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Home » वेगा ही वेगा: जब एक बलिदान ने विज्ञान को सुपरहीरो बना दिया | King Comics
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वेगा ही वेगा: जब एक बलिदान ने विज्ञान को सुपरहीरो बना दिया | King Comics

90 के दशक की वो कॉमिक जहाँ जादू नहीं, विज्ञान उड़ता है — भावनाओं, बलिदान और तकनीक से जन्मा वेगा
ComicsBioBy ComicsBio24 January 202608 Mins Read
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वेगा ही वेगा रिव्यू: किंग कॉमिक्स का विज्ञान आधारित सुपरहीरो | Vega King Comics
विज्ञान, बलिदान और भावनाओं से जन्मा किंग कॉमिक्स का अनोखा सुपरहीरो — वेगा
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90 के दशक के मध्य में किंग कॉमिक्स ने ‘वेगा’ के रूप में एक ऐसा सुपरहीरो पेश किया, जिसकी ताकतें जादू-टोने से नहीं बल्कि पूरी तरह विज्ञान और तकनीक पर आधारित थीं। टीकाराम सिप्पी द्वारा लिखित और द्रोणा फीचर्स द्वारा चित्रांकित यह कॉमिक ‘वेगा ही वेगा’, इस सीरीज की पहली कड़ी है। यह कहानी पाठकों को ऐसे सफर पर ले जाती है जहाँ भावनाएँ और रोमांच साथ-साथ चलते हैं। संपादक विवेक मोहन के मार्गदर्शन में बनी यह कॉमिक अपने दौर की बाकी कॉमिक्स से काफी अलग, ज्यादा गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली लगती है।

कथानक का प्रारंभ: डायरी के पन्नों से निकलता दर्द

कहानी की शुरुआत प्रोफेसर गोशा की डायरी से होती है। 25 मई 1994 की एक एंट्री में प्रोफेसर ऐसे समाज का सपना देखते हैं जहाँ अपराध नाम की कोई चीज़ न हो। वे चाहते हैं कि इंसान के भीतर ऐसी शक्ति विकसित की जाए जो उसे हर हाल में अजेय बना दे। लेकिन इस महान खोज की एक बहुत बड़ी कीमत है। इसके लिए एक मानव परीक्षण विषय की जरूरत होती है, और उसमें जान जाने का खतरा पूरे 100 प्रतिशत है।

यहीं से कहानी भावनात्मक मोड़ लेती है। प्रोफेसर का मंझला भाई मेघा ब्लड कैंसर की आखिरी स्टेज में है। डॉक्टर साफ कह देते हैं कि अब इलाज मुमकिन नहीं है और उसके पास सिर्फ सात दिन बचे हैं। मेघा अपने भाई के सपने को पूरा करने और अपनी मौत को किसी मकसद से जोड़ने के लिए खुद को इस खतरनाक प्रयोग के लिए सौंप देता है। यही बलिदान पूरी कहानी की नींव बनता है।

प्रथम वेगा और त्रासदी का तांडव

प्रोफेसर गोशा का प्रयोग सफल होता है और मेघा को ‘वेगा पावर’ मिल जाती है। अब वह हवा में उड़ सकता है और असाधारण गति हासिल कर लेता है। सब कुछ सही लग रहा होता है, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उड़ान के दौरान मेघा को कैंसर का तेज दौरा पड़ता है। उसका संतुलन बिगड़ जाता है और वह एक ऊंची इमारत से टकराकर नीचे गिर जाता है।

जमीन पर पहुंचने से पहले ही मेघा की मौत हो जाती है। यह सीन पाठक को अंदर तक हिला देता है, क्योंकि यहाँ नायक की मौत किसी खलनायक की वजह से नहीं, बल्कि उसकी अपनी शारीरिक कमजोरी के कारण होती है। हालात ऐसे बनते हैं कि प्रोफेसर गोशा पर अपने ही भाई की हत्या का आरोप लग जाता है और उन्हें मृत्युदंड यानी फांसी की सजा सुना दी जाती है।

न्याय की तलाश और रहस्यमयी पत्र

प्रोफेसर का छोटा भाई, जो आगे चलकर वेगा बनता है, अपने बड़े भाई को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करता है। उसे पता चलता है कि मरने से पहले मेघा ने एक पत्र लिखा था, जिसमें उसने साफ तौर पर कहा था कि वह इस प्रयोग में अपनी मर्जी से शामिल हुआ था। यही पत्र प्रोफेसर की बेगुनाही का सबसे बड़ा सबूत है।

इसी मोड़ पर कहानी में विलेन ‘नोनेम’ (Noname) की एंट्री होती है। वह उस पत्र को चुरा लेता है ताकि प्रोफेसर को फांसी हो जाए और वह उनकी लैब से जुड़े सारे वैज्ञानिक राज हासिल कर सके। यहाँ से कहानी एक जबरदस्त सस्पेंस थ्रिलर बन जाती है। नायक का समय के खिलाफ दौड़ना और अपने भाई की जान बचाने की कोशिश पाठकों की धड़कनें तेज कर देता है।

एक्शन और जासूसी का संगम

कॉमिक का मिडिल हिस्सा जबरदस्त एक्शन से भरा हुआ है। नायक स्केटबोर्ड पर अपराधियों का पीछा करता है, जो उस समय के हिसाब से काफी नया और मॉडर्न कॉन्सेप्ट था। कार चेज़ सीन और चलती कार की छत पर गुंडों से लड़ाई द्रोणा फीचर्स की शानदार ड्रॉइंग स्किल को साफ दिखाते हैं।

एक खास सीन में नायक विलेन को कंक्रीट मिक्सर में फंसा देता है और उससे सच उगलवाने के लिए उसे सीमेंट की ईंट बना देने की धमकी देता है। इस तरीके से वह पत्र वापस हासिल करता है। यह सीन सिर्फ ताकत नहीं, बल्कि नायक की अक्ल और उसके मजबूत इरादों को भी दिखाता है।

फांसी के तख्ते पर रोमांचक क्लाइमेक्स

कहानी अपने चरम पर तब पहुंचती है जब प्रोफेसर गोशा को फांसी के लिए ले जाया जाता है। आखिरी पलों में, नायक अपनी बाइक पर कहर बरपाते हुए फांसी घर की दीवार तोड़कर अंदर घुसता है। वह ठीक उसी पल पहुंचता है जब जल्लाद फंदा खींचने वाला होता है, और अपने भाई को मौत के मुंह से खींच लाता है।

यह दृश्य भारतीय फिल्मों के क्लासिक क्लाइमेक्स सीन की याद दिलाता है। मेघा का पत्र पेश किया जाता है और प्रोफेसर गोशा को सम्मान के साथ बरी कर दिया जाता है। लेकिन यहीं कहानी खत्म नहीं होती, बल्कि यहीं से एक नए सुपरहीरो की असली शुरुआत होती है।

नए ‘वेगा’ का उदय: वैज्ञानिक प्रक्रिया

मेघा की मौत से प्रोफेसर गोशा पूरी तरह टूट चुके होते हैं और वे अपना रिसर्च बंद करने का फैसला कर लेते हैं। लेकिन उनका छोटा भाई उन्हें समझाता है कि मेघा का बलिदान बेकार नहीं जाना चाहिए। वह खुद इस प्रयोग का हिस्सा बनने का निर्णय लेता है।

यह हिस्सा साइंस-फिक्शन के शौकीनों के लिए किसी ट्रीट से कम नहीं है। लेखक ने ‘वेगा पावर’ को बड़े विस्तार से समझाया है। प्रयोग के जरिए शरीर के रोम-रोम में विद्युत-चुंबकीय तरंगों का संचार किया जाता है, जिससे एंटी-ग्रैविटी जैसी स्थिति बनती है। इसका असर यह होता है कि नायक शून्य गुरुत्वाकर्षण की स्थिति में हवा में तैर सकता है। वह अपनी हथेलियों और पैरों के अंगूठों के जरिए हवा के दबाव को कंट्रोल करके छोटे-छोटे चक्रवात भी बना सकता है। इसके साथ ही उसकी सुनने की क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि वह मीलों दूर की आवाजें भी पकड़ सकता है।

इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया का चित्रण इतना सटीक है कि पाठक को लगता है कि शायद ऐसा सच में मुमकिन हो सकता है।

वेशभूषा और शक्तियों का विश्लेषण

प्रयोग के बाद नायक को एक खास नीले रंग की ड्रेस दी जाती है। प्रोफेसर गोशा उसे साफ शब्दों में समझाते हैं कि वह खुद को कोई ‘सुपरमैन’ न समझे, क्योंकि उसकी शक्तियों की भी सीमाएँ हैं। वह एक तय ऊंचाई, लगभग 200 मीटर से ज्यादा ऊपर नहीं उड़ सकता। बहुत ज्यादा ठंड में उसकी शक्तियां कमजोर पड़ सकती हैं। उसकी उड़ान पूरी तरह उसके मानसिक संतुलन और शरीर की मुद्रा पर निर्भर करती है।

यही सीमाएँ वेगा को एक आम लेकिन मजबूत इंसान जैसा सुपरहीरो बनाती हैं, जो हर हाल में अजेय नहीं है, बल्कि अपनी कमजोरियों के साथ लड़ता है।

कला और चित्रांकन (Art and Illustration)

द्रोणा फीचर्स का आर्टवर्क सच में तारीफ के काबिल है। 90 के दशक की हैंड-ड्रॉन कला में जो आत्मा और गर्माहट होती थी, वह इस कॉमिक में साफ नजर आती है। आज की डिजिटल चमक-दमक से अलग, इस तरह की ड्रॉइंग में एक अलग ही अपनापन महसूस होता है।

पात्रों के चेहरे और भावों पर खास मेहनत दिखाई देती है। प्रोफेसर गोशा के चेहरे पर एक साथ गहरा दुख और एक वैज्ञानिक की जुनूनी बेचैनी नजर आती है, वहीं नायक की आँखों में अपने भाई के लिए न्याय पाने की आग साफ झलकती है। ये भाव कहानी को सिर्फ पढ़ने लायक नहीं, बल्कि महसूस करने लायक बना देते हैं।

रंगों का इस्तेमाल भी बहुत सोच-समझकर किया गया है। कहानी के दुख और त्रासदी से भरे हिस्सों में गहरे और भारी रंग माहौल को और गंभीर बना देते हैं, जबकि जैसे ही वेगा पूरी ताकत के साथ सामने आता है, नीले और लाल जैसे चटकीले रंग स्क्रीन पर जान डाल देते हैं। इसके अलावा, डायरी के जरिए कहानी को आगे बढ़ाने का तरीका इसे एक निजी और भावनात्मक स्पर्श देता है, जैसे पाठक खुद प्रोफेसर के मन की बातें पढ़ रहा हो।

समीक्षात्मक निष्कर्ष

‘वेगा ही वेगा’ सिर्फ एक सुपरहीरो की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक परिवार के टूटने, बिखरने और फिर से जुड़ने की दर्दभरी लेकिन उम्मीद से भरी दास्तान है। यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि विज्ञान कोई जादू नहीं, बल्कि एक दोधारी तलवार है—जो सही हाथों में जीवन बचा सकता है, और गलत हालात में सब कुछ छीन भी सकता है।

इस कॉमिक की सबसे बड़ी ताकत इसकी मजबूत और भावनात्मक कहानी है। शक्तियों को जिस तरह वैज्ञानिक तर्क के साथ समझाया गया है, वह इसे बाकी कॉमिक्स से अलग बनाता है। कहानी की गति कहीं भी ढीली नहीं पड़ती और हर सीन अगले सीन को देखने की उत्सुकता बनाए रखता है। साथ ही, नायक की सीमाएँ उसे इंसानी बनाती हैं और पाठक उससे आसानी से जुड़ पाता है।

कमज़ोरियों की बात करें तो विलेन ‘नोनेम’ का किरदार थोड़ा और गहराई पा सकता था। उसके इरादों और बैकग्राउंड पर और काम किया जा सकता था। वहीं फांसी घर वाला सीन थोड़ा ज्यादा फिल्मी और नाटकीय लगता है, हालांकि उसी दौर की कहानियों के हिसाब से यह बात बहुत खटकती भी नहीं है।

अंतिम शब्द

कुल मिलाकर, ‘वेगा ही वेगा’ किंग कॉमिक्स के इतिहास का एक बेहद अहम और गर्व करने लायक अध्याय है। यह उन सभी पाठकों के लिए ज़रूरी पढ़ाई है जो भारतीय कॉमिक्स के स्वर्ण युग की असली भावना को महसूस करना चाहते हैं। यह कॉमिक हमें एक ऐसा नायक देती है जो हवा में उड़ता है, हवाओं से बात करता है, लेकिन जिसका दिल अपने परिवार और अपनों के लिए धड़कता है।

अगली कड़ी ‘जेल की चक्की’ के संकेत के साथ खत्म होने वाली यह कॉिक्स पाठकों को एक लंबे, भावनात्मक और रोमांचक सफर के लिए पूरी तरह तैयार कर देती है।

मानवीय कमजोरियों और भावनात्मक गहराई के साथ एक नई पहचान दी। वेगा ही वेगा किंग कॉमिक्स की वह ऐतिहासिक कॉमिक है जिसने भारतीय सुपरहीरो को जादू से निकालकर विज्ञान
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