90 के दशक में नागराज की फुंकार और ध्रुव की बुद्धिमानी के बीच एक ऐसी सुपरहीरोइन का उदय हुआ जिसने भारतीय कॉमिक्स जगत में ‘फेमिनिज्म’ और ‘एक्शन’ का नया अध्याय लिखा। वह थी—शक्ति। साल 1998 में प्रकाशित हुई कॉमिक ‘पवनपुत्री’ सिर्फ एक कहानी नहीं थी, बल्कि यह राज कॉमिक्स के उस ‘शक्ति वर्ष’ का एक मील का पत्थर थी जिसने पुरुष प्रधान सुपरहीरो समाज में अपनी अलग पहचान बनाई।
आइए, इस ऐतिहासिक कॉमिक्स का गहराई से विश्लेषण करते हैं और जानते हैं कि क्यों आज 25 साल बाद भी यह हमारे जेहन में ताजा है।
‘शक्ति वर्ष‘ का ऐतिहासिक संदर्भ: जब नारी शक्ति ने ली अंगड़ाई

1998 को राज कॉमिक्स ने ‘शक्ति वर्ष’ घोषित किया था। यह वह समय था जब भारतीय समाज धीरे-धीरे बदल रहा था, लेकिन कॉमिक्स की दुनिया अभी भी पुरुष नायकों के इर्द-गिर्द सिमटी थी। लेखक तरुण कुमार वाही और संपादक मनीष गुप्ता ने एक साहसी कदम उठाया। उन्होंने एक ऐसी नायिका को पेश किया जो केवल खूबसूरत नहीं थी, बल्कि महाकाली का कोप और सूर्य का ताप लिए हुए थी।
‘पवनपुत्री’ की शुरुआत एक बहुत ही प्रगतिशील विचार से होती है—प्रिया माथुर का भारत की पहली महिला कमर्शियल पायलट बनना। उस समय यह एक बड़ा ‘स्टेटमेंट’ था। कॉमिक्स के शुरुआती पन्ने ही पाठक को एक गौरवपूर्ण अहसास देते हैं, जो इसे एक साधारण सुपरहीरो फंतासी से ऊपर उठाकर सामाजिक संदेश की ओर ले जाता है।
पितृसत्तात्मक अहंकार बनाम प्रगतिशील भारत: विलेन का मनोविज्ञान

इस कॉमिक्स की सबसे बड़ी ताकत इसका विलेन ‘मिस्टर सिंहानिया’ है। वह कोई जादुई शक्तियों वाला दानव नहीं है, बल्कि हमारे समाज के उस ‘टॉक्सिक मस्कुलिनिटी’ का चेहरा है जो एक महिला को ऊंचे पद पर देख नहीं सकता। सिंहानिया का संवाद “क्या खाक मिसाल पैदा करेगी ये कल की लड़की,” आज भी कई कार्यस्थलों की कड़वी सच्चाई दिखाता है।
लेखक ने दिखाया है कि कैसे आंतरिक जलन (Insecurity) इंसान को बुरे रास्तों की ओर धकेल देती है। सिंहानिया का आतंकवादियों से हाथ मिलाना और विमान के साथ छेड़छाड़ करना यह बताता है कि कभी-कभी सबसे बड़ा दुश्मन आपके अंदर की नफरत होती है। यह कहानी को एक मनोवैज्ञानिक गहराई (Psychological Depth) देती है।
चंदा और शक्ति: दो व्यक्तित्वों का द्वंद्व और दिव्यता

शक्ति का चरित्र राज कॉमिक्स के सबसे जटिल प्रयोगों में से एक है। वह नागराज की तरह पूरी तरह से बदली हुई इंसान नहीं है, बल्कि ‘चंदा’ के भीतर सोई हुई एक दैवीय चेतना है। कॉमिक में चंदा को एक आम घरेलू महिला के रूप में दिखाया गया है, जो अपनी भाभी के साथ कैरम खेल रही है। यह ‘घरेलूपन’ (Domesticity) और ‘दिव्यता’ (Divinity) का विरोधाभास दिलचस्प है।
जब चंदा को प्रिया की चीख सुनाई देती है, तो उसका शरीर थरथराने लगता है। लेखक ने दिखाया कि शक्ति केवल एक रक्षक नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड की हर पीड़ित नारी की आवाज से जुड़ी है। चंदा का शक्ति में रूपांतरण किसी सुपरहीरो के ‘कॉस्ट्यूम बदलने’ जैसा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जागृति है।
धीरज वर्मा की कलाकारी: दृश्यों में तैरता हुआ रोमांच
‘पवनपुत्री’ को आज भी याद किया जाता है, तो इसका बड़ा श्रेय दिग्गज आर्टिस्ट धीरज वर्मा को जाता है। उनका आर्टवर्क 90 के दशक के अन्य कलाकारों से काफी अलग और विस्तृत था। उन्होंने शक्ति का डिजाइन एक ‘एन्शिएंट गॉडडेस’ (Ancient Goddess) की तरह किया है—नीला रंग, लंबे काले बाल और शेर की खाल की पोशाक इसे खास पहचान देती है; साथ ही मांसपेशियों और चेहरे के क्रोध को जिस तरह उकेरा गया है, वह इसे सच में डरावना और शक्तिशाली बनाता है।

तकनीकी बारीकियां भी लाजवाब हैं। ‘पवनपुत्री’ विमान का डिजाइन उस दौर के हिसाब से काफी ‘फ्यूचरिस्टिक’ था, और इंजन फटने, धुएं के गुबार व आसमान के रंगों का सटीक इस्तेमाल इसे सिनेमाई अनुभव (Cinematic Experience) देता है। धीरज वर्मा की कला एक्शन सीक्वेंस में और निखरती है जब शक्ति हवा में उड़ते हुए इंजन बदलती है; पैनलों में गति (Motion) का अहसास अद्भुत है और क्लोज-अप व वाइड-एंगल का संतुलन बढ़िया है।
असंभव फंतासी: विज्ञान और कल्पना का मेल
कॉमिक्स के कुछ हिस्सों में लेखक ने कल्पना की ऊंची उड़ान भरी है, जो शायद वैज्ञानिक रूप से सही न लगे, लेकिन पाठक के लिए रोमांचक और रोंगटे खड़े कर देने वाली है। हवा में उड़ते विमान का इंजन बदलना या रनवे पर अचानक लोहे का ‘फ्लाईओवर’ बन जाना—ये दृश्य शक्ति की ‘गॉड-लाइक’ (God-like) क्षमताओं को दिखाते हैं।

अगर शक्ति की तुलना डीसी की ‘वंडर वुमन’ से की जाए, तो शक्ति कहीं ज्यादा ‘कच्ची’ और ‘आदिम’ (Primal) लगती है। उसकी शक्तियां किसी लैब से नहीं, बल्कि आस्था और न्याय की तड़प से पैदा हुई हैं। यही वजह है कि भारतीय पाठक उससे अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
पटकथा, संवाद और संपादन का तालमेल

तरुण कुमार वाही की लेखनी में एक लय है। कहानी के दो ट्रैक—एक तरफ हाईजैक हुआ विमान और दूसरी तरफ चंदा का घर—एक साथ चलते हैं और क्लाइमेक्स पर मिलते हैं। संवाद छोटे लेकिन असरदार हैं। आतंकवादियों का डर और यात्रियों की बेबसी शब्दों के जरिए बखूबी महसूस होती है।
संपादक मनीष गुप्ता ने सुनिश्चित किया कि कहानी की रफ्तार कहीं भी धीमी न पड़े। ‘पवनपुत्री’ उन चुनिंदा कॉमिक्स में से है जहाँ हर पेज पर कुछ न कुछ रोमांचक घट रहा होता है। 32 पन्नों में एक पूरी फिल्म जितना मसाला भरा हुआ है।
निष्कर्ष: क्या ‘पवनपुत्री‘ आज भी पढ़ी जानी चाहिए?
‘पवनपुत्री’ सिर्फ सुपरहीरो एक्शन कॉमिक नहीं है; यह साहस की एक गाथा है। यह सिखाती है कि प्रगति के रास्ते में ईर्ष्या और नफरत के कई ‘सिंहानिया’ आएंगे, लेकिन अगर इरादे ‘शक्ति’ जैसे मजबूत हों, तो कोई भी आपदा आपको रोक नहीं सकती।
आज के दौर में जब हम महिला नेतृत्व वाली फिल्मों (Female-led movies) की बात करते हैं, राज कॉमिक्स ने यह काम 26 साल पहले ही कर दिया था। यह कॉमिक्स हर उस इंसान को पढ़नी चाहिए जो भारतीय पॉप-कल्चर के इतिहास को समझना चाहता है। यही शक्ति की शुरुआत थी, जिसने आगे चलकर ‘आई मुसीबत’, ‘अमानुष’ और ‘जरा संभल के’ जैसी शानदार कहानियों का आधार तैयार किया।
