तुलसी कॉमिक्स में ‘बाज़’ (Baaz) की पहचान हमेशा से कुछ अलग ही रही है। लेखक परशुराम शर्मा और चित्रकार विकास–पंकज की जोड़ी ने एक ऐसे नायक को रचा, जो शुरुआत में एक पेशेवर हत्यारा होता है, लेकिन हालात और किस्मत उसे ‘भूतों के राजकुमार’ का हमशक्ल बना देते हैं। यही मोड़ इस किरदार को आम हीरो से खास बना देता है। पिछले दो अंकों—‘बाज़ का आतंक’ और ‘बाज़ और बाज़’—में हमने देखा कि कैसे देव, यानी कहानी का मुख्य नायक, रहस्यमयी शक्तियाँ हासिल करता है और किस तरह उसका आमना-सामना असली राजकुमार बाज़ से होता है।
प्रस्तुत अंक “बाज़ का हमला” (अंक संख्या 510) उसी कहानी को आगे बढ़ाता है और रोमांच को एक नए स्तर पर ले जाता है। यह वही दौर था जब कॉमिक्स सिर्फ टाइमपास नहीं थीं, बल्कि बच्चों के लिए एक नई दुनिया में झांकने का ज़रिया हुआ करती थीं, जहाँ हर पन्ना कल्पना और एक्शन से भरा होता था।
कथानक का विस्तृत विश्लेषण (Detailed Plot Summary)

कहानी वहीं से शुरू होती है, जहाँ ‘ब्लैक टाइगर’ संगठन का सरगना सुप्रीमो, जिसे शेख गुलफ़ाम के नाम से भी जाना जाता है, अपनी हार और अपमान से बुरी तरह तिलमिलाया हुआ है। ‘सलाम टापू’ पर बाज़ ने जो तबाही मचाई थी, उसने उसके पूरे आपराधिक साम्राज्य की नींव हिला दी थी। सुप्रीमो को साफ समझ आ जाता है कि यह लड़ाई अब आसान नहीं रहने वाली।
नए खलनायक का उदय: ‘करंट’ (Current)
सुप्रीमो को यह एहसास हो जाता है कि बाज़ को साधारण हथियारों से हराना नामुमकिन है। इसलिए वह अपना सबसे खतरनाक दांव चलता है और मैदान में उतारता है ‘करंट’ को। करंट कोई आम विलेन नहीं है। उसके शरीर में पूरे 36,000 वोल्ट की बिजली दौड़ती रहती है। उसका लुक भी उतना ही डरावना है—हरा हुड, चेहरे पर मास्क और सीने पर खोपड़ी का निशान। वह न सिर्फ जबरदस्त बिजली के झटके दे सकता है, बल्कि स्टील जैसी मज़बूत धातु तक को पिघलाने की ताकत रखता है। उसके साथ उसकी अपनी ‘इलेक्ट्रिक फ़ोर्स’ भी होती है, जिसमें 440 और 660 वोल्ट की ताकत वाले गुर्गे शामिल हैं।
समुद्र में गुरिल्ला युद्ध
बाज़ यानी देव अपनी मोटरबोट पर सवार होकर सुप्रीमो के हेडक्वार्टर की ओर बढ़ता है। यहीं से कहानी में जबरदस्त एक्शन शुरू हो जाता है। सुप्रीमो की समुद्री सेना चारों तरफ से बाज़ पर हमला कर देती है। गोलियों और धमाकों के बीच बाज़ अपनी जादुई पोशाक की एक और खास ताकत दिखाता है। वह न सिर्फ गोलियों को पलट सकता है, बल्कि उसके पास ‘बाज़ चक्र’ (Baaz Chakra) जैसा बेहद खतरनाक हथियार भी है। उफनती लहरों के बीच एक नाव से दूसरी नाव पर छलांग लगाता हुआ बाज़ किसी हॉलीवुड एक्शन फिल्म के सीन जैसा लगता है।

‘ब्लैक हिल’ हेडक्वार्टर में घुसपैठ
अपनी समझदारी और चालाकी से बाज़ दुश्मनों को चकमा देता है और रात के अंधेरे में ‘ब्लैक हिल’ पहुँच जाता है। वह सीधी और ऊँची दीवारों पर चढ़ते हुए तीसरी मंज़िल की खिड़की से अंदर दाखिल होता है। देव का मकसद सिर्फ सुप्रीमो को खत्म करना नहीं है, बल्कि संगठन के काले कारनामों से जुड़े ज़रूरी रिकॉर्ड्स और माइक्रोफिल्म्स हासिल करना भी है, ताकि इस पूरे आतंकवादी नेटवर्क को जड़ से खत्म किया जा सके।
बाज़ बनाम करंट: महासंग्राम
कॉमिक्स का सबसे धमाकेदार हिस्सा तब आता है, जब बाज़ और करंट आमने-सामने होते हैं। करंट के ज़ोरदार बिजली के झटके बाज़ को गिरा देते हैं। करंट को लगता है कि अब जीत उसकी है और वह बाज़ की जादुई पोशाक उतारने की कोशिश करता है। तभी कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आता है। जिससे करंट लड़ रहा होता है, वह असली देव नहीं बल्कि एक ‘डमी’ निकलता है।

प्रेत राजकुमार बाज़ की वापसी और ‘मूनवॉक’
असल चौंकाने वाला पल तब आता है, जब ‘प्रेत राजकुमार बाज़’ खुद सामने आता है। यहाँ लेखक ने उस दौर के मशहूर पॉप स्टार माइकल जैक्सन का बड़ा मज़ेदार संदर्भ जोड़ा है। प्रेत राजकुमार छत से उल्टा लटककर ‘ब्रेक डांस’ और ‘मूनवॉक’ करता है, जिसे देखकर करंट जैसा ताकतवर विलेन भी घबरा जाता है। यह सीन न सिर्फ मनोरंजन बढ़ाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कई बार भूतों की दुनिया की ताकतें विज्ञान पर भारी पड़ सकती हैं।
कबड्डी और विनाश
राजकुमार बाज़ करंट को थकाने के लिए उसके साथ ‘कबड्डी’ खेलने लगता है। धीरे-धीरे करंट अपना संतुलन खो बैठता है और आखिरकार एक गहरी खाई में जा गिरता है। इसी दौरान असली देव अपना मिशन पूरा कर चुका होता है। वह संगठन की तिजोरियाँ तोड़कर ज़रूरी दस्तावेज़ हासिल कर लेता है और पूरे हेडक्वार्टर में बम लगाकर उसे उड़ा देता है। कहानी का अंत ‘सलाम टापू’ के पूरी तरह तबाह होने और बाज़ की शानदार जीत के साथ होता है।
पात्रों का मूल्यांकन (Character Assessment)

देव (बाज़): देव एक ऐसा नायक है जो हर मिशन पर पूरा ध्यान देता है। वह अपनी ताकतों पर घमंड नहीं करता, बल्कि उन्हें सही समय और सही रणनीति के साथ इस्तेमाल करता है। इस अंक में उसकी जासूसी और चुपचाप दुश्मन के इलाके में घुसने की कला साफ दिखाई देती है, जो यह साबित करती है कि वह सिर्फ ताकतवर ही नहीं, बल्कि दिमाग़ी तौर पर भी मजबूत है।
प्रेत राजकुमार बाज़: यह किरदार कहानी में रहस्य और मज़ाक का शानदार मेल है। वह कब क्या कर बैठे, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। दुश्मन का मज़ाक उड़ाते हुए उसे हराना उसका खास अंदाज़ है, जो पाठकों को खूब पसंद आता है। उसकी मौजूदगी हर गंभीर सीन को भी मज़ेदार बना देती है।
करंट: करंट एक बेहद ताकतवर और डर पैदा करने वाला खलनायक है। उसे एक चलते-फिरते ‘पावर स्टेशन’ की तरह दिखाया गया है। शारीरिक रूप से वह बहुत मजबूत है, लेकिन राजकुमार बाज़ की मायावी और रहस्यमयी ताकतों के सामने आखिरकार कमजोर पड़ जाता है।
सुप्रीमो: इस अंक में सुप्रीमो की हताशा साफ दिखाई देती है। बार-बार की हार उसे अंदर से तोड़ रही है और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है। उसकी बेचैनी उसे और ज़्यादा खतरनाक तो बनाती है, लेकिन साथ ही उसकी गलतियों की वजह भी बनती है।
चित्रांकन और कला पक्ष (Art and Illustration)

विकास–पंकज की ड्रॉइंग इस कॉमिक्स की सबसे बड़ी ताकत है। गोलियों की बारिश, बिजली की कड़क और ज़बरदस्त धमाकों को उन्होंने इतनी जीवंतता से काग़ज़ पर उतारा है कि हर सीन चलता हुआ महसूस होता है। ‘धड़ाम’, ‘बूम’ और ‘तड़ाक’ जैसे शब्दों का सही जगह पर इस्तेमाल दृश्यों का असर कई गुना बढ़ा देता है और पाठक खुद को कहानी के बीच खड़ा हुआ महसूस करता है। रंगों की बात करें तो बाज़ की नीली और ग्रे ड्रेस के सामने करंट का हरा और सुनहरा रंग बहुत प्रभावशाली लगता है। खासकर बिजली को दिखाने के लिए इस्तेमाल किए गए पीले और लाल रंग उस दौर के हिसाब से काफी नए और आकर्षक नज़र आते हैं। वहीं, प्रेत राजकुमार का कंकाल रूप और छत पर नाचने वाला सीन कलाकारों की कल्पनाशीलता का बेहतरीन उदाहरण है।
संवाद और पटकथा (Dialogues and Screenplay)

परशुराम शर्मा ने संवादों को छोटा, सीधा और असरदार रखा है। करंट के संवाद उसके घमंड और अहंकार को दिखाते हैं, जबकि बाज़ के डायलॉग्स में आत्मविश्वास और इंसाफ़ की भावना साफ झलकती है। एक सीन में जब करंट बाज़ की पोशाक उतारने की कोशिश करता है, उस वक्त के संवाद कहानी में जबरदस्त उत्सुकता पैदा करते हैं। वहीं कबड्डी वाला सीन पूरी कहानी में देसी रंग घोल देता है, जिससे पाठक खुद को इससे और ज़्यादा जुड़ा हुआ महसूस करता है।
समीक्षात्मक टिप्पणी: विज्ञान बनाम पराशक्ति

इस कॉमिक्स की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह टेक्नोलॉजी और जादू के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाती है। एक तरफ सुप्रीमो है, जो आधुनिक हथियारों, समुद्री सेना और करंट जैसे ‘इलेक्ट्रिक ह्यूमन’ पर भरोसा करता है। दूसरी तरफ देव है, जिसके पास भूतों की दुनिया से जुड़ा जादुई लिबास और प्रेत राजकुमार का साथ है। यह टकराव साफ संदेश देता है कि बुराई चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, सच्चाई और मजबूत इरादों के सामने वह ज़्यादा देर टिक नहीं सकती। बाज़ का हमला सिर्फ हथियारों पर नहीं, बल्कि पूरे अपराधी साम्राज्य के घमंड पर सीधा वार था।
कुछ अनूठे पहलू (Unique Aspects)
90 के दशक की भारतीय कॉमिक्स पर ग्लोबल पॉप कल्चर का असर इस अंक में साफ दिखाई देता है। माइकल जैक्सन का ज़िक्र और ‘ब्रेक डांस’ जैसे एलिमेंट्स उस समय के बच्चों के लिए किसी सरप्राइज़ से कम नहीं रहे होंगे। कहानी में डमी बाज़ का ट्विस्ट और करंट की हार इसे और मज़ेदार बना देती है, जिससे पाठक आख़िरी पन्ने तक असली देव की तलाश में उलझा रहता है। एक्शन के मामले में भी यह कॉमिक्स कमाल की है, जहाँ समुद्री लड़ाई, आमने-सामने की भिड़ंत और आख़िर में ज़बरदस्त विस्फोट—सब कुछ मौजूद है, जो पाठक को रोमांच की पूरी सवारी कराता है।
निष्कर्ष (Final Verdict)
“बाज़ का हमला” सिर्फ एक कॉमिक्स नहीं है, बल्कि बाज़ सीरीज़ का वह मोड़ है जहाँ नायक अपनी पूरी पहचान और ताकत के साथ सामने आता है। यह अंक साबित करता है कि देव अब पूरी तरह ‘बाज़’ बन चुका है और किसी भी बड़े आतंकवादी संगठन को टक्कर देने की ताकत रखता है।
तुलसी कॉमिक्स की यह रचना आज भी पुरानी यादों को ताज़ा कर देती है। इसकी तेज़ रफ्तार कहानी, दमदार चित्रांकन और रोमांचक क्लाइमैक्स इसे एक यादगार कॉमिक्स बनाते हैं। अगर आपने इसके पिछले दो अंक पढ़े हैं, तो यह अंक आपके लिए बिल्कुल मिस न करने वाला अनुभव है। यह हमें अगले अंक “बाज़ का तहलका” (Baaz Ka Tehelka) के लिए ज़बरदस्त उत्सुकता के साथ छोड़ता है।
रेटिंग: 4.9/5
भारतीय कॉमिक्स प्रेमियों के लिए यह एक अनिवार्य रत्न है, जो हमें उस मासूम दौर की याद दिलाता है जब हमारा हीरो जादुई पोशाक पहनकर हवा में उड़ता था और बुराई का अंत करता था।
