मनोज कॉमिक्स द्वारा प्रकाशित ‘दूसरा शार्क’ (Doosra Shark) की यह समीक्षा सिर्फ इस खास अंक की कहानी पर बात नहीं करती, बल्कि उस दौर की भारतीय कॉमिक्स में चल रही रचनात्मक सोच और प्रेरणा की पतली रेखा को भी टटोलती है। यह कॉमिक्स ‘शार्क’ सीरीज़ का दूसरा और बेहद अहम हिस्सा है, जहाँ कहानी सिर्फ एक सुपरहीरो की नहीं रहती, बल्कि सत्ता, लालच और साज़िश की तरफ बढ़ जाती है।
‘दूसरा शार्क’: एक विस्तृत आलोचनात्मक समीक्षा
प्रस्तावना (Introduction)
‘दूसरा शार्क’ पहले अंक की कहानी को सीधे आगे बढ़ाता है। जहाँ पहले भाग में हमने शार्क के जन्म और उसकी शक्तियों के उभरने को देखा था, वहीं इस अंक में कहानी ज्यादा गहरी, ज्यादा रहस्यमयी और कहीं ज़्यादा राजनीतिक हो जाती है। लेखक महेंद्र जैन और चित्रकार चंदू ने मिलकर समुद्र के नीचे बसती एक ऐसी दुनिया रची है, जहाँ सिर्फ शांति और सुंदरता नहीं, बल्कि हिंसा, धोखा और सत्ता की लड़ाई भी मौजूद है। अपने समय के हिसाब से यह कॉमिक्स काफी डार्क और हिंसक कही जा सकती है, जो इसे बाकी कॉमिक्स से अलग बनाती है।

कथानक का विस्तार (Plot Breakdown)
कहानी की शुरुआत समुद्र के एक और डरावने इलाके ‘घोंघा महल’ से होती है। यहाँ दैत्यों का राजा ‘घोंघा’ राज करता है। पहले अंक का खतरनाक विलेन ‘हुंकार’ अब उसी घोंघा के सामने झुका हुआ दिखाई देता है। हुंकार, जलधार नगरी के असली राजा सोमारू को घोंघा की कैद में सौंप देता है, ताकि वह खुद जलधार नगरी पर बिना किसी रोक-टोक के राज कर सके।
दूसरी ओर, शार्क अपनी शक्तियों का इस्तेमाल समुद्री जीवों की रक्षा के लिए कर रहा है। वह एक आठ आँखों वाले भयानक समुद्री राक्षस से छोटी-छोटी मछलियों को बचाता है। इस हिस्से में शार्क की बहादुरी के साथ-साथ उसका करुणा भरा स्वभाव भी सामने आता है। जल-ऋषि जार्का उसे बताते हैं कि अब समय आ गया है कि वह हुंकार का अंत करे और अपनी माँ ‘मानसी’ से जुड़े रहस्य को समझे।
कहानी के मुख्य मोड़:
हुंकार की क्रूरता इस अंक में अपने चरम पर दिखाई देती है। उसे एक बेहद घिनौने विलेन के रूप में दिखाया गया है, जो जलधार नगरी के मासूम बच्चों को अपने नाश्ते और भोजन के रूप में माँगता है। यह दृश्य पाठक के मन में उसके लिए गहरी नफरत पैदा करता है और उसे एक सच्चा राक्षस साबित करता है।
धरती और समुद्र की दुनिया का मेल भी इसी अंक में देखने को मिलता है। राजनगर के समुद्र तट पर एक रहस्यमयी जल-गोला निकलता है, जिसके अंदर शार्क की माँ मानसी बेहोश पड़ी होती है। इंस्पेक्टर वागले, जो एक निडर और ईमानदार पुलिस अफसर है, इस अजीब घटना की जाँच शुरू करता है। यह उप-कहानी कॉमिक्स को सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं रखती, बल्कि इंसानी दुनिया से भी जोड़ देती है।

इसी बीच, राजा सोमारू की दूसरी पत्नी रानी जगीत्ता की असली चाल सामने आती है। वह अपने बेटे अखिलेचा को राजा बनाना चाहती है और इसी लालच में हुंकार से हाथ मिला लेती है। जगीत्ता शार्क को खत्म करने के लिए हुंकार को ‘जल टापू’ पर बुलाती है और चालाकी से शार्क को भी वहीं भेज देती है।
क्लाइमेक्स जल टापू पर पहुँचकर और भी खतरनाक हो जाता है। यहाँ शार्क जहरीले पौधों और हुंकार के जानलेवा हमलों का शिकार हो जाता है। जब ऐसा लगता है कि शार्क अब मारा गया, तभी अचानक एक और शार्क वहाँ प्रकट होता है। यही है ‘दूसरा शार्क’। यह रहस्यमयी योद्धा हुंकार को बेहद भयानक मौत देता है, उसे नुकीले तीरों की शय्या पर पटक देता है। अंत में, वह दूसरा शार्क असली शार्क की जान बचाते हुए खुद मर जाता है, और अपने पीछे एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है कि आखिर वह था कौन?
चरित्र चित्रण और विकास (Character Analysis)
शार्क इस अंक में एक ज्यादा समझदार और परिपक्व योद्धा के रूप में सामने आता है। हालाँकि, उसकी भावुकता ही उसकी कमजोरी बनती है, क्योंकि वह रानी जगीत्ता यानी अपनी सौतेली माँ की चाल में फँस जाता है। यह उसकी मासूमियत और भरोसेमंद स्वभाव को दिखाता है।
हुंकार का अंत इस कॉमिक्स का सबसे संतोषजनक हिस्सा है। बच्चों को खाने जैसी उसकी क्रूर हरकतें उसे भारतीय कॉमिक्स के सबसे डरावने और नफरत योग्य विलेन में खड़ा कर देती हैं।
इंस्पेक्टर वागले धरती पर चल रही कहानी की रीढ़ हैं। उनका अंदाज़ एक पुराने ज़माने के ईमानदार और ‘सलाम-ठोक’ पुलिस अफसर जैसा है, जो हर हाल में सच्चाई तक पहुँचना चाहता है।

रानी जगीत्ता को एक क्लासिक दुष्ट सौतेली माँ के रूप में दिखाया गया है, जिसकी सत्ता की भूख उसे अपने ही परिवार के खिलाफ खड़ा कर देती है। उसका चरित्र कहानी में साज़िश और विश्वासघात का असली चेहरा बनकर उभरता है।
कला और चित्रांकन (Art and Visuals)
इस अंक में चंदू का आर्टवर्क पिछले अंक के मुकाबले और भी निखर कर सामने आता है। हिंसा के दृश्यों को उन्होंने बिना किसी झिझक के खुलकर दिखाया है, जहाँ खून और मौत को विस्तार से दर्शाया गया है। खास तौर पर हुंकार का नुकीले तीरों पर गिरना और उससे पहले का पूरा युद्ध दृश्य काफी असरदार लगता है। राक्षसी मछलियों की डिज़ाइन और ‘घोंघा महल’ की कल्पना कलाकार की रचनात्मक सोच को साफ दिखाती है। समुद्र के नीचे के दृश्यों में नीले, हरे और बैंगनी रंगों का सही संतुलन एक गहरा और रहस्यमयी माहौल बनाने में पूरी तरह सफल रहता है, जिससे पाठक खुद को उसी दुनिया का हिस्सा महसूस करता है।
‘नकल’ या ‘प्रेरणा’ का मुद्दा (Is it a Copy or Inspired?)

अगर गहराई से देखा जाए, तो यह साफ हो जाता है कि ‘शार्क’ का किरदार और यह खास अंक कई वैश्विक और पौराणिक स्रोतों से प्रेरणा लेकर बना है। समुद्र से शार्क का संवाद और उसका दो दुनियाओं—धरती और समुद्र—के बीच का अस्तित्व सीधे तौर पर डीसी के एक्वामैन और मार्वल के नमोर की याद दिलाता है। वहीं कहानी में ‘दूसरे शार्क’ का अचानक आना कॉमिक्स की दुनिया में पहले से चले आ रहे ‘क्लोन ट्रॉप’ या बिज़ारो टाइप कॉन्सेप्ट जैसा लगता है। इसके अलावा शार्क की छाती पर बना ‘S’ लोगो बिना किसी बदलाव के सुपरमैन के ‘House of El’ सिंबल की सीधी नकल है, जो उस दौर में कॉपीराइट जैसे मुद्दों को हल्के में लेने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। साथ ही, इसके कई पात्र भारतीय पौराणिक कथाओं से भी प्रभावित नज़र आते हैं—रानी जगीत्ता का षड्यंत्र कैकेयी की याद दिलाता है और हुंकार की निर्दयता कंस जैसे राक्षसी पात्रों से प्रेरित लगती है।
सामाजिक और नैतिक पक्ष

यह कॉमिक्स मूल रूप से मानवता, साहस और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का संदेश देती है, लेकिन इसकी हिंसा छोटे बच्चों के लिए थोड़ी असहज कर देने वाली हो सकती है। हुंकार द्वारा बच्चों के अपहरण और उन्हें खाने की बात उस समय के नन्हे पाठकों के मन में डर पैदा करने के लिए काफी थी। फिर भी, जिस भयानक तरीके से बुराई का अंत होता है, वह ‘न्याय’ की भावना को मज़बूती से स्थापित करता है और यह दिखाता है कि अंततः अत्याचार का अंत तय है।
कमियां (Drawbacks)
कुछ जगहों पर संवाद जरूरत से ज्यादा नाटकीय हो जाते हैं, जिससे कहानी थोड़ी भारी महसूस होती है। तर्क के स्तर पर यह सवाल भी उठता है कि जार्का की साफ चेतावनी के बावजूद शार्क इतनी आसानी से रानी जगीत्ता के जाल में कैसे फँस गया, जो उसकी समझदारी पर हल्का सा सवाल खड़ा करता है। इसके अलावा ‘दूसरे शार्क’ का रहस्य—हालाँकि वह एक क्लिफहैंगर के रूप में उत्सुकता पैदा करता है—इस अंक में बहुत कम जानकारी के साथ छोड़ दिया गया है, जिससे पाठक के मन में अधूरापन सा रह जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
‘दूसरा शार्क’ मनोज कॉमिक्स की एक साहसी और यादगार पेशकश है। यह सिर्फ एक सुपरहीरो की कहानी नहीं, बल्कि परिवार, विश्वासघात और बलिदान की एक गहरी कथा भी है। इसका अंत पाठकों को अगले अंक ‘बेगुनाह’ के लिए बेसब्री से इंतज़ार करने पर मजबूर कर देता है।
क्या यह एक मौलिक रचना है?
पूरी तरह से नहीं। यह पश्चिमी सुपरहीरो जैसे एक्वामैन और सुपरमैन के विज़ुअल्स को भारतीय लोककथाओं और भावनाओं के साथ मिलाकर बनाया गया एक ‘हाइब्रिड’ किरदार है। फिर भी, जिस तरह से हुंकार और जलधार नगरी की दुनिया को विस्तार दिया गया है, वह इसे भारतीय पाठकों के लिए एक यादगार अनुभव बना देता है।
अगर आप 90 के दशक की उन कॉमिक्स को दोबारा महसूस करना चाहते हैं, जो सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करती थीं बल्कि अपने डार्क कंटेंट से चौंका भी देती थीं, तो ‘दूसरा शार्क’ वाकई एक मास्टरपीस है।
अंतिम रेटिंग: 4/5 ⭐⭐⭐⭐
