आज हम जिस कॉमिक्स की समीक्षा कर रहे हैं, उसका नाम है— “हत्याकांड”। यह कॉमिक्स सिर्फ एक साधारण मर्डर मिस्ट्री नहीं है, बल्कि लालच, धोखे और मौत के बाद मिलने वाले बदले की एक गहरी और भावनात्मक कहानी है। नाज़रा अज़हर द्वारा लिखी गई और आदिल खान के शानदार चित्रों से सजी यह कॉमिक्स शुरू से लेकर आखिर तक पाठकों को अपने साथ बाँधे रखती है।
कथानक का परिचय और विश्वासघात की शुरुआत:
कहानी की शुरुआत होती है अलहबीबा कैफे हाउस से, जहाँ चार दोस्त—जुगनू, रूबी, कोका-कोला और बिल्लू—एक खतरनाक योजना पर बात कर रहे होते हैं। ये चारों ही गलत रास्ते पर चलने वाले युवक-युवतियाँ हैं और इनका सिर्फ एक ही सपना है—जल्दी से अमीर बनना। उसी जगह शालू नाम की एक लड़की भी मौजूद है, जो इन सब पर पूरा भरोसा करती है। शालू, प्रोफेसर अमरजीत की बेटी है, जिनके पास प्राचीन वस्तुओं का एक बड़ा म्यूजियम है।

जुगनू, जो इस गिरोह का सबसे चालाक और दिमागी आदमी है, शालू को अपनी मीठी बातों में फंसा लेता है। वह उसे समझाता है कि उसे एक तांत्रिक क्रिया के लिए उसके पिता के म्यूजियम से एक पुरानी खोपड़ी चाहिए। सीधी-सादी शालू दोस्ती निभाने के चक्कर में उसकी बातों में आ जाती है और म्यूजियम की चाबी की एक नकली कॉपी उसे दे देती है। यहाँ लेखक ने बहुत अच्छे तरीके से यह दिखाया है कि अंधा भरोसा किस तरह इंसान को बर्बादी की तरफ ले जाता है।
म्यूजियम की रात और अपराध का जन्म:
कहानी का दूसरा हिस्सा रात के अंधेरे में शुरू होता है, जब ये चारों म्यूजियम में घुसते हैं। यहीं पाठक समझ पाते हैं कि जुगनू का असली मकसद खोपड़ी नहीं, बल्कि म्यूजियम में रखे करोड़ों के कीमती अवशेष चुराना था। जैसे ही चोरी शुरू होती है, अचानक शालू वहाँ पहुँच जाती है। उसे अपनी गलती का एहसास होता है और वह इन सबका विरोध करती है।
यहीं कहानी एक खतरनाक मोड़ लेती है। चोरी पकड़े जाने के डर और लालच में डूबा जुगनू शालू का गला घोंट देता है। सिर्फ इसलिए एक मासूम लड़की की जान ले ली जाती है, क्योंकि उसने सही और गलत का फर्क समझ लिया था। उसकी लाश को छिपाने के लिए वे उसे एक मम्मी के ताबूत में बंद कर देते हैं। यह दृश्य रोंगटे खड़े कर देता है—एक जिंदा लड़की अब मम्मी बन चुकी होती है।
रहस्यमयी हत्याएं और डर का साया:
अपराध करने के बाद ये चारों सोचते हैं कि अब वे बच जाएंगे, लेकिन कानून और किस्मत दोनों का हिसाब अलग होता है। जब वे स्मगलर कास्त्रो से मिलने जाते हैं, तो पता चलता है कि वह पहले ही पुलिस के हत्थे चढ़ चुका है। अब चोरी का माल भी इनके गले की फाँस बन जाता है।

इसके बाद कहानी एक सच्चे हॉरर-थ्रिलर में बदल जाती है। एक-एक करके इन चारों की अजीब और डरावनी तरीके से मौत होने लगती है।
बिल्लू की मौत: सबसे पहले बिल्लू को उसके कमरे में एक मम्मी जैसी आकृति दिखाई देती है। वह कोई और नहीं, बल्कि शालू की आत्मा होती है, जो मम्मी के रूप में वापस आई होती है। उसके हाथ में पकड़ी एक पुरानी कुल्हाड़ी से वह बिल्लू को बेरहमी से मार देती है।
रूबी का अंत: अपनी जान बचाने के लिए रूबी कार लेकर भागती है, लेकिन मम्मी अचानक उसकी कार की पिछली सीट पर प्रकट हो जाती है। डर के मारे रूबी कार से नियंत्रण खो देती है और एक बिजली के ट्रांसफॉर्मर से टकराकर उसकी मौके पर ही दर्दनाक मौत हो जाती है।
इन सभी घटनाओं की जाँच कर रहे होते हैं इन्स्पेक्टर आमिर खान, जो एक तेज-तर्रार और समझदार पुलिस अधिकारी हैं। वे इस बात से हैरान होते हैं कि हर हत्या के पीछे कोई न कोई डरावना और अलौकिक संकेत क्यों मिल रहा है।
क्लाइमेक्स और आत्मा का विलाप:
कहानी का आखिरी हिस्सा बेहद भावुक और नाटकीय है। गिरोह का आखिरी सदस्य कोका-कोला समझ जाता है कि अब उसकी जान भी खतरे में है। जुगनू को पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी होती है। इन्स्पेक्टर खान को शक होता है कि कहीं शालू के पिता प्रोफेसर अमरजीत ही मम्मी बनकर बदला तो नहीं ले रहे। वे उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं।

लेकिन असली सच इससे भी ज़्यादा डरावना और दिल तोड़ने वाला होता है। यह कोई इंसान नहीं, बल्कि शालू की भटकती हुई आत्मा होती है। अंतिम पन्नों में शालू की आत्मा सामने आती है। वह अपने पिता से मिलती है और इन्स्पेक्टर खान को बताती है कि कैसे उसके अपने दोस्तों ने उसे धोखा दिया और बेरहमी से मार डाला।
शालू की आत्मा अपने पिता से कहती है—
“डैडी, मैंने आपकी सारी चीजें वापस कर दी हैं। अब आप मेरी लाश को उस मम्मी केस से निकालकर मेरा अंतिम संस्कार कर दीजिए, ताकि मुझे शांति मिल सके।”
यह संवाद पाठकों की आँखें नम कर देता है। एक बेटी मरने के बाद भी अपने पिता और उनके सम्मान की चिंता करती है। यही इस कॉमिक्स की सबसे बड़ी ताकत और भावनात्मक जीत है।
पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण:
शालू: शालू मासूमियत और भरोसे की मिसाल है। उसकी सबसे बड़ी गलती यही थी कि उसने गलत लोगों को अपना दोस्त मान लिया। मरने के बाद उसका रूप भले ही डरावना हो जाता है, लेकिन उसका मकसद सिर्फ और सिर्फ इंसाफ पाना होता है। वह बदले से ज़्यादा न्याय की प्रतीक बनकर सामने आती है।

जुगनू और गिरोह: ये सभी पात्र समाज के उस तबके को दिखाते हैं, जो पैसे और ऐश के लिए किसी की जान लेने से भी पीछे नहीं हटते। जुगनू की चालाकी, लालच और वक्त आने पर उसकी घबराहट को लेखक ने बहुत सटीक तरीके से उभारा है, जिससे उसका असली चेहरा साफ नजर आता है।
प्रोफेसर अमरजीत: वे एक ऐसे पिता हैं, जो अंदर से पूरी तरह टूट चुके हैं। बेटी की मौत का दर्द और उसका विलाप पाठक के दिल को छू जाता है और कहानी को भावनात्मक गहराई देता है।
इन्स्पेक्टर आमिर खान: वे पूरी तरह तर्क और सबूतों पर भरोसा करने वाले पुलिस अधिकारी हैं, लेकिन शालू का मामला उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि इस दुनिया में विज्ञान और कानून से परे भी कुछ सच हो सकते हैं।
कला और चित्रांकन (Artwork Analysis):

आदिल खान का चित्रांकन इस कॉमिक्स की सबसे बड़ी ताकत है। किंग कॉमिक्स की पहचान हमेशा से उनके मजबूत और यादगार कैरेक्टर डिज़ाइन रहे हैं, और यह कॉमिक्स भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है।
मम्मी का चित्रण: पट्टियों में लिपटी शालू की आत्मा, जिसकी आँखों में बदले की आग साफ दिखती है, बहुत प्रभावशाली तरीके से बनाई गई है और डर का माहौल पैदा करती है।
हत्या के दृश्य: बिल्लू पर कुल्हाड़ी से किया गया हमला और रूबी की कार का एक्सीडेंट—इन दोनों दृश्यों में लाल रंग और शैडो वर्क का इस्तेमाल कहानी के थ्रिल और डर को और बढ़ा देता है।

म्यूजियम का वातावरण: प्राचीन मूर्तियों, ताबूतों और अंधेरे गलियारों के बीच बना सस्पेंस पाठकों को एक अलग ही रहस्यमयी दुनिया में ले जाता है।
लेखन और संवाद:
नाज़रा अज़हर का लेखन कसा हुआ और तेज़ रफ्तार है। कहानी कहीं भी बोझिल या धीमी नहीं लगती। हर पन्ने पर कोई नया रहस्य या नया डर पाठकों का इंतजार करता है। संवाद सरल हैं, लेकिन असरदार हैं। खासतौर पर शालू के आखिरी शब्द और गिरोह के सदस्यों के बीच की आपसी नोक-झोंक उनके किरदारों को साफ-साफ सामने रख देती है।
समीक्षात्मक निष्कर्ष:
“हत्याकांड” सिर्फ एक डरावनी कहानी नहीं है, बल्कि यह एक गहरा मोरल लेसन भी देती है। यह सिखाती है कि अपराध चाहे कितना भी छुपाया जाए, वह कभी न कभी सामने जरूर आता है—भले ही उसे मिस्र के प्राचीन ताबूतों के नीचे क्यों न दबा दिया जाए। यह भरोसे और धोखे के बीच की उस पतली रेखा को दिखाती है, जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं।
इस कॉमिक्स की सबसे बड़ी ताकत इसका अंत है। आम तौर पर हॉरर कहानियाँ डर पर खत्म हो जाती हैं, लेकिन यहाँ कहानी करुणा और शांति के भाव के साथ समाप्त होती है। शालू की आत्मा का शांत होना और एक पिता का अपनी बेटी के लिए रोना पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ता है।
अगर आप क्लासिक भारतीय कॉमिक्स के शौकीन हैं और मम्मी से जुड़े रहस्यों में दिलचस्पी रखते हैं, तो किंग कॉमिक्स की यह प्रस्तुति आपको बिल्कुल निराश नहीं करेगी। अपने समय में यह एक साहसी कहानी थी, जिसने अलौकिक डर को मानवीय भावनाओं के साथ बहुत खूबसूरती से जोड़ा।
