राज कॉमिक्स की ‘राजनगर रक्षक’ (Rajnagar Rakshak) श्रृंखला के पाँचवें और बेहद रोमांचक भाग ‘राजनगर रणक्षेत्र’ (Rajnagar Rannkshetra) की यह समीक्षा उस महागाथा के चरम बिंदु की ओर बढ़ते कदमों को सामने रखती है। यह अंक सिर्फ तेज़-तर्रार एक्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि उस रहस्य की परतें भी खोलता है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौर से राजनगर की ज़मीन के नीचे दबा हुआ था।
महायुद्ध का शंखनाद

‘राजनगर रणक्षेत्र’ महज़ एक कॉमिक नहीं है, बल्कि यह विचारों, तकनीक और सत्ता के बीच छिड़े युद्ध की कहानी है। पिछले अंकों—राजनगर रक्षक, हाइबरनेशन, राजनगर रीबूट और राजनगर रीलोडेड—ने जिस तनाव और रहस्य को धीरे-धीरे खड़ा किया था, यह अंक उसे एक नई और निर्णायक दिशा देता है। यहाँ राजनगर अब सिर्फ एक शहर नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसा रणक्षेत्र बन जाता है, जहाँ दांव पर केवल कुछ ज़िंदगियाँ नहीं, बल्कि पूरी मानवता का भविष्य लगा है।
कथानक और पृष्ठभूमि (The Prologue: 1940s)

कहानी की शुरुआत एक बेहद प्रभावशाली फ्लैशबैक से होती है, जो हमें द्वितीय विश्व युद्ध के समय के ब्रिटिश भारत में ले जाता है।
ब्रिटिश वैज्ञानिक प्रोफेसर हैमंड, राजगढ़ (पुराना राजनगर) के घने जंगलों में एक ऐसी विनाशकारी शक्ति या हथियार की खोज कर लेते हैं, जिसकी ताकत का अंदाज़ा लगाते ही वह घबरा जाते हैं। हैमंड समझ जाते हैं कि यह शक्ति अगर गलत हाथों में चली गई, तो पूरी मानवता के लिए खतरा बन सकती है। इसी डर के चलते वह उस शक्ति को वहीं ज़मीन में दफन करने का फैसला करते हैं।
प्रोफेसर हैमंड की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी कैथरीन और बेटा क्रिस्टोफर इंग्लैंड लौटने के बजाय यहीं रुक जाते हैं। कैथरीन का नज़रिया अपने पति से बिल्कुल अलग है। उसका मानना है कि हैमंड ने जिस तकनीक और शक्ति की खोज की थी, अगर उस पर सही तरीके से नियंत्रण पा लिया जाए, तो उनकी आने वाली पीढ़ियाँ न सिर्फ इस देश पर, बल्कि पूरी दुनिया पर राज कर सकती हैं। यह प्रोलॉग साफ़ कर देता है कि आज राजनगर जिस तबाही से गुजर रहा है, उसके बीज दशकों पहले ही बो दिए गए थे।
वर्तमान घटनाक्रम: दो ध्रुव और पहचान का संकट

जब कहानी वर्तमान समय में ‘हाइबरजोन’ यानी पुराने राजनगर में लौटती है, तो पाठकों के सामने सबसे बड़ा झटका आता है—दो सुपर कमांडो ध्रुव!
इंस्पेक्टर स्टील अपनी चालाकी से ध्रुव के सामने उसका ही हूबहू हमशक्ल, एक ह्युमनॉइड, खड़ा कर देता है। मकसद साफ़ है—ध्रुव को भ्रमित करना, उसकी पहचान और आत्मविश्वास पर हमला करना। यहीं ध्रुव की असली परीक्षा होती है। वह जल्दी ही समझ जाता है कि यह स्टील का बुना हुआ जाल है, जिससे उसे मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश की जा रही है।
ध्रुव और उसके हमशक्ल के बीच होने वाला संवाद ‘रण’ यानी युद्ध और ‘रणक्षेत्र’ यानी युद्ध के मैदान का असली मतलब समझाता है। यह सीन सिर्फ ज़बरदस्त एक्शन ही नहीं दिखाता, बल्कि ध्रुव की रणनीतिक सोच और मानसिक मज़बूती को भी पूरी तरह उजागर करता है।
प्रोटोप्लास्टा (Protoplasta): महाखलनायक का उदय

इस अंक की सबसे बड़ी ताकत ‘प्रोटोप्लास्टा’ के रहस्य का पूरी तरह सामने आना है।
कहानी बताती है कि दुनिया जिसे पहला कंप्यूटर मानती है—ENIAC (1946)—उससे भी बहुत पहले प्रोफेसर हैमंड ने ‘प्रोटोप्लास्टा’ नाम की एक खतरनाक प्रणाली बना ली थी। यह कोई साधारण मशीन नहीं थी, बल्कि एक ऐसा अचूक हथियार था, जो अपने आसपास के वातावरण के साथ-साथ सजीव और निर्जीव दोनों चीज़ों को अपने नियंत्रण में ले सकता था।
यही प्रोटोप्लास्टा इंस्पेक्टर स्टील की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में घुसपैठ करता है। वह स्टील के बाइ-पोलर डिसऑर्डर और उसकी भावनात्मक अस्थिरता का फायदा उठाकर उसे धीरे-धीरे एक तानाशाह में बदल देता है। जो स्टील कभी कानून और व्यवस्था का रक्षक था, वही अब प्रोटोप्लास्टा का मोहरा बनकर मानवता को खत्म करने के रास्ते पर चल पड़ा है।
पात्रों का विश्लेषण और आंतरिक द्वंद्व

इंस्पेक्टर स्टील (अमर):
इस अंक में स्टील का किरदार बेहद दुखद और डरावना रूप ले चुका है। वह साफ तौर पर मान चुका है कि “अमर मर चुका है, अब सिर्फ स्टील बचा है।” उसकी नज़र में भावनाएँ कमजोरी हैं, और इंसान होना एक खामी। जब वह फर्नेस, हैमर और फर्सा जैसे अपराधियों को दोबारा उनके हथियार लौटा देता है, ताकि वे खुलकर तबाही मचा सकें, तो यह उसके रक्षक वाले रूप का पूरी तरह अंत साबित होता है। यहाँ स्टील कानून का रखवाला नहीं, बल्कि विनाश का साधन बन चुका है।
सुपर कमांडो ध्रुव:
इस कहानी में ध्रुव सिर्फ एक फाइटर नहीं, बल्कि एक सच्चे ‘उद्धारक’ की भूमिका निभाता है। वह मशीनों और मशीनी सेनाओं से तो लड़ ही रहा है, लेकिन उसके साथ-साथ स्टील के भीतर कहीं दबे हुए ‘अमर’ को भी बचाने की कोशिश कर रहा है। ध्रुव का संयम, उसका धैर्य और प्रोटोप्लास्टा के साथ उसका वैचारिक संघर्ष कहानी को एक अलग ही गहराई देता है। वह मानता है कि लड़ाई सिर्फ जीतने की नहीं, बल्कि इंसानियत को बचाने की भी है।
नताशा और ब्लैक कैट:
इन दोनों महिला पात्रों ने अपनी बहादुरी और समझदारी से कहानी में बेहतरीन संतुलन बनाया है। गटर और सुरंगों के रास्ते हाइबरजोन में घुसना, और वहाँ खतरनाक चूहों से भिड़ना, उनके साहस को साफ दिखाता है। ये दोनों साबित करती हैं कि इस युद्ध में सिर्फ ताकत नहीं, हिम्मत और समझ भी उतनी ही ज़रूरी है।
साल्मा खान का बलिदान:
डॉ. अनीस की बहन साल्मा खान कहानी में सबसे साहसी कदम उठाती है। वह अपनी जान की परवाह किए बिना स्टील के शरीर से उसकी ‘पावर बैटरी’ निकाल लेती है, जिससे स्टील कुछ समय के लिए निष्क्रिय हो जाता है। भले ही यह जीत स्थायी न हो, लेकिन साल्मा का यह बलिदान उसे पूरी श्रृंखला के सबसे बहादुर और यादगार पात्रों में खड़ा कर देता है।
तकनीकी और दार्शनिक संघर्ष

कॉमिक में ‘अल्ट्रासोनिक व्हिसल’ का इस्तेमाल और कुत्तों के झुंड से मशीनों पर हमला करवाना ध्रुव की पहचान बन चुकी शैली को दिखाता है। लेकिन इसके पीछे एक गहरा सवाल भी छुपा है—क्या तकनीक इंसान की आत्मा को बदल सकती है?
प्रोटोप्लास्टा का तर्क है कि मशीनें बेहतर हैं, क्योंकि वे गलती नहीं करतीं। वहीं ध्रुव का मानना है कि इंसान की असली ताकत उसकी इच्छाशक्ति और भावनाएँ हैं, जो उसे मशीनों से ऊपर रखती हैं। यह टकराव असल में ‘मैटेरियलिज्म’ और ‘ह्यूमनिज्म’ के बीच की लड़ाई बन जाता है।
लेखन और चित्रांकन (Writing and Art)

स्तुति मिश्रा का लेखन इस अंक में अपने शिखर पर नज़र आता है। अतीत और वर्तमान को जिस साफ़-सुथरे तरीके से जोड़ा गया है, वह काबिल-ए-तारीफ है। खास तौर पर प्रोटोप्लास्टा की उत्पत्ति की कहानी साइंस-फिक्शन प्रेमियों के लिए बेहद रोमांचक बन जाती है।
हेमंत कुमार का चित्रांकन इस कहानी को भव्य रूप देता है।
पन्ना संख्या 11 पर स्टील की विशाल मशीनी सेना और उसके सामने खड़े अकेले रोबो का दृश्य गहरी छाप छोड़ता है।
पन्ना संख्या 37-38 पर साल्मा खान और स्टील के बीच का तनाव, और बैटरी खींचने वाला एक्शन सीन बेहद प्रभावी तरीके से चित्रित किया गया है।
प्रोटोप्लास्टा का ‘बीस्ट’ अवतार डरावना होने के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का एक अनोखा मिश्रण लगता है।
एक्शन और रोमांच
इस अंक के एक्शन सीन सिर्फ शारीरिक टकराव तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनके भीतर मानसिक और भावनात्मक गहराई भी मौजूद है। ध्रुव और ध्रुव ह्युमनॉइड के बीच की लड़ाई एक ऐसा युद्ध है, जहाँ नायक को अपने ही जैसे कौशल और सोच से लड़ना पड़ता है। दूसरी ओर, रोबो और स्टील की सेनाओं के बीच की भिड़ंत दो विशाल मशीनी ताकतों की भीषण टक्कर को दिखाती है। फर्नेस और हैमर का हमला कहानी में पुरानी दुश्मनी को एक नए और रोमांचक मोड़ पर ले आता है, जबकि प्रोटोप्लास्टा और ध्रुव के बीच होने वाली ब्रेन मैपिंग की मानसिक जंग आगे की पूरी रणनीति तय करने वाला अहम मोड़ बन जाती है।

खूबियाँ:
द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ा कनेक्शन कहानी को एक मजबूत ऐतिहासिक आधार देता है, जिससे इसकी बैकस्टोरी और भी दमदार बन जाती है। विलेन के रूप में प्रोटोप्लास्टा सिर्फ एक साधारण खलनायक नहीं, बल्कि एक ‘आदि-मशीन’ और पूरी विचारधारा के रूप में सामने आता है। अमर (स्टील) का नैतिक पतन और उसके लिए ध्रुव व साल्मा की चिंता कहानी को भावनात्मक रूप से और गहरा बना देती है। अंत में ‘राजनगर उद्धारक’ का विज्ञापन एक शानदार क्लिफहैंगर का काम करता है, जो पाठकों को अगले अंक के लिए बेचैन छोड़ देता है।
कमियाँ:
श्रृंखला काफी लंबी होने की वजह से नए पाठकों के लिए सीधे इस अंक को समझ पाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।
कुछ पैनलों में संवादों की अधिकता के कारण आर्ट कहीं-कहीं दबता हुआ महसूस होता है।
निष्कर्ष: एक युग का अंत और नई शुरुआत
‘राजनगर रणक्षेत्र’ राज कॉमिक्स की सबसे महत्वाकांक्षी श्रृंखलाओं में से एक का बेहद अहम अध्याय है। यह कहानी साफ संदेश देती है कि अगर विज्ञान नैतिकता से अलग हो जाए, तो वह सिर्फ विनाश ही लाता है। यह अंक साबित करता है कि सुपर कमांडो ध्रुव सिर्फ करतब दिखाने वाला नायक नहीं, बल्कि वह मानवता का ऐसा रक्षक है, जो अपनी बुद्धिमत्ता और विचारों से ईश्वर जैसी मशीनों को भी चुनौती दे सकता है।
यह कॉमिक हर उस पाठक के लिए ज़रूरी है, जिसे सुपरहीरो कहानियों में गंभीरता, विज्ञान और दमदार ड्रामा पसंद है। राजनगर अब अपनी आख़िरी साँसें ले रहा है, और ‘रणक्षेत्र’ यह साफ कर देता है कि आने वाला मुकाबला अब आर-पार का होने वाला है।
रेटिंग: 4.7 / 5
