राज कॉमिक्स का एक खास पात्र है—’भेड़िया’। वह बाकी सुपरहीरो से अलग है; उसकी ताकत सिर्फ शारीरिक नहीं थी, बल्कि उसका व्यक्तित्व मानवीय भावनाओं, लोक-कथाओं और असम के रहस्यमय जंगलों की संस्कृति में गहराई से बुना गया था।
कॉमिक्स ‘भुजंग’ इसी श्रृंखला की एक बड़ी कहानी है, जो पाठक को रोमांच के उस मुकाम तक ले जाती है जहाँ तंत्र-मंत्र, पुरानी परंपराएं और असुरी ताकतें आमने-सामने आती हैं। तरुण कुमार वाही की लेखनी और धीरज वर्मा के बेहतरीन चित्रांकन ने इसे भारतीय कॉमिक्स के इतिहास में खास बना दिया है। यह समीक्षा ‘भुजंग’ के उन पहलुओं को बताएगी जो इसे एक मास्टरपीस बनाते हैं।
असम के जंगलों का डर: जहाँ इंसान नहीं, ‘जहर’ राज करता है!

कहानी की शुरुआत हमें असम के दूर और दुर्गम जंगलों में ले जाती है, जहाँ कानून नहीं, बल्कि ‘ताकत’ चलती है। शुरू में दो शिकारी गुटों के बीच हिरण को लेकर खूनी संघर्ष होता है। लेकिन यह कोई आम लड़ाई नहीं है। यहाँ ‘जंगली न्याय’ का अलग ही रूप दिखता है। लेखक ने खूबसूरती से दिखाया है कि जंगल में जीत केवल उसी की होती है जिसके पास ज्यादा हिंसकता और ताकत हो।
इस बीच नायक ‘भेड़िया’ आता है। वह देखता है कि कुछ शिकारी अपने दुश्मनों को दांतों से काट रहे हैं और काटते ही शिकार के मुंह से झाग निकलने लगता है। भेड़िया हैरान हो जाता है क्योंकि यह सामान्य इंसानी व्यवहार नहीं था। यहाँ आता है ‘बाबा फूजो’, जो भेड़िया के गुरु और जंगल के रहस्यों के जानकार हैं। बाबा फूजो भेड़िया को ‘गार्ला कबीले’ के बारे में बताते हैं—एक ऐसा कबीला जो सदियों से दुनिया से छुपा हुआ है और जहाँ जहर ही जीवन का आधार है।
नीला राक्षस या जहरीला देवता? भुजंग की वो ताकतें जिनसे कांप उठता था पूरा कबीला!

कॉमिक्स का मुख्य पात्र ‘भुजंग’ कहानी का सबसे शक्तिशाली और डरावना केंद्र है। भुजंग कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि गार्ला कबीले का देवता और रक्षक माना जाता है। उसका चित्रण नीले रंग के विशालकाय राक्षस के रूप में है, जिसके पास एक दिव्य राजदंड है। भुजंग हर पांच साल में धरती पर आता है, और उसका आना कबीले के लिए खुशी और डर दोनों लेकर आता है।
भुजंग का व्यक्तित्व अहंकारी और क्रूर है। वह आते ही पुराने सरदार से उसकी ‘विष-शक्ति’ छीन लेता है। यह इतना दर्दनाक होता है कि पुराना सरदार तड़प-तड़प कर मर जाता है। भुजंग मानता है कि शक्ति केवल उसी के पास रहनी चाहिए जो इसका हकदार हो। उसका संवाद, “मैं फिर से विष-शक्ति देने आया हूँ,” कबीले में नई हिंसा और प्रतिस्पर्धा पैदा करता है। भुजंग दिखाता है कि कैसे अंधविश्वास और शक्ति का लालच इंसानों को जानवरों से भी बदतर बना सकता है।
‘सर्प कला’ और खूनी दांत: जब शिकार का तरीका ही सबसे बड़ा डर बन गया!

लेखक तरुण कुमार वाही ने ‘गार्ला कबीले’ की जो कल्पना की है, वह अद्भुत है। यह कबीला जहर के साथ जीता है। वे जहरीली पत्तियों की चटनी खाते हैं, सांपों के बिस्तर पर सोते हैं और बिच्छुओं को अपने शरीर पर रेंगने देते हैं ताकि उनका खून पूरी तरह से जहरीला हो जाए। उनकी युद्ध कला को ‘सर्प कला’ कहा गया है।
इस कला में माहिर योद्धा अपने दांतों का इस्तेमाल सांप की तरह हमला करने के लिए करते हैं। एक बार जब वे किसी को काटते हैं, तो जहर सीधे रक्तप्रवाह में जाता है और मौत निश्चित होती है। कॉमिक्स में कबीले के जीवन का विवरण इतना विस्तार से है कि पाठक खुद उस जहरीले वातावरण को महसूस करने लगता है। यह कहानी में हॉरर और मिस्ट्री का ऐसा तड़का लगाता है जो पाठक को पन्ने पलटने पर मजबूर कर देता है।
तिलिस्म फाड़कर निकला ‘कोबी’: क्या यह हिंसक योद्धा भुजंग के अहंकार को तोड़ पाएगा?

कहानी का असली रोमांच तब आता है जब भेड़िया का दूसरा रूप ‘कोबी’ आता है। कोबी, जो तिलिस्म में फंसा था, जमीन के नीचे से एक जोरदार विस्फोट के साथ बाहर आता है। कोबी भेड़िया से बिल्कुल अलग है—वह हिंसक, बेपरवाह और किसी के आगे झुकता नहीं।
कोबी खुद को गार्ला कबीले के जहरीले इलाके में पाता है। उसे सांस लेने में तकलीफ होती है, लेकिन हार मानने के बजाय वह एक शिकारी का मास्क (विष-रोधक) ले लेता है। कोबी और भुजंग का आमना-सामना कॉमिक्स का सबसे रोमांचक हिस्सा है। भुजंग खुद को देवता समझता है, और कोबी उसे साधारण दुश्मन मानकर चुनौती देता है। इन दो महाशक्तियों की लड़ाई कहानी को अगले स्तर पर ले जाती है।
धीरज वर्मा का जादू: वो चित्रकारी जिसने ‘भुजंग’ को एक विजुअल मास्टरपीस बना दिया!

यदि ‘भुजंग’ आज भी याद किया जाता है, तो इसका बड़ा श्रेय धीरज वर्मा के चित्रांकन को जाता है। उनकी कला में गहराई और ‘मस्कुलर’ बनावट है जो पात्रों को जीवंत बना देती है। भुजंग का नीला रंग, शरीर की बनावट और उसके क्रूर चेहरे के भाव उसे यादगार विलेन बनाते हैं। कोबी और भेड़िया के एक्शन सीन्स में गति (Fluidity) इतनी शानदार है कि लगता है जैसे कोई फिल्म चल रही हो। पन्नों पर बिखरा खून और योद्धाओं के चेहरे पर दिखता दर्द धीरज वर्मा की पहचान है। बैकग्राउंड डिटेलिंग भी शानदार है—असम के घने जंगल, जहरीला धुआं, और कबीले के मास्क—सब बहुत बारीकी से बने हैं। साथ ही सुनील पांडे का रंग संयोजन कहानी के डरावने और रहस्यमयी माहौल को पूरी तरह से सपोर्ट करता है।
अंतिम फैसला: क्या ‘भुजंग’ वाकई भेड़िया सीरीज की सबसे बेहतरीन कॉमिक्स है?

समीक्षा के अंत में कहा जा सकता है कि ‘भुजंग’ सिर्फ कॉमिक्स नहीं, बल्कि कल्पनाशीलता का एक शानदार उदाहरण है। यह कहानी दिखाती है कि प्रकृति में ऐसे कई रहस्य हैं जो मानव समझ से परे हैं। इसकी खूबियों में मजबूत पटकथा है, जो कभी भी बोर नहीं करती और हर पन्ने पर नया सस्पेंस रहता है। गार्ला कबीले और सर्प कला की अवधारणा के साथ इसका विश्व-निर्माण (World Building) बहुत ही अनोखा है। भेड़िया की चिंता और कोबी की निडरता के विरोधाभास के जरिए पात्रों का विकास भी बेहतरीन ढंग से दिखाया गया है।
यदि इसकी कोई कमी बतानी हो तो शायद यही कि कहानी का अंत एक बड़े ‘क्लिफहैंगर’ पर होता है, जिससे पाठक के मन में कई सवाल रह जाते हैं। इन सवालों का जवाब अगली कॉमिक्स ‘नीली लाश’ में मिलता है।
निष्कर्ष:
‘भुजंग’ राज कॉमिक्स के सभी प्रशंसकों के लिए एक जरूरी कॉमिक्स है। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं देती, बल्कि उस दौर की याद भी दिलाती है जब कहानियों में गहराई और चित्रों में जान होती थी। यदि आप भेड़िया सीरीज की शुरुआत करना चाहते हैं, तो ‘भुजंग’ सबसे अच्छा विकल्प है।
