी की तरह फट पड़ता है और आगे की कहानी एक नए, और भी तीखे मोड़ की ओर बढ़ जाती है।
पात्रों का गहन विश्लेषण
युगान्धर:
युगान्धर एक आदर्श नायक के रूप में सामने आता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका ‘अमोघ रथ’ जरूर है, लेकिन असल में उसकी वास्तविक शक्ति उसका चरित्र और उसकी सोच है। जब वह काखा और खूबी को बेहोशी की हालत में देखता है, तो उन पर वार नहीं करता, क्योंकि उसके लिए निहत्थे और अचेत शत्रु को मारना कायरता है। यह दृश्य युगान्धर को आम नायकों से अलग पहचान देता है और उसे एक नैतिक योद्धा के रूप में स्थापित करता है।

काखा:
काखा शुद्ध शारीरिक बल का प्रतीक है। उसका पूरा चरित्र बदले की भावना से अंधा हो चुका है। वह अपने गुरु एकहाथ और एकटांग के इशारों पर चलने वाला एक साधन मात्र बन जाता है। भले ही वह स्वयं ज्यादा नहीं सोचता, लेकिन उसकी गदा का वार बेहद घातक है, जो उसे एक खतरनाक प्रतिद्वंद्वी बनाता है।
खूबी:
खूबी इस कॉमिक्स की सबसे रोचक और चालाक खलनायिका है। उसके पास ‘कातिल दर्पण’ (Killer Mirror) जैसा खतरनाक हथियार है, जो सूर्य की किरणों को एक जानलेवा लेज़र में बदल देता है। उसकी चालाकी, उसका घमंड और खुद पर जरूरत से ज्यादा भरोसा ही आखिरकार उसकी हार का कारण बनते हैं।
एकहाथ और एकटांग:
एकहाथ और एकटांग इस कहानी के असली ‘मास्टरमाइंड’ हैं। वे खुद शारीरिक रूप से अक्षम हैं, लेकिन तांत्रिक और मानसिक शक्तियों से भरपूर हैं। वे सीधे लड़ने के बजाय अपने शिष्यों—काखा और खूबी—को आगे बढ़ाकर युगान्धर को खत्म करने की साजिश रचते हैं।
कला और चित्रांकन (Artwork)

विजय कदम और नीता बोराडे का चित्रांकन ‘युगान्धर’ को एक शानदार विजुअल अनुभव बना देता है। 90 के दशक की खास पहचान—चमकीले रंग और बारीक बैकग्राउंड—यहाँ साफ नजर आती है। अमोघ रथ का डिज़ाइन इसे सिर्फ एक साधारण वाहन नहीं, बल्कि एक खतरनाक युद्ध मशीन की तरह पेश करता है। उसके नुकीले हथियार इसके आक्रामक रूप को और प्रभावशाली बनाते हैं।
पात्रों के चेहरे के भाव इतने जीवंत हैं कि युगान्धर के चेहरे पर दिखने वाला ‘झटका’ और हैरानी पाठक तक उसकी मानसिक हालत को पूरी तरह पहुँचा देती है। युद्ध दृश्यों में ‘धम्म’, ‘तनाक’ और ‘खच्च’ जैसे ध्वनि शब्दों का इस्तेमाल एक्शन के रोमांच को दोगुना कर देता है।
संवाद और पटकथा

टीकाराम सिप्पी की पटकथा कसाव लिए हुए है। संवादों में वीरता और नाटकीयता का संतुलन साफ दिखता है। उदाहरण के तौर पर युगान्धर का यह संवाद—
“बहन और भाई के पवित्र रिश्ते पर तूने मुझे वरमाला पहनाने की कोशिश करके कालिख पोत दी है तारा! इसकी सजा है तेरी मौत!”
यह साफ दिखाता है कि युगान्धर के लिए नैतिकता और मर्यादा सबसे ऊपर है।
खलनायकों के संवाद भी उनके घमंड और आत्मविश्वास को अच्छे से दर्शाते हैं। खूबी का अपने कातिल दर्पण पर भरोसा और काखा की गर्जना कहानी में लगातार तनाव बनाए रखती है।
मुख्य आकर्षण: जादुई अस्त्र और तकनीक

‘युगान्धर’ में विज्ञान और कल्पना का मेल कहानी को एक अलग ही रोमांच देता है। कातिल दर्पण का विचार दरअसल प्राचीन लेज़र तकनीक का एक रचनात्मक रूप है, जहाँ सूर्य की किरणों को केंद्रित करके उन्हें विनाशकारी ऊर्जा में बदला जाता है।
कहानी के अंत में दिखाया गया वध-यंत्र (Execution Machine) अपनी भयावह कल्पना से पाठकों की धड़कनें बढ़ा देता है। स्प्रिंग से जुड़े उस नुकीले हल की सोच, जो एक रस्सी के कटते ही सीने को चीर सकता है, क्लाइमेक्स में जबरदस्त सस्पेंस पैदा करती है।
नैतिक पक्ष और संदेश

“युगान्धर और काखा” सिर्फ एक मार-धाड़ वाली कहानी नहीं है, बल्कि यह नैतिकता से जुड़े कठिन सवाल भी उठाती है।
क्या शत्रु के साथ भी न्याय करना चाहिए? युगान्धर इसका जवाब ‘हाँ’ में देता है।
क्या प्रतिशोध के लिए किसी भी हद तक जाना सही है? काखा का चरित्र बताता है कि यह रास्ता विनाश की ओर ले जाता है।
कहानी का अंत यही सिखाता है कि बुराई चाहे जितनी भी चालाक क्यों न हो, धर्म और सत्य की रक्षा करने वाला अंत में जीतता ही है।
कहानी का चरमोत्कर्ष (Climax)
अंतिम युद्ध महागुरु के आश्रम में होता है, जो प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। जहाँ से बदले की आग भड़की थी, वहीं उसका अंत भी होता है। खूबी का अपने ही कातिल दर्पण की वजह से मारा जाना और काखा का पत्थर के नीचे दबकर मरना, “जैसी करनी वैसी भरनी” की कहावत को पूरी तरह साबित करता है। युगान्धर का अपनी सहेलियों शैल और चारू को बचाना और अंत में अमोघ रथ पर सवार होकर आगे बढ़ जाना कहानी को एक संतोषजनक अंत देता है।
