मनोज कॉमिक्स द्वारा प्रकाशित ‘सिकंदर’ (अंक संख्या 1085) का यह अंक सिर्फ एक एक्शन-थ्रिलर नहीं है, बल्कि यह 90 के दशक की उन कहानियों की याद दिलाता है जहाँ वीरता, बलिदान और न्याय के लिए अडिग निष्ठा सबसे अहम थी। अर्जुन पंडित की लिखावट और हुसैन जामिन के शानदार चित्रण ने इसे और भी खास बना दिया है। इस अंक में हम नए नायक ‘सिकंदर’ के जन्म और उसके संघर्ष की कहानी देख सकते हैं।
प्रस्तावना: नायक का प्रवेश

कहानी की शुरुआत होती है राजनगर के सबसे खतरनाक इलाके ‘डेथ स्ट्रीट’ से। रात के बारह बजे, जहाँ पुलिस भी जाने से कतराती है, वहाँ एक रहस्यमयी युवक स्केटिंग करता हुआ प्रवेश करता है। यह युवक कोई और नहीं, बल्कि हमारा नायक ‘सिकंदर’ है। कॉमिक्स के पहले पन्ने ही पाठक को रोमांच से भर देते हैं, जब सिकंदर अकेले ही मोटरसाइकिल सवार गुंडों के बड़े गिरोह से मुकाबला करता है। उसकी लड़ने की शैली अलग ही है—वह अपने रोलर स्केट्स का इस्तेमाल सिर्फ चलने के लिए नहीं, बल्कि हथियार की तरह करता है।
कहानी का सारांश: अतीत और वर्तमान का संगम
कहानी को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है—सिकंदर का वर्तमान संघर्ष और उसके ‘सिकंदर’ बनने के पीछे का दर्दनाक अतीत।
वर्तमान संघर्ष:
शुरुआती लड़ाई में सिकंदर घायल हो जाता है, लेकिन उसे ‘रोनी’ नाम का एक छोटा बच्चा बचा लेता है। रोनी उसे अपने घर ले जाता है, जहाँ उसकी बड़ी बहन ‘मोना’ रहती है। सिकंदर अपनी असली पहचान छुपा लेता है और उनके घर में शरण लेता है। यहाँ पता चलता है कि मोना और रोनी एक खतरनाक माफिया ‘डॉन’ के निशाने पर हैं, जो उनके पुरखों की जमीन हड़पकर वहाँ फाइव स्टार होटल बनाना चाहता है।
अतीत की झलक (फ्लैशबैक):
कहानी तब और गहरी हो जाती है जब सिकंदर (असली नाम विक्रम) अपने अतीत को याद करता है। विक्रम जेल में था, जहाँ उसकी मुलाकात ‘माइक’ से हुई। माइक नेक इंसान था, जिसे वही डॉन झूठे ड्रग्स केस में फंसाकर जेल भेज चुका था क्योंकि उसने अपनी जमीन बेचने से इनकार किया था। जेल से भागते समय पुलिस वैन का एक्सीडेंट हो जाता है और वैन से भागते समय पुलिस की गोली माइक को लग जाती है। मरते समय माइक विक्रम से वादा करता है कि वह उसके छोटे भाई-बहन (मोना और रोनी) की रक्षा करेगा और डॉन के आतंक को खत्म करेगा।
चरमोत्कर्ष (क्लाइमेक्स):
विक्रम, माइक के घर पहुँचता है लेकिन अपनी पहचान छुपा लेता है। मोना उसे एक अपराधी समझकर नफरत करती है, जबकि सिकंदर असल में उसकी और रोनी की रक्षा कर रहा होता है। जब डॉन के गुंडे मोना का अपहरण कर लेते हैं, तब सिकंदर अपने असली रूप में सामने आता है। अंत में, एक भीषण युद्ध होता है जहाँ सिकंदर डॉन के ठिकाने पर पहुँचकर उसे मौत के घाट उतार देता है। कहानी का अंत इस बात से होता है कि सिकंदर फिर से गुमनामी में चला जाता है, एक मास्कड हीरो की तरह, ताकि वह अन्याय के खिलाफ अपनी जंग जारी रख सके।
चरित्र चित्रण (Character Analysis)
विक्रम/सिकंदर: वह एक ऐसा नायक है जो ‘एंटी-हीरो’ और ‘विजिलेंटे’ (Vigilante) दोनों का मिश्रण है। उसका चरित्र गंभीर है और वह अपने वादे के प्रति हमेशा पक्का रहता है। स्केटिंग को युद्ध कला में बदलना उसे बाकी नायकों से अलग बनाता है। उसकी मानसिक उलझन—एक तरफ मोना की नफरत सहना और दूसरी तरफ उसकी रक्षा करना—पाठक के मन में उसके लिए सहानुभूति पैदा करती है।

माइक: भले ही उसका स्क्रीन टाइम छोटा है, लेकिन वह पूरी कहानी की रीढ़ है। उसका बलिदान ही विक्रम को ‘सिकंदर’ बनने के लिए प्रेरित करता है।
मोना और रोनी: ये दोनों समाज के मासूम और कमजोर लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ताकतवर माफिया के दबाव में हैं। रोनी का किरदार कहानी में मासूमियत और उम्मीद लेकर आता है, खासकर जब वह अपने खिलौने से पुलिस सायरन की आवाज निकालकर सिकंदर की जान बचाता है।
डॉन (खलनायक): वह 90 के दशक के खलनायकों की तरह लालची, क्रूर और सत्ता का भूखा है। उसका मकसद सिर्फ जमीन हड़पना है, जो उस दौर की फिल्मों और कॉमिक्स में आम था।
कला और चित्रांकन (Art and Illustration)
हुसैन जामिन का काम काबिल-ए-तारीफ है। एक्शन सीन में गति (Motion) का एहसास देने के लिए जिस तरह के ‘इफेक्ट्स’ का इस्तेमाल किया गया है, वह शानदार है। सिकंदर के स्केटिंग मूव्स को बेहद जीवंत तरीके से दिखाया गया है। पात्रों के चेहरे के हाव-भाव, खासकर जेल के दृश्य में विक्रम की उदासी और लड़ाई के दौरान उसका गुस्सा, बहुत असरदार हैं। रंगों की योजना (Color Palette) भी जीवंत है, जो मनोज कॉमिक्स की खास पहचान है।
संवाद और लेखन

अर्जुन पंडित के संवाद चुस्त और प्रभावशाली हैं। “मौत को पकड़ना नहीं पड़ता, क्योंकि वह खुद मरने वाले के पास आती है” जैसे संवाद कहानी में नाटकीयता और गंभीरता जोड़ते हैं। कहानी की गति तेज है और कहीं भी धीमी नहीं पड़ती। फ्लैशबैक का इस्तेमाल सही समय पर किया गया है, जिससे पाठक नायक के उद्देश्यों और भावनाओं को आसानी से समझ पाता है।
थीम और सामाजिक संदर्भ

‘सिकंदर’ सिर्फ एक एक्शन कॉमिक्स नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत नैतिकता की कहानी भी है। यह बताती है कि जब व्यवस्था भ्रष्ट हो जाती है—पुलिस और माफिया का गठजोड़—तो आम आदमी का भरोसा कानून से उठ जाता है और वह खुद ‘सिकंदर’ जैसे रक्षक बनने पर मजबूर हो जाता है। भूमि माफिया का मुद्दा इसे और यथार्थवादी बनाता है। माइक और विक्रम की मित्रता और वचनबद्धता कहानी को भावनात्मक आधार देती है, जो भारतीय पाठकों के दिल को छू जाती है।
समीक्षात्मक निष्कर्ष
‘सिकंदर’ राज कॉमिक्स के ‘विजिलेंटे’ नायकों में एक खास जगह बनाता है। यह सिर्फ मार-धाड़ नहीं है, बल्कि भावनाओं का सफर भी है। नायक का स्केटिंग कॉन्सेप्ट उस दौर में क्रांतिकारी था, जो उसे शहरी गलियों में अद्भुत गति देता है। इसकी बैकस्टोरी पाठक को पात्र के साथ जोड़ती है, और इसकी रॉ और ग्रिटी एक्शन स्टाइल इसे बेहतरीन क्राइम-थ्रिलर बनाती है।

जहाँ तक कमियों की बात है, डॉन के चरित्र में गहराई थोड़ी कम है और क्लाइमेक्स थोड़ा संक्षिप्त लगता है—शायद लेखक का ध्यान ‘सिकंदर की जंग’ के लिए उत्सुकता पैदा करने पर ज्यादा था।
अंतिम शब्द
अगर आप 90 के दशक की पुरानी यादों में खोना चाहते हैं और ऐसे नायक की तलाश में हैं जो सुपरपावर से नहीं बल्कि अपने कौशल और जज्बे से लड़ता है, तो ‘सिकंदर’ आपके लिए जरूरी है। मनोज कॉमिक्स ने इसे एक ऐसे योद्धा के रूप में पेश किया है जो समाज की गंदगी को साफ करने के लिए अंधेरों में चलता है। यह कॉमिक्स आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पहले थी।
अंत में, यह कहानी एक वादे के साथ खत्म होती है—”सिकंदर की जंग” अभी शुरू हुई है। यह पाठक को उत्सुक छोड़ देती है कि आगे विक्रम अपनी दोहरी पहचान कैसे बनाए रखेगा और नए ‘डॉन’ के साथ उसका मुकाबला कैसा होगा।
