90 के दशक में ‘किंग कॉमिक्स’ ने कुछ ऐसे किरदार दिए जो बिल्कुल अलग सोच के साथ बनाए गए थे। इन्हीं में से एक था ‘ब्लाइंड डेथ’। जैसा कि नाम से ही समझ आता है, यह कहानी एक ऐसे नायक की है जो देख नहीं सकता। संपादक विवेक मोहन, लेखक नाजरा रवान और चित्रकार दिलीप चौबे की इस तिकड़ी ने मिलकर भारतीय पाठकों को एक ऐसा सुपरहीरो दिया जो देखने में भले ही हॉलीवुड के ‘डेयरडेविल’ की याद दिलाए, लेकिन उसकी कहानी, उसकी ट्रेनिंग और उसकी ताकतें पूरी तरह देसी और मौलिक हैं।
एक रोंगटे खड़े कर देने वाला बचाव
कॉमिक की शुरुआत ही बहुत दमदार और भावनाओं से भरे सीन से होती है। एक निर्माणाधीन इमारत की छत पर एक छोटा सा बच्चा पतंग उड़ा रहा होता है। वह इतना मस्त है कि उसे यह अहसास ही नहीं होता कि उसका पैर एक ढीली ईंट पर पड़ गया है। अगले ही पल बच्चा नीचे गिरने लगता है, लेकिन किस्मत से वह एक रस्सी में फंस जाता है और हवा में लटक जाता है।

यहीं से हमारे नायक की शानदार एंट्री होती है। सड़क पर चल रहा एक अंधा व्यक्ति, हाथ में छड़ी लिए, अपनी खास ‘बैट सेंस’ की मदद से खतरे को तुरंत भांप लेता है। हवा की हलचल, हवा में रुकावट और बच्चे की चीखें—इन सबके जरिए वह दूरी और दिशा का अंदाजा लगा लेता है। बिना देखे, उसका उस ऊंची इमारत की सीढ़ियों पर दौड़ना और फिर खिड़की से छलांग लगाकर हवा में ही बच्चे को पकड़ लेना, एकदम फिल्मी और यादगार सीन बन जाता है। यहीं पर पाठक कहानी से पूरी तरह जुड़ जाता है।
शक्तियों का विज्ञान: बैट सेंस और ज्ञानेंद्रियां
लेखक ने ‘ब्लाइंड डेथ’ की ताकतों को बहुत साफ और असरदार तरीके से समझाया है। वह भले ही आंखों से नहीं देख सकता, लेकिन उसकी सुनने, सूंघने और महसूस करने की शक्ति आम इंसानों से हजारों गुना ज्यादा है। वह ध्वनि तरंगों के जरिए अपने दिमाग में आसपास की पूरी तस्वीर बना लेता है। उसकी सूंघने की क्षमता कुत्ते जैसी तेज है और वह सांप की तरह बेहद हल्की आहट भी पहचान सकता है।

कहानी में यह बात साफ कही गई है कि ये शक्तियां किसी हादसे की वजह से नहीं आईं, बल्कि प्रोफेसर कैलाश वर्मा के मार्गदर्शन में किए गए कठिन योग अभ्यास और प्राचीन भारतीय तपस्या का नतीजा हैं। यही ट्रेनिंग उसे रात के गहरे अंधेरे में भी एक शिकारी की तरह सतर्क और खतरनाक बना देती है।
‘क्राइम स्कूल’ का आतंक
हर सुपरहीरो कहानी में विलेन बहुत मायने रखते हैं, और इस कॉमिक में ‘क्राइम स्कूल’ का कॉन्सेप्ट सच में डराने वाला है। यह कोई आम गैंग नहीं, बल्कि एक ऐसी क्रूर संस्था है जो मासूम बच्चों को अगवा करके उन्हें प्रोफेशनल अपराधी बनने की ट्रेनिंग देती है।

इस कहानी के मुख्य विलेन ‘जहाज’ और ‘गोलिलो’ हैं, जिनकी लड़ने की स्टाइल भी उतनी ही अजीब और खतरनाक है। जहाज खिलौना हवाई जहाजों को हथियार की तरह इस्तेमाल करता है, जबकि गोलिलो अपनी बेल्ट में बंधे विस्फोटक गोलों से तबाही मचाता है। स्टेट बैंक ऑफ होनोलूलू में की गई उनकी डकैती यह साफ दिखा देती है कि उनका मकसद सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि लोगों में डर फैलाना और निर्दोषों को मारना है।
भावनात्मक गहराई: प्रोफेसर कैलाश वर्मा का अतीत
यह कहानी सिर्फ एक्शन तक सीमित नहीं रहती। इसमें एक बेहद भावुक मोड़ तब आता है जब प्रोफेसर वर्मा नायक को राज नगर मेंटल हॉस्पिटल ले जाते हैं। वहाँ वह अपनी पत्नी से मिलवाते हैं, जो सदमे की वजह से मानसिक संतुलन खो चुकी है। वजह बेहद दर्दनाक है—क्राइम स्कूल के गुंडों ने उनके दो मासूम बच्चों को बेरहमी से मार डाला था।
यह सच्चाई नायक के मिशन को पूरी तरह बदल देती है। अब यह सिर्फ अपराध के खिलाफ लड़ाई नहीं रह जाती, बल्कि अपने गुरु के दर्द का बदला लेने और उनके साथ न्याय करने की लड़ाई बन जाती है।
एक्शन और क्लाइमेक्स: फार्म हाउस पर हमला
कॉमिक का आखिरी हिस्सा काफी तेज रफ्तार से आगे बढ़ता है। क्राइम स्कूल के मास्टर को पता चल जाता है कि प्रोफेसर वर्मा अभी जिंदा हैं और उन्होंने एक ऐसा रक्षक तैयार कर लिया है जो उनके लिए खतरा बन सकता है। इसी वजह से जहाज और गोलिलो को प्रोफेसर के फार्म हाउस पर हमला करने भेजा जाता है।

अंधेरे फार्म हाउस में ‘ब्लाइंड डेथ’ और इन अपराधियों के बीच की भिड़ंत बेहद शानदार तरीके से दिखाई गई है। यहाँ नायक अपनी पूरी ताकत दिखाता है। वह गोलिलो के फेंके गए गोलों को हवा में ही पकड़कर वापस उसी पर फेंक देता है। जहाज के उड़ते हुए खिलौना विमानों की आवाज सुनकर वह अपनी पोजिशन बदलता है और दोनों अपराधियों को करारी शिकस्त देता है।
रहस्यमयी मोड़: नकाबपोश का आगमन
कहानी के अंत में एक और दिलचस्प ट्विस्ट आता है। जब ‘ब्लाइंड डेथ’ पूरी तरह हावी हो रहा होता है, तभी एक रहस्यमयी नकाबपोश (Masked Man) वहाँ पहुंचता है। वह भी क्राइम स्कूल का पीड़ित रह चुका होता है और नायक का साथ देने की बात करता है। यह मोड़ पाठकों को अगली कॉमिक ‘क्राइम स्कूल’ के लिए बेहद उत्सुक कर देता है।
चित्रांकन और प्रस्तुति (Art Analysis)
दिलीप चौबे का आर्टवर्क पूरी तरह 90 के दशक की पहचान लिए हुए है। ‘ब्लाइंड डेथ’ की ड्रेस—पीला केप, बैंगनी सूट और आंखों पर काले चश्मे—उसे एक रहस्यमयी और दमदार लुक देती है।

एक्शन सीन्स में गति दिखाने के लिए इस्तेमाल की गई रेखाएं और ‘बूम’, ‘कड़क’ जैसे साउंड इफेक्ट्स कॉमिक को जिंदा सा महसूस कराते हैं। पहाड़, फार्म हाउस और अस्पताल जैसे बैकग्राउंड्स में भी बारीक डिटेलिंग साफ नजर आती है। वहीं जहाज और गोलिलो के हथियारों की डिजाइन काफी क्रिएटिव और अलग है।
समीक्षात्मक टिप्पणी (Critical Evaluation)

मजबूत पक्ष:
यह कहानी एक शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति को सुपरहीरो बनाकर समाज को एक मजबूत और सकारात्मक संदेश देती है। प्रोफेसर के परिवार के साथ हुई त्रासदी पाठक के मन में विलेन के प्रति गुस्सा और नायक के लिए गहरी सहानुभूति पैदा करती है। वहीं ‘क्राइम स्कूल’ जैसी संस्था का आइडिया वर्ल्ड-बिल्डिंग के नजरिए से काफी डरावना और आगे की कहानियों की मजबूत नींव रखता है। कुल मिलाकर, यह कहानी अपनी भावनात्मक गहराई और अनोखे कॉन्सेप्ट की वजह से बहुत असर छोड़ती है।
कमजोर पक्ष:
होनोलूलू और राजनगर जैसे स्थानों का एक साथ इस्तेमाल थोड़ा भ्रम पैदा करता है।
विलेन के हथियार काफी अनोखे हैं, लेकिन नायक के सामने वे अपेक्षाकृत जल्दी हार जाते हैं।
निष्कर्ष
‘ब्लाइंड डेथ’ किंग कॉमिक्स की एक यादगार और मजबूत पेशकश है। यह कहानी बताती है कि अगर इंसान अपनी इंद्रियों को सही तरीके से प्रशिक्षित करे, तो वही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती हैं। प्रतिशोध, वफादारी और न्याय के इर्द-गिर्द घूमती यह कहानी नाजरा रवान के संतुलित लेखन और दिलीप चौबे के दमदार चित्रों की वजह से लंबे समय तक याद रहती है।
अगर आप भारतीय कॉमिक्स के शौकीन हैं और ऐसा कुछ पढ़ना चाहते हैं जो रोमांच के साथ दिल को भी छू जाए, तो ‘ब्लाइंड डेथ’ सीरीज की यह पहली कॉमिक जरूर आपके कलेक्शन में होनी चाहिए।
