‘नूतन चित्रकथा’ द्वारा प्रकाशित ‘राका दी ग्रेट’ (Raka the Great) कॉमिक्स एक ऐसी रचना है जिसने अपनी दमदार कहानी और अलग अंदाज़ के नायक की वजह से पाठकों के दिल में खास जगह बनाई। आबिद रिज़वी द्वारा लिखी गई और विष्णु-पवन द्वारा चित्रित यह कॉमिक सिर्फ एक वीरता की कहानी नहीं है, बल्कि उस दौर की सामाजिक सोच और देशभक्ति की भावना को भी अच्छे से सामने लाती है। 32 पन्नों की यह रोमांचक यात्रा हमें एक ऐसे नायक से मिलवाती है जो पहाड़ों में पला-बढ़ा है और बुराई के खिलाफ चट्टान की तरह खड़ा रहता है।
कथानक का विस्तृत विश्लेषण:
कहानी की शुरुआत ‘शमराल’ की पहाड़ियों से होती है, जहाँ पहले सब कुछ शांत नजर आता है, लेकिन अचानक हालात बिगड़ जाते हैं। ‘मूंगा’ (Moonga) नाम का एक बेहद क्रूर अपराधी अपने गुंडों के जरिए इलाके में आतंक फैला रहा है। ये गुंडे सिर्फ जानवरों और सामान की चोरी ही नहीं करते, बल्कि मासूम लोगों को बेरहमी से पीटते और मारते भी हैं। कहानी के शुरुआती पन्नों में ही मूंगा के गुंडों की हैवानियत दिखाई जाती है, जहाँ वे एक माँ की गोद से उसका बच्चा छीनकर भाग जाते हैं। यह दृश्य पाठक के दिल को झकझोर देता है और तुरंत ही खलनायक के लिए नफरत और नायक के आने की उम्मीद जगा देता है।

इसी वक्त हमारे नायक ‘राका’ की एंट्री होती है। राका को एक ताकतवर, गठीले बदन वाले नायक के रूप में दिखाया गया है, जो नकाब पहनता है और अपने भरोसेमंद सफेद घोड़े ‘टाइगर’ पर सवार रहता है। राका सिर्फ ताकत का नाम नहीं है, बल्कि उसके साथ दो खास साथी भी हैं—उसका घोड़ा टाइगर और उसका शिकारी बाज ‘शेरा’। राका का प्रवेश बिल्कुल किसी फिल्मी हीरो जैसा है, जो ऐन मौके पर पहुँचकर बच्चे को बचाता है और गुंडों की जमकर धुनाई करता है। वह घायल गुंडों को उन्हीं के घोड़ों पर बाँधकर मूंगा के पास भेज देता है, जो साफ तौर पर मूंगा के लिए खुली चुनौती होती है।
कहानी का दूसरा भाग मूंगा के किरदार और उसके इरादों को और गहराई से दिखाता है। मूंगा कोई मामूली डाकू नहीं है। वह पहाड़ियों के अंदर एक छिपा हुआ अंडरग्राउंड बेस चलाता है, जो आधुनिक मशीनों, लैब्स और हथियारों से भरा हुआ है। मूंगा को एक आंख वाले खलनायक के रूप में दिखाया गया है, जो विदेशी एजेंटों के साथ मिलकर देश में नशीली दवाओं और अवैध हथियारों की तस्करी करना चाहता है। यहाँ कहानी सिर्फ एक एक्शन कॉमिक नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे एक जासूसी थ्रिलर का रूप ले लेती है। मूंगा का यह कहना कि “पहाड़ियों पर सिर्फ मूंगा का हुक्म चलेगा,” उसके घमंड और तानाशाही सोच को साफ दिखाता है।

कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है जब मूंगा अपने आधुनिक हेलीकॉप्टर ‘तडपा-2’ (Tadpa-2) से राका पर हमला करता है। यह सीन कॉमिक्स के सबसे रोमांचक दृश्यों में से एक है। मशीनगन से लैस हेलीकॉप्टर और नीचे घोड़े पर सवार राका का सामना पुराने और नए ज़माने की ताकतों की टक्कर जैसा लगता है। इस दौरान राका का बाज ‘शेरा’ अपनी समझदारी और वफादारी दिखाता है। वह हेलीकॉप्टर के पायलट पर झपट्टा मारकर उसका ध्यान भटका देता है, जिससे मूंगा के हाथ से मशीनगन छूट जाती है। इसके बाद राका एक ऐसा कारनामा करता है जो लगभग नामुमकिन लगता है—जब उसे जाल में फँसाकर हेलीकॉप्टर से ऊपर खींच लिया जाता है, तो वह अपनी कटार से जाल काटकर हवा में ही टाइगर की पीठ पर कूद जाता है। यह दृश्य खासकर बच्चों की कल्पना को जबरदस्त रोमांच देता है।
चरमोत्कर्ष (Climax)

में राका अकेले ही मूंगा के उस अड्डे पर हमला करता है जहाँ तस्करी का माल पहुँचने वाला होता है। वह ‘मिस्टर हेग’ और ‘मिस्टर खान’ जैसे अंतरराष्ट्रीय तस्करों को धूल चटाता है और करोड़ों का तस्करी का सामान पुलिस को सौंप देता है। अंत में मूंगा अपने चार सबसे खतरनाक लड़ाकों—‘किल मास्टर बैगा’, ‘डॉन मास्टर मिकी’, ‘चैंपियन मार्गरेट’ और ‘गन मास्टर स्टेनली’—को राका को खत्म करने भेजता है। राका और साँगा मिलकर इन सभी का सामना करते हैं। मूंगा हेलीकॉप्टर से भागने की कोशिश करता है, लेकिन राका ‘गन मास्टर स्टेनली’ की खास बंदूक से हेलीकॉप्टर पर सटीक निशाना साधता है। हेलीकॉप्टर मूंगा के ही विस्फोटक भंडार पर गिरता है और जबरदस्त धमाके के साथ उसका पूरा साम्राज्य खत्म हो जाता है। कहानी का अंत शमराल की पहाड़ियों में शांति लौटने और बुराई के अंत के साथ होता है।
पात्रों का विश्लेषण:

राका: वह एक आदर्श नायक है। उसके अंदर साहस, इंसाफ और प्रकृति के प्रति प्रेम साफ नजर आता है। वह सच में “पहाड़ों का बेटा” लगता है। उसका नकाब उसे रहस्यमय बनाता है। राका की सबसे बड़ी ताकत उसके पशु साथी—टाइगर और शेरा—हैं, जो यह दिखाते हैं कि इंसान और प्रकृति का रिश्ता कितना मजबूत हो सकता है।
मूंगा: वह एक असरदार और खतरनाक खलनायक है। उसके पास पैसा, तकनीक और विदेशी संपर्क सब कुछ है। उसकी ढकी हुई आंख उसके अधूरे और गलत सोच वाले व्यक्तित्व का प्रतीक लगती है। वह अपने ही साथियों के लिए भी बेरहम है, जो उसकी क्रूरता को और गहरा कर देता है।
साँगा: वह कहानी का ऐसा किरदार है जो शुरुआत में गलत राह पर होता है, लेकिन अंत में सही रास्ता चुनता है। उसका बदलाव यह संदेश देता है कि इंसान कभी भी अपने गलत रास्ते से लौट सकता है।
टाइगर और शेरा: ये बोलते नहीं हैं, लेकिन पूरी कहानी में इनकी अहमियत नायक के बराबर है। टाइगर की रफ्तार और शेरा की तेज नजर राका को और भी ताकतवर बना देती है।
कला और चित्रांकन (Art and Illustration):

विष्णु-पवन की कला शैली ‘नूतन चित्रकथा’ की खास पहचान थी। इस कॉमिक्स का चित्रांकन काफी जीवंत और ऊर्जा से भरा हुआ है। एक्शन दृश्यों में शरीर की हरकत, मांसपेशियों की ताकत और ‘धिशूम-धिशूम’ या ‘धड़ाम’ जैसे शब्द उस दौर की कॉमिक्स का असली मज़ा देते हैं। रंगों का चुनाव, खासकर राका का नीला नकाब और लाल लंगोट, उसे बाकी पात्रों से अलग पहचान देता है। पहाड़ियों और मूंगा के अड्डे का चित्रण इतना विस्तार से किया गया है कि पाठक खुद को उसी माहौल में महसूस करने लगता है। हेलीकॉप्टर क्रैश और आग के दृश्य उस समय के हिसाब से काफी प्रभावशाली थे।
साहित्यिक और सामाजिक महत्व:

‘राका दी ग्रेट’ सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि इसमें छुपे संदेश आज भी मायने रखते हैं। यह कॉमिक देशभक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्व को दर्शाती है। मूंगा जैसे विदेशी एजेंट के जरिए कहानी यह सिखाती है कि बाहरी खतरों से देश की रक्षा करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। इसके साथ ही, तस्करी और नशीली दवाओं जैसे गंभीर मुद्दों को दिखाकर बच्चों को इनके खतरों के बारे में जागरूक किया गया है। राका का अपने जानवरों के साथ गहरा रिश्ता पशु-प्रेम और संवेदनशीलता का संदेश देता है, जबकि कहानी का अंत अच्छाई की जीत के शाश्वत सच को मजबूती से सामने रखता है।
समीक्षात्मक टिप्पणी (Critical Evaluation):

सकारात्मक पहलू:
कहानी की रफ्तार इतनी तेज है कि पाठक शुरू से अंत तक जुड़ा रहता है। हर पन्ना अगले पन्ने को पढ़ने की उत्सुकता बढ़ाता है। कहानी की सबसे बड़ी ताकत इसका मजबूत नायक-खलनायक संतुलन है। मूंगा जैसा चालाक और ताकतवर विलेन ही राका की बहादुरी को और उभारता है। साथ ही, पारंपरिक वीरता और आधुनिक तकनीक का मेल कहानी को अलग और यादगार बनाता है।
सुधार के क्षेत्र:
राका के अतीत के बारे में थोड़ा और बताया जा सकता था। वह पहाड़ों का बेटा कैसे बना और उसकी ताकत का असली स्रोत क्या है, इस पर और रोशनी डाली जा सकती थी। मूंगा के चार खास लड़ाकों का मुकाबला भी थोड़ा जल्दी खत्म हो जाता है, जिन्हें थोड़ा और समय मिलना चाहिए था।
निष्कर्ष:
कुल मिलाकर, ‘राका दी ग्रेट’ नूतन चित्रकथा की एक शानदार पेशकश है। यह उस दौर की याद दिलाती है जब कहानियाँ सीधी-सादी लेकिन दिल को छू लेने वाली होती थीं। राका जैसे नायक हमें यह सिखाते हैं कि सच्चाई के रास्ते पर मुश्किलें जरूर आती हैं, लेकिन जीत आखिरकार सच की ही होती है। यह कॉमिक आज की पीढ़ी के लिए भी संभालकर रखने लायक है, क्योंकि यह हमें भारतीय कॉमिक्स की समृद्ध विरासत से जोड़ती है। आबिद रिज़वी की कहानी और विष्णु-पवन की कला ने मिलकर राका को सच में “ग्रेट” बना दिया है।
यह कॉमिक सिर्फ एक पुरानी याद नहीं, बल्कि साहस और वफादारी का ऐसा सबक है जिसे हर पीढ़ी को पढ़ना चाहिए। राका का यह वादा—“मैं फिर आऊँगा.. जब तुम याद करोगे!”—आज भी उसके चाहने वालों के दिलों में गूंजता है।
