कॉमिक्स की शुरुआत एक गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाले माहौल से होती है। लेखक परमाणु बम और उसके भयानक असर की बात करते हुए पाठक को सीधे हिरोशिमा की याद दिला देते हैं। कहानी के बीचों-बीच हैं प्रोफेसर भास्कर, जो एक सच्चे देशभक्त और ईमानदार वैज्ञानिक हैं। वे अपने सहायक प्रकाश भूते के साथ मिलकर ‘सुपर प्रोटेक्टिव रेज’ (Super Protective Rays) पर काम कर रहे हैं। इस रिसर्च का मकसद परमाणु विकिरण के खतरनाक असर को खत्म करना है, ताकि आने वाले समय में इंसानियत को ऐसे विनाश से बचाया जा सके।
कहानी की शुरुआत में ही यह साफ हो जाता है कि यह कोई साधारण मार-धाड़ वाली कॉमिक्स नहीं है। लेखक ने इसमें विज्ञान को आधार बनाकर एक गंभीर और मजबूत कहानी गढ़ने की कोशिश की है, जो उस दौर की कॉमिक्स में कम ही देखने को मिलती थी।
कथानक का विस्तार और संघर्ष

कहानी का दूसरा अहम हिस्सा प्रोफेसर भास्कर की बेटी श्रेया भास्कर से जुड़ा है। श्रेया एक मार्शल आर्ट एक्सपर्ट है, जो तालकटोरा स्टेडियम में जूडो, कराटे और कुंग-फू की प्रतियोगिता जीतती है। 90 के दशक के हिसाब से यह किरदार काफी आगे की सोच को दिखाता है, क्योंकि यहाँ एक महिला को सिर्फ बहादुर ही नहीं, बल्कि शारीरिक रूप से बेहद मजबूत और आत्मनिर्भर भी दिखाया गया है।
जैसे ही श्रेया अपनी जीत की खुशी अपने पिता के साथ बांटने के लिए लैब पहुँचती है, कहानी एक बड़े मोड़ पर आ जाती है। एक पेशेवर हत्यारा रंगा, जो विदेशी ताकतों (CIA और उनके एजेंटों) के इशारे पर काम कर रहा होता है, लैब में घुस आता है। उसका मकसद प्रोफेसर की रिसर्च को नष्ट करना और भारत को परमाणु शक्ति बनने से रोकना है।
रेडियोधर्मी विस्फोट और उत्परिवर्तन (Mutation)
कॉमिक्स का सबसे अहम हिस्सा वही दुर्घटना है, जो आगे चलकर सुपरहीरो और सुपरविलेन दोनों के जन्म की वजह बनती है। लैब में रंगा और वैज्ञानिकों के बीच हुई झड़प के दौरान चूहों के चैम्बर में रेडियोधर्मी विकिरण फैल जाता है। उसी समय वहाँ एक छिपकली और एक कॉकरोच (तिलचट्टा) भी मौजूद होते हैं, जो कहानी को एक अलग दिशा में ले जाते हैं।

मरते समय प्रोफेसर भास्कर अपनी पूरी रिसर्च की माइक्रोफिल्म श्रेया को सौंप देते हैं और उससे अपनी मेहनत को बचाने का वादा लेते हैं। इस पल पर कहानी भावनात्मक हो जाती है और पाठक अपने-आप श्रेया के दर्द को महसूस करने लगता है, साथ ही रंगा के लिए नफरत और भी गहरी हो जाती है।
रंगा का कायापलट: एक भयानक खलनायक
रंगा, जो पहले से ही एक बेरहम कातिल है, भागते वक्त उसी रेडियोधर्मी विकिरण की चपेट में आ जाता है। जब वह अपने आकाओं यानी विदेशी एजेंटों के पास पहुँचता है और वे उसे मारने की कोशिश करते हैं, तभी उसका म्यूटेशन शुरू होता है। वह एक विशाल और डरावने कॉकरोच-मानव में बदल जाता है।
यहाँ विनोद भाटिया का चित्रांकन वाकई तारीफ के काबिल है। रंगा का कॉकरोच रूप इतना घिनौना और डरावना दिखता है कि उसकी अंदर की दुष्ट सोच साफ नजर आती है। वह अपने ही बॉस को मार देता है और अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बनने का सपना देखने लगता है। इस हिस्से में कहानी पूरी तरह से एक रोमांचक क्रिएचर फीचर का रंग ले लेती है।
लिजा का रहस्यमय उदय

कॉमिक्स का नाम भले ही “लिजा” है, लेकिन ज्यादातर कहानी श्रेया और रंगा के टकराव के इर्द-गिर्द घूमती है। आखिरी पन्नों में जाकर हमें लिजा की पहली झलक मिलती है। जब कुछ गुंडे एक आम आदमी को परेशान कर रहे होते हैं, तभी एक रहस्यमयी महिला सामने आती है। उसके चेहरे पर छिपकली जैसे निशान होते हैं और उसके पास दीवारों पर चढ़ने और लंबी जीभ से हमला करने जैसी अजीब लेकिन दमदार ताकतें होती हैं।
हालाँकि इस पहले अंक में यह पूरी तरह साफ नहीं किया गया है कि क्या श्रेया ही लिजा है, लेकिन इशारे साफ-साफ बताते हैं कि लैब में मौजूद छिपकली और रेडियोधर्मी विकिरण के असर से ही यह नई सुपरहीरोइन लिजा (छिपकली-मानव) जन्म लेती है। उसका लुक काफी बोल्ड और याद रहने वाला है—हरे बाल और पीला सूट उसे बाकी किरदारों से अलग पहचान देते हैं।
पात्र चित्रण (Character Analysis)

प्रोफेसर भास्कर: वे एक आदर्शवादी वैज्ञानिक का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनका बलिदान कहानी को गति देता है।
श्रेया: वह एक आधुनिक, साहसी और न्यायप्रिय लड़की है। उसका मार्शल आर्ट बैकग्राउंड उसे एक शक्तिशाली नायक बनाता है।
रंगा (खलनायक): वह एक लालची और क्रूर हत्यारा है। उसका कॉकरोच में बदलना उसके चरित्र की गंदगी को शारीरिक रूप प्रदान करता है।
इंस्पेक्टर काले: पुलिस की भूमिका को भी सम्मानजनक दिखाया गया है। वे मामले की तह तक जाने की कोशिश करते हैं और वैज्ञानिक साक्ष्यों पर विश्वास करते हैं।
कला और चित्रांकन (Art and Illustration)

विनोद भाटिया की आर्ट इस कॉमिक्स की असली जान है। 90 के दशक की कॉमिक्स की तरह इसमें भी रंग बेहद चटकीले हैं, जो बच्चों और किशोरों को तुरंत आकर्षित करते हैं। धमाकों के सीन, लैब के उपकरण और रंगा का म्यूटेशन बहुत डिटेल में दिखाया गया है। एक्शन को तेज और असरदार बनाने के लिए ब्लर लाइन्स और साउंड इफेक्ट्स जैसे “धड़ाम”, “कड़ाक”, “आह” का शानदार इस्तेमाल किया गया है।
खासतौर पर परमाणु विस्फोट और विकिरण वाले सीन में पीले और नारंगी रंगों का इस्तेमाल खतरे और तबाही की गंभीरता को अच्छे से दिखाता है।
लेखन और संवाद

तरुण कुमार ‘वाही’ का लेखन कसा हुआ और तेज रफ्तार है। कहानी कहीं भी बोझिल नहीं लगती। संवादों में देशभक्ति, साहस और बदले की भावना साफ झलकती है। विदेशी साजिश यानी CIA वाला एंगल उस दौर की कॉमिक्स का पसंदीदा विषय था, और यहाँ भी इसे अच्छे से पिरोया गया है। कहानी के आखिर में “क्रमशः” लिखकर पाठकों के मन में लिजा की असली पहचान और रंगा के अगले कदम को लेकर उत्सुकता पैदा करना एक कामयाब दांव है।
सामाजिक और नैतिक पक्ष

यह कॉमिक्स सीधे-सीधे नहीं, लेकिन इशारों में विज्ञान के गलत इस्तेमाल और परमाणु हथियारों के खतरों की ओर ध्यान दिलाती है। यह दिखाती है कि लालच और विदेशी दखल किसी भी देश की तरक्की को कैसे नुकसान पहुँचा सकता है। इसके साथ-साथ यह नारी शक्ति को भी सामने लाती है, जहाँ एक बेटी अपने पिता की हत्या का बदला लेने और इंसाफ के लिए खड़े होने को तैयार है।
समीक्षात्मक निष्कर्ष
“लिजा” सिर्फ एक सुपरहीरो के जन्म की कहानी नहीं है, बल्कि बदले और इंसाफ की एक मजबूत गाथा भी है। इसकी खासियतें इसे यादगार बनाती हैं।
कॉकरोच बनाम छिपकली जैसा अनोखा म्यूटेशन आइडिया।
एक ताकतवर महिला नायक।
देशभक्ति और विज्ञान का दिलचस्प मेल।
हाँ, कुछ पाठकों को कॉकरोच-मानव का कॉन्सेप्ट थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन फैंटेसी और कॉमिक्स की दुनिया में ऐसे प्रयोग ही कहानी को मजेदार बनाते हैं। “लिजा” का यह पहला अंक पूरी तरह अपने मकसद में सफल है—यह मनोरंजन करता है, भावनाओं को छूता है और अंत में एक सस्पेंस छोड़ जाता है।
अगर आप पुराने भारतीय कॉमिक्स के शौकीन हैं, तो किंग कॉमिक्स की यह पेशकश आपको निराश नहीं करेगी। यह उस दौर की याद दिलाती है जहाँ अच्छाई की जीत तय होती थी और बुराई चाहे जितनी ताकतवर हो, उसे खत्म करने के लिए कहीं न कहीं कोई “लिजा” जरूर जन्म लेती थी।
