‘राज कॉमिक्स’ के ब्रह्मांड में ‘नागराज के बाद’ (Nagraj Ke Baad) ने जिस खतरनाक मोड़ पर पाठकों को छोड़ा था, उसका जवाब लेकर आती है यह कॉमिक— “फ्यूल” (Fuel)। अगर ‘नागराज के बाद’ एक महागाथा का दुखभरा अंत था, तो ‘फ्यूल’ उसी दुख के बीच से उठती एक रहस्यमयी चिंगारी है। संजय गुप्ता द्वारा प्रस्तुत, जॉली सिन्हा की कहानी और अनुपम सिन्हा के जादुई चित्रों से सजी यह कॉमिक सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि भारतीय कॉमिक्स जगत में सस्पेंस और एक्शन का एक नया मापदंड है। जहाँ पिछली कड़ी में हमने नागराज को ‘सुसाइड-रे’ (Suicide Ray) के कारण हारते और मौत के बेहद करीब पहुँचते देखा था, वहीं ‘फ्यूल’ उस रहस्य को और भी पेचीदा बना देती है। यह समीक्षा इस ६० पन्नों के रोमांचक सफर को हर पहलू से समझने की कोशिश करेगी।
मौत के अंधेरे में सस्पेंस: शार्क, समंदर और एक अजेय योद्धा

कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ नागराज समुद्र की गहराइयों में खूंखार शार्कों के बीच गिरा था। पन्ना संख्या ४ और ५ पर हम देखते हैं कि ‘सुसाइड-रे’ का असर होने के बावजूद नागराज का शरीर और उसका अवचेतन मन हार मानने को तैयार नहीं है। यहाँ लेखक ने बहुत ही दिलचस्प वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक टकराव दिखाया है—एक तरफ वह किरण है जो ‘जीने की इच्छा’ को खत्म कर देती है, और दूसरी तरफ ऐसा नायक है जिसका पूरा अस्तित्व ही ‘मानवता की रक्षा’ के लिए बना है।
समुद्र के नीचे का दृश्य रोमांच को और बढ़ा देता है, जब नागराज को पता चलता है कि वह शार्क असली नहीं बल्कि ‘मैकेनिकल शार्क’ (Mechanical Sharks) हैं, जिनमें बम लगे हुए हैं। यहाँ अनुपम सिन्हा की कला सच में कमाल लगती है। पानी के अंदर के एक्शन दृश्यों में जो मूवमेंट दिखाया गया है, वह बहुत प्रभावशाली है। नागराज का उन बमों से भिड़ना और आखिर में उस रहस्यमयी ‘किंग’ की योजना को नाकाम करना यह साबित करता है कि नागराज को खत्म करना इतना आसान नहीं है। लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल बना रहता है—क्या वह सच में नागराज ही है?
‘स्नेक आइज’ का उदय: रक्षकों का नया और चतुर अवतार

कहानी का एक अहम हिस्सा ‘स्नेक आइज सिक्योरिटी एजेंसी’ (Snake Eye Security Agency) की स्थापना है। सौडांगी, शीतनाग कुमार और बाकी इच्छाधारी नाग इंसानी रूप में आकर एक एजेंसी बनाते हैं, जिससे कहानी में ‘कॉर्पोरेट थ्रिलर’ जैसा मजेदार ट्विस्ट जुड़ जाता है। पन्ना संख्या ११ पर हेमल भाई के साथ उनका संवाद और हिप्नोटिज्म (Hypnotism) का इस्तेमाल यह दिखाता है कि नागराज के साथी अब सिर्फ ताकत पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि दिमाग और रणनीति भी बराबर लगा रहे हैं।
यह एजेंसी सिर्फ एक बिजनेस नहीं है, बल्कि महानगर में फैले नागराज के दुश्मनों पर नजर रखने और नागराज के ‘गुप्त रूप’ को ढूँढने का एक मजबूत जरिया है। भारती और सौडांगी के बीच की समझ और उनकी चिंता पाठकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है। यह देखना दिलचस्प है कि एक सुपरहीरो की गैरमौजूदगी में उसके साथी किस तरह पूरी जिम्मेदारी संभालते हैं।
‘फ्यूल’ का दर्शन: ऊर्जा की भूख और मानवता का विनाश

कॉमिक का शीर्षक “फ्यूल” (ईंधन) अपने अंदर बहुत गहरा मतलब छिपाए हुए है। यह सिर्फ नागों के जहर से बनने वाले ईंधन की बात नहीं करता, बल्कि यह ‘शक्ति की भूख’ की कहानी भी कहता है। पन्ना संख्या १० और ३१ पर विलेन ‘किंग’ और ‘नागमणि’ के बीच का संवाद साफ दिखाता है कि उनके लिए दुनिया की तबाही भी बस एक बिजनेस है।
‘वेनम फ्यूल’ (Venom Fuel) के जरिए लेखक ने आज के ऊर्जा संकट पर तीखी टिप्पणी की है। जब प्राकृतिक संसाधन खत्म होने लगते हैं, तो इंसान किस हद तक गिर सकता है—यही इस कहानी का असली आधार है। नागदंत और नागमणि जैसे पात्रों का लालच यह दिखाता है कि जब विज्ञान नैतिकता से अलग हो जाता है, तो वह ‘फ्यूल’ के रूप में सिर्फ विनाश ही पैदा करता है।
रहस्यमयी अजनबी: नायक की पहचान पर लगा बड़ा सवाल

पूरी कॉमिक में सबसे ज्यादा चर्चा जिस चीज की होती है, वह है वह ‘अजनबी’ (Stranger) जो नागराज जैसा दिखता जरूर है, लेकिन उसकी शक्तियाँ अलग नजर आती हैं। पन्ना संख्या ३३ से ४५ तक हम उसे महानगर की रक्षा करते हुए देखते हैं। वह नागराज की तरह काम करता है, लेकिन वह ‘इच्छाधारी’ नहीं लगता। वह आग से लड़ता है, विशाल ‘ग्लोब’ (Globe) को गिरने से बचाता है और ड्रैगनॉइड्स (Dragon-noids) से भिड़ जाता है।
इस किरदार के चारों ओर एक ‘देवदूत’ (Angel) या ‘डेविल’ (Devil) जैसा रहस्यमय एहसास बना रहता है। भारती और विसर्पी भी उसे पहचान नहीं पातीं। क्या वह नागराज की आत्मा है? क्या वह उसका कोई क्लोन है? या फिर कोई और है जो नागराज के नाम का इस्तेमाल कर रहा है? पन्ना संख्या ४६ पर विसर्पी का उसे ‘बंधनों’ में जकड़ना और उसका अचानक गायब हो जाना इस रहस्य को और भी गहरा बना देता है।
दृश्यों का महाकुंभ: अनुपम सिन्हा की तूलिका का जीवंत प्रदर्शन

अगर ‘फ्यूल’ को एक शानदार विजुअल अनुभव कहा जाए, तो इसका सबसे बड़ा श्रेय अनुपम सिन्हा को ही जाता है। पन्ना संख्या १५ और १६ पर महानगर पर हमला करते विशाल ड्रैगन का दृश्य सचमुच रोंगटे खड़े कर देता है—उसका आकार, उसकी दहकती आग और शहर में फैलती तबाही बेहद असरदार लगती है। वहीं पन्ना संख्या १७ और १८ पर हवा में रुका हुआ विशाल ग्लोब और उसे थामे खड़ा नायक भारतीय कॉमिक्स के सबसे यादगार पैनलों में गिना जा सकता है। इसके अलावा विसर्पी और भारती के चेहरों पर दिखती अनिश्चितता और दर्द बिना शब्दों के बहुत कुछ कह जाते हैं। अंधेरे दृश्यों में गहरे नीले-बैंगनी रंग और एक्शन दृश्यों में चटख नारंगी-पीले रंगों का इस्तेमाल कहानी की रफ्तार और मूड को पूरी तरह बनाए रखता है।
आतंक का नया चेहरा: ‘किंग’ का रणनीतिक दांव

इस सीरीज का मुख्य विलेन ‘किंग’ कोई साधारण अपराधी नहीं, बल्कि एक बेहद चालाक रणनीतिकार है। पन्ना संख्या ५२ और ५३ पर हम उसे ‘नागदंत’ के दिमाग से जानकारी निकालने की कोशिश करते देखते हैं। वह अच्छी तरह समझता है कि नागराज की असली ताकत सिर्फ उसके शरीर में नहीं, बल्कि उसके रहस्यमयी अतीत और उसके अलग-अलग रूपों में छिपी है।
किंग का किरदार यह साबित करता है कि खतरनाक दुश्मन वह नहीं होता जिसके पास सिर्फ बड़ी सेना हो, बल्कि वह होता है जो नायक के मन को पढ़ना जानता हो। उसका यह दावा—“नागराज तो मेरा कैदी है” (पन्ना ५९)—कहानी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करता है जहाँ पाठक सचमुच चौंक जाता है और आगे क्या होगा, यह जानने की उत्सुकता और बढ़ जाती है।
मनोवैज्ञानिक युद्ध: ‘सुसाइड-रे’ और इच्छाशक्ति की टक्कर

‘सुसाइड-रे’ का कॉन्सेप्ट इस पूरी सीरीज की रीढ़ जैसा है। यह साफ दिखाता है कि लड़ाइयाँ सिर्फ हथियारों से नहीं जीती जातीं। किंग का मानना है कि अगर वह नागराज की ‘जीने की इच्छा’ खत्म कर देगा, तो उसका शरीर खुद ही हार मान लेगा। लेकिन पन्ना संख्या ६ और ७ पर साफ नजर आता है कि नायक का कर्तव्य उसकी मौत की चाह पर भारी पड़ता है।
यह उपकथा अवसाद (Depression) और मानसिक संघर्ष का एक रूपक भी बनकर उभरती है। कहानी इशारा करती है कि जब इंसान के पास दूसरों की रक्षा करने जैसा बड़ा मकसद होता है, तो वह अपने अंदर के अंधेरे से भी लड़ सकता है और उसे हरा सकता है।
विसर्पी की वापसी और नागलोक पर मंडराता खतरा

विसर्पी की एंट्री कहानी में नई जान डाल देती है। पन्ना संख्या ४३ और ४४ पर उसका युद्ध कौशल साफ बता देता है कि वह सिर्फ एक राजकुमारी नहीं, बल्कि एक मजबूत योद्धा भी है। नागलोक पर मंडराता खतरा और इच्छाधारी नागों का शिकार होना यह दिखाता है कि यह जंग सिर्फ महानगर तक सीमित नहीं रहने वाली।
‘नागमणि’ का नागलोक की राजकुमारी को बंधक बनाने का सपना और इच्छाधारी नागों का जहर चूसने की उसकी योजना कहानी में फैंटेसी और पौराणिकता का मजबूत तड़का लगाती है। इससे साफ महसूस होता है कि जैसे ही रक्षक कमजोर पड़ा है, शिकारी चारों तरफ से सक्रिय हो गए हैं।
संवादों की गहराई: दार्शनिकता और वीरता साथ-साथ

जॉली सिन्हा के संवाद इस कॉमिक की असली ताकत हैं। पन्ना संख्या २ पर नागराज के बारे में कही गई पंक्ति—“नागदेव कालजयी के विष ने एक बालक को मरणासन्न कर दिया, लेकिन उसी विष ने उसे दिया नवजीवन…”—पाठक को नागराज के गौरवशाली अतीत की याद दिला देती है।
रहस्यमयी अजनबी के संवाद कम शब्दों में भी गहरा असर छोड़ते हैं, जबकि विलेन के संवादों में भरा अहंकार और क्रूरता उन्हें और डरावना बना देती है। “persuasion” और “demonstration” जैसे शब्दों का इस्तेमाल (पन्ना २७-२८) कहानी को एक आधुनिक और वैश्विक फील देता है, जिससे यह सिर्फ पारंपरिक सुपरहीरो कॉमिक न रहकर एक बड़े कैनवास वाली कथा बन जाती है।
अंतिम धमाका: एक दहला देने वाला रहस्योद्घाटन
कॉमिक का अंत (पृष्ठ ५८-५९) सचमुच जोरदार झटका देता है। अब तक जिस ‘अजनबी’ को पाठक नागराज समझकर राहत महसूस कर रहे थे, उसके पीछे की सच्चाई कहीं ज्यादा डरावनी निकलती है। आख़िर में असली नागराज को मशीनों से जकड़ा हुआ और बेसुध हालत में देखना पाठकों को पूरी तरह स्तब्ध कर देता है।
यह क्लाइमेक्स साफ बता देता है कि अब तक हमने जो कुछ देखा, वह किसी बहुत बड़े खेल का बस छोटा सा हिस्सा था। “क्या है यह रहस्य?”—यह सवाल पाठक के मन में ऐसा अटकता है कि वह अगले भाग ‘वीनॉम’ (Venom) पढ़ने के लिए बेचैन हो जाता है। यह एक दमदार एंडिंग है जो इस कॉिक को सच में ‘मस्ट-रीड’ बना देती है।
समीक्षात्मक निष्कर्ष: क्यों “फ्यूल” एक अनिवार्य कृति है?
“फ्यूल” सिर्फ ‘नागराज के बाद’ की अगली कड़ी भर नहीं है, बल्कि यह नागराज के किरदार को एक नए आयाम में ले जाती है। यह कॉमिक हमें बताती है कि नायक कभी सच में खत्म नहीं होता, वह बस समय के साथ अपना रूप बदल लेता है। कहानी में राजनीति, विज्ञान, लालच और वीरता का जो मिश्रण दिखता है, उसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना आसान नहीं है।
इसकी सबसे बड़ी ताकत है—रहस्य और रोमांच का बढ़िया संतुलन, नए और पुराने पात्रों का शानदार मेल, अनुपम सिन्हा की विश्वस्तरीय कला, और ऊर्जा संकट जैसे असली मुद्दे को सुपरहीरो फैंटेसी के साथ जोड़ने की कोशिश। हाँ, कहानी थोड़ी जटिल जरूर है, इसलिए कुछ नए पाठकों को इसे पूरी तरह समझने के लिए ‘नागराज के बाद’ फिर से देखना पड़ सकता है। लेकिन एक सच्चे राज कॉमिक्स फैन के लिए यह कमी नहीं, बल्कि मजेदार चुनौती बन जाती है।
निष्कर्ष:
‘फ्यूल’ ऐसी कॉमिक है जो पढ़ने के बाद दिमाग में देर तक घूमती रहती है। यह सिर्फ नागराज की लड़ाई नहीं, बल्कि हर उस इंसान की लड़ाई का प्रतीक है जो अंधेरे के बीच भी रोशनी ढूँढता रहता है। अगर आप भारतीय कॉमिक्स के स्वर्ण युग वाली फील पाना चाहते हैं, तो यह गाथा आपके कलेक्शन में जरूर होनी चाहिए। राज कॉमिक्स ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनके पास कहानियों का ऐसा ‘फ्यूल’ है जो जल्दी खत्म होने वाला नहीं है।
