राज कॉमिक्स की इस कालजयी त्रयी का अंतिम और सबसे गहन अध्याय, ‘महायुद्ध’ (संख्या 112), न केवल एक निर्णायक लड़ाई है, बल्कि मानवीय अहंकार, दैवीय हस्तक्षेप, और परम बलिदान की एक मार्मिक गाथा है। संजय गुप्ता द्वारा लिखित और कदम स्टूडियो द्वारा चित्रांकित यह विशेषांक पिछली गाथाओं—’भोकाल’, ‘कपालिका’ और ‘कलंका’—की कथा को महारावण और उसके भाई हिमराज के साथ चरम पर पहुँचाता है।
यह अंक, अपनी भव्यता और नाटकीयता में, मात्र एक कॉमिक्स से अधिक है; यह महाबली भोकाल के चरित्र-विकास का अंतिम चरण है, जहाँ उसे अपने ही दंभ से लड़ना पड़ता है। वहीं, वृद्ध रूपी हनुमान की भूमिका यहाँ एक गुप्त संरक्षक से बढ़कर एक गुरु और मार्गदर्शक की बन जाती है, जिसके मौन त्याग और रणनीति से ही मानवता की जीत संभव हो पाती है।
शीर्षक और आवरण: अहंकार और टकराव
‘महायुद्ध’ का शीर्षक ही कहानी के विशाल दायरे को स्पष्ट करता है। आवरण पृष्ठ पर, भोकाल को अपने पिता पवनदेव (या शायद स्वयं पवनदेव से उत्पन्न प्रचंड वायु शक्ति का प्रतिरूप) से संघर्ष करते हुए दिखाया गया है, जबकि पृष्ठभूमि में भगवान राम अपने दिव्यास्त्रों के साथ खड़े हैं। यह दृश्य कहानी के मुख्य विषय—महाबली का अपने ही गुरु/पिता (हनुमान/पवनदेव) के साथ वैचारिक संघर्ष—को स्पष्ट करता है। मुखपृष्ठ पर भोकाल के प्रतिरूप के हाथों में त्रिशूल, गदा और खडग जैसे दिव्यास्त्रों का होना, और नीचे दंभ से भरा उसका आत्मविश्वास, आगामी अहंकार की पराजय की ओर संकेत करता है।

कदम स्टूडियो का चित्रांकन इस अंक में चरम भव्यता और सूक्ष्म भावनात्मक अभिव्यक्ति का संगम है। हिमखंडों का टूटना, ज्वालामुखी का फूटना, और पात्रों के चेहरे पर क्रोध, दंभ या चिंता के भाव—सब कुछ अत्यंत जीवंत और प्रभावशाली है।
कथा-वस्तु का गहन विश्लेषण: दंभ, गुरु-शिष्य परंपरा और बलिदान
‘महायुद्ध’ की कथा-वस्तु तीन प्रमुख चरणों में विकसित होती है: भोकाल का दंभ, महारावण की मायावी रणनीति, और देवताओं का हस्तक्षेप।
भोकाल का अहंकार और आत्म-विनाश
कहानी का आरंभ भोकाल के अप्रत्याशित दंभ से होता है। कलंकिनी पर विजय प्राप्त करने के बाद, वह अपने साथियों—भीलराज, अतिक्रूर और धनुषा—के योगदान को नकारता हुआ कहता है कि महाबली को किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं होती। यह भोकाल के चरित्र में एक घातक दोष के रूप में उभरता है, जिसे वृद्ध रूपी हनुमान तुरंत पहचान लेते हैं।
इधर, महारावण को अपनी बहन कलंकिनी और उसके साथियों (मृत्युजीत, कपालिका) की मृत्यु का समाचार मिलता है। कपट गुरु तुषाराचार्य की सलाह पर, महारावण का भाई हिमराज अपनी छद्म-मृत्यु त्यागकर, भोकाल के अहंकार का लाभ उठाने की योजना बनाता है। हिमराज की रणनीति भोकाल के दंभ को चुनौती देकर उसे शारीरिक द्वंद्व में उलझाना है। भीलराज पर विजय पाने के बाद, भोकाल का अहंकार और बढ़ जाता है, जिससे वह आत्म-हत्या के कगार पर पहुँच जाता है। भीलराज के हाथों पराजित होकर, भोकाल अपने ‘अपमान’ से इतना आहत होता है कि वह अपने प्राण त्यागने के लिए अपनी ही तलवार अपने सीने में घोंप लेता है।

यह मोड़ कहानी का सबसे गहन भावनात्मक क्षण है, जहाँ नायक का सबसे बड़ा शत्रु कोई बाहरी दानव नहीं, बल्कि उसका अपना अहंकार सिद्ध होता है।
हनुमान का गुप्त गुरुत्व और दिव्यास्त्रों का त्याग:
भोकाल के आत्मघाती कदम से ठीक पहले, हनुमान अपने वास्तविक ‘बजरंगी’ रूप में प्रकट होते हैं। उनका क्रोध भोकाल के शरीर को नहीं, बल्कि उसके ‘अहंकार’ को भस्म करता है। हनुमान उसे समझाते हैं कि सच्चा वीर अपने शरीर का नहीं, बल्कि अपने अहंकार का त्याग करता है। हनुमान के मार्गदर्शन से भोकाल पुनर्जीवित हो जाता है और उसे एहसास होता है कि वह एक ‘स्वप्न’ में था, जिसे हनुमान ने ही उसके अहंकार को तोड़ने के लिए रचा था।

इसके बाद, हिमराज (वास्तविक) अपनी मायावी शक्तियों से हिम-चट्टानों की वर्षा करता है। भोकाल, धनुषा और अतिक्रूर इस संकट से लड़ते हैं, लेकिन यह हिमराज की रणनीति का पहला चरण है। हिमराज और तुषाराचार्य अपनी ‘कपट माया’ से भोकाल और उसके साथियों को भ्रमित करते हैं (जैसे धनुषा और अतिक्रूर का भटक जाना, भील सेना का हिम-चट्टानों में दबना, अतिक्रूर का प्यास से जर्जर होना, और वृद्ध की हत्या का भ्रम)।
हिमराज, पवनदेव और यमराज का महासंग्राम:
तुषाराचार्य की माया से भ्रमित अतिक्रूर प्यास के आवेश में आकर, वृद्ध रूपी हनुमान द्वारा फेंके गए जल के मश्क को छीनने के प्रयास में एक निर्बल वृद्ध (तुषाराचार्य की माया) की हत्या कर देता है। यह भोकाल की तरह अतिक्रूर के चरित्र पर भी एक भावनात्मक दाग लगाता है, जो उसे ग्लानि से भर देता है।
हिमराज को परास्त करने के लिए भोकाल, हनुमान की रणनीति पर, अपने पिता पवनदेव का आह्वान करता है। पवनदेव ब्रह्मा के वरदान के कारण महारावण और उसके भाइयों के विरुद्ध सीधा युद्ध नहीं कर सकते, लेकिन वह वायु के प्रचंड वेग से भोकाल की मदद करते हैं। पवनदेव को रोकने के लिए हिमराज, यमराज का आह्वान करता है। यमराज का ‘मृत्युदण्ड’ भोकाल पर प्रहार करता है, जिसे भोकाल अपने दिव्यास्त्रों की शक्ति से निष्प्रभावी कर देता है, लेकिन इस प्रक्रिया में वह स्वयं धराशायी हो जाता है।
सूर्य का अंतिम बलिदान
कहानी का अंतिम और सबसे नाटकीय मोड़ तब आता है जब भोकाल, पराजित होकर, अपनी पूरी सेना और साथियों (भील सेना, अतिक्रूर, धनुषा) को महारावण की सेना से बचाने के लिए, हिमराज को उठाकर सूर्य की ओर उड़ चलता है—वह स्थान जहाँ हिमराज की शक्ति शून्य हो जाती है।
सूर्य देव, महारावण और हनुमान की दो परस्पर विरोधी चेतावनियों के बीच फंस जाते हैं:

महारावण की चेतावनी: यदि सूर्य के ताप से हिमराज को आँच आई, तो सूर्य को महारावण के क्रोध का भाजन बनना पड़ेगा (चूँकि महारावण ने सूर्य को विवश किया था)।
हनुमान की चेतावनी: यदि सूर्य ने भोकाल की मदद नहीं की, तो हनुमान स्वयं सूर्य को निगल लेंगे।
इस भीषण नैतिक और अस्तित्वगत द्वंद्व में, सूर्य देव का कठोर चेहरा पड़ जाता है—वह अपना निर्णय लेते हैं। सूर्य देव मानवता के रक्षक भोकाल के साथ खड़े होने का निर्णय लेते हैं। इस निर्णय का परिणाम होता है—सूर्य के प्रचंड ताप से हिमराज वाष्प बन जाता है, और भोकाल भी उसके साथ ही ऊर्जा के प्रचंड टकराव से बेहोश होकर नीचे गिर जाता है।
परम बलिदान और समापन
अंतिम पृष्ठ पर, सूर्य देव अपने निर्णय पर कहते हैं, “मैं महारावण के कोप का भोजन बनने के लिए तैयार हूं। मानवता और देवता के हितों के लिए जब भोकाल जैसा मनुष्य अपना अस्तित्व दावं पर लगाये हुए है तो भला मैं देव होकर पीछे क्यों रहूं।” सूर्य यहाँ देवताओं की मर्यादा का त्याग कर, धर्म और मानवता के लिए व्यक्तिगत बलिदान की सर्वोच्च मिसाल पेश करते हैं।

हनुमान बेहोश भोकाल को अपने रथ पर बैठाकर आकाश की ओर चले जाते हैं। इस प्रकार, ‘महायुद्ध’ का समापन भौतिक जीत के साथ-साथ नैतिक विजय और त्याग के उच्च आदर्शों की स्थापना के साथ होता है।
पात्रों और विषयों का महत्व
दंभ का विषय: इस कॉमिक्स का सबसे बड़ा विषय ‘अहंकार’ है। यह दिखाता है कि महाबली होना पर्याप्त नहीं है; सच्चा बल विनम्रता और त्याग में होता है। भोकाल का अहंकार ही उसे मृत्यु के द्वार तक ले जाता है।
गुरु-शिष्य/देवता-भक्त संबंध: हनुमान यहाँ गुरु और रक्षक दोनों हैं। उनकी रणनीति दिव्यास्त्रों या बल पर नहीं, बल्कि भोकाल के चरित्र-दोष को ठीक करने पर केंद्रित है। उनकी गुप्त सहायता भक्त को विजयी बनाने के लिए देवों द्वारा नियम तोड़ने की अंतिम सीमा को दर्शाती है।

नैतिक बलिदान (Moral Sacrifice): अतिक्रूर का प्यास के आवेश में आकर निर्बल की हत्या करना, भोकाल का अपने अहंकार को मारना, और सबसे बढ़कर सूर्य देव का महारावण के कोप से भी ऊपर मानवता के लिए खड़ा होना—ये सब इस अंक को एक गहरा नैतिक और दार्शनिक आयाम प्रदान करते हैं।
महारावण और कपट गुरु तुषाराचार्य: ये दोनों खलनायक यहाँ छल, माया और क्रूरता के प्रतीक हैं। तुषाराचार्य की ‘कपट माया’ अत्यंत घातक है, जो नायक को शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक और नैतिक रूप से नष्ट करती है।
निष्कर्ष
‘महायुद्ध’ राज कॉमिक्स की इस गाथा का एक उत्कृष्ट और परिपक्व निष्कर्ष है। संजय गुप्ता ने सफलतापूर्वक एक ऐसे महानायक की कहानी को जटिलता से बुना है, जिसकी सबसे बड़ी लड़ाई उसे स्वयं से लड़नी पड़ी। कदम स्टूडियो की कला ने इस भावनात्मक और पौराणिक संघर्ष को भव्यता प्रदान की है। यह कॉमिक्स इस बात का प्रमाण है कि भारतीय कॉमिक्स में केवल एक्शन ही नहीं, बल्कि गहन चरित्र-विकास और नैतिक शिक्षा का भी समावेश रहा है। भोकाल का अहंकार टूटा, हनुमान की रणनीति सफल हुई, और सूर्य का बलिदान मानवता की सर्वोच्च जीत बन गया।
