राज कॉमिक्स ने भारतीय कॉमिक्स की दुनिया को नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव और परमाणु जैसे कई बड़े नायक दिए हैं, लेकिन डोगा की पहचान शुरू से ही सबसे अलग रही है। जहाँ बाकी हीरो अपनी ताकत, आदर्शों और नैतिक मूल्यों के लिए जाने जाते थे, वहीं डोगा यानी सूरज एक ऐसा विजिलेंटे था जो कानून की सीमाओं में बँधकर नहीं चलता था। अपराधी अगर सामने है, तो सज़ा भी वहीं तय है। वह मुंबई का रखवाला था, ऐसा रखवाला जिसकी नसों में पूरे शहर का गुस्सा, दर्द और हकीकत दौड़ती थी।
संजय गुप्ता द्वारा लिखी गई ‘डोगा हाय हाय’ उस दौर में आई जब भारत का सामाजिक माहौल बेहद संवेदनशील हो चुका था। हर तरफ अफवाहें, नफरत और सांप्रदायिक सोच फैल रही थी। यह कॉमिक ‘डोगा हिंदू है’ और ‘अपना भाई डोगा’ के बाद की कड़ी है और मिलकर ये तीनों कहानियाँ एक मजबूत त्रयी (Trilogy) बनाती हैं। इस भाग में डोगा को किसी शारीरिक लड़ाई से नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी नैतिक और सामाजिक परीक्षा से गुजरना पड़ता है।
साजिश का जाल
कहानी ठीक वहीं से शुरू होती है जहाँ पिछला भाग खत्म हुआ था। खलनायक ब्लडमैन डोगा को बर्बाद करने के लिए एक बेहद चालाक और खतरनाक साजिश रच चुका है। इस बार हथियार बंदूक या चाकू नहीं, बल्कि धर्म है। डोगा, जो हमेशा इंसानियत और इंसाफ के साथ खड़ा रहा, उसे अचानक एक खास धर्म का समर्थक दिखाया जाने लगता है। उसे जानबूझकर “हिंदू डोगा” की छवि में फँसाया जाता है।

कहानी में दीनानाथ की बेटी अलका की विदाई डोगा के हाथों होती है, लेकिन कुछ दंगाई इस मौके को सांप्रदायिक रंग दे देते हैं। उसी इलाके में एक मुस्लिम परिवार की शादी के दौरान दंगा भड़क उठता है। तभी एक वीडियो सामने आता है जिसमें डोगा चुपचाप खड़ा दिखाई देता है, जबकि एक मुस्लिम दुल्हन के साथ बदसलूकी हो रही होती है।
पूरी कहानी का टकराव इसी वीडियो के आसपास घूमता है। जो जनता कल तक डोगा को अपना मसीहा मानती थी, वही आज सड़कों पर उतरकर ‘डोगा हाय हाय’ और ‘डोगा मुर्दाबाद’ के नारे लगाने लगती है। डोगा चारों तरफ से घिर जाता है। सिर्फ गुंडों और दंगाइयों से नहीं, बल्कि उसी आम जनता से भी, जिसकी उसने सालों तक जान की बाज़ी लगाकर रक्षा की थी।
सांप्रदायिकता और समाज का कड़वा सच
संजय गुप्ता इस कहानी के ज़रिए समाज की उस सच्चाई को सामने लाते हैं, जो बहुत तकलीफदेह है। यहाँ दिखाया गया है कि कैसे लोग पल भर में अपने ही रक्षक को दुश्मन मान लेते हैं। कॉमिक के पन्नों में साफ नजर आता है कि एक छोटी सी अफवाह और तोड़-मरोड़ कर दिखाया गया वीडियो यानी आज की भाषा में फेक न्यूज़, पूरे शहर को आग में झोंक सकता है।
मुंबई, जिसे डोगा अपना घर मानता है, अब उसके लिए अजनबी बन चुकी है। दंगों के दृश्य इतने जीवंत और डरावने हैं कि पढ़ते समय बेचैनी होने लगती है। लोग एक-दूसरे का खून बहाने को तैयार हैं। इस पूरी आग में घी डालने का काम ब्लडमैन जैसे लोग करते हैं, जो धर्म की आड़ में अपना धंधा चमकाना चाहते हैं और खून बेचकर मुनाफा कमाते हैं।
डोगा का किरदार: एक बेबस नायक
आमतौर पर हम डोगा को अपराधियों की हड्डियाँ तोड़ते, उन्हें डर से काँपते देखते आए हैं, लेकिन ‘डोगा हाय हाय’ में उसका बिल्कुल अलग रूप सामने आता है। यहाँ वह शारीरिक रूप से लाचार और मानसिक रूप से टूटा हुआ दिखाई देता है। साजिशकर्ताओं ने उसे नशीली बर्फी और खतरनाक रसायनों की मदद से लकवाग्रस्त कर दिया था, जिसकी वजह से वह उस विवादित वीडियो में हिल तक नहीं पाता।

डोगा का सबसे बड़ा दर्द यह नहीं है कि लोग उसे पीट रहे हैं, बल्कि यह है कि वह जवाब में हाथ नहीं उठा सकता। सामने खड़े लोग अपराधी नहीं हैं, बल्कि वही आम नागरिक हैं जो अफवाहों के जाल में फँस चुके हैं। यहीं डोगा की असली नैतिकता सामने आती है। वह चाहे खुद मर जाए, लेकिन अपने ही शहर के मासूम लोगों पर गोली चलाने का ख्याल तक नहीं करता।
पुलिस और फॉरेंसिक जांच: कानून की नजर से सच्चाई
कॉमिक का एक बड़ा हिस्सा इंस्पेक्टर खोंपड़ और खुरदुरा की जांच पर टिका हुआ है। यह हिस्सा इसलिए खास बन जाता है क्योंकि यहाँ ताकत नहीं, बल्कि धैर्य और विज्ञान की भूमिका सामने आती है। खुरदुरा, जो हमेशा से डोगा का विरोधी रहा है, इस बार भीड़ के साथ बहने के बजाय सच्चाई तक पहुँचने की कोशिश करता है।
फॉरेंसिक जांच में यह सामने आता है कि डोगा के चेहरे पर थूकने वाले व्यक्ति के थूक में पायरिया नाम की बीमारी के अंश मौजूद थे, जो साफ इशारा करता है कि वह कोई आम आदमी नहीं, बल्कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति था। वहीं वीडियो की गहराई से जांच करने पर यह भी पता चलता है कि डोगा की आँखों की पुतलियाँ बिल्कुल स्थिर थीं। यह इस बात का सबूत था कि उसे किसी रासायनिक असर से जड़ यानी फ्रोजन कर दिया गया था।
यह पूरा हिस्सा पाठकों को यह समझाने का काम करता है कि अफवाहों और भावनाओं के बहाव में बहने से बेहतर है कि तथ्यों और सबूतों को ध्यान से देखा जाए।
लोमड़ी का किरदार: वफादारी और हिम्मत की पहचान
लोमड़ी (The Fox) इस कहानी में डोगा की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आती है। जब पूरा शहर और पूरी दुनिया डोगा के खिलाफ खड़ी थी, तब सिर्फ वही थी जिसने बिना सवाल किए सच्चाई जानने की कोशिश की। वही थी जिसने डोगा को मौत के मुंह से वापस खींच लिया।

सीवर यानी गटर के दृश्य, जहाँ डोगा को एसिड डालकर मारने की कोशिश की जाती है, वहाँ लोमड़ी का साहस दिल छू लेने वाला है। बिना किसी लंबे संवाद के, नायक और नायिका के बीच का रिश्ता बहुत कुछ कह जाता है। यह रिश्ता भरोसे, समर्पण और खामोश समझदारी का प्रतीक बन जाता है।
चित्रांकन (Art) और दृश्य प्रस्तुति
राज कॉमिक्स का आर्टवर्क हमेशा से मजबूत रहा है, लेकिन इस कॉमिक में रंगों और शेडिंग का इस्तेमाल कहानी के भारी माहौल को और असरदार बना देता है। दंगों के दृश्यों में लाल और नारंगी रंगों का प्रयोग हिंसा, आग और नफरत की तीव्रता को साफ दिखाता है।
डोगा का वह दृश्य, जहाँ वह सीवर में घायल पड़ा है और उसके कुत्ते उसे घेरे हुए हैं, बेहद भावुक कर देने वाला है। चित्रकार ने डोगा की आँखों में छिपे दर्द, थकान और बेबसी को बहुत संवेदनशील तरीके से उकेरा है। हर पैनल कहानी की रफ्तार को बनाए रखता है और पाठक को बाँधे रखता है।
विलेन: ‘ब्लडमैन’ का प्रतीकात्मक अर्थ
ब्लडमैन सिर्फ एक खलनायक नहीं है, बल्कि वह उन ताकतों का प्रतीक है जो समाज में फूट डालकर अपना फायदा निकालती हैं। उसका所谓 ‘खून का धंधा’ असल में नफरत का धंधा है। वह जानता है कि अगर डोगा जैसे नायक की छवि खराब कर दी जाए, तो कानून और व्यवस्था की रीढ़ टूट सकती है।

डोगा को बदनाम करके ब्लडमैन शहर को अराजकता की आग में झोंक देना चाहता है, ताकि उसी आग में वह अपनी सत्ता और मुनाफा दोनों सेंक सके।
संवाद और पटकथा
कॉमिक के संवाद सीधे दिल पर चोट करते हैं। खासतौर पर वे दृश्य, जहाँ भीड़ डोगा को गालियाँ देती है या जब डोगा अपने मन में कहता है, “मैं अपनी टूटी हड्डियाँ तो जोड़ सकता हूँ, लेकिन समाज के टूटे भरोसे को कैसे जोड़ूँ?” — ये पंक्तियाँ पाठक को भीतर तक झकझोर देती हैं।
यहाँ तरुण कुमार वाही का लेखन पूरी ताकत के साथ उभरता है। संवाद न सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि उसके भावनात्मक असर को भी कई गुना बढ़ा देते हैं।
मनोवैज्ञानिक पहलू: भीड़ की मानसिकता
यह कॉमिक मॉब साइकोलॉजी यानी भीड़ की मानसिकता पर एक सटीक और गहरी टिप्पणी है। भीड़ का न कोई चेहरा होता है और न ही कोई सोच। जो लोग कल तक डोगा को भगवान मानते थे, वही आज उसके गले में पड़े ‘ओम’ के लॉकेट को देखकर, जो जानबूझकर प्लांट किया गया था, उसे कातिल घोषित कर देते हैं।
यह साफ दिखाता है कि जब इंसान धर्म और नफरत का चश्मा पहन लेता है, तो सच और झूठ के बीच का फर्क पूरी तरह मिट जाता है।
कहानी का क्लाइमेक्स और अंत

कहानी का अंत एक जबरदस्त क्लिफहैंगर पर होता है। डोगा बुरी तरह घायल है, शहर आग में जल रहा है और पुलिस प्रशासन खुद को असहाय महसूस कर रहा है। डोगा का अपने कुत्तों के बीच सिसकना और अगली कड़ी ‘रो पड़ा डोगा’ का संकेत, पाठकों के दिल में गहरी संवेदना छोड़ जाता है।
समीक्षा का निष्कर्ष: क्यों जरूरी है यह कॉमिक?

‘डोगा हाय हाय’ सिर्फ बच्चों के लिए बनाई गई एक साधारण कॉमिक नहीं है। यह एक गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली ग्राफिक नोवेल है। यह कहानी सांप्रदायिकता के खिलाफ एक मजबूत आवाज उठाती है। यह दिखाती है कि किसी नायक के लिए सबसे कठिन वक्त वह होता है, जब उसे अपने ही लोगों की नफरत का सामना करना पड़ता है। यह सुपरहीरो को भगवान नहीं, बल्कि एक आम इंसान के रूप में पेश करती है, जो टूट सकता है, हार सकता है और दर्द महसूस कर सकता है।
अंतिम विचार:
संजय गुप्ता और उनकी टीम ने इस कॉमिक के जरिए भारतीय कॉमिक्स को एक नया और साहसी मोड़ दिया है। आज के सोशल मीडिया और फेक वीडियो के दौर में यह कहानी और भी ज्यादा सटीक लगती है, जहाँ किसी की भी छवि कुछ मिनटों में तबाह की जा सकती है।
‘डोगा हाय हाय’ ऐसी कहानी है जो आपकी आँखों में आँसू भी लाएगी और आपके भीतर छुपे गुस्से को भी जगाएगी। अगर आप एक ऐसी कहानी पढ़ना चाहते हैं जो सिर्फ सुपरहीरो एक्शन तक सीमित न हो, बल्कि समाज और इंसान की मानसिकता को भी समझे, तो यह कॉमिक आपके संग्रह में जरूर होनी चाहिए। यह राज कॉमिक्स की उन चुनिंदा कहानियों में से है, जिन्हें लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
रेटिंग: 5/5
सिफारिश: हर उस पाठक के लिए जो भारतीय समाज, न्याय व्यवस्था और महानायकों के मानवीय पक्ष को समझना चाहता है।
