भारतीय कॉमिक्स की दुनिया में जब भी किसी कहानी में गंभीर, भावनात्मक और गहरे मतलब वाले विषयों को छूने की बात होती है, तो लेखक तरुणकुमार वाही का नाम अपने-आप सामने आ जाता है। और जब उस गहरी कहानी को अपनी ज़बरदस्त और चलती हुई लगने वाली ड्राइंग के ज़रिये पन्नों पर जगा देने की बात आती है, तो धीरज वर्मा जैसा कलाकार कोई दूसरा नहीं। “सलीब“ इन दोनों दिग्गजों का ऐसा काम है, जो “कोबी और भेड़िया” के फैंस के दिमाग में बहुत समय तक याद रहता है।
यह कोई साधारण कॉमिक्स नहीं है जहाँ एक सुपरहीरो किसी बाहर के विलेन से लड़ रहा हो। यह कहानी है किस्मत से लड़ने की, अपने ही अंदर छिपे डर और विनाश से जूझने की, और उस तबाही को रोकने की जिसका कारण खुद नायक के भीतर मौजूद है। यह कहानी है उस सलीब (Cross) की, जिसे सिर्फ भेड़िया और कोबी ही नहीं, बल्कि पढ़ने वाला भी भावनात्मक रूप से महसूस करता है।
कॉमिक्स की शुरुआत ही एक डरावनी भविष्यवाणी से होती है। हर पाँच हज़ार साल में एक ख़ास तरह का पुच्छल तारा (Comet) ब्रह्मांड से गुज़रता है, जिसकी ऊर्जा “भेड़िया-मानवों” के लिए जानलेवा होती है। यह ऊर्जा भेड़िया और कोबी दोनों को बेहद हिंसक और बेकाबू बना देती है, जिससे जंगल में भयानक तबाही मच जाती। इस विनाश को रोकने का सिर्फ एक ही, और वह भी बेहद कठोर तरीका है—दोनों को “दुर्दम लकड़ी” की सलीब पर ठोकना।
कथानक और कहानी का विश्लेषण
“सलीब” की कहानी किसी सीधी लाइन में नहीं चलती, बल्कि भावनाओं, सोच-विचार और कई मोड़ों से गुजरती है।
जेन का निर्णायक हस्तक्षेप

पहले ही पन्ने पर हम देखते हैं कि फूजो बाबा काँपते हाथों से भेड़िया को सलीब पर ठोंकने की तैयारी कर रहे हैं। भेड़िया अपने बलिदान के लिए तैयार है। तभी जेन वहाँ पहुँचती है और उन्हें रोक देती है। यहाँ तरुण वाही ने जेन को किसी कमज़ोर नायिका की तरह नहीं दिखाया, बल्कि एक तेज़ दिमाग वाली रणनीतिकार के रूप में पेश किया है।
जेन एक ऐसा तर्क देती है जो फूजो बाबा और भेड़िया, दोनों को हिला देता है। वह कहती है:
“अगर आपने भेड़िया को ठोंक दिया, तो फिर जंगल में ऐसी कौन–सी ताकत बचेगी जो कोबी जैसे महाबली और खूँखार प्राणी को काबू करके सलीब तक ले आएगी?”
यह बात पूरी कहानी को उलट देती है। सब अपनी गलती समझ जाते हैं। तय होता है कि पहले कोबी को पकड़ना होगा। उसे पहले सलीब पर ठोंकना होगा, और यह काम सिर्फ भेड़िया ही कर सकता है।
महाबली कोबी को थकाने की योजना

अब समस्या यह थी कि कोबी को सीधे भिड़कर हराना लगभग मुमकिन नहीं था—वो भी तब, जब समय बहुत कम था। जेन यहाँ एक शिकारी का उदाहरण देती है:
“शिकारी शेर को जिंदा पकड़ने के लिए उससे लड़ता नहीं, उसे भूखा–प्यासा रखकर थकाता है।“
यही बात पूरी कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा शुरू करती है। भेड़िया, जेन और फूजो बाबा पूरा जंगल इस योजना में शामिल कर लेते हैं। मकसद है—कोबी को भटका-भटका कर इतना थका देना कि वह काबू में आ जाए।
“बाजू” हाथी कीचड़ फेंककर उसे गुस्सा दिलाता है। कोबी उससे भिड़ने के लिए पीछे भागता है।
आगे हिरणों का झुंड उसका रास्ता रोक लेता है।
फिर एक विशाल अजगर उस पर टूट पड़ता है।
गैंडों का दल, चींटियों की सेना, साही के काँटे—जंगल का हर जीव उसके रास्ते में मुश्किलें खड़ी करता है।
यह पूरा हिस्सा धीरज वर्मा की ड्राइंग का कमाल है। हर पन्ना तेज़ एक्शन और कोबी की बढ़ती झुंझलाहट से भरा है। तरुण वाही यहाँ कोबी की मानसिक हालत को भी बखूबी दिखाते हैं—कोबी समझ ही नहीं पाता कि जंगल, जिसका वह खुद को राजा मानता है, अचानक उसके खिलाफ क्यों हो गया है। यह बात उसके अहंकार को चोट पहुँचाती है और वह और ज्यादा थक जाता है।
टकराव और क्रूर नियति
जब कोबी बहुत थक जाता है और लगभग गिरने की हालत में होता है, तभी भेड़िया उसके सामने आ जाता है। लेकिन कोबी, चाहे जितना थका हो, आसान प्रतिद्वंद्वी नहीं है। दोनों के बीच जोरदार लड़ाई होती है। भेड़िया की भेड़िया-फौज भी कोबी पर हमला करती है, और कोबी को यह सब किसी बड़ी चाल की तरह लगता है। आखिरकार भेड़िया किसी तरह उसे काबू में कर लेता है।

इसके बाद कहानी का सबसे दर्दनाक और डरावना हिस्सा आता है। कोबी को सलीब पर बाँध दिया जाता है। वह गुस्से और धोखे की भावना में दहाड़ता है, चिल्लाता है। वह जेन और फूजो बाबा को धमकाता है।
तभी जेन उसे पूरी सच्चाई बताती है—पुच्छल तारे के बारे में, आने वाली प्रलय के बारे में, और यह भी कि यह उसे मारने के लिए नहीं, बल्कि उसे और भेड़िया दोनों को बचाने के लिए किया जा रहा है। भेड़िया भी साफ कह देता है कि वह भी दूसरी सलीब पर चढ़ेगा।
फूजो बाबा काँपते हुए कोबी के हाथों में कीलें ठोकना शुरू करते हैं। कोबी की चीखें, जेन के बहते आँसू और भेड़िया की बेबसी—यह दृश्य सीधे दिल पर असर करता है।
प्रलय का आगमन और युमंतुओं का हमला
जैसे ही दोनों सलीब पर चढ़ते हैं, पुच्छल तारा पास आता है। आसमान से आग जैसी लपटें गिरने लगती हैं। जंगल के कबीले यह दृश्य देखकर घबरा जाते हैं। वे सोचते हैं कि फूजो बाबा ने उनके ‘भगवानों’—भेड़िया और कोबी—को मार दिया है। गुस्से में वे जेन और फूजो बाबा पर हमला कर देते हैं।
और यहीं कहानी में एक और बड़ा मोड़ आता है। अचानक जमीन फटती है और उसमें से “युमंतु” नाम के बड़े-बड़े राक्षस निकलते हैं। असली खतरा यही थे। वे कबीले वालों को बेरहमी से मारने लगते हैं।
अंतिम संग्राम और मुक्ति
पुच्छल तारे की वजह से भेड़िया और कोबी भी हिंसक रूप में बदल चुके थे, लेकिन अपने लोगों को मरता देखकर उनका गुस्सा युमंतुओं पर फूट पड़ता है। वे अपनी सलीबें तोड़कर आज़ाद हो जाते हैं।
यहाँ से कहानी का असली क्लाइमेक्स शुरू होता है। सलीब पर ठोंके हुए, खून से लथपथ भेड़िया और कोबी जब युमंतुओं पर टूटते हैं, तो वह दृश्य लड़ाई से ज्यादा नरसंहार जैसा लगता है। धीरज वर्मा ने इस फाइट को इतने खूँखार और दमदार अंदाज़ में बनाया है कि हर पन्ना जीवंत महसूस होता है। भेड़िया और कोबी का प्रलयंकारी रूप देखने लायक है।
अंत में, सूरज की पहली किरण फूटते ही पुच्छल तारे का असर खत्म हो जाता है। युमंतु मारे जा चुके होते हैं। भेड़िया और कोबी दोबारा अपने शांत रूप में लौट आते हैं। जंगल सुरक्षित बच जाता है।
चरित्र चित्रण (Character Analysis)
भेड़िया:
यह कहानी भेड़िया के ‘रक्षक’ वाले रूप को सबसे ऊपर ले जाती है। वह जंगल को बचाने के लिए खुद सलीब पर चढ़ने को तैयार है। साथ ही उसे अपने ही अंश—कोबी—को सलीब पर ठोंकने का दर्द भी सहना पड़ता है। इसमें भेड़िया का असली नायक वाला रूप सामने आता है।

कोबी:
“सलीब” का असली हीरो कोबी है। वह एक ‘ट्रैजिक हीरो’ है। ताकतवर है, अहंकारी है, लेकिन यहाँ वह किस्मत के जाल में फँस जाता है। उसे समझ नहीं आता कि उसके अपने ही उसके खिलाफ क्यों खड़े हैं। उसका गुस्सा, उसका दर्द, सलीब पर उसकी चीखें और अंत में एक रक्षक के रूप में उसका रूपांतरण—ये सब मिलकर उसे राज कॉमिक्स का सबसे गहरा और दिलचस्प किरदार बना देते हैं।
जेन:
जेन इस कहानी की दिमाग है। उसकी योजना के बिना सब कुछ बर्बाद हो जाता। तरुण वाही ने उसे सिर्फ प्रेमिका नहीं, बल्कि एक पार्टनर दिखाया है—जो भेड़िया की ताकत के साथ अपनी समझदारी से संतुलन बनाती है।
फूजो बाबा:
फूजो बाबा इस कहानी में ‘धर्म-संकट’ का प्रतीक हैं। एक ऐसे पिता जैसी शख्सियत, जिसे अपने ही बच्चों को बचाने के लिए उन्हें असहनीय दर्द से गुज़रते हुए देखना पड़ता है। कील ठोंकते समय उनके काँपते हाथ कहानी के सबसे दिल तोड़ने वाले पलों में से एक हैं।
कला और चित्रांकन (Art and Illustration)
धीरज वर्मा का दमदार और ज़िंदा सा लगने वाला चित्रांकन ही कॉमिक्स “मुर्दा बाप” की असली जान है। वर्मा जी ने एक्शन सीन में ऐसा जोश भर दिया है कि हर पैनल चलता-फिरता महसूस होता है। चाहे कोबी की हाथी, अजगर और गैंडे जैसे विशाल जानवरों से भिड़ंत हो, या फिर कोबी-भेड़िया और युमंतुओं की खतरनाक लड़ाई—हर फ्रेम में तेज़ गति और भारी असर साफ दिखता है। यह उनकी कमाल की ड्रॉइंग स्किल का सबूत है।
उनकी कला की सबसे बड़ी खूबी है किरदारों के चेहरे के हावभाव। उन्होंने भावनाओं को इतनी सच्चाई से उतारा है कि दृश्य दिल तक उतर जाते हैं। सलीब पर टंगे कोबी का दर्द, उसकी आँखों में असहनीय पीड़ा, भेड़िया की मजबूरी, जेन का डर और फूजो बाबा की मानसिक तकलीफ़—हर एक भाव को धीरज वर्मा ने जैसे जिंदा कर दिया है।
पूरी कॉमिक्स में एक गहरी ‘डार्कनेस’ और ‘ग्रिट’ का माहौल है, जो कहानी की गंभीरता को और गहरा बना देता है। खून, पसीना, कीचड़ और रात का अंधेरा—इनका इस्तेमाल इतना सटीक है कि कहानी और भी रियल महसूस होती है। साथ ही उनकी सोच-समझकर की गई पैनलिंग कहानी की रफ्तार को सही दिशा देती है—जहाँ एक्शन बढ़ता है, पैनल बड़े और ताकतवर हो जाते हैं; और जहाँ कोबी थकने या टूटने लगता है, वहाँ पैनल छोटे और बिखरे हुए दिखते हैं, जिससे उसका मानसिक हाल सीधे पाठक तक पहुँचता है।
लेखन और संवाद (Writing and Dialogue)
तरुण कुमार वाही का बेहतरीन लेखन ही कॉमिक्स “मुर्दा बाप” को भारतीय कॉमिक्स जगत में ‘क्लासिक’ की जगह दिलाता है। वाही जी ने ‘बलिदान’, ‘नियति’ और ‘पुनर्जन्म’ जैसे गहरे विचारों को एक सुपरहीरो कहानी में बहुत ही सहज और खूबसूरती से पिरोया है।
उनके लेखन की दूसरी बड़ी ताकत है कहानी की गति (Pacing)। कहानी कहीं भी धीमी नहीं पड़ती। शुरू में योजना बनाना, कोबी को थकाने की स्ट्रैटेजी और फिर अंतिम युद्ध—सब कुछ इतनी रफ्तार और दिलचस्पी के साथ आगे बढ़ता है कि पाठक शुरुआत से अंत तक कहानी में डूबा रहता है।
और सबसे अहम बात—संवाद। उनके डायलॉग छोटे, सटीक, तीखे और भावों से भरपूर हैं। हर संवाद पात्र की अंदरूनी लड़ाई और उसकी सोच को साफ दिखाता है। जैसे जेन का वह समझदार हस्तक्षेप—
“अगर मैं समय पर न आती, तो तुम भावनाओं में बहकर एक बहुत बड़ी गलती कर देते।”
या फिर सलीब पर तड़पते हुए कोबी की दर्द भरी चीखें—वाही जी के हर शब्द का अपना वज़न है, जो कहानी के असर को कई गुना बढ़ा देता है।
निष्कर्ष और अंतिम फैसला
“सलीब” सिर्फ एक कॉमिक्स नहीं है, बल्कि एक गहरा अनुभव है। यह राज कॉमिक्स के उस सुनहरे समय की निशानी है जब कहानियाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि पाठकों की भावनाओं को झकझोरने के लिए लिखी जाती थीं। यह कोबी और भेड़िया की सबसे डार्क, सबसे हिंसक और भावनात्मक कहानियों में से एक है।
तरुणकुमार वाही की शानदार लेखनी और धीरज वर्मा की धांसू आर्ट इसे एक “मस्ट-रीड” यानी हर कॉमिक प्रेमी के लिए ज़रूर पढ़ने लायक बनाते हैं। यह कहानी बताती है कि हीरो बनने के लिए सिर्फ ताकत काफी नहीं—कभी-कभी असहनीय दर्द और सबसे बड़ा त्याग भी करना पड़ता है।
मेरी रेटिंग: 5/5 (पूरी तरह से कालजयी और यादगार शाहकार)
