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Home » प्लैनेट ऑफ़ द एप्स फ़िल्म शृंखला की पूरी टाइमलाइन: कहानी के सही क्रम में समझिए
Don't Miss Updated:14 December 2025

प्लैनेट ऑफ़ द एप्स फ़िल्म शृंखला की पूरी टाइमलाइन: कहानी के सही क्रम में समझिए

1968 की क्लासिक से लेकर Kingdom of the Planet of the Apes तक — वानरों और इंसानों की उलझी हुई लेकिन दमदार कहानी
ComicsBioBy ComicsBio14 December 2025Updated:14 December 202509 Mins Read
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Planet of the Apes Timeline Hindi | पूरी फ़िल्म शृंखला सही क्रम में
यह लेख प्लैनेट ऑफ़ द एप्स फ़िल्म शृंखला की पूरी टाइमलाइन को कहानी के सही क्रम में समझाता है, जिसमें क्लासिक फ़िल्में, प्रीक्वल त्रयी, टिम बर्टन की 2001 की फ़िल्म और नई Kingdom of the Planet of the Apes शामिल हैं।
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‘प्लैनेट ऑफ़ द एप्स’ फ़िल्म शृंखला की टाइमलाइन थोड़ी पेचीदा मानी जाती है। हाल के समय में आई फ़िल्म किंगडम ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (Kingdom of the Planet of the Apes) और साल 2001 में बनी टिम बर्टन की फ़िल्म ने इस उलझन को और बढ़ा दिया है। एक तरफ़ चार्ल्सटन हेस्टन वाली पुरानी फ़िल्में हैं, तो दूसरी तरफ़ एंडी सर्किस के दौर की नई प्रीक्वल त्रयी (trilogy)। दोनों ही दौर की कहानियाँ अपनी जगह काफ़ी गहरी और सोचने पर मजबूर करने वाली हैं।
यह फ़िल्म शृंखला साइंस-फ़िक्शन की दुनिया की सबसे मशहूर शृंखलाओं में से एक है। इसकी पहली फ़िल्म प्लैनेट ऑफ़ द एप्स 1968 में रिलीज़ हुई थी, जो फ्रांसीसी लेखक पियरे बूले के उपन्यास “ला प्लैनेट डेस सिंग्स” (La Planète des Singes) पर आधारित थी।
कई बार रीबूट और सीक्वल आने के बावजूद, ‘प्लैनेट ऑफ़ द एप्स’ फ़िल्मों ने अपनी एक जुड़ी हुई कहानी बनाए रखी है, भले ही फ़िल्में हमेशा रिलीज़ के क्रम में कहानी न सुनाती हों।
अभी तक ‘प्लैनेट ऑफ़ द एप्स’ टाइमलाइन में कुल दस फ़िल्में शामिल हैं। शुरुआती फ़िल्में एक ऐसे भविष्य की पृथ्वी दिखाती हैं जहाँ इंसान लगभग जंगली हालत में पहुँच चुके हैं और वानर एक समझदार और व्यवस्थित समाज बना चुके हैं। लेकिन यह दिखाने के लिए कि वानर इस मुकाम तक कैसे पहुँचे, 2011 में आई फ़िल्म राइज़ ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (Rise of the Planet of the Apes) कहानी को पीछे ले जाती है।

आज की तेज़ रफ्तार सर्वाइवल एक्शन फ़िल्मों से लेकर 1970 और 80 के दशक की सोचने वाली साइंस-फ़िक्शन तक, ‘प्लैनेट ऑफ़ द एप्स’ फ़िल्मों को अगर कहानी के सही क्रम में देखा जाए, तो यह सफ़र और भी मज़ेदार हो जाता है।

बिनीथ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (Beneath The Planet Of The Apes)

हालाँकि ‘प्लैनेट ऑफ़ द एप्स’ की दुनिया अपने आप में तबाही से भरी लगती है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब ये फ़िल्में काफ़ी आगे की सोच रखती थीं। बिनीथ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स, पहली फ़िल्म की अगली कहानी है। इसमें एक नया अंतरिक्ष यात्री उन लोगों को खोजने आता है जो पहले इस ग्रह पर लापता हो चुके थे। लेकिन किस्मत उसके साथ भी कुछ खास अच्छा नहीं करती और उसे भी इसी अजीब ग्रह पर एक दर्दनाक अंत का सामना करना पड़ता है। फ़िल्म में आदिम इंसानों, समझदार वानरों और लगभग खत्म हो चुकी मानव सभ्यता के साथ रहने के हालात दिखाए गए हैं।
फ़िल्म की रफ्तार भले ही थोड़ी धीमी लगे, लेकिन कहानी लगातार आगे बढ़ती रहती है। पुराने इलाकों में लौटते हुए भी नए मोड़ आते हैं। जब नया अंतरिक्ष यात्री ब्रेंट, चार्ल्सटन हेस्टन के किरदार टेलर से मिलता है, तो दोनों मिलकर इंसानों और वानरों के बीच होने वाले भयानक युद्ध को रोकने की कोशिश करते हैं। ग्रह के पूरी तरह तबाह होने का खतरा, वानरों का धीरे-धीरे हिंसक स्वभाव अपनाना और अज्ञानता की वजह से खुद को ही खत्म कर लेना — ये सब मिलकर कहानी को एक मजबूत अगला पड़ाव बनाते हैं, जिसका अंत इतना चौंकाने वाला है कि दर्शक हिल जाते हैं और यह एहसास होता है कि शायद लोकतंत्र भी खतरे में है।

कॉन्क्वेस्ट ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (Conquest Of The Planet Of The Apes)

यहाँ जिस फ़िल्म की बात हो रही है, वह है “कॉन्क्वेस्ट ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स”। इस फ़िल्म का असर बाद में आई प्रीक्वल फ़िल्मों में भी साफ़ दिखाई देता है। कहानी उन समझदार वानरों पर आधारित है जिन्हें उनके भविष्य के माता-पिता पीछे छोड़ गए थे और जिन्हें इंसानों के हाथों बहुत ज़ुल्म सहना पड़ा। पिछली फ़िल्मों में जहाँ वानरों को पालतू जानवरों की तरह दिखाया गया था, वहीं इस फ़िल्म में सीज़र अपने माता-पिता की मौत के बाद इंसानों के खिलाफ़ खड़ा होने की तैयारी करता है और खुलकर विद्रोह की बात करता है।
भविष्य की दुनिया की नींव रखने वाली यह फ़िल्म एक तरह से यह भी दिखाती है कि कभी इंसान खुद भी गुलामी झेल चुके थे। इसी वजह से यह फ़िल्म पूरी त्रयी (trilogy) की सबसे ताक़तवर कड़ी मानी जाती है।

बैटल फ़ॉर द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (Battle for the Planet of the Apes) (1973)

‘प्लैनेट ऑफ़ द एप्स’ शृंखला की कहानी के हिसाब से आख़िरी फ़िल्म “बैटल फ़ॉर द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स” है। इसमें सीज़र और उसकी सेना आख़िरकार आज़ादी हासिल कर लेती है। फ़िल्म के अंत में सीज़र बदले और हिंसा के रास्ते को छोड़ देता है और इंसानों को माफ़ कर देता है। इसके बाद इंसान और वानर साथ रहने का फैसला करते हैं। यह फ़िल्म पूरी शृंखला में सबसे कम कमाई करने वाली साबित हुई। मशहूर फ़िल्म समीक्षक रोजर एबर्ट ने इसे “मरती हुई शृंखला की आख़िरी साँस” कहा था। खराब प्रतिक्रिया की वजह से यह फ़्रैंचाइज़ी कई सालों तक बंद पड़ी रही, जब तक कि 2001 में इसे फिर से ज़िंदा करने की कोशिश नहीं की गई।

एस्केप फ़्रॉम द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (Escape From The Planet Of The Apes)

एक ऐसा मोड़ जहाँ कहानी सच में अजीब लगने लगती है, वहाँ यह पता चलता है कि वानरों के ग्रह के नष्ट होने से पहले दो वानर वैज्ञानिक पृथ्वी से भाग चुके थे। जितना अजीब यह सुनने में लगता है, उतना ही अजीब उनका 1973 की पृथ्वी पर वापस आना भी है, जहाँ उन्हें पहले कभी अंतरिक्ष यात्री बनाकर भेजा गया था।
शुरुआत में इंसान इन वानरों का स्वागत करते हैं, लेकिन जल्द ही उन पर शक करने लगते हैं। इसके बावजूद वानर इंसानों पर भरोसा बनाए रखते हैं। शीत युद्ध के दौर में इस तरह की चालें और डर बहुत आम थे। नतीजा यह निकलता है कि इंसान खुद अपने विनाश की ओर बढ़ जाते हैं, जबकि वानर मरने से पहले अपने बच्चे को चिड़ियाघर में छिपा देते हैं। कहानी थोड़ी उलझी हुई ज़रूर है, लेकिन इसके विचार इस पूरी फ़्रैंचाइज़ी में सबसे मज़बूत माने जाते हैं।

द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (The Planet of the Apes)

निर्देशक टिम बर्टन की यह फ़िल्म 1968 की क्लासिक का रीमेक है, लेकिन इसके बारे में ज़्यादा अच्छा कहना मुश्किल है। कहानी वही पुरानी है — एक अंतरिक्ष यात्री, जिसे इस बार मार्क वाह्लबर्ग निभाते हैं, भविष्य की पृथ्वी पर गिर जाता है जहाँ वानर राज करते हैं और इंसान उनके अधीन होते हैं।
हाँ, 2001 की फ़िल्म के विशेष प्रभाव पुराने ज़माने की फ़िल्म से बेहतर हैं, लेकिन रबर जैसे कॉस्ट्यूम और कमजोर कहानी की वजह से यह फ़िल्म कोई खास असर नहीं छोड़ पाती। इसका अंत भी इतना उलझा हुआ है कि ‘ट्विस्ट’ समझ में ही नहीं आता। यह फ़िल्म पूरी टाइमलाइन में एक अलग और ज़रूरत से ज़्यादा लगने वाली कड़ी जैसी महसूस होती है।

वॉर फ़ॉर द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (War For The Planet Of The Apes)

प्रीक्वल त्रयी की तीसरी और आख़िरी फ़िल्म में हमें वह युद्ध दिखता है जिसने वानरों को पूरी तरह सत्ता तक पहुँचाया। यह फ़िल्म 1968 वाली कहानी से पहले की घटनाओं को जोड़ती है और कहानी के हिसाब से बिल्कुल सही जगह बैठती है। यह न सिर्फ़ एक त्रयी का अच्छा अंत है, बल्कि पूरी शृंखला के लिए भी एक मज़बूत जोड़ बनती है।

डॉन ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (Dawn of the Planet of the Apes)

‘प्लैनेट ऑफ़ द एप्स’ फ़िल्मों में एक बात हमेशा सामने आती है — वानर भी उतने ही अच्छे या बुरे हो सकते हैं जितने इंसान। इस विचार को हर फ़िल्म में दिखाया गया है, लेकिन डॉन ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स में यह सबसे ज़्यादा असरदार लगता है क्योंकि यह पूरी तरह युद्ध पर आधारित फ़िल्म है।
यह फ़िल्म इंसानों और वानरों दोनों को उनके अच्छे और बुरे रूप में दिखाती है। उनका टकराव सिर्फ़ रोमांचक नहीं है, बल्कि दिल तोड़ देने वाला भी है — और सबसे दुख की बात यह है कि इसे रोका जा सकता था।

राइज़ ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (Rise of the Planet of the Apes)

2011 में आई “राइज़ ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स” इस पूरी कहानी की शुरुआत करती है और 1968 की फ़िल्म से पहले की घटनाएँ दिखाती है। इसलिए यहाँ फ़िल्मों को रिलीज़ के क्रम में नहीं, बल्कि कहानी के क्रम में रखा गया है। यह फ़िल्म सीज़र नाम के एक चिंपैंजी की कहानी है, जिसकी बुद्धि वैज्ञानिक प्रयोगों से बढ़ा दी जाती है। लेकिन इन्हीं प्रयोगों की वजह से उसे और दूसरे वानरों को इंसानों की बेरहमी झेलनी पड़ती है, और यहीं से विद्रोह की शुरुआत होती है।
इस त्रयी की सबसे बड़ी ताक़त एंडी सर्किस का सीज़र के रूप में अभिनय है। मोशन कैप्चर तकनीक की मदद से उन्होंने सीज़र को ऐसा जीवंत बना दिया कि वह बिना ज़्यादा बोले भी सब कुछ महसूस करा देता है।
एंडी सर्किस ने सीज़र के किरदार के ज़रिए यह दिखाया कि इंसानियत के पतन की शुरुआत कैसे होती है।
यह फ़िल्म मौजूदा दौर में सेट है और इसमें जेम्स फ्रैंको, जॉन लिथगो, ब्रायन कॉक्स और फ्रीडा पिंटो जैसे कलाकार भी हैं, जो आगे आने वाले बड़े संघर्ष की नींव रखते हैं।

किंगडम ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स (Kingdom of the Planet of the Apes)

Planet Of The Apes Movies In Chronological Order, Let's Start

पहली फ़िल्म के बाद से ‘प्लैनेट ऑफ़ द एप्स’ की दुनिया में ढेर सारी कहानियाँ सामने आई हैं — जिनमें आठ फ़िल्में, किताबें, ग्राफिक नॉवेल और वीडियो गेम शामिल हैं। फ़िल्म शृंखला की नई कड़ी “किंगडम ऑफ़ द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स”, हाल की त्रयी की कहानी को आगे बढ़ाती है, जिसे पहले 20वीं सेंचुरी फॉक्स और अब 20वीं सेंचुरी स्टूडियोज़ ने बनाया है।
यह फ़िल्म 2011 से शुरू हुए रीबूट की चौथी कड़ी है। पहले हिस्सों में एंडी सर्किस ने सीज़र का किरदार निभाया था। बाद की फ़िल्मों में मैट रीव्स का अंदाज़ देखने को मिला, जो गहरे और भावुक विषयों को भी खुलकर दिखाता है। 60 और 70 के दशक की पुरानी फ़िल्मों से तुलना करें तो नई फ़िल्में ज़्यादा आधुनिक लगती हैं, लेकिन फिर भी उनमें पुरानी शृंखला वाली सादगी और आत्मा मौजूद है।
‘वॉर फ़ॉर द प्लैनेट ऑफ़ द एप्स’ के बाद की कहानी में, किंगडम एक युवा चिंपैंजी नूह (Noah) के सफ़र को दिखाती है। वह देखता है कि दुनिया में नए वानर कबीले उभर रहे हैं और इंसान फिर से जंगली हालत में पहुँच चुके हैं। वानरों का एक नेता प्रॉक्सिमस सीज़र (Proximus Caesar), सीज़र की सीख को गलत तरीके से इस्तेमाल कर दूसरे कबीलों को अपने क़ब्ज़े में ले लेता है, ताकि पुरानी मानव तकनीक हासिल कर सके। सीज़र की असली सोच को बचाने के लिए नूह, मे (May) नाम की एक लड़की के साथ मिलकर इस ज़ुल्म को खत्म करने और आज़ादी पाने की कोशिश करता है।

जिसमें क्लासिक फ़िल्में टिम बर्टन की 2001 की फ़िल्म और नई Kingdom of the Planet of the Apes शामिल हैं। प्रीक्वल त्रयी यह लेख प्लैनेट ऑफ़ द एप्स फ़िल्म शृंखला की पूरी टाइमलाइन को कहानी के सही क्रम में समझाता है
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