कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ ‘स्पाइडर’ (प्रथम भाग) खत्म हुआ था। कैम्ब्रिज, इंग्लैंड की शांत गलियां अब एक डरावने साये के कब्जे में हैं। ‘वेबसाइट’ शब्द यहाँ सिर्फ इंटरनेट के लिए नहीं, बल्कि उस ‘जाल’ (Web) के लिए इस्तेमाल हुआ है जो अपराधी ‘स्पाइडर’ ने पूरे शहर में फैला रखा है। पहले भाग में हमने देखा था कि कैसे डिन नाम का एक सीधा-सादा छात्र रेडिएशन के असर से एक मकड़ीनुमा जीव में बदल जाता है। इस दूसरे भाग में वह अपनी ताकत का इस्तेमाल सिर्फ निजी बदले के लिए ही नहीं करता, बल्कि खुद को कानून से भी ऊपर समझने लगता है। कहानी का माहौल विदेशी है, जो ध्रुव के लिए नई मुश्किल खड़ी करता है, क्योंकि यहाँ उसे अपनी ‘कमांडो फोर्स’ या लोकल पुलिस का वैसा साथ नहीं मिलता जैसा भारत में मिलता था।
इंसानियत और दानवता के बीच झूलता ‘डिन’ का चरित्र

इस अंक की सबसे बड़ी खासियत डिन (स्पाइडर) के दिमाग के अंदर चल रही उथल-पुथल है। वह अभी भी खुद को एक ‘सुपरहीरो’ ही मानता है। वह अपराधियों को सजा दे रहा है, ड्रग डीलरों को पकड़ रहा है, लेकिन उसका तरीका इतना ज्यादा हिंसक और बेरहम हो चुका है कि वह खुद ही एक बड़ा अपराधी बन गया है। वह श्वेता (ध्रुव की बहन) को अपनी ‘क्वीन’ बनाना चाहता है। डिन का किरदार साफ दिखाता है कि कैसे ‘असुरक्षा की भावना’ (Insecurity) और ‘शक्ति का नशा’ मिलकर एक अच्छे इंसान को राक्षस बना सकते हैं। वह समाज की ‘बुलीइंग’ का बदला पूरे समाज से लेना चाहता है। उसके संवादों में एक अजीब सा पागलपन और जबरदस्त आत्मविश्वास नजर आता है, जो उसे राज कॉमिक्स के सबसे यादगार खलनायकों में शामिल कर देता है।
जब ध्रुव की तीक्ष्ण बुद्धि बनी सबसे बड़ा हथियार

सुपर कमांडो ध्रुव की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उसके पास कोई अलौकिक शक्ति नहीं है। इस कॉमिक्स में ध्रुव अपनी सीमाओं के भीतर रहकर एक ऐसे दुश्मन से भिड़ता दिखता है जो उससे कई गुना ज्यादा ताकतवर है। यहाँ ध्रुव एक जासूस (Detective) की भूमिका में ज्यादा नजर आता है। वह वैज्ञानिक तथ्यों, पदचिह्नों और व्यवहारिक मनोविज्ञान की मदद से स्पाइडर तक पहुँचने की कोशिश करता है। रग्बी मैच वाले सीन से लेकर स्पाइडर के छिपने की जगह खोजने तक, ध्रुव का हर कदम सोच-समझकर उठाया गया है। वह जानता है कि वह स्पाइडर को सिर्फ ताकत से नहीं हरा सकता, इसलिए वह रेडिएशन और विज्ञान का सहारा लेता है।
श्वेता: सिर्फ एक शिकार नहीं, बल्कि साहस की प्रतिमूर्ति

अक्सर कॉमिक्स में नायक की बहन को सिर्फ बचाए जाने वाले किरदार (Damsel in distress) के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन जॉली सिन्हा ने श्वेता को यहाँ एक ‘फाइटर’ की तरह पेश किया है। श्वेता खुद माइक्रोबायोलॉजी की छात्रा है और वह स्पाइडर के खतरे को वैज्ञानिक नजरिए से समझती है। वह स्पाइडर के जाल में फंसने के बाद भी हार नहीं मानती। ध्रुव की गैरमौजूदगी में भी वह अपनी समझ का इस्तेमाल करती है और डिन को उसकी गलती का एहसास कराने की कोशिश करती है। श्वेता और डिन के बीच के संवाद कहानी को भावनात्मक गहराई देते हैं, जहाँ एक तरफ पुरानी दोस्ती की यादें हैं और दूसरी तरफ आज की कड़वी सच्चाई।
स्याह रातों में मकड़जाल का खूनी खेल: कथानक का विस्तार

‘वेबसाइट’ की कहानी काफी तेज रफ्तार से आगे बढ़ती है। इसमें कई छोटी-छोटी उपकहानियां भी चलती हैं, जैसे ध्रुव के ताऊजी की शादी वाला प्रसंग, जो कहानी में थोड़ा हल्का-फुल्का माहौल बना देता है। लेकिन असली कहानी हमेशा उस रेडिएशन मीटर की टिक-टिक के आसपास ही घूमती रहती है। स्पाइडर का पुलिस विभाग के भ्रष्ट अफसरों को सजा देना और फिर खुद को शहर का मसीहा घोषित करना—इन सब में एक सामाजिक संदेश भी छिपा है। क्या भीड़ द्वारा किया गया न्याय (Mob Justice) सही है? डिन इसी बात को सही ठहराता है, जबकि ध्रुव कानून और नैतिकता का साथ देता है। यही वैचारिक टकराव इस कॉमिक्स को साधारण एक्शन कहानी से ऊपर उठा देता है।
अनुपम सिन्हा की कला का भव्य प्रदर्शन

राज कॉमिक्स के फैंस के लिए अनुपम सिन्हा की आर्ट किसी विजुअल ट्रीट से कम नहीं है। स्पाइडर के शरीर से निकलने वाले अतिरिक्त पैर, उसकी खौफनाक लाल आँखें और चेहरे पर आते बदलावों को बहुत बारीकी से दिखाया गया है। वहीं इमारतों के बीच स्पाइडर का झूलना और ध्रुव के एक्शन सीन में जबरदस्त मूवमेंट महसूस होती है। इंग्लैंड की गलियों, चर्चों और लैब की पृष्ठभूमि को भारतीय माहौल से अलग दिखाने में कलाकार पूरी तरह सफल रहे हैं। खासकर रात वाले दृश्यों में नीले-बैंगनी रंगों का इस्तेमाल और रेडिएशन दिखाने के लिए हरे रंग का प्रयोग कहानी के थ्रिल को और बढ़ा देता है।
विज्ञान और कल्पना का अनूठा संगम

यह कॉमिक्स पूरी तरह ‘साइ-फाइ’ (Sci-Fi) तत्वों से भरी हुई है। रेडिएशन लैब, गामा फाइंडर, रेडियोधर्मी उत्परिवर्तन (Mutation) और ब्लड रिपोर्ट्स—इन सब चीजों का जिक्र इसे एक मॉडर्न थ्रिलर जैसा फील देता है। लेखक ने सिर्फ इतना नहीं कहा कि वह ‘स्पाइडर’ बन गया, बल्कि उसके पीछे के वैज्ञानिक कारण (चाहे वे काल्पनिक ही क्यों न हों) भी बताने की कोशिश की है। ध्रुव का स्पाइडर के शरीर का तापमान और उसकी रेडिएशन फ्रीक्वेंसी ट्रैक करना दिखाता है कि राज कॉमिक्स अपने पाठकों को दिमागी तौर पर भी सोचने पर मजबूर करती थी।
शक्ति का नशा और नैतिक पतन की दास्तां

इस भाग का मुख्य विषय ‘शक्ति’ है। डिन बार-बार कहता है कि अब कोई उसे ‘बुली’ नहीं कर सकता। वह अपनी ताकत का इस्तेमाल उन्हीं लोगों को डराने में करता है जिनसे वह कभी खुद डरता था। यह पाठकों के लिए साफ संदेश है कि बदले की आग आखिर में इंसान को उसी बुराई में बदल देती है जिसे वह खत्म करना चाहता था। ध्रुव का किरदार यहाँ संतुलन का प्रतीक बनकर सामने आता है—उसके पास शक्ति हो या न हो, उसके संस्कार और नैतिकता कभी नहीं बदलते।
आने वाले ‘वर्ल्ड वाइड वेब’ (WWW) की आहट

कॉमिक्स का अंत एक जबरदस्त क्लिफहैंगर (Cliffhanger) पर होता है। स्पाइडर अब सिर्फ एक स्थानीय खतरा नहीं रह गया है। उसके शरीर के अंदर चल रही रेडियोधर्मी प्रक्रिया उसे एक ‘चलते-फिरते परमाणु बम’ में बदल रही है। अब ध्रुव के सामने चुनौती सिर्फ श्वेता को बचाने की नहीं, बल्कि पूरे कैम्ब्रिज शहर को एक भयानक विस्फोट से बचाने की भी है। आखिरी पेज पर ‘WWW – वर्ल्ड वाइड वेब’ का विज्ञापन पाठकों के अंदर अगले भाग के लिए जबरदस्त उत्सुकता पैदा कर देता है। यह सीरीज की मार्केटिंग और कहानी कहने की कला का बेहतरीन नमूना है।
अंतिम मूल्यांकन (Final Verdict)
‘वेबसाइट’ राज कॉमिक्स के इतिहास की एक ऐसी अहम कड़ी है जो दिखाती है कि भारतीय कॉमिक्स भी विश्व स्तर की कहानियाँ सुनाने की पूरी क्षमता रखती थीं। यह भाग ‘मकड़जाल’ सीरीज को नई ऊंचाइयों तक ले जाता है। इसमें दमदार एक्शन है, गहरी भावनाएँ हैं, और सबसे बढ़कर एक ऐसा विलेन है जिससे आप नफरत तो करते हैं, लेकिन उसकी त्रासदी (Tragedy) आपको अंदर से दुखी भी कर देती है।
सुपर कमांडो ध्रुव के फैंस के लिए यह एक अनिवार्य पठनीय (Must-read) कॉमिक्स है। यह हमें सिखाती है कि महानता सिर्फ शक्तियों में नहीं होती, बल्कि उन शक्तियों के सही इस्तेमाल के चुनाव में होती है। अनुपम सिन्हा और उनकी टीम का यह काम आने वाली पीढ़ियों के लिए सच में एक मिसाल है।
