भारतीय कॉमिक्स के इतिहास में ‘पवन कॉमिक्स’ एक ऐसा नाम है जिसने 80 और 90 के दशक में पाठकों को सिर्फ मनोरंजन ही नहीं दिया, बल्कि विज्ञान, रोमांच और भारतीय अध्यात्म के मिश्रण वाली कहानियों का एक नया संसार दिखाया। ‘सूर्यपुत्र’ इस पब्लिकेशन का सबसे लोकप्रिय और ताकतवर पात्र रहा है। पिछले भाग में हमने देखा था कि सूर्यपुत्र का जन्म और उसकी उत्पत्ति (Origin) कैसे हुई थी, जहाँ महात्मा धर्मदेव की आत्मा प्रोफेसर चंद्राकर के मृत पुत्र के शरीर में बस गई थी। आज हम इस श्रृंखला की दूसरी रोमांचक कड़ी ‘सूर्यपुत्र और फिरओन की आत्मा’ की पूरी समीक्षा करेंगे।
सूर्यपुत्र भवन से शुरू हुई मौत की साजिश: दिल्ली से रेगिस्तान तक का खौफनाक सफर

कहानी की शुरुआत दिल्ली स्थित ‘सूर्यपुत्र भवन’ से होती है। सर्दियाँ आ चुकी हैं और हिमालय की गुफा में भारी बर्फबारी के कारण प्रोफेसर चंद्राकर और सूर्यपुत्र भारत सरकार द्वारा दिए गए इस खास बंगले में रह रहे हैं। यहीं से कहानी की असली शुरुआत होती है जब सूर्यपुत्र को ‘लारन्सा द्वीप’ के सुल्तान सादी का एक पत्र मिलता है। सुल्तान सादी, जो प्रोफेसर के पुराने दोस्त हैं, बड़ी मुसीबत में फंसे हैं।
सुल्तान बताते हैं कि उनके द्वीप पर उनके पूर्वजों की आत्मा, जिसे वे ‘फिरओन’ कहते हैं, आतंक फैला रही है। लोग डर के मारे रात में मकबरे के पास जाने की हिम्मत नहीं करते। सूर्यपुत्र यह चुनौती स्वीकार करता है और प्रधानमंत्री की अनुमति लेकर एक हाई-टेक हेलीकॉप्टर से लारन्सा द्वीप के लिए उड़ जाता है।
भूतिया कंकाल या हाई–टेक मशीन? वो चौंकाने वाला सच जिसने पाठकों के होश उड़ा दिए!

द्वीप पर पहुँचने के बाद कहानी में रहस्य और रोमांच का तड़का लग जाता है। सूर्यपुत्र को वहां के सैनिक पकड़ लेते हैं, लेकिन जल्दी ही उसे सुल्तान के सामने पेश किया जाता है। यहाँ पता चलता है कि असली समस्या सिर्फ ‘आत्मा’ नहीं है, बल्कि मकबरे में छुपा अरबों का खजाना भी है। सुल्तान का वजीर और सेनापति भी इस रहस्यमयी खेल में शामिल हैं।
रात के अंधेरे में जब सूर्यपुत्र मकबरे की जांच करता है, तो उस पर एक ‘जिंदा कंकाल’ हमला कर देता है। लेखक ने यहाँ एक जबरदस्त मोड़ दिया—वह कंकाल कोई भूत नहीं, बल्कि एक ‘कंकाल जैसा रोबोट‘ है। यहीं से सुपरहीरो और खलनायक का मुकाबला शुरू होता है। पूरी साजिश के पीछे अंतरराष्ट्रीय अपराधी ‘गिलबर्ट’ का हाथ है, जो मकबरे के नीचे एक गुप्त बेस बनाकर खजाना चुराने के लिए ‘फिरओन की आत्मा’ का डर फैला रहा है।
खूनी कैंचियों वाला ‘सीजरमैन‘: सूर्यपुत्र के इतिहास का सबसे डरावना और घातक मुकाबला!

कहानी का चरम (Climax) तब आता है जब गिलबर्ट अपने सबसे खतरनाक हथियार ‘सीजरमैन’ (एक विशाल रोबोट जिसके हाथ कैंची जैसे तेज हैं) को सूर्यपुत्र को खत्म करने के लिए भेजता है। इसके बाद सूर्यपुत्र और सीजरमैन के बीच जो युद्ध होता है, वह उस समय की कॉमिक्स के हिसाब से बेहद भव्य दिखाया गया है। अंत में गिलबर्ट अपने पालतू खतरनाक चीते (Black Tiger) को भी सूर्यपुत्र पर छोड़ देता है, लेकिन सूर्यपुत्र की असीम शक्तियों के सामने कोई टिक नहीं पाता। हार देखकर गिलबर्ट जहर खाकर आत्महत्या कर लेता है और लारन्सा द्वीप इस आतंक से मुक्त हो जाता है।
आधुनिक देवता: योग शक्ति और लेजर किरणों का वो अनोखा संगम
इस अंक में सूर्यपुत्र का पात्र और भी निखर कर सामने आता है। वह सिर्फ ताकतवर नहीं है, बल्कि बहुत चालाक भी है। वह तुरंत समझ जाता है कि ‘कंकाल’ कोई भूत नहीं, बल्कि एक मशीन है। उसकी योग-शक्तियों का प्रदर्शन, जैसे शरीर का आकार बढ़ाना (Size manipulation) और उंगलियों से लेजर निकालना, उसे एक ‘आधुनिक देवता’ की तरह दिखाता है।
वहीँ, विलेन ‘गिलबर्ट’ एक क्लासिक ‘दुष्ट जीनियस’ है। उसके पास हाई-टेक तकनीक है, वह रोबोट बना सकता है और CCTV के जरिए पूरे द्वीप पर नजर रखता है। वह सूर्यपुत्र के लिए सही प्रतिद्वंदी साबित होता है क्योंकि वह उसे शारीरिक ताकत के बजाय तकनीकी जाल में फंसाने की कोशिश करता है।
केमियो आर्ट्स का जादू: 30 साल पुराने वो चित्र जो आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं
‘केमियो आर्ट्स’ के कुशल कलाकारों ने इस कॉमिक्स के पन्नों पर जो जादू बिखेरा है, वह पाठक की कल्पना को नई उड़ान देता है। खासकर सीजरमैन का चित्र इतना डरावना है कि वह धातु और मांस का बना एक डरावना सपना लगता है। पन्ना संख्या 20 से 23 के बीच के एक्शन सीन इतने ज़बरदस्त हैं कि रोमांच चरम पर पहुँच जाता है। सूर्यपुत्र की फुर्ती से सीजरमैन के खतरनाक प्रहारों से बचना और अपनी प्रलयंकारी लेजर किरणों से उस फौलादी दुश्मन को पिघलाना बहुत ही जीवंत तरीके से दिखाया गया है।
विज्ञान बनाम अंधविश्वास: धरम बारिया की वो दूरदर्शी सोच

धरम बारिया का लेखन इस कॉमिक्स की जान है। विज्ञान और अंधविश्वास के बीच का टकराव इस कहानी का सबसे मजबूत पहलू है। लेखक ने दिखाया कि जिसे लोग ‘फिरओन की आत्मा’ समझकर डर रहे थे, वह असल में तकनीक का एक खिलौना था। यह पाठकों को वैज्ञानिक सोच अपनाने का संदेश देता है। साथ ही, सूर्यपुत्र अपनी शक्तियों को योग विद्या और गुरुदेव के आशीर्वाद से जोड़ता है, जो उसे पश्चिमी सुपरहीरोज से अलग एक खास ‘भारतीय पहचान’ देता है।
क्या सूर्यपुत्र की ये कहानी आज भी खरी उतरती है? एक निष्पक्ष समीक्षा

इस कॉमिक्स की सबसे अच्छी बात ‘कंकाल का रोबोट’ निकलना और ‘सीजरमैन’ के साथ मुकाबला है। 80 के दशक में लेजर गन और रोबोटिक्स का ऐसा इस्तेमाल देखना अद्भुत है। हालाँकि, कुछ कमजोर पक्ष भी हैं। गिलबर्ट जैसे बड़े खलनायक का सिर्फ जहर खाकर मर जाना थोड़ा फीका लगता है। साथ ही, वजीर और सेनापति की गद्दारी को और गहराई दी जा सकती थी। लेकिन कुल मिलाकर, यह एक पैसा-वसूली कहानी है।
निष्कर्ष: 90 के दशक की वो ‘कल्ट क्लासिक‘ जिसे हर कॉमिक प्रेमी को पढ़ना चाहिए
‘सूर्यपुत्र और फिरओन की आत्मा’ पवन कॉमिक्स की एक ‘मस्ट-रीड’ कॉमिक है। यह हमें उस दौर में ले जाती है जब कल्पना की कोई सीमा नहीं थी। सूर्यपुत्र की यह यात्रा विश्वास दिलाती है कि जब तक सत्य और साहस साथ हैं, दुनिया की कोई भी काली शक्ति इंसानियत को हरा नहीं सकती। ‘जय गुरुदेव’ का उद्घोष करते हुए सूर्यपुत्र का उड़ना, आज भी हर कॉमिक प्रेमी के दिल में जोश भर देता है।
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