अश्वराज’ श्रृंखला एक अनोखी ऐतिहासिक–फैंटेसी कहानी थी, जो एक अनजान समय के सूर्यवंशी राजकुमार अश्वराज के इर्द–गिर्द घूमती है। उसके पाँच खास घोड़े (पंचाश्व) और उसका न्याय पसंद स्वभाव उसे बाकी नायकों से बिल्कुल अलग बनाता है। राज कॉमिक्स की प्रस्तुति संख्या 564, “कलयुग”, न सिर्फ अश्वराज की कहानी को एक बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ देती है, बल्कि अपने समय से आगे बढ़कर कुछ गंभीर समाजिक और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर भी बात करती है। तरुण कुमार वाही की लेखनी और मिलिंद मिसाल व विट्ठल कांबले की शानदार कला मिलकर इस कॉमिक को सिर्फ एक साधारण ‘पानी से बाहर मछली’ वाली कहानी से कहीं ऊपर ले जाते हैं। यह असल में ‘धर्म’ बनाम ‘अधर्म’ का एक क्लासिक मुकाबला है, जिसे विज्ञान–कथा (साइंस–फिक्शन) वाले एक अंधकारमय भविष्य की पृष्ठभूमि पर दिखाया गया है।
अतीत से भविष्य तक की छलांग
“कलयुग” की शुरुआत ठीक वहीं से होती है, जहाँ पिछली कॉमिक “अश्वराज” खत्म हुई थी। कहानी की शुरुआत में एक छोटा सा रीकैप दिया गया है, जिसमें बताया जाता है कि किस तरह खलनायक अश्वबाज ने कारु का खजाना चुरा कर ‘भविष्य’ नाम के एक सतरंगी समय–यंत्र (टाइम–पोर्टल) में घुसने की योजना बनाई थी। अश्वराज के पंचाश्व और राजकुमारी कुतुमछुम्बी भी अश्वबाज के रथ के साथ उसी घेरे में खिंच रहे थे। तभी सही समय पर अश्वराज पहुँचता है और अश्वबाज से वो खजाना वापस छीन लेता है। एक जोरदार लड़ाई में अश्वराज अश्वबाज का सिर धड़ से अलग करवा देता है और उसे एक सूखे कुएँ में डलवा कर बंद भी कर देता है।
लेकिन मुसीबत आ चुकी थी। राजकुमारी और पंचाश्व समय–यंत्र में समा चुके थे। पोर्टल बंद होने ही वाला था, इससे पहले ही अश्वराज भी अपने प्रियजनों को बचाने के लिए उस सतरंगी रोशनी के घेरे में कूद पड़ता है।

यहीं से “कलयुग” की असली यात्रा शुरू होती है। पोर्टल के दूसरी तरफ पहुँचते ही अश्वराज खुद को एक ऐसी दुनिया में पाता है, जिसका उसने कभी सपना भी नहीं देखा था। यह गगनचुंबी इमारतों से भरा एक बेहद आधुनिक शहर था, जहाँ ‘राज’ और ‘हार्ड’ लिखी हुई उड़ने वाली कारें हवा में चल रही थीं। पहली नज़र में यह जगह किसी सपनों की नगरी जैसी लगती है, लेकिन कुछ ही देर में यह सपना एक भयानक दुःस्वप्न में बदलना शुरू हो जाता है।
प्यास से परेशान अश्वराज जब एक जलाशय की तरफ बढ़ता है, तो उसकी मुलाकात एक अश्व–मानव (आधा इंसान, आधा घोड़ा) से होती है, जो पानी पीने की कोशिश कर रहा होता है। तभी वहीं पर उसी जाति का एक अश्व–सैनिक आता है और उस बेचारे प्राणी पर सिर्फ पानी छूने की वजह से बर्बरता से हमला कर देता है। वह उसके दोनों हाथ काट देता है और उन्हें अपने भाले पर टांगकर उसका मज़ाक उड़ाता है। जब वह उस अश्व–मानव को जान से मारने वाला होता है, तो वह क्रूरता से ऐलान करता है—”इस धरती का सीना नहीं फटेगा… क्योंकि यहाँ जुल्म का राज़ है। पाप और अत्याचार ही यहाँ धर्म हैं… यही है असली कलयुग!!”
अश्वराज, जो अपने समय के धर्म और न्याय वाला मनुष्य था, यह अत्याचार देखकर शांत नहीं रह पाता। वह सैनिक से भाला छीनकर उसे सबक सिखाता है। इसके बाद वह उस घायल अश्व–मानव से बात करता है, जिसका नाम ‘घोड़क’ है। घोड़क के कटे हाथों से बहता खून रोकने के लिए अश्वराज अपनी तलवार गर्म करके उसके घाव सील कर देता है और उसकी जान बचाता है।
घोड़क धीरे-धीरे अश्वराज का मार्गदर्शक बन जाता है और उसे इस ‘कलयुग’ की असली सच्चाई दिखाता है। यह शहर भविष्य का है, लेकिन यह कोई चमकदार या खुशहाल भविष्य नहीं है—यह एक डराने वाला, अंधेरा भविष्य है। अश्वराज एक जगह ‘प्रदूषण नियंत्रण यंत्र’ देखता है और घोड़क उसे समझाता है कि यह मशीन बढ़ती जनसंख्या, ज्यादा मशीनों वाले आवागमन और पेड़ों की बेतहाशा कटाई से फैले प्रदूषण को साफ करने के लिए बनाई गई है।
कहानी का सबसे ज्यादा हिला देने वाला पल तब आता है, जब दोनों एक चीख सुनकर एक गली में पहुँचते हैं। वहाँ एक और अश्वमानव की लाश पड़ी होती है। उसकी हत्या क्यों हुई? घोड़क बताता है—”सिर्फ एक जोड़ी जूतों के लिए।” यह सुनकर अश्वराज सदमे में पड़ जाता है। घोड़क उसे इस दुनिया का कड़वा सच बताता है—”शायद इसी वजह से तुम्हें भी पानी की कीमत चुकाने के लिए अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े… यहाँ तो पानी की हर बूंद बिकती है, अश्वराज!”
अश्वराज को धीरे-धीरे महसूस होने लगता है कि वह जिस भविष्य में आ गया है, वहाँ संसाधनों की भारी कमी है, इंसानियत की कोई कीमत नहीं बची, और यहाँ वही ताकतवर है जो हथियार उठाए खड़ा है—यानी ‘जिसके पास लाठी, उसकी ही भैंस’ वाला कानून चलता है। अश्वमानव यहाँ के दबे-कुचले, सताए हुए लोग हैं।
कहानी तब तेज हो जाती है जब अश्वराज और घोड़क, घोड़क की बस्ती में पहुँचते हैं। वहाँ के स्थानीय गुंडे उन्हें डराने की कोशिश करते हैं, लेकिन सूर्यवंशी योद्धा अश्वराज उन्हें अच्छे से सबक सिखा देता है। बस्ती के लोग पहली बार किसी को अपने लिए खड़े होते देखते हैं। वे अश्वराज को अपना रक्षक, अपना नायक समझने लगते हैं।
यह खबर जल्दी ही अश्व-सैनिकों के बड़े अधिकारियों तक पहुँच जाती है। वे अपनी मशीनीकृत घोड़ों वाली सेना लेकर पूरी बस्ती पर हमला कर देते हैं। अश्वराज, जो अब तक सिर्फ अपनी राजकुमारी और पंचाश्व को खोज रहा था, अब इन कमजोर, सताए हुए लोगों की रक्षा करने का ‘धर्म’ खुद पर ले लेता है। वह अश्वमानवों को हिम्मत देता है और उन्हें लड़ने के लिए तैयार करता है। एक भयंकर युद्ध शुरू होता है, जिसमें अश्वराज अपने जबरदस्त युद्ध-कौशल से दुश्मनों को धराशायी कर देता है।

कहानी के आखिर में दो बड़े मोड़ आते हैं। पहला—अश्वराज को अपने बहादुर पंचाश्व और अपना रथ वापस मिल जाते हैं, जिन्हें सैनिकों ने कैद कर रखा था। अब वह पूरी ताकत से लड़ सकता था। और दूसरा—सबसे बड़ा झटका तब लगता है, जब राजकुमारी कुतुमछुम्बी सामने आती है। लेकिन वह किसी कैदी की तरह नहीं, बल्कि भविष्य की इस दुनिया के शासकों के साथ खड़ी दिखाई देती है। वह अश्वराज को युद्ध खत्म करने का आदेश देती है। और अंतिम पैनल में असली खुलासा होता है—इस शहर का असली शासक कोई इंसान नहीं, बल्कि खलनायक अश्वबाज का ‘सिर’ है, जिसे एक जार में जिंदा रखा गया है और जो मशीनों की मदद से पूरे शहर पर राज कर रहा है।
चरित्र-चित्रण: कलयुग के पात्र
अश्वराज: इस कॉमिक्स का नायक सच में ‘धर्म’ का असली चेहरा है। वह एक राजा है, और उसकी रगों में अपने लोगों की रक्षा करने वाला खून दौड़ता है। जब वह ‘कलयुग’ की बेरहम और अमानवीय दुनिया देखता है, तो वह चुप नहीं बैठ सकता। उसका स्वभाव एक क्लासिक हीरो जैसा है—बहादुर, न्याय पसंद और दयालु। उसका असली संघर्ष बाहरी दुश्मनों से कम है और इस नए युग के बिगड़े हुए मूल्यों से ज्यादा है। वह इस टूटे हुए भविष्य के लिए एक तरह का ‘मसीहा’ बन जाता है।
घोड़क: घोड़क इस कहानी की जान है। वह इस अंधेरे भविष्य का आम आदमी है, जो हर रोज़ अत्याचार और अन्याय झेलता है। उसके कटे हुए हाथ इस क्रूर दुनिया की सच्चाई को हमेशा याद दिलाते हैं। वह अश्वराज के लिए एक गाइड का काम करता है, और उसी के ज़रिए पाठक इस भयानक, टूटे हुए समाज को असल में महसूस कर पाता है।
अश्वबाज: खलनायक के रूप में अश्वबाज का रूप बेहद खतरनाक और अलग तरह का है। उसका सिर्फ सिर बचा है, जो दिखाता है कि बुराई को जड़ से खत्म करना कितना मुश्किल होता है। शरीर नहीं होने के बावजूद, वह अपनी चालाकी और तकनीक की मदद से पूरे भविष्य पर राज कर रहा है। यही बात उसे एक यादगार और डर पैदा करने वाला विलेन बनाती है।
राजकुमारी कुतुमछुम्बी: कहानी के अंत में उसका अचानक सामने आना कथानक को एक नया और बड़ा ट्विस्ट देता है। वह असली में किनके साथ है? क्या वह खलनायक के पक्ष में चली गई है, या कोई मजबूरी है? यह रहस्य पाठक की उत्सुकता को सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँचा देता है।
विषय-वस्तु और विश्लेषण: सिर्फ एक कॉमिक्स नहीं
“कलयुग” को अगर सिर्फ एक फैंटेसी–एक्शन कॉमिक्स समझ लिया जाए, तो यह उसके साथ बहुत कम न्याय होगा। तरुण कुमार वाही ने इस कहानी के जरिये कुछ बेहद गंभीर और अपने समय से आगे के मुद्दों को छुआ है।
“कलयुग” की आधुनिक व्याख्या: लेखक ने पौराणिक ‘कलयुग’ की सोच को उठाकर उसे पूरी तरह एक भविष्यवादी, टूटी–फूटी और डरावनी दुनिया में बदल दिया है। यहाँ ‘कलयुग’ किसी धार्मिक ग्रंथ का युग नहीं है, बल्कि इंसानी लालच, स्वार्थ और क्रूरता से बना हुआ भविष्य है। इस दुनिया में ‘पाप’ और ‘अत्याचार’ ही नया ‘धर्म’ बन चुका है, क्योंकि लोगों ने इन्हीं बातों को सच मानकर अपना लिया है।
गंभीर सामाजिक टिप्पणी: यह कॉमिक्स भले ही 90 के दशक में लिखी गई हो, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे आज के समय पर सीधा प्रहार करते हैं।
पर्यावरणीय विनाश (Environmental Decay): “पेड़ों की अंधाधुंध कटाई” और “प्रदूषण” का जिक्र साफ दिखाता है कि लेखक उस समय ही समझ गया था कि भविष्य में सबसे बड़ा खतरा पर्यावरण पर ही आने वाला है। यह बात आज के ‘क्लाइमेट चेंज’ की चर्चा से पूरी तरह जुड़ती है।

संसाधनों का संकट (Resource Scarcity): “यहाँ पानी की बूंद बिकती है”—यह पंक्ति आज के कई देशों और भारत के कई शहरों की हकीकत जैसी लगती है। यह भविष्य में आने वाले ‘जल-युद्धों’ की ओर एक डराने वाला इशारा है।
आर्थिक असमानता (Economic Inequality): “एक जोड़ी जूतों के लिए हत्या” जैसी बात यह दिखाती है कि समाज दो हिस्सों में बंट चुका है। एक तरफ ऊँची-ऊँची इमारतें और उड़न-कारें हैं, और दूसरी तरफ घोड़क जैसी गरीब बस्तियाँ हैं, जहाँ लोग बुनियादी जरूरतों के लिए भी जान गंवा देते हैं।
अमानवीयता और मूल्यों का पतन: यह कॉमिक्स बताती है कि जब समाज से दया, करुणा और इंसानियत खत्म हो जाती है, तो दुनिया कैसी दिखाई देती है। अश्व-सैनिकों की बेरहमी और लोगों की बेपरवाही ‘कलयुग’ का असली चेहरा दिखाते हैं। अश्वराज इस सोई हुई दुनिया में फिर से इंसानियत जगाने की कोशिश करता है।
कला और लेखन शैली
लेखन: तरुण कुमार वाही का लेखन सधा हुआ और असरदार है। संवाद छोटे होने के बावजूद गहरा असर छोड़ते हैं। “यही तो है… कलयुग!!” या “यहाँ पानी की बूंद बिकती है” जैसे डायलॉग सीधे दिल में उतर जाते हैं। कहानी की रफ्तार शानदार है—एक बार पढ़ना शुरू करें तो हर पन्ना आपको आगे बढ़ने पर मजबूर करता है। घोड़क के ज़रिए दुनिया की पूरी तस्वीर दिखाना एकदम सही और असरदार तरीका है।
कला (आर्टवर्क): मिलिंद मिसाल और विट्ठल कांबले की आर्ट उस समय की राज कॉमिक्स की क्लासिक पहचान है। भविष्य का शहर बहुत कल्पनाशील ढंग से बनाया गया है। उड़न-कारें, अलग तरह की इमारतें—सब कुछ अपनी उम्र से काफी आगे लगता है। लड़ाई के दृश्य बेहद तेज, ऊर्जा से भरे और आंखों को खींच लेने वाले हैं। पात्रों के हाव-भाव—अश्वराज का गुस्सा, घोड़क का दर्द, अश्व-सैनिकों की क्रूरता—सब बहुत खूबसूरती से दिखाए गए हैं।
सबसे ज्यादा असर डालने वाला पैनल वही है, जिसमें घोड़क के हाथ काटे जाते हैं। यह दृश्य जितना क्रूर है, उतना ही कहानी की असली भावना को सामने लाता है। रंगों का इस्तेमाल चटक और आकर्षक है, जैसा उस दौर की प्रिंटिंग में होता था।
निष्कर्ष: एक कालजयी कृति
राज कॉमिक्स की “कलयुग” सिर्फ एक कॉमिक्स नहीं है—यह एक चेतावनी है। यह एक ऐसे भविष्य की डरावनी तस्वीर पेश करती है, जहाँ शायद हम अपने ही कर्मों (पर्यावरण को नुकसान, बढ़ती असमानता, अमानवीयता) की वजह से पहुँच सकते हैं।
अश्वराज की यह यात्रा उसे एक साधारण राजकुमार से उठाकर एक ‘धर्म-योद्धा’ के स्तर पर ले जाती है।
यह कॉमिक्स अपनी रोमांचक कहानी, जबरदस्त एक्शन, मजबूत किरदारों और सबसे ज्यादा, अपने गहरे सामाजिक संदेश के कारण आज भी उतनी ही प्रभावशाली है। इसका अंत जिस तगड़े मोड़ पर होता है, उसे भारतीय कॉमिक्स इतिहास के सबसे दमदार ‘क्लिफहैंगर्स’ में रखता है।
“कलयुग” सच में राज कॉमिक्स का एक अनमोल रत्न है, जिसे हर कॉमिक प्रेमी को जरूर पढ़ना चाहिए।
