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Home » किंग कॉमिक्स की ‘अभेद सीरीज’: ‘षड्यंत्र’ से शुरू हुआ साजिशों, विज्ञान और सुपरहीरो का महायुद्ध
Hindi Comics World Updated:22 January 2026

किंग कॉमिक्स की ‘अभेद सीरीज’: ‘षड्यंत्र’ से शुरू हुआ साजिशों, विज्ञान और सुपरहीरो का महायुद्ध

90 के दशक की एक महत्वाकांक्षी हिंदी कॉमिक, जहाँ राजनीति, तकनीक और रहस्य मिलकर ‘अभेद’ के जन्म की कहानी रचते हैं
ComicsBioBy ComicsBio22 January 2026Updated:22 January 202606 Mins Read
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अभेद सीरीज की शुरुआत: किंग कॉमिक्स की ‘षड्यंत्र’ कॉमिक की पूरी कहानी और समीक्षा
किंग कॉमिक्स की ‘षड्यंत्र’—जहाँ भारखण्डा की राजनीति, प्रोफेसर आलूजा की तकनीक और ‘अभेद’ की आहट एक नई सुपरहीरो गाथा की नींव रखती है
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‘अभेद सीरीज’ किंग कॉमिक्स पब्लिकेशन की एक काफी बड़ी और महत्वाकांक्षी कोशिश थी। इस सीरीज की पहली कॉमिक ‘षड्यंत्र’, जिसे नाजरा रवान ने लिखा है और दिलीप चौबे ने चित्रित किया है, पूरी कहानी की नींव रखती है। विवेक मोहन के संपादन में तैयार यह कॉमिक पाठकों को एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में ले जाती है, जो कल्पना से भरी होने के साथ-साथ काफी दिलचस्प भी है।

कथानक का विस्तार और विश्व–निर्माण

कहानी की शुरुआत ओशिया नाम के एक विशाल महाद्वीप से होती है, जो सैकड़ों छोटे-बड़े द्वीपों में बंटा हुआ है। लेखक ने इस दुनिया को गढ़ने में काफी मेहनत की है और हर द्वीप को उसकी अलग पहचान दी है। हर द्वीप के अपने कानून हैं, अपनी व्यवस्था है और अपना शासक भी।
इन सब में सबसे ताकतवर और विकसित द्वीप है— भारखण्डा।

भारखण्डा की पहचान सिर्फ उसकी अमीरी और ताकत से नहीं है, बल्कि उसके अजीब और बेहद क्रूर कानूनों से भी है। यहाँ बाहरी चोर-लुटेरों को सीधे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर वे पकड़े जाएँ तो उन्हें ऐसी खौफनाक सज़ाएं दी जाती हैं कि रूह तक कांप जाए। बिच्छुओं, चूहों, गर्म पानी और जहरीले कीड़ों से भरे ‘यातना कक्ष’ इस द्वीप की डरावनी सच्चाई को साफ दिखाते हैं।

राजनैतिक उथल–पुथल और षड्यंत्र

कहानी का असली फोकस भारखण्डा की अंदरूनी राजनीति पर है। यहाँ का राजा नरेश भारखण्डिया एक कमजोर और मंदबुद्धि इंसान दिखाया गया है, जिसे सिर्फ इसलिए राजा बना दिया गया क्योंकि वह राजपरिवार से था। असल सत्ता उसके हाथ में नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे चल रही चालों में है।

प्रधानमंत्री बालनोंच और मुख्यमंत्री मारखोड़ जैसे चालाक और लालची लोग सत्ता पर पूरा कब्जा जमाना चाहते हैं। दूसरी तरफ, भारखण्डा की समृद्धि को देखकर पास के द्वीपों—जैसे बाटापुर, मंगोलपुरी और सुल्तानपुर—के राजा भी ललचाई नज़रों से उसे देखते हैं।
इसी लालच में बाटापुर का राजा जूतामार अपनी सेना के साथ भारखण्डा पर हमला कर देता है। यहीं से कहानी में जबरदस्त एक्शन और सस्पेंस की एंट्री होती है।

प्रोफेसर आलूजा: भारखण्डा का रक्षक

जब भारखण्डा पर बड़ा खतरा आता है, तब सामने आता है प्रोफेसर आलूजा का नाम। प्रोफेसर आलूजा और उनकी रहस्यमयी प्रयोगशाला ‘भोपड़ा’, इस द्वीप की असली सुरक्षा ढाल हैं। आलूजा के पूर्वज पीढ़ियों से राजपरिवार की सेवा करते आए हैं।
अपनी आधुनिक तकनीक और अजीबोगरीब मशीनों के दम पर—जैसे वह मशीन जो चूहे और धुआं छोड़कर दुश्मनों को बेहोश कर देती है—वे दुश्मनों को करारा जवाब देते हैं।

यहीं से असली ‘षड्यंत्र’ जन्म लेता है। प्रधानमंत्री बालनोंच समझ जाता है कि जब तक प्रोफेसर आलूजा और उनकी लैब मौजूद है, तब तक भारखण्डा पर कब्जा करना नामुमकिन है। इसी सोच के साथ वह बाहरी दुश्मनों से हाथ मिलाकर आलूजा को रास्ते से हटाने की साजिश रचता है।

सुपर हीरो मार्केट: एक अनूठा विचार

इस कॉमिक का सबसे मजेदार और चुटीला हिस्सा है ‘सुपर हीरो मार्केट’ का कॉन्सेप्ट। यहाँ लेखक ने बड़े ही व्यंग्यात्मक तरीके से सुपरहीरो संस्कृति पर तंज कसा है।
‘सुपर हीरो दी हट्टी’ और ‘सुपर हीरो सर्विस स्टेशन’ जैसे विज्ञापनों के ज़रिए दिखाया गया है कि यहाँ सुपरहीरो भी किसी सामान की तरह खरीदे और बेचे जा सकते हैं।

महाबली आलसीराम जैसे डिस्काउंट वाले हीरो हों, उड़न छू—जिसके साथ माचिस मुफ्त मिलती है—या फिर मिस फुर्तीली, गंबोला और गुलुगुलु जैसे किराए के किरदार—सब कुछ बाजार में उपलब्ध है।
बालनोंच और विद्रोही राजा इन्हीं भाड़े के सुपरहीरो का इस्तेमाल प्रोफेसर आलूजा की लैब को तबाह करने के लिए करते हैं। यह पूरा आइडिया नायकों की नैतिकता पर एक गहरा और मजेदार कटाक्ष करता है।

रहस्यमयी युवक और ‘अभेद’ की आहट

कहानी की एक समानांतर धारा एक रहस्यमयी युवक से जुड़ी है, जिसके हाथ बेहद भयानक, खुरदरे और कांटों जैसे हैं। वह एक क्लब में पैसे के लिए कुश्ती लड़ता है और अपनी जबरदस्त ताकत से एक विशाल सूमो फाइटर को हरा देता है।
वह सिर्फ 100 रुपये लेता है, ताकि अपने बीमार हाथों का इलाज करा सके।

एक डॉक्टर उसे बताता है कि उसका इलाज केवल जंगल में स्थित ‘भोपड़ा’ लैब में मौजूद प्रोफेसर आलूजा ही कर सकते हैं। अनजाने में यह युवक उसी साजिश का हिस्सा बन जाता है, जहाँ पहले से ही किराए के सुपरहीरो लैब पर हमला करने वाले होते हैं।

कला और चित्रांकन (Art and Illustration)

दिलीप चौबे का आर्टवर्क पूरी तरह 90 के दशक की क्लासिक कॉमिक्स स्टाइल को दर्शाता है। किरदारों की बॉडी स्ट्रक्चर मजबूत, मांसल और प्रभावशाली है। प्रोफेसर आलूजा की लैब और उनके सुरक्षा उपकरण—जैसे रोबोटिक मेंटिस, खुजली वाली गैस और लेजर गन—काफी रचनात्मक ढंग से दिखाए गए हैं।
रंगों का इस्तेमाल चटकीला है, जो कहानी के फैंटेसी माहौल को और भी जीवंत बना देता है। खास तौर पर वह दृश्य, जहाँ युवक अपनी ताकत से लैब के दरवाज़े तोड़ता है, काफी दमदार बन पड़ा है।

मुख्य पात्रों का विश्लेषण

नरेश भारखण्डिया: एक कमजोर राजा, जो हर फैसले के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है।

बालनोंच: एक क्लासिक खलनायक, जो सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। उसकी चालें कहानी को तेज़ी देती हैं।

प्रोफेसर आलूजा: एक ईमानदार और वफादार वैज्ञानिक, जो अपनी बुद्धि और तकनीक से देश की रक्षा करता है।

रहस्यमयी युवक: कहानी का सबसे बड़ा आकर्षण, जिसकी असली पहचान अंत तक छुपी रहती है। उसके हाथों का रहस्य और उसकी असीम ताकत पाठकों की जिज्ञासा बनाए रखती है।

अभेद: कॉमिक के अंत में कवर पेज वाले महानायक ‘अभेद’ की एंट्री होती है, जो एक ऐसी दीवार बनकर खड़ा होता है जिसे तोड़ पाना नामुमकिन लगता है।

समीक्षात्मक निष्कर्ष

‘षड्यंत्र’ सिर्फ एक साधारण सुपरहीरो कॉमिक नहीं है, बल्कि यह एक बड़े और भव्य महाकाव्य की शुरुआत है। इसमें राजनीति की गंदगी, विज्ञान का चमत्कार और एक गरीब युवक का संघर्ष साथ-साथ चलता है।

सकारात्मक पक्ष:
कहानी की रफ्तार काफी तेज़ है और कहीं भी बोरियत महसूस नहीं होती। ‘सुपर हीरो मार्केट’ जैसा नया और मजेदार आइडिया कहानी में ताज़गी लाता है। रहस्य और सस्पेंस का संतुलन अंत तक बना रहता है, जिससे पाठक जुड़ा रहता है। संवाद सरल होते हुए भी असरदार हैं, जो किरदारों और हालात को जीवंत बना देते हैं और पूरी कहानी को यादगार अनुभव में बदल देते हैं।

नकारात्मक पक्ष:
कुछ जगहों पर किरदारों की संख्या इतनी ज़्यादा हो जाती है कि नए पाठकों के लिए उन्हें याद रखना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।
कहानी एक बहुत बड़े क्लिफहैंगर पर खत्म होती है, जो पाठकों को अगली कॉमिक ‘अभेद’ पढ़ने के लिए मजबूर कर देती है।

अंतिम शब्द

किंग कॉमिक्स की यह पेशकश हिंदी कॉमिक्स प्रेमियों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है। अगर आपको क्लासिक सुपरहीरो कहानियों के साथ-साथ राजनीतिक चालें और साजिशें पसंद हैं, तो ‘षड्यंत्र’ आपको जरूर पसंद आएगी।
यह कॉमिक हमें यह सिखाती है कि असली ताकत सिर्फ मांसपेशियों में नहीं, बल्कि दिमाग और तकनीक के सही इस्तेमाल में होती है।

कहानी के अंत में खड़े सवाल—क्या वह युवक अपनी बीमारी से छुटकारा पा पाएगा? क्या प्रोफेसर आलूजा भारखण्डा को बचा पाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल, आखिर कौन है यह ‘अभेद’, जिसकी दीवार को कोई भेद नहीं सकता?—इन सबके जवाब अगली कड़ी में छुपे हुए हैं।

90 के दशक की हिंदी सुपरहीरो कॉमिक्स अभेद का ओरिजिन किंग कॉमिक्स की अभेद सीरीज की पहली कॉमिक ‘षड्यंत्र’ क्लासिक हिंदी कॉमिक रिव्यू प्रोफेसर आलूजा और उनकी रहस्यमयी लैब भारखण्डा की राजनीति सुपर हीरो मार्केट का अनोखा कॉन्सेप्ट
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