तुलसी कॉमिक्स के स्वर्णिम दौर में ‘योगा’ एक ऐसा किरदार बनकर सामने आया, जिसने सिर्फ शारीरिक ताकत ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक शक्ति यानी योग को भी अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। वेद प्रकाश शर्मा, जो अपनी रहस्यमयी और रोमांच से भरी कहानियों के लिए मशहूर रहे हैं, उन्होंने इस कॉमिक्स के ज़रिये एक आम से बच्चे के ‘योगा’ बनने के सफर को बेहद भावुक और रोमांचक अंदाज़ में पेश किया है। ‘योगा की कहानी’ सिर्फ एक एक्शन कॉमिक्स नहीं है, बल्कि यह दर्द, टूटन, बदले की आग और इंसाफ की तलाश की एक लंबी और गहरी यात्रा है।
कथानक का विस्तार (Plot Analysis)
कहानी की शुरुआत होती है ‘योगिराज’ से, जो योग विद्या के महान आचार्य हैं और भारतीय सेना के लिए योग में पारंगत योद्धाओं की एक खास बटालियन तैयार कर रहे हैं। उनके साथ एक रहस्यमयी शिष्य भी है—योगा। योगा की शक्तियाँ असाधारण हैं। वह एक साथ हज़ारों शरीर बना सकता है और अपने सूक्ष्म शरीर के ज़रिये कहीं भी आ-जा सकता है। लेकिन सवाल यही है कि योगा आखिर है कौन? उसका अतीत क्या है? पूरी कॉमिक्स की कहानी इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द घूमती है।

योगा का असली नाम शगुन था। वह एक बिल्कुल साधारण किशोर था, जिसके दो ही शौक थे—एक्शन फिल्में देखना और मार्शल आर्ट्स सीखना। कहानी तब अचानक करवट लेती है जब एक दिन उसकी स्कूल बस को ‘टिंकोरा’ नाम का अपराधी अपने गिरोह के साथ हाईजैक कर लेता है। टिंकोरा दरअसल शगुन के पिता, प्रोफेसर विक्रम, से एक गुप्त रहस्य ‘नीली छतरी’ के बारे में जानकारी चाहता था।
यहीं से कहानी एक बेहद अंधेरे और दर्दनाक मोड़ पर पहुँच जाती है। टिंकोरा शगुन और उसके माता-पिता को बंदी बना लेता है और उन पर अमानवीय अत्याचार करता है। शगुन अपनी फिल्मी समझदारी और हिम्मत से भागने की कोशिश तो करता है, लेकिन टिंकोरा की बेरहमी के सामने वह बेबस साबित होता है। अपराधी न सिर्फ उसके माता-पिता की बेरहमी से हत्या कर देते हैं, बल्कि उनके घर को भी आग के हवाले कर देते हैं। शगुन किसी तरह एक सुरंग के रास्ते अपनी जान बचाकर निकल तो आता है, लेकिन पीछे छूट जाती हैं उसके माता-पिता की अस्थियाँ और उसके दिल में जलती हुई बदले की आग।
एक अनोखा हथियार: ‘इंसाफ’

इस कॉमिक्स की सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली और शायद सबसे डरावनी बात है शगुन का बदला लेने का तरीका। वह अपने माता-पिता की अस्थियों को इकट्ठा करता है और उनसे एक हथियार बनाता है—एक गदा जैसी भारी अस्त्र, जिसे वह ‘इंसाफ’ नाम देता है। यह सोच कि एक नायक अपने ही माता-पिता की हड्डियों से बना हथियार उठाए घूम रहा है, कहानी को एक अलग ही स्तर की गंभीरता और कठोरता देता है। इससे साफ पता चलता है कि शगुन का दर्द और गुस्सा कितना गहरा है।
शारीरिक प्रशिक्षण से आध्यात्मिक ज्ञान तक
शगुन सबसे पहले मार्शल आर्ट्स के कोच बोगा के पास जाता है। वहाँ वह अपने शरीर को इतना मजबूत बना लेता है कि उसकी ताकत चरम पर पहुँच जाती है। वह टिंकोरा के पूरे अपराध साम्राज्य को तहस-नहस कर देता है और धोखेबाज़ इंस्पेक्टर चोगले को भी उसकी सज़ा मिलती है। लेकिन जब उसका सामना असली खलनायक ‘भयंकर’ से होता है, तब उसे एहसास होता है कि सिर्फ ताकतवर शरीर और हथियार ही काफी नहीं हैं। भयंकर एक तांत्रिक है और योग शक्तियों का माहिर जानकार भी। वह शगुन को बेहद आसानी से हरा देता है।

यहीं कहानी में एक अलग ही दिव्य मोड़ आता है। एक रहस्यमयी महात्मा शगुन को समझाते हैं कि अगर उसे भयंकर को हराना है, तो उसे ‘योग विद्या’ सीखनी ही होगी। इसके बाद शगुन का सफर शुरू होता है योगिराज के आश्रम की ओर, जहाँ वह सालों की कठोर तपस्या और साधना के बाद ‘योगा’ के रूप में नया जन्म लेता है।
चरित्र चित्रण (Character Development)
शगुन/योगा: शगुन का किरदार बहुत गहराई से विकसित किया गया है। एक चंचल और सपने देखने वाले लड़के से एक टूटे हुए, बदले से भरे इंसान और फिर एक शांत लेकिन बेहद शक्तिशाली योग योद्धा बनने का सफर लेखक ने बड़े ही सधे हुए ढंग से दिखाया है। उसकी बेबसी पाठक के दिल को छू जाती है और उसकी जीत प्रेरणा देती है।
योगिराज: योगिराज एक मार्गदर्शक ही नहीं, बल्कि पिता समान व्यक्तित्व हैं। उनका किरदार यह दिखाता है कि शक्ति और अनुशासन का सही संतुलन कितना ज़रूरी है।

टिंकोरा और भयंकर: टिंकोरा एक आम किस्म का अपराधी है, लेकिन भयंकर एक अलग ही स्तर का खलनायक है। उसकी मौजूदगी कहानी में रहस्यमय, अलौकिक और डर पैदा करने वाला माहौल बना देती है।
लेखन और संवाद (Writing and Dialogues)
वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी का असर यहाँ साफ़ दिखाई देता है। उनके संवादों में पूरा ‘पल्प’ वाला मज़ा है। जैसे—
“निहत्थे के सामने हथियार लेकर अकड़ता है… मर्द का बच्चा है तो फेंक दे हथियार और हो जाए दो-दो हाथ।”
इस तरह के डायलॉग सीधे 90 के दशक की एक्शन फिल्मों की याद दिलाते हैं। कहानी की रफ्तार शुरू से लेकर अंत तक तेज़ बनी रहती है और कहीं भी ढीली नहीं पड़ती। हर पेज खत्म होते ही पाठक अपने आप अगला पेज पलटने पर मजबूर हो जाता है।
कला और चित्रांकन (Art and Illustrations)

तुलसी कॉमिक्स के चित्रकार (संभव है प्रदीप साठे या उस दौर के किसी और कलाकार ने) ने हर दृश्य को पूरी जान के साथ उकेरा है।
मार्शल आर्ट्स की लड़ाइयों और ‘इंसाफ’ अस्त्र के वार को बहुत ही ऊर्जा और गति के साथ दिखाया गया है।
शगुन का अपने माता-पिता की चिता के पास बैठकर रोना या उनकी अस्थियों को समेटना—ये दृश्य ऐसे हैं जो बिना किसी संवाद के भी बहुत कुछ कह जाते हैं। कॉमिक्स में चटख रंगों का इस्तेमाल उस दौर की पहचान था, लेकिन अंधेरे दृश्यों और तांत्रिक क्रियाओं के समय रंगों का चयन माहौल में रहस्य और डर पैदा करने में पूरी तरह सफल रहता है।
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलू
यह कॉमिक्स परोक्ष रूप से सिस्टम की नाकामी को भी सामने लाती है। जब शगुन पुलिस कमिश्नर के पास जाता है, तो उसे इंसाफ नहीं, बल्कि समझौते और सब्र की सलाह दी जाती है। यही बेबसी धीरे-धीरे उसे खुद कानून हाथ में लेने के रास्ते पर धकेल देती है। अपने माता-पिता की अस्थियों से हथियार बनाना उसके गहरे मानसिक आघात (Trauma) को दर्शाता है। वह अपने माता-पिता को खुद से अलग नहीं करना चाहता, इसलिए वह उन्हें हमेशा अपने साथ, अपने हथियार के रूप में रखता है।
‘योग’ का महत्व

इस कॉमिक्स का एक बड़ा मकसद योग की शक्ति और महत्व को दिखाना भी लगता है। भले ही यहाँ योग को सुपर-पावर के रूप में पेश किया गया हो, लेकिन संदेश बिल्कुल साफ़ है—मन और आत्मा की ताकत, सिर्फ शरीर की ताकत से कहीं ज़्यादा बड़ी होती है।
निष्कर्ष (Final Verdict)
‘योगा की कहानी’ एक क्लासिक बदले की कहानी है, जिसे भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक सोच के साथ जोड़ा गया है। लगभग 1300 शब्दों की इस विस्तृत समीक्षा के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि यह कॉमिक्स तुलसी कॉमिक्स के इतिहास की सबसे अहम और यादगार रचनाओं में से एक है।
यह कहानी हमें सिखाती है कि:
अन्याय के खिलाफ खड़ा होना ज़रूरी है।
सिर्फ शारीरिक ताकत काफी नहीं होती, मानसिक एकाग्रता और ज्ञान भी उतने ही ज़रूरी हैं।
बदले की आग इंसान को बर्बाद कर सकती है, लेकिन अगर उसे सही दिशा यानी योग मिल जाए, तो वही आग ‘इंसाफ’ बन सकती है।
अगर आप पुराने ज़माने की कॉमिक्स के शौकीन हैं, तो ‘योगा की कहानी’ आपके लिए किसी खज़ाने से कम नहीं है। यह सिर्फ रोमांच नहीं देती, बल्कि ऐसे नायक से मिलवाती है जो अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसके अगले भाग ‘योगा का इंतकाम’ की मजबूत नींव भी यही कॉमिक्स बड़े शानदार तरीके से रखती है।
रेटिंग: 4.5/5
