भारतीय कॉमिक्स की दुनिया का इतिहास हमेशा से काफ़ी मज़ेदार और रंगीन रहा है। 80 और 90 के दशक में जहाँ राज कॉमिक्स और डायमंड कॉमिक्स का दबदबा था, वहीं मेरठ से निकलने वाली ‘दुर्गा कॉमिक्स’ (Durga Pocket Books) ने भी अपनी अलग पहचान बनाई थी। दुर्गा कॉमिक्स की कहानियों में एक अलग ही देसी फील होती थी—पूरा पल्प-फिक्शन वाला तड़का, ज़्यादा एक्शन, ज़्यादा ड्रामा और ज़्यादा “सीटी मार” सीन। इसी लाइन में उनका एक ताक़तवर और यादगार किरदार सामने आया—‘फाइटर मैन’ (Fighter Man)। इस लेख में हम फाइटर मैन के पहले अंक की पूरी और विस्तार से समीक्षा करेंगे, जिसमें उसके जन्म, कहानी, कला और उस दौर की कॉमिक्स संस्कृति की झलक मिलेगी।
कथानक का परिचय और विकास
फाइटर मैन के पहले अंक की शुरुआत होती है एक क्लासिक खलनायक से—विकराल। उसे “काली दुनिया का बेताज बादशाह” बताया गया है, जो विदेशी ताक़तों के साथ मिलकर हिंदुस्तान पर राज करने का सपना देख रहा है। शुरू के कुछ पन्नों में ही साफ हो जाता है कि यह कहानी पूरी तरह से “सुपर विलेन बनाम सुपर हीरो” टाइप होने वाली है।

कहानी में असली मोड़ तब आता है जब विकराल का भरोसेमंद आदमी कलुआ कुछ छोटे-मोटे अपराधियों को उसके सामने लाता है। यहाँ विकराल की बेरहमी दिखाने के लिए एक सीन रखा गया है, जहाँ वह मामूली अपराधियों को खुद अपनी रिवॉल्वर से मार देता है और कहता है कि उसे बड़े काम के लिए बड़े अपराधी चाहिए। इसी मौके पर एंट्री होती है डॉक्टर डेंग (Dr. Dang) की, जो पूरी तरह से एक पागल वैज्ञानिक यानी “मैड साइंटिस्ट” वाला किरदार है।
डॉक्टर डेंग विकराल को एक खतरनाक प्लान बताता है। वह कहता है कि अगर किसी जंगली इंसान या किसी जानवर के साथ पले बच्चे पर वैज्ञानिक प्रयोग किए जाएँ, तो उसे ऐसा सुपर-ह्यूमन बनाया जा सकता है जिस पर गोलियों का असर न हो और जो शेर जैसी ताक़त रखता हो।
फाइटर मैन का जन्म: जंगल से लैब तक
कहानी का अगला हिस्सा हमें सीधे जंगलों में ले जाता है। कलुआ अपने साथियों के साथ ऐसे बच्चे की तलाश में निकलता है, जिसे डॉक्टर डेंग अपनी लैब में इस्तेमाल कर सके। यहीं से हमें फाइटर मैन के ओरिजिन की पूरी कहानी पता चलती है। कलुआ जंगल में एक छोटे बच्चे को चीतों के साथ खेलते हुए देखता है। कॉमिक्स में बताया गया है कि वह बच्चा किसी वजह से जंगल में छूट गया था और चीतों ने उसे अपने बच्चे की तरह पाला। इसी कारण उसके शरीर पर चीते जैसी धारियाँ अपने-आप बन गई थीं।

उस बच्चे को पकड़ने के लिए कलुआ चीतों को बेरहमी से मार देता है। यह सीन पढ़ते हुए पाठक के मन में बच्चे के लिए दया और कलुआ के लिए गुस्सा पैदा हो जाता है। बच्चे को ज़बरदस्ती शहर लाया जाता है और डॉक्टर डेंग के हवाले कर दिया जाता है।
रूपांतरण और शक्तियाँ
अगले कई साल डॉक्टर डेंग की लैब में बीतते हैं। यहाँ विज्ञान और कल्पना का अजीब-सा मेल देखने को मिलता है। डॉक्टर डेंग बच्चे को स्लो पॉइज़न और अलग-अलग केमिकल्स पिलाता है। लगभग दस-बारह साल तक चलने वाले इन खतरनाक प्रयोगों के बाद वह बच्चा एक विशालकाय और बेहद ताक़तवर युवक में बदल जाता है—यानी फाइटर मैन।

फाइटर मैन की ताक़तें किसी आम इंसान जैसी नहीं हैं। उस पर गोलियों और बमों का कोई असर नहीं होता। उसकी आँखों से खतरनाक लेज़र किरणें निकलती हैं। वह अपने हाथों से बिजली की तरह चमकने वाले चक्र छोड़ सकता है, जो दुश्मनों को काट देते हैं। इतना ही नहीं, वह हेलीकॉप्टर को लात मारकर गिरा सकता है और ऊँची-ऊँची इमारतों से छलांग लगा सकता है।
डॉक्टर डेंग की सबसे बड़ी गलती यही होती है कि वह फाइटर मैन के दिमाग में आज्ञाकारी यंत्र लगाने से पहले ही उसे आख़िरी ताक़त वाला घोल पिला देता है। नतीजा यह होता है कि फाइटर मैन बगावत कर देता है और उसकी यादें वापस आने लगती हैं। उसे याद आता है कि इन्हीं लोगों ने उसके जंगली माता-पिता यानी चीतों को मारा था।
एक्शन और चरमोत्कर्ष (Climax)
कॉमिक्स का आख़िरी हिस्सा पूरा एक्शन से भरा हुआ है। फाइटर मैन लैब में जमकर तबाही मचाता है। वह डॉक्टर डेंग को अंधा कर देता है और कलुआ का अंत बेहद क्रूर तरीके से करता है। इस दौरान उसका संवाद “पेट है कि गुब्बारा” उस दौर की कॉमिक्स स्टाइल को अच्छे से दिखाता है।

जब विकराल अपने कमांडो के साथ फाइटर मैन पर हमला करता है, तब उसकी अजेयता पूरी तरह सामने आती है। गोलियाँ उसके शरीर से टकराकर नीचे गिर जाती हैं। वह अपने चक्र चलाकर पूरी सेना को खत्म कर देता है। अंत में, जब विकराल हेलीकॉप्टर से भागने की कोशिश करता है, तो फाइटर मैन हवा में ऊँची छलांग लगाकर हेलीकॉप्टर को लात मारता है, जो पहाड़ियों में गिरकर तबाह हो जाता है।
पात्र चित्रण (Character Analysis)
फाइटर मैन एक टार्ज़न-टाइप बैकग्राउंड वाला सुपरहीरो है, जिसे आधुनिक विज्ञान ने और भी ज़्यादा खतरनाक बना दिया है। वह ज़्यादा बोलता नहीं है, लेकिन जब गुस्सा आता है तो सब कुछ तबाह कर देता है। उसकी टाइगर-प्रिंट वाली ड्रेस और लाल शॉर्ट्स उसे बाकी हीरोज़ से अलग पहचान देती हैं।

विकराल पूरी तरह 90 के दशक का बॉलीवुड-स्टाइल विलेन है—निजी सेना, हाई-टेक हथियार और सत्ता की भूख। उसका एक ही मकसद है, राज करना।
डॉक्टर डेंग विज्ञान के गलत इस्तेमाल का प्रतीक है। उसका लालच ही अंत में उसकी बर्बादी की वजह बनता है।
कला और चित्रांकन (Art and Illustration)
धर्मेश स्टूडियो द्वारा किया गया चित्रांकन उस समय के हिसाब से काफ़ी असरदार है। भले ही इसमें राज कॉमिक्स जैसी बारीक डिटेलिंग न हो, लेकिन रंगों का इस्तेमाल और एक्शन सीन की बनावट पाठक को बाँधे रखती है। खासतौर पर फाइटर मैन की आँखों से निकलती किरणें और धमाकों के सीन ‘धड़ाम’, ‘बड़ाम’ और ‘किंइइइ’ जैसे साउंड इफेक्ट्स के साथ काफी जानदार लगते हैं। हिंसा दिखाने में भी कॉमिक्स झिझकती नहीं है, जिससे इसका टोन थोड़ा ग्रिटी बन जाता है।
भाषा और संवाद
कॉमिक्स की भाषा सरल हिंदी में है, जिसमें उर्दू के शब्द जैसे ‘सल्तनत’, ‘हुकूमत’ और ‘खूँखार’ अच्छे से घुले-मिले हैं। संवाद छोटे लेकिन असरदार हैं। फाइटर मैन की हँसी और विलेन का डर संवादों के ज़रिये अच्छे से सामने आता है।
समीक्षात्मक विश्लेषण: खूबियाँ और कमियाँ
कहानी कहीं भी ढीली नहीं पड़ती और शुरू से आख़िर तक पकड़ बनाए रखती है। जंगल में पले बच्चे को लैब में सुपरहीरो बनाना उस दौर के हिसाब से एक मज़ेदार और नया आइडिया था। फाइटर मैन का लुक बच्चों और युवाओं को तुरंत पसंद आ सकता है।

कमज़ोरी की बात करें तो विज्ञान के नाम पर दिखाई गई चीज़ें पूरी तरह काल्पनिक हैं और ज़्यादा तर्कसंगत नहीं लगतीं। कहानी में एक्शन पर ज़्यादा और किरदारों के मनोविज्ञान पर कम ध्यान दिया गया है। नायक के अंदर चलने वाला भावनात्मक द्वंद्व लगभग न के बराबर है।
सांस्कृतिक प्रभाव और पुरानी यादें (Nostalgia)
आज के मार्वल और डीसी के दौर में फाइटर मैन जैसे किरदार हमें उस मासूम समय की याद दिलाते हैं, जब गली के नुक्कड़ पर कॉमिक्स की दुकान होती थी। दुर्गा कॉमिक्स ने इस अंक के ज़रिये सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं दिया, बल्कि देशभक्ति का संदेश भी दिया—जहाँ फाइटर मैन देशद्रोहियों को खत्म करने की कसम खाता है।

यह अंक सिर्फ़ शुरुआत था। आख़िर में अगले अंक ‘फाइटर मैन का तहलका’ का विज्ञापन दिया गया है, जिससे साफ़ होता है कि पब्लिशर इस किरदार को लेकर काफ़ी सीरियस थे। साथ ही ‘टोरा-टोरा’ और ‘महाबली लंगूरा’ जैसे किरदारों के विज्ञापन उस समय के शेयरड यूनिवर्स का एहसास देते हैं।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, फाइटर मैन अंक-1 भारतीय पल्प कॉमिक्स का एक शानदार उदाहरण है। यह ताक़त, बदले और सुपर पावर से भरी ऐसी कहानी है, जो आज भी पाठकों को अपने साथ बहा ले जाती है। अगर आप पुरानी भारतीय कॉमिक्स और उस दौर की रॉ, बिना फिल्टर वाली कहानियों के शौकीन हैं, तो फाइटर मैन की यह शुरुआत ज़रूर पढ़ने लायक है।
यह कॉमिक हमें यही सिखाती है कि बुराई कितनी भी ताक़तवर क्यों न हो, प्रकृति और न्याय की ताक़त आख़िरकार उसे हरा ही देती है। फाइटर मैन सिर्फ़ एक सुपरहीरो नहीं, बल्कि उन सभी बच्चों के सपनों का नायक है, जिन्होंने कभी खुद को आसमान में उड़ते और बुराई का खात्मा करते हुए देखा है।
