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Home » सूर्यांश (Suryansh): अधर्म की गोद में पला देवत्व – योद्धा सीरीज़ का सबसे गहन और दार्शनिक अध्याय
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सूर्यांश (Suryansh): अधर्म की गोद में पला देवत्व – योद्धा सीरीज़ का सबसे गहन और दार्शनिक अध्याय

योद्धा – भाग 2 में नियति, संस्कार और धर्म-अधर्म के संघर्ष के बीच एक ऐसे नायक का उदय, जो अपनी पहचान खुद गढ़ता है
ComicsBioBy ComicsBio3 February 202609 Mins Read
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सूर्यांश (Suryansh) Review: योद्धा भाग 2 में धर्म, अधर्म और नियति का महायुद्ध | Raj Comics
राज कॉमिक्स का सूर्यांश — अधर्म के बीच जन्मा वह नायक, जिसकी नियति ही उसे देवत्व के कठिन मार्ग पर ले जाती है
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प्रस्तुत कॉमिक्स ‘सूर्यांश’ (Suryansh), जो योद्धा सीरीज़ का दूसरा भाग है, उस कहानी को आगे बढ़ाती है जिसकी शुरुआत ‘आरम्भ’ में हुई थी। यह कॉमिक सिर्फ़ एक एक्शन-फैंटेसी मनोरंजन नहीं है, बल्कि नियति, संस्कार और धर्म-अधर्म के बीच चलने वाले उस शाश्वत संघर्ष को दिखाती है, जो हर युग में किसी न किसी रूप में सामने आता है। लेखक तरुण कुमार वाही और संपादक संजय गुप्ता ने इस अंक में ऐसे नायक की बुनियाद रखी है, जो हालात से लड़ते हुए अपनी पहचान खुद बनाता है और जिसकी किस्मत ही उसे कठिन रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करती है।

कथानक का विस्तार और प्रवाह:

कहानी ठीक वहीं से शुरू होती है, जहाँ पिछला भाग खत्म हुआ था। शिरोमणि—जिसे आगे चलकर सूर्यांश के नाम से जाना जाता है—का जन्म एक गहरे षड्यंत्र के तहत होता है। वह देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होने वाला ‘श्रेष्ठ बीज’ था, लेकिन दैत्यगुरु शुक्राचार्य की चालाकी और दिति की असुरक्षा के कारण उस भ्रूण को दिति के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया जाता है। कहानी की शुरुआत में ही पाठक इस विडंबना से रूबरू हो जाते हैं कि जिसे देवताओं का रक्षक और सृष्टि का महान नायक बनना था, वही अब दैत्यों के बीच राक्षसी गुणों की शिक्षा ले रहा है।

कॉमिक्स को दो समानांतर धाराओं में बांटा गया है:

देवगुरु बृहस्पति की शिक्षा: जहाँ अदिति के पुत्रों यानी देवताओं को ज्ञान और शक्ति के संतुलन का पाठ पढ़ाया जा रहा है।
दैत्यगुरु शुक्राचार्य की शिक्षा: जहाँ दिति के पुत्रों को सिर्फ़ शक्ति, जीत और स्वार्थ को ही सर्वोपरि बताया जाता है।

प्रमुख घटनाक्रम और उनका विश्लेषण:

वायुवृत्त का आतंक और पवना का उदय:
कहानी के शुरुआती पन्नों में एक विशाल वायु-दैत्य वायुवृत्त के हमले को दिखाया गया है। यह प्रसंग गुरु बृहस्पति की शिक्षण शैली को बहुत खूबसूरती से सामने लाता है। जब वायुवृत्त देवताओं पर हमला करता है, तो इंद्र जैसे शक्तिशाली बालक भी उसके भयानक चक्रवात में फँस जाते हैं। ऐसे समय में बृहस्पति शस्त्र उठाने की बजाय ‘आत्मबोध’ पर ज़ोर देते हैं। वे पवना (वायुपुत्र) को उसकी भीतर छुपी शक्ति पहचानने के लिए प्रेरित करते हैं। पवना का खुद चक्रवात का रूप लेकर वायुवृत्त के सुरक्षा कवच को तोड़ना और फिर अनल (अग्निपुत्र) द्वारा उसका अंत करना यह साबित करता है कि सच्चा ज्ञान सबसे बड़ा हथियार होता है। यह दृश्य न सिर्फ़ रोमांच पैदा करता है, बल्कि कहानी में टीमवर्क की अहमियत को भी मजबूती से दिखाता है।

शिरोमणि का द्वंद्व और अधर्म का विरोध:
कॉमिक्स का सबसे असरदार हिस्सा वह है, जहाँ शिरोमणि अपने दैत्य भाइयों के बीच खड़ा दिखाई देता है। एक प्रसंग में जब शुक्राचार्य भूमि के केंद्र को लेकर प्रश्न करते हैं, तो शिरोमणि का तर्क और नारायण (विष्णु) के प्रति उसकी श्रद्धा उसे बाकी दैत्यों से बिल्कुल अलग कर देती है। जब दैत्य बालक भोजन के लिए निर्दोष हिरणों का शिकार करते हैं, तो शिरोमणि का उसे ‘अधर्म’ कहना और मांसाहार से इनकार करना उसके भीतर मौजूद ‘दैवीय डीएनए’ को साफ़ उजागर करता है। उसका यह कहना— “किसी भी प्राणी की हत्या से बड़ा कोई पाप नहीं”—उसके चरित्र की गहराई को दिखाता है और यह बात साफ़ कर देता है कि संस्कार जन्मस्थान से नहीं, बल्कि आत्मा के गुणों से आते हैं।

शुक्राचार्य द्वारा परित्याग:
शिरोमणि द्वारा यज्ञ करना और दैत्यों के मांसाहार को आंधी के ज़रिए उड़ा देना शुक्राचार्य को क्रोधित कर देता है। उन्हें यह साफ़ समझ आ जाता है कि वे शिरोमणि को कभी भी एक निर्दयी दैत्य नहीं बना पाएँगे। यहाँ शुक्राचार्य का रूप एक सख़्त और निर्मम गुरु के तौर पर सामने आता है, जो अपने सिद्धांतों से ज़रा भी समझौता नहीं करता। शिरोमणि को उसकी माताओं के पास वापस भेजना और अंततः उसका गुरु बृहस्पति की शरण में पहुँचना, उस नियति चक्र को पूरा करता है जिसे देवताओं ने पहले ही तय कर रखा था।

प्रलय और ‘भूकंप’ की उत्पत्ति:
ब्रह्मांड विज्ञान को लेकर राज कॉमिक्स का नज़रिया हमेशा से रोचक रहा है। गुरु बृहस्पति द्वारा सुनाई गई ‘प्रथम प्रलय’ की कथा भी कुछ ऐसी ही है। करोड़ों वर्ष पहले डायनासोर जैसे महाकाय प्राणियों के विनाश के लिए ईश्वर ने ‘भूकंप’ नामक एक अत्यंत शक्तिशाली पात्र और उसके 10,000 पुत्रों को भेजा था। लेकिन यह कहानी यह भी दिखाती है कि जब शक्ति के साथ अहंकार जुड़ जाए, तो वही शक्ति विनाश का कारण बन जाती है। भूकंप का घमंड उसे ईश्वर के विरुद्ध खड़ा कर देता है, जिसके परिणामस्वरूप उसे पृथ्वी के गर्भ में कैद कर दिया जाता है। यह प्रसंग पौराणिक होते हुए भी विज्ञान और फैंटेसी का शानदार मेल पेश करता है।

पात्र चित्रण (Character Analysis):

शिरोमणि / सूर्यांश:
वह इस पूरी गाथा का केंद्र बिंदु है। उसका चरित्र एक ऐसे बालक का है, जो राक्षसों के बीच रहकर भी बुद्ध की तरह शांत, सोचने-समझने वाला और न्यायप्रिय है। अपनी वास्तविक माँ अदिति के प्रति उसका अनजाना आकर्षण और नारायण के प्रति उसकी भक्ति उसे एक तरह का ट्रेजिक हीरो बना देती है। इस अंक में वह शारीरिक ताकत से ज़्यादा नैतिक शक्ति का परिचय देता है।

गुरु बृहस्पति:
उन्हें एक बेहद धैर्यवान और दूरदर्शी गुरु के रूप में दिखाया गया है। वे पहले से जानते हैं कि शिरोमणि ही वह कड़ी है, जो भविष्य में पूरे ब्रह्मांड की रक्षा करेगी। उनकी शिक्षा सिर्फ़ युद्ध कौशल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे सृष्टि के गहरे रहस्यों से भी अपने शिष्यों को परिचित कराते हैं।

दैत्यगुरु शुक्राचार्य:
वे चालाक और कठोर हैं, लेकिन अपने सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह अडिग रहते हैं। उनके लिए ज्ञान का अर्थ सिर्फ़ वही है, जो उनके वंश को विजयी बना सके। उनका अहंकार और कश्यप ऋषि के प्रति उपेक्षा का भाव कहानी में लगातार तनाव बनाए रखता है।

पर्वतचूर्ण (Parvatchur):
एक नया और भयावह पात्र। साँपों को खाने वाला यह विशाल दैत्य ‘बांबी’ तोड़ने के कारण शापित है कि वह ज़्यादातर समय सोया रहेगा। यह किरदार कहानी में रहस्य और डर का एक अलग ही माहौल पैदा करता है।

चित्रांकन और कला पक्ष (Art and Aesthetics):

नितिन मिश्रा का चित्रांकन ‘सूर्यांश’ को एक भव्य और सिनेमाई अनुभव देता है। वायुवृत्त के साथ युद्ध और चक्रवात के दृश्य इतने जीवंत हैं कि पन्नों में गति और ऊर्जा साफ़ महसूस होती है। पात्रों की डिज़ाइन में गहरा अंतर दिखाया गया है—दैत्यों को विशाल और डरावना बनाकर उनकी क्रूरता उभारी गई है, जबकि देवताओं के चेहरों पर तेज और शांति दोनों झलकती हैं। पृष्ठभूमि में आश्रम की शांति और प्रलयकालीन जलते हुए जंगलों के दृश्य कहानी के मूड को और गहरा कर देते हैं। साथ ही सुशील राम शर्मा की कलरिंग, खासकर अग्नि और बिजली के दृश्यों में, कॉमिक्स को एक आधुनिक एहसास देती है और रंगों का चुनाव पात्रों की भावनाओं के साथ बेहतरीन तालमेल बनाता है।

संवाद और भाषा शैली:

तरुण कुमार वाही ने ‘सूर्यांश’ में बहुत ही संतुलित और परिपक्व भाषा का इस्तेमाल किया है। संवादों में तत्सम शब्दों की संख्या ज़्यादा है, जिससे कहानी को एक पौराणिक गरिमा मिलती है। जैसे— “जो ज्ञात नहीं है, उसका ज्ञान ही शास्त्र है!”—ऐसे संवाद सीधे पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। पूरी कॉमिक्स की भाषा में एक तरह का गंभीर और स्थिर प्रवाह है, जो राज कॉमिक्स की पहचान रहा है। यहाँ संवाद सिर्फ़ कहानी आगे बढ़ाने का ज़रिया नहीं हैं, बल्कि वे हर पात्र के नैतिक स्तर और सोच को भी साफ़-साफ़ परिभाषित करते हैं।

नैतिक और दार्शनिक पहलू:

यह कॉमिक्स कई गहरे सवाल उठाती है—क्या इंसान अपने जन्म की परिस्थितियों से बंधा होता है, या फिर वह अपने रास्ते खुद चुन सकता है? क्या अधर्म की पाठशाला में रहकर भी धर्म की लौ जलाई जा सकती है? भूकंप के प्रसंग के ज़रिए शक्ति के अहंकार और उससे होने वाले पतन को बहुत प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया है। शिरोमणि का संघर्ष असल में हर उस व्यक्ति का संघर्ष है, जो गलत माहौल या गलत परवरिश के बावजूद सत्य का रास्ता चुनना चाहता है। अंत में यह कॉमिक्स हमें यही सिखाती है कि एक सच्चा ‘नायक’ सिर्फ़ ताकत से नहीं, बल्कि सच को स्वीकार करने और उस पर डटे रहने के साहस से बनता है।

समीक्षात्मक मूल्यांकन (Critical Evaluation):

खूबियां:
‘सूर्यांश’ में वर्ल्ड बिल्डिंग बेहद मजबूत है। प्रलय, डायनासोर और दैत्यों के अलग-अलग कुलों की कथाएँ इस काल्पनिक ब्रह्मांड को एक महाकाव्य जैसी व्यापकता देती हैं। कहानी में सस्पेंस का स्तर भी काफी ऊँचा है—पर्वतचूर्ण का रहस्य और शुक्राचार्य की आने वाली चालें पाठकों की जिज्ञासा को अंत तक बनाए रखती हैं। इसी के साथ, शिरोमणि और अदिति के बीच का मानसिक और भावनात्मक जुड़ाव कहानी में एक नरम और संवेदनशील पहलू जोड़ता है, जिसे बहुत सलीके से दिखाया गया है।

कमियां:
एक ही अंक में मल्लका, पर्वतचूर्ण और भूकंप जैसे कई नए पात्रों का परिचय देना कुछ पाठकों के लिए थोड़ा उलझन भरा हो सकता है, जिससे मुख्य कहानी से ध्यान हटने का खतरा रहता है। इसके अलावा, जहाँ दार्शनिक चर्चाएँ कहानी को गहराई देती हैं, वहीं कुछ जगहों पर उनकी अधिकता कहानी की गति को थोड़ा धीमा कर देती है, जिससे एक्शन और रोमांच का प्रवाह कुछ समय के लिए कम महसूस होता है।

निष्कर्ष:

‘सूर्यांश’ (योद्धा – भाग 2) राज कॉमिक्स के स्वर्ण युग की याद दिलाता है। यह कहानी हमें अपनी पौराणिक जड़ों से जोड़ते हुए एक आधुनिक सुपरहीरो के जन्म की रोमांचक यात्रा पर ले जाती है। यह सिर्फ़ युद्ध या टकराव की कहानी नहीं है, बल्कि एक आत्मा के ‘देवत्व’ की ओर बढ़ने की यात्रा है।
अगर आप केवल एक्शन के लिए कॉमिक्स पढ़ते हैं, तब भी यह आपको निराश नहीं करेगी। लेकिन अगर आप कहानी में गहराई, भावनाएँ और दर्शन तलाशते हैं, तो यह आपके लिए किसी मास्टरपीस से कम नहीं है। सूर्यांश का पिछले भाग में अपने अंगूठे का त्याग और इस भाग में अधर्म का त्याग, उसे भारतीय कॉमिक्स इतिहास के महान नायकों की कतार में खड़ा कर देता है।

यह कॉमिक्स एक बड़े युद्ध की ओर इशारा कर रही है—एक ऐसा युद्ध जहाँ एक तरफ़ शुक्राचार्य का प्रतिशोध होगा और दूसरी तरफ़ शिरोमणि का सत्य। अगला भाग ‘पर्वतचूर्ण’ के जागने और सृष्टि पर आने वाले संकट पर केंद्रित होगा, जिसका इंतज़ार इस अंक को पढ़ने के बाद हर पाठक को रहेगा।

अंतिम निर्णय:

यह कॉमिक्स हर उस पाठक को पढ़नी चाहिए, जो भारतीय ग्राफिक उपन्यासों में मजबूत लेखन और शानदार कला का मेल देखना चाहता है। राज कॉमिक्स ने एक बार फिर साबित किया है कि उनके पास कहानियों का ऐसा खज़ाना है, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ भी याद रखेंगी।

रेटिंग: 4.8/5

गुरु बृहस्पति और शुक्राचार्य की विचारधाराओं शिरोमणि के नैतिक संघर्ष और भारतीय मिथकों को आधुनिक सुपरहीरो नैरेटिव से जोड़ती है सूर्यांश (योद्धा भाग 2) राज कॉमिक्स की वह पौराणिक फैंटेसी कहानी है जो धर्म बनाम अधर्म
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