‘योद्धा: आरम्भ’ सिर्फ एक कॉमिक बुक नहीं है, बल्कि भारतीय पौराणिक कथाओं और फैंटेसी का शानदार मेल है। यह कहानी हमें उस दौर में ले जाती है जब सृष्टि बिल्कुल शुरुआती अवस्था में थी और देवताओं के लिए स्वर्ग तक का निर्माण नहीं हुआ था। यानी यह कहानी सीधे जड़ों से शुरू होती है।
‘योद्धा’ (Yoddha) एक ऐसा किरदार है जो पौराणिक माहौल और जबरदस्त पराक्रम का अनोखा मिश्रण है। प्रस्तुत कॉमिक ‘आरम्भ’ (Aarambh) योद्धा की मूल कहानी यानी उसकी ऑरिजिन स्टोरी का पहला भाग है। यह सिर्फ किसी एक नायक की कहानी नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड की रचना, ईश्वरीय नियमों और नियति के टकराव को दिखाने वाली एक बड़ी और गंभीर महागाथा है।
कहानी का सारांश और प्रवाह:

कहानी की शुरुआत उस समय से होती है जब देवताओं का स्वर्ग भी अस्तित्व में नहीं आया था। प्रजापति ब्रह्मा सृष्टि की रचना का संकल्प लेते हैं और उसी संकल्प से इस विशाल ब्रह्मांड की उत्पत्ति होती है। लेखक तरुण कुमार वाही ने कहानी की शुरुआत बहुत ही भव्य और बड़े स्तर पर की है, जिससे शुरुआत से ही यह एहसास हो जाता है कि आगे कुछ खास होने वाला है।
शुरुआती पन्नों में हमें ‘जुरासिक काल’ के विशाल और खतरनाक जीव दिखाई देते हैं, जहाँ डायनासोर जैसे प्राणी पृथ्वी पर आतंक मचा रहे होते हैं। अपनी रचना को बचाने के लिए ईश्वर एक प्रलय लाते हैं और इन राक्षसी जीवों का अंत कर देते हैं। इसके बाद जीवन का एक नया अध्याय शुरू होता है। यहीं से महर्षि कश्यप की वंशावली की नींव रखी जाती है। ब्रह्मा जी अपने दाहिने अंगूठे से दक्ष को और बाईं कोख से उनकी पत्नी को प्रकट करते हैं। दक्ष की पुत्रियाँ — दिति और अदिति — महर्षि कश्यप से विवाह करती हैं।
अदिति के गर्भ से देवताओं का जन्म होता है, जबकि दिति के गर्भ से दैत्यों का। कहानी का एक अहम मोड़ सूर्य के जन्म से आता है। जब सूर्य का जन्म होता है तो उनका तेज इतना प्रचंड होता है कि पूरा ब्रह्मांड जलने लगता है। महर्षि कश्यप की प्रार्थना पर भगवान सूर्य अपना तेज नियंत्रित करते हैं और सूर्यलोक की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। इसके बाद कहानी का असली संघर्ष शुरू होता है — देवताओं और दैत्यों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और टकराव।

महर्षि कश्यप अपने पुत्रों की शिक्षा और भविष्य को लेकर चिंतित हो जाते हैं। भगवान विष्णु के मार्गदर्शन में वे देवगुरु बृहस्पति और दैत्यगुरु शुक्राचार्य को आमंत्रित करते हैं। यहीं से ‘श्रेष्ठ बीज’ (The Divine Seed) की कहानी सामने आती है। बृहस्पति और शुक्र अपनी संयुक्त शक्तियों से एक ऐसे दिव्य बीज का निर्माण करते हैं, जिससे ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली योद्धा जन्म लेने वाला होता है। लेकिन नियति का खेल और शुक्राचार्य व दिति की चालों के कारण वह बीज, जो अदिति के लिए था, दिति के गर्भ में चला जाता है। इसी गर्भ से ‘शिरोमणि’ का जन्म होता है, जिसे आगे चलकर योद्धा या सूर्यांश के नाम से जाना जाता है।
पात्र चित्रण (Character Analysis):
महर्षि कश्यप को एक न्यायप्रिय और दूरदर्शी पिता के रूप में दिखाया गया है। वे देवताओं और दैत्यों दोनों के साथ समान व्यवहार करना चाहते हैं, लेकिन उनके स्वभाव और सोच का फर्क उन्हें लगातार परेशान करता है। एक पिता के रूप में उनका द्वंद्व कहानी को और गहराई देता है।

अदिति और दिति मातृत्व के दो बिल्कुल अलग रूपों को दर्शाती हैं। अदिति शांत, संयमी और धैर्यवान है, जबकि दिति के भीतर ईर्ष्या और असुरक्षा साफ नजर आती है। दिति का अपने पुत्र को हर हाल में श्रेष्ठ बनाने का जुनून ही इस पूरी कहानी के संघर्ष की जड़ बनता है।
गुरु बृहस्पति और शुक्राचार्य भी बेहद रोचक तरीके से उभरते हैं। बृहस्पति नीति, धर्म और नैतिकता के प्रतीक हैं, वहीं शुक्राचार्य ज्ञान के साथ-साथ छल, महत्वाकांक्षा और चालाकी का प्रतिनिधित्व करते हैं। शुक्राचार्य द्वारा छींक के जरिए अनुष्ठान में बाधा डालना और बीज का स्थान बदल देना उनके चालाक और कुटिल स्वभाव को साफ दिखाता है।
शिरोमणि यानी योद्धा, भले ही इस भाग में एक बालक के रूप में सामने आता है, लेकिन उसके भीतर का तेज और न्याय के प्रति उसकी स्वाभाविक झुकाव उसे बाकी दैत्य बालकों से अलग खड़ा करता है। उसके जन्म की परिस्थितियाँ ही उसे एक ऐसे नायक के रूप में स्थापित करती हैं जो पूरी तरह हीरो या विलेन नहीं, बल्कि एक जटिल और दिलचस्प एंटी-हीरो जैसा महसूस होता है।
कला और चित्रांकन (Artwork and Illustration):
नितिन मिश्रा का आर्टवर्क इस कॉमिक की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। हर पैनल में भव्यता और डिटेल साफ दिखाई देती है। खासकर शुरुआत में डायनासोर वाले दृश्य और बाद में देवताओं व दैत्यों के चित्र बेहद प्रभावशाली हैं। सुशील राम शर्मा की इनकिंग ने ड्रॉइंग्स में जान डाल दी है और हर सीन को ज्यादा मजबूत बनाया है।

रंग संयोजन के लिए अमित कादिर्या की तारीफ करना बनता है। पौराणिक कहानियों में सही रंगों का चुनाव बहुत जरूरी होता है, और यहाँ ‘श्रेष्ठ बीज’ की रोशनी, सूर्य का तेज और हिमालय जैसे दृश्यों में रंगों का इस्तेमाल पाठक को उसी युग में ले जाता है। संवादों की लिखावट यानी कॉलिग्राफी भी साफ, पढ़ने में आसान और असरदार है, जो कहानी के प्रभाव को और बढ़ा देती है।
प्रमुख प्रसंग और उनका महत्व:
इस कॉमिक का सबसे भावनात्मक और सबसे अहम प्रसंग ‘सफेद कमल’ लाने की परीक्षा है। गुरु बृहस्पति बालकों की योग्यता और संस्कारों को परखने के लिए उन्हें ब्रह्म सरोवर से श्वेत कमल लाने का आदेश देते हैं। यह परीक्षा सिर्फ ताकत की नहीं, बल्कि सोच और चरित्र की भी है।
मार्ग में दैत्य बालकों का व्यवहार बेहद नकारात्मक रूप में सामने आता है। वे रास्ते में आने वाली बाधाओं को हटाने के लिए निर्दोष पशुओं, खासकर भैंसों, पर अत्याचार करते हैं। उनकी यह क्रूरता साफ दिखाती है कि उनके भीतर संस्कारों की जगह अहंकार और निर्दयता ने घर कर लिया है। यह दृश्य यह भी समझाता है कि केवल शक्ति होना पर्याप्त नहीं होता।

इसके विपरीत देवता बालकों और शिरोमणि का व्यवहार पूरी तरह त्याग और संयम पर आधारित है। जब सरोवर का रक्षक सफेद कमल के बदले अंगूठे की मांग करता है, तो शिरोमणि बिना किसी हिचकिचाहट के अपना अंगूठा काट देता है। यह दृश्य महाभारत के एकलव्य की याद दिलाता है, लेकिन यहाँ यह बलिदान किसी अन्याय का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयं चुना गया एक न्यायपूर्ण त्याग है। यह प्रसंग साफ संदेश देता है कि असली महानता ताकत में नहीं, बल्कि त्याग और संस्कारों में होती है।
दार्शनिक और नैतिक पहलू:
‘आरम्भ’ सिर्फ एक कल्पनात्मक कहानी नहीं है, बल्कि कई गहरे दार्शनिक सवाल भी उठाती है। क्या कोई जन्म से देवता या दैत्य होता है? क्या कर्म, जन्म से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं? शिरोमणि इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो दैत्य माता दिति की कोख से जन्म लेने के बावजूद देवताओं जैसी सोच, तेज और नैतिकता रखता है। यही बात इस कहानी को ‘प्रकृति बनाम पोषण’ यानी Nature vs Nurture की बहस से जोड़ती है।

लेखक ने शुक्राचार्य के किरदार के जरिए यह भी दिखाया है कि कैसे कई बार ‘छल’ को भी ‘नीति’ का नाम दे दिया जाता है। शिक्षा के महत्व को भी बहुत स्पष्ट रूप से सामने रखा गया है। एक ओर बृहस्पति शास्त्रों, संयम और मर्यादा की शिक्षा देते हैं, तो दूसरी ओर शुक्राचार्य शस्त्रों और वाम मार्ग यानी अंधकार की ओर ले जाने वाली शिक्षा का समर्थन करते हैं। यही टकराव आगे की कहानी की नींव बनता है।
समीक्षात्मक विश्लेषण:
इस कॉमिक की सबसे बड़ी ताकत इसकी पेसिंग यानी कहानी की गति है। कहानी कहीं भी बोझिल या धीमी नहीं लगती। सिर्फ 42 पन्नों में पाठक को सृष्टि की रचना से लेकर एक महान नायक के बचपन तक की पूरी यात्रा करा दी जाती है, और कहीं भी ऐसा महसूस नहीं होता कि कुछ खिंच रहा है।
अगर किसी कमी की बात करें, तो कुछ पाठकों को पात्रों की संख्या थोड़ी ज्यादा लग सकती है। हालांकि, चूंकि यह एक ओरिजिन इशू है, इसलिए मजबूत पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए यह जरूरी भी था। संवाद संस्कृतनिष्ठ हिंदी में लिखे गए हैं, जो कहानी के पौराणिक माहौल के साथ पूरी तरह मेल खाते हैं। ‘राज कॉमिक्स है मेरा जुनून’ वाला जज़्बा हर पन्ने पर साफ नजर आता है, क्योंकि प्रोडक्शन क्वालिटी किसी अंतरराष्ट्रीय कॉमिक से कम नहीं लगती।
निष्कर्ष:
‘आरम्भ’ (योद्धा – भाग 1) निस्संदेह राज कॉमिक्स के बेहतरीन संग्रहों में से एक है। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि महानता केवल ऊँचे पद या जन्म से नहीं आती, बल्कि कठिन परिस्थितियों में लिए गए फैसलों से बनती है। शिरोमणि का अपना अंगूठा त्याग करना और फिर दिति का उसे शुक्राचार्य के पास ले जाना, कहानी को एक बेहद रोमांचक मोड़ पर छोड़ देता है।
यह कॉमिक सिर्फ बच्चों के लिए नहीं, बल्कि बड़ों के लिए भी उतनी ही प्रभावशाली है, क्योंकि इसके भीतर गहरे जीवन मूल्य और जटिल मानवीय भावनाएँ छिपी हैं। अगर आप भारतीय पौराणिक कथाओं और सुपरहीरो फैंटेसी के शौकीन हैं, तो ‘आरम्भ’ आपकी लाइब्रेरी में जरूर होनी चाहिए।
रेटिंग: 4.5/5 ⭐⭐⭐⭐✨
