यह समीक्षा कॉमिक्स के सबसे क्रूर और यथार्थवादी सुपरहीरो ‘डोगा’ के एक बेहद अहम और रोमांचक अंक ‘कर्फ़्यू’ पर आधारित है। संजय गुप्ता द्वारा रचित और तरुण कुमार वाही द्वारा लिखी गई यह कॉमिक भारतीय कॉमिक्स इतिहास के उन खास अंकों में गिनी जाती है, जो सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज की गहरी बुराइयों, भ्रष्टाचार और न्याय के बिगड़े हुए सिस्टम पर सीधा और कड़ा वार करती है।
डोगा का संवाद उसके पूरे किरदार को साफ़ तौर पर बयान कर देता है:
“इन आँखों ने देखा है इंसान और इंसानियत का वीभत्स रूप! घृणा और दरिंदगी का नंगा नाच! कुत्तों की तरह नोचे जाते इंसानों के जिस्म! और अब कानून तोड़कर मैं करूँगा कानून की हिफ़ाज़त!”
यह डायलॉग साफ़ दिखाता है कि डोगा उस न्याय व्यवस्था में भरोसा नहीं करता, जहाँ अपराधी सालों तक अदालतों में घूमता रहे। डोगा अपराध को जड़ से खत्म करने में यकीन रखता है, आधे-अधूरे हल में नहीं।
कहानी का आधार: चंबल की खाइयों से मुंबई की गलियों तक

कहानी की शुरुआत चंबल के बीहड़ों से होती है, जहाँ डकैत हलकान सिंह का खौफ़ फैला हुआ है। यह हिस्सा नायक और विलेन के बीच पुराने, कड़वे और खून से सने रिश्ते को सामने लाता है।
हलकान सिंह की क्रूरता और ‘कचरा पेटी’ का बच्चा:
जब पुलिस हलकान सिंह को घेर लेती है, तो उसे कूड़े के ढेर में पड़ा एक लावारिस बच्चा मिलता है। वह बच्चे को किसी दया या इंसानियत के कारण नहीं उठाता, बल्कि उसे अपनी ढाल बनाता है, ताकि पुलिस गोली न चला सके। वह उस मासूम को “कचरा पेटी की औलाद” कहता है। यही बच्चा आगे चलकर डोगा बनता है। यहीं से साफ़ हो जाता है कि डोगा का बचपन ममता और प्यार में नहीं, बल्कि गालियों, डर और बारूद की गंध के बीच गुज़रा है।

नरसंहार और नफरत का जन्म:
हलकान सिंह और उसका गिरोह, जिसमें जागीरा और अन्य लोग शामिल हैं, निहत्थे यात्रियों को बेरहमी से मार डालते हैं। वे सिर्फ़ हत्या ही नहीं करते, बल्कि लाशों को लूटते भी हैं—किसी मरी हुई औरत की उंगली काटकर अंगूठी निकालना और किसी शव के सोने के दाँत पत्थर से तोड़कर निकाल लेना। ये दृश्य पाठकों के मन में हलकान सिंह के लिए गहरी नफरत भर देते हैं और डोगा के आने वाले बदले को सही ठहराते हैं। वह छोटा बच्चा यह सब अपनी आँखों से देख रहा था, और उसी वक्त उसके अंदर नफरत और गुस्से की आग जल चुकी थी।
‘पान-खराब’: समाज के खिलाफ एक नया षड्यंत्र
कई साल बाद कहानी महानगर मुंबई (तब की बम्बई) पहुँचती है। अब हलकान सिंह बीहड़ों का डकैत नहीं, बल्कि एक ताकतवर आदमी और मंत्री बन चुका है। वह ‘पान-खराब’ नाम के पान-मसाले का ज़ोर-शोर से प्रचार कर रहा है।
यह सिर्फ़ एक बिज़नेस नहीं है। ‘पान-खराब’ में ऐसा नशा मिलाया गया है, जो लोगों को उसका आदी और मानसिक रूप से कमजोर बना देता है। लेखक ने यहाँ तंबाकू और नशीले पदार्थों के समाज पर पड़ने वाले खतरनाक असर को बड़ी साफ़ तरीके से दिखाया है। जब बच्चे भी इसकी चपेट में आने लगते हैं, तो यह साफ़ संकेत देता है कि समाज का भविष्य दांव पर है। हलकान सिंह का मकसद सिर्फ़ पैसा कमाना नहीं, बल्कि पूरे शहर को नशे की अंधेरी गलियों में धकेल देना है।

‘कर्फ़्यू’ और डोगा का तांडव
कहानी का असली मोड़ तब आता है, जब डोगा मुंबई की दीवारों पर पोस्टर लगाकर ऐलान कर देता है कि वह हलकान सिंह को मार डालेगा। पुलिस कमिश्नर त्रिपाठी इस खुली चुनौती से परेशान हो जाते हैं। हलकान सिंह की सुरक्षा के लिए मंत्री के बंगले के चारों ओर पाँच मील के इलाके में ‘कर्फ़्यू’ लगा दिया जाता है।
ब्लैक कैट कमांडो बनाम अकेला योद्धा:
मंत्री की सुरक्षा में ‘ब्लैक कैट कमांडो’ तैनात हैं और उन्हें साफ़ आदेश है कि जो भी नज़र आए, उसे देखते ही गोली मार दी जाए। ऐसे माहौल में डोगा की एंट्री वाकई हैरान कर देने वाली है। वह 25वीं मंज़िल से सीधे नीचे कूदता है—एक ऐसा रहस्यमयी इंसान, जिसके जिस्म में मानो फौलाद भरा हो और रगों में लहू की जगह बारूद दौड़ता हो।
यहाँ का एक्शन चित्रण (Art by Manu) बेहद शानदार बन पड़ा है। डोगा अपनी भारी मशीनी गन और न्याय के चाबुक से उन कमांडो को धूल चटा देता है, जो एक सड़ी-गली और भ्रष्ट व्यवस्था की हिफ़ाज़त कर रहे हैं। इस हिस्से में एक गहरा नैतिक सवाल भी खड़ा होता है—क्या डोगा उन पुलिसकर्मियों और कमांडो को मारकर सही कर रहा है, जो सिर्फ़ अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं? लेकिन कहानी के हिसाब से देखा जाए, तो वे एक अपराधी और हत्यारे (हलकान सिंह) को बचा रहे हैं, इसलिए डोगा की नज़र में वे भी सज़ा के हक़दार बन जाते हैं।
चरम सीमा (Climax): हिसाब बराबर

कॉमिक्स का अंत बेहद भावनात्मक और ज़बरदस्त नाटकीय है। आखिरकार डोगा हलकान सिंह के सामने पहुँचता है। यहीं पर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा होता है कि हलकान सिंह ही वह शख़्स है, जिसने कभी उसे ‘कचरा पेटी’ से उठाकर पाला था।
ऋण की अदायगी और न्याय:
हलकान सिंह अपनी बेल्ट में छिपी एक खास सुनहरी गोली डोगा के सीने में उतार देता है, लेकिन डोगा मरता नहीं है। इसके बाद वह हलकान सिंह का गला घोंटकर उसे मौत के घाट उतार देता है। डोगा का संवाद उसके किरदार की गहराई को साफ़ दिखाता है:
“उसने मुझे जीवन देकर जो अहसान किया था, वह चुकता हो जाए… उसने मेरा खून बहाकर हिसाब बराबर किया, मैंने उसका खून बहाकर कानून का हिसाब बराबर किया।”
डोगा जानबूझकर अपनी जान जोखिम में डालता है, ताकि हलकान सिंह उसे गोली मार सके और वह उसके दिए गए ‘जीवन दान’ के कर्ज़ से आज़ाद हो सके। यह दृश्य डोगा को सिर्फ़ एक हिंसक किरदार नहीं रहने देता, बल्कि उसे ऊँचे नैतिक सिद्धांतों वाला एक सच्चा ‘एंटी-हीरो’ बना देता है।
पात्र चित्रण और मनोविज्ञान

डोगा (Doga):
उसका चरित्र नफ़रत और न्याय के बीच खड़ा हुआ एक संतुलन है। वह एक आवारा कुत्ते की तरह है—जिसे समाज ने ठुकरा दिया, लेकिन जो अपनी वफ़ादारी, यानी न्याय के प्रति, कभी नहीं डगमगाता। उसका मुखौटा और उसके भारी हथियार उसकी ताक़त और उसके डरावने रूप के प्रतीक हैं।
हलकान सिंह (Halkan Singh):
वह एक बेहद असरदार और कामयाब विलेन है। चंबल का डकैत बनने से लेकर एक भ्रष्ट मंत्री तक का उसका सफ़र यह दिखाता है कि समाज में बुराई खत्म नहीं होती, बस अपना रूप बदल लेती है। वह सत्ता और नशे के ज़रिए लोगों को काबू में रखना चाहता है।
अदरक चाचा (Adrak Chacha):
अंत में अदरक चाचा की एंट्री कहानी को एक नई दिशा देती है। वह डोगा के संरक्षक हैं और दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि इस खूँखार योद्धा के सीने में भी एक मासूम और संवेदनशील दिल धड़कता है।
कला, संवाद और संपादन (Art & Technical Review)

चित्रांकन (Illustration):
मनु का आर्टवर्क इस कॉमिक की सबसे बड़ी ताक़त है। 90 के दशक की राज कॉमिक्स की पहचान बन चुकी शैली यहाँ पूरी तरह नज़र आती है। रंगों का चुनाव, ख़ासकर डोगा का बैंगनी और लाल सूट, बहुत असरदार लगता है। खून-खराबे और गोलियों की बौछार वाले सीन इतने बारीकी से बनाए गए हैं कि पाठक खुद को उस तनाव और हिंसा के बीच खड़ा महसूस करता है।
पटकथा और संवाद (Screenplay & Dialogues):
तरुण कुमार वाही ने संवादों में शब्दों का चुनाव बहुत सोच-समझकर किया है। “कुत्तों की तरह नोचे जाते इंसानों के जिस्म” जैसे वाक्य कहानी के डार्क मूड को और गहरा बना देते हैं। पटकथा की रफ़्तार तेज़ है और कहीं भी कहानी ढीली नहीं पड़ती। हर पन्ने पर एक्शन और सस्पेंस का सही संतुलन बना रहता है।
सामाजिक प्रासंगिकता और संदेश

‘कर्फ़्यू’ सिर्फ़ एक काल्पनिक सुपरहीरो की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन कड़वे सामाजिक सचों को सामने लाती है, जहाँ भ्रष्ट राजनीति के सहारे अपराधी सत्ता तक पहुँच जाते हैं और समाज के रक्षक बनकर घूमते हैं। नशे का फैलता कारोबार आने वाली पीढ़ियों को अंदर से खोखला कर रहा है। यह कहानी हमारी न्याय व्यवस्था की नाकामी को भी दिखाती है, जहाँ कानून ही अपराधियों की ढाल बन जाता है। ऐसे हालात में ‘डोगा’ जैसे किरदारों का जन्म होना लगभग तय हो जाता है। सबसे अहम बात यह है कि कहानी बचपन के असर को गहराई से दिखाती है—कूड़े के ढेर पर मिले उस बच्चे का भविष्य उसके माहौल ने तय कर दिया। अगर उसे नफ़रत की जगह प्यार मिला होता, तो शायद उसकी ज़िंदगी कुछ और होती, लेकिन उसी कमी ने उसे एक ख़ूँखार ‘किल्लर’ बना दिया।
निष्कर्ष: एक अमर कृति
‘कर्फ़्यू’ राज कॉमिक्स की एक ऐसी मास्टरपीस है, जो पाठक को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि सही और ग़लत के बीच की रेखा कितनी धुंधली हो सकती है। यह अंक डोगा के प्रशंसकों के लिए एक ख़ास ‘कलेक्टर आइटम’ है, क्योंकि यह उसके ओरिजिन और उसके उसूलों को गहराई से दिखाता है।
इस कॉमिक की सबसे बड़ी ताक़त इसका अंत है, जो पाठक को भारी मन और गहरी संवेदनाओं के साथ छोड़ देता है। यह बताती है कि एक रक्षक बनने की क़ीमत कितनी बड़ी होती है। ‘कर्फ़्यू’ भारतीय कॉमिक्स के स्वर्ण युग का ऐसा नगीना है, जिसे हर पीढ़ी के पाठकों को ज़रूर पढ़ना चाहिए।
यह कहानी सिर्फ़ ‘डोगा’ की जीत नहीं है, बल्कि उस मासूम बच्चे के बदले की पूरी कहानी है, जिसने बरसों पहले चंबल के बीहड़ों में इंसानियत को मरते हुए देखा था। राज कॉमिक्स को सलाम, जिन्होंने इतना साहसी और यथार्थवादी किरदार हमें दिया।
रेटिंग: 5/5
सिफ़ारिश: ज़रूर पढ़ें (Must Read) उन सभी के लिए, जिन्हें एक्शन, थ्रिलर और गहरी भावनात्मक कहानियाँ पसंद हैं।
