राज कॉमिक्स ने भारतीय कॉमिक्स की दुनिया को कई शानदार सुपरहीरो दिए हैं, लेकिन ‘भेड़िया’ का किरदार अपनी गहराई और अंदरूनी टकराव की वजह से सबसे अलग नजर आता है। 1998 में आई कॉमिक्स ‘जानवर’ सिर्फ एक एक्शन एडवेंचर कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसान के अंदर चलने वाली उस जंग की कहानी है जो हर पल उसके मन में चलती रहती है। यह कहानी प्यार, गुस्से, हिंसा और पछतावे के बीच के संघर्ष को बहुत ही असरदार तरीके से दिखाती है। इसका सबसे बड़ा संदेश यही है कि हर इंसान के भीतर दो रूप होते हैं – एक ‘इंसानी’ जो दया और प्यार सिखाता है, और दूसरा ‘जानवर’ जो गुस्से और विनाश की तरफ ले जाता है।
कथानक का विस्तार: रक्षक से भक्षक तक का सफर
कहानी की शुरुआत असम के जंगलों, यानी कामरूप, के रक्षक भेड़िया से होती है। वह जंगल का पहरेदार है और अपनी तेज सुनने की ताकत से दूर से ही एक हाथी की दर्द भरी आवाज सुन लेता है। जब वह वहाँ पहुँचता है तो देखता है कि कुछ चालाक शिकारी उस हाथी को फंदे में फँसाकर ले जाने वाले हैं। भेड़िया बिना देर किए उसे छुड़ा देता है। यहाँ उसका इंसानी रूप साफ दिखाई देता है। वह एक बेजुबान जानवर की जान बचाता है और हाथी कृतज्ञ होकर उसका धन्यवाद करता है।

कहानी का असली मोड़ तब आता है जब भेड़िया की मुलाकात जेन से होती है। जेन वह लड़की है जिससे भेड़िया दिल से प्यार करता है। उसे देखकर भेड़िया के भीतर का कोमल और संवेदनशील इंसान सामने आ जाता है। वह जेन की घुड़सवारी की तारीफ करता है, उसकी सुंदरता की बात करता है और अपने मन की भावनाएँ जताने की कोशिश करता है। इस पल में भेड़िया सिर्फ एक योद्धा नहीं, बल्कि एक ऐसा इंसान दिखता है जो समाज में अपनापन चाहता है। वह ‘कुरूप’ या ‘जल्लाद’ कहलाने के डर से बाहर निकलकर एक सामान्य जीवन और सच्चा प्यार पाना चाहता है। उसके मन में अपनी पुरानी गलतियों का पछतावा भी है और वह उन्हें सुधारना चाहता है।
लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। जिस हाथी को भेड़िया ने कुछ समय पहले बचाया था, वही हाथी खुशी-खुशी उसके लिए मीठे फलों की एक डाली लेकर आता है। उस समय भेड़िया जेन के साथ बातों में खोया होता है। अचानक वह डाली उसके पास गिरती है और वह चौंक जाता है। एक पल के लिए उसके भीतर का ‘जानवर’ जाग उठता है। बिना सोचे-समझे वह उसी बेजुबान हाथी पर हमला कर देता है और उसे बुरी तरह घायल कर देता है। यह दृश्य पूरी कहानी का सबसे झकझोर देने वाला पल है।

जेन यह सब अपनी आँखों से देखती है। उसके लिए यह दृश्य असहनीय है। वह भेड़िया को ‘जानवर’ कहकर धक्का देती है और उससे नफरत करने की बात कह देती है। यह शब्द भेड़िया के दिल पर गहरी चोट की तरह लगते हैं। यहाँ पाठक भी समझ पाता है कि एक पल का गुस्सा कैसे किसी की पूरी पहचान को बदल सकता है।
प्रायश्चित की खोज: ‘नायाब’ फूल का मिशन
जेन की नफरत भेड़िया को अंदर तक हिला देती है। उसे अपनी गलती का अहसास होता है। उसका इंसानी पक्ष फिर से जागता है और वह हाथी के इलाज का रास्ता खोजने निकल पड़ता है। इसी तलाश में वह फूजो बाबा के पास पहुँचता है। फूजो बाबा उसे बताते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात बारह साल में सिर्फ एक बार ‘नायाब’ नाम का दुर्लभ फूल खिलता है। मान्यता है कि अगर कोई प्रेमी यह फूल अपनी प्रेयसी को दे दे, तो उनका प्रेम हमेशा के लिए अमर हो जाता है।

भेड़िया इसे अपने लिए आखिरी मौका मानता है। उसे लगता है कि यही फूल जेन का दिल वापस जीत सकता है और उसके किए का प्रायश्चित बन सकता है। लेकिन इस फूल की चाह सिर्फ उसे ही नहीं है। जंगल के कई कबीलों – काचीपीचा, हाजा, कोला और थंबुका – के योद्धा भी इस फूल को पाने के लिए निकल पड़ते हैं। यहाँ से कहानी का माहौल पूरी तरह बदल जाता है। जो कहानी अब तक भावनाओं के इर्द-गिर्द घूम रही थी, वह अब एक बड़े संघर्ष की ओर बढ़ने लगती है।
युद्ध और हिंसा का तांडव
कहानी का बीच का हिस्सा कबीलाई लड़ाइयों और भयंकर हिंसा से भरा हुआ है। धीरज वर्मा की कला यहाँ अपने पूरे असर में दिखाई देती है। अलग-अलग कबीलों के योद्धा अजीब और ताकतवर जानवरों जैसे शुतुरमुर्ग, तेंदुए और गैंडे पर सवार होकर एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं। ‘फंगा’, ‘खिम्बा’ और ‘जानली’ जैसे खतरनाक हथियारों से लड़ाई के दृश्य बहुत तीखे और असरदार बनते हैं। कई जगह शरीर के अंग कटते दिखाए गए हैं, जो उस दौर की कॉमिक्स की बेबाक शैली को दर्शाते हैं।

भेड़िया इस खून-खराबे को रोकने की कोशिश करता है। वह योद्धाओं को समझाता है कि प्यार पाने के लिए इतनी हिंसा करना गलत है। लेकिन कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं होता। हालात ऐसे बन जाते हैं कि उसे भी अपनी गदा उठानी पड़ती है। आत्मरक्षा और फूल तक पहुँचने की मजबूरी में वह खुद भी उसी हिंसा का हिस्सा बन जाता है जिसे वह रोकना चाहता था।
यही इस कहानी की सबसे बड़ी विडंबना है। जो नायक खून-खराबा रोकना चाहता था, वही लाशों के ढेर के बीच से गुजरकर अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। यहाँ लेखक ने बहुत सादगी लेकिन गहराई से एक बड़ी बात कही है – अगर रास्ता गलत हो, तो मंजिल कितनी भी पवित्र क्यों न हो, उसका नतीजा कभी पूरी तरह अच्छा नहीं हो सकता।
‘जानवर’ सिर्फ भेड़िया की कहानी नहीं है, बल्कि हर उस इंसान की कहानी है जो अपने भीतर के गुस्से और प्यार के बीच झूलता रहता है। यह कॉमिक्स हमें याद दिलाती है कि असली लड़ाई बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने अंदर के ‘जानवर’ से होती है।
चरमोत्कर्ष: एक दुखद अंत
भेड़िया आखिरकार ‘नायाब’ फूल हासिल कर लेता है, लेकिन तब तक न सिर्फ उसका शरीर बल्कि वह फूल भी खून से भीग चुका होता है। वह थका हुआ है, घायल है, पर उसके चेहरे पर उम्मीद साफ दिखती है। उसे लगता है कि अब सब ठीक हो जाएगा। वह पूरे जोश के साथ जेन के पास पहुँचता है और वह फूल उसे दे देता है। उसके मन में यही विश्वास है कि उसने जो कुछ सहा, जो कुछ किया, वह सब अपने प्यार को बचाने के लिए था।

लेकिन यहीं कहानी दिल तोड़ देने वाला मोड़ लेती है। जेन उस फूल को लेने से मना कर देती है। उसकी आँखों में आँसू हैं, लेकिन साथ ही गुस्सा भी है। वह कहती है, “ओह भेड़िया! सिर्फ एक फूल के लिए तुमने खून-खराबा रोकने की जगह उसे और बढ़ा दिया।” जेन के लिए यह फूल अब प्यार का नहीं, बल्कि हिंसा का निशान बन चुका है। उसकी नजर में भेड़िया फिर वही बन गया है, जिससे वह डरती थी – एक ‘जानवर’।
वह उसे अपने सामने से चले जाने को कह देती है। यह शब्द भेड़िया के दिल पर किसी तलवार से कम नहीं लगते। जिस प्यार को अमर बनाने के लिए वह निकला था, उसी को उसने अपने हाथों से खत्म कर दिया। यह अंत हमें सोचने पर मजबूर कर देता है कि कभी-कभी हम सही मकसद लेकर भी गलत रास्ता चुन लेते हैं, और उसका अंजाम बहुत दर्दनाक होता है।
कला और चित्रांकन (Art and Illustration)

‘जानवर’ की सफलता में धीरज वर्मा के चित्रों का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने भेड़िया के ताकतवर शरीर, उसकी आंखों की बेचैनी और चेहरे के दर्द को बहुत बारीकी से दिखाया है। खासकर जब भेड़िया गुस्से में होता है या टूट जाता है, तो उसके चेहरे के भाव सीधे दिल तक असर करते हैं।
युद्ध के दृश्य बेहद जीवंत हैं। ऐसा लगता है जैसे पैनल के अंदर सब कुछ सच में चल रहा हो। जंगलों की हरियाली, कबीलों की अलग-अलग वेशभूषा, उनके हथियार और जानवरों का डिजाइन – सब कुछ बहुत मेहनत से बनाया गया है। राज कॉमिक्स का वह क्लासिक अंदाज यहाँ पूरी तरह नजर आता है।
रंगों का काम भी कहानी के मूड के हिसाब से किया गया है। जहाँ सुकून और भावनाएँ हैं, वहाँ हल्के और शांत रंग हैं। लेकिन जैसे ही हिंसा शुरू होती है, लाल रंग का असर बढ़ जाता है, जो माहौल को और भारी बना देता है। सुनील पांडेय का रंग संयोजन कहानी को और गहराई देता है।
दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

यह कॉमिक्स सिर्फ एक कहानी नहीं सुनाती, बल्कि कई गहरे सवाल भी छोड़ जाती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भेड़िया कभी अपने अंदर के ‘जानवर’ को पूरी तरह काबू कर पाएगा? कहानी दिखाती है कि हालात कभी-कभी इंसान से ऐसे फैसले करवा देते हैं, जिनका उसे बाद में पछतावा होता है।
दूसरा बड़ा सवाल है – क्या प्यार को हिंसा के सहारे पाया जा सकता है? ‘नायाब’ फूल प्यार और पवित्रता का प्रतीक था, लेकिन जब वह खून से सना हुआ जेन के सामने पहुँचा, तो उसकी पूरी अहमियत खत्म हो गई। इससे साफ होता है कि गलत तरीके से हासिल की गई चीज कभी सच्ची खुशी नहीं दे सकती।
भेड़िया का पूरा सफर पछतावे और सुधार की कोशिश का था। वह अपनी गलती सुधारना चाहता था, लेकिन उसी कोशिश में उसने और बड़ी गलतियाँ कर दीं। यही जीवन की विडंबना है – कई बार हम सुधारने निकलते हैं, और उल्टा और उलझ जाते हैं।
निष्कर्ष: एक कालजयी रचना
‘जानवर’ सिर्फ बच्चों के लिए बनी कॉमिक नहीं है। यह एक ऐसी कहानी है जो बड़े पाठकों को भी सोचने पर मजबूर कर देती है। इसकी कहानी मजबूत है, संवाद असरदार हैं और भावनात्मक गहराई इसे खास बनाती है। अंत में कोबी की छाया का दिखना अगली कहानी ‘कोबी और भेड़िया’ के लिए जबरदस्त उत्सुकता पैदा करता है।
समीक्षा का सार:
कहानी: 5/5 (दिल को छू लेने वाली और रोमांच से भरी)
कला: 5/5 (धीरज वर्मा का बेहतरीन काम)
संवाद: 4.5/5 (सीधे दिल पर असर करने वाले)
अगर आप राज कॉमिक्स के फैन हैं या ऐसी कहानी पढ़ना चाहते हैं जो सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि एक गहरी सीख भी दे, तो ‘जानवर’ जरूर पढ़ें। यह हमें याद दिलाती है कि हमारे भीतर का ‘इंसान’ और ‘जानवर’ हमेशा साथ रहते हैं। फर्क बस इतना है कि किस पल हम किसे आगे आने देते हैं। एक छोटी सी चूक सच में सब कुछ बदल सकती है।
