‘विध्वंस’ मनोज कॉमिक्स की एक सुपरहीरो और एक्शन-एडवेंचर कहानी है। इसे नाज़रा खान ने लिखा है और नरेश कुमार ने इसका चित्रण किया है। इसका संपादन संदीप गुप्ता ने किया है। कहानी एक अनाथ लड़के की है, जिसे अचानक दैवीय शक्तियां मिलती हैं और वह अन्याय से लड़ने वाला एक महामानव बन जाता है।
कहानी का सारांश (Detailed Plot Summary)

कहानी की शुरुआत बहुत दुखद घटना से होती है। ‘विशाल’ नाम का एक मासूम लड़का अपने माता-पिता के साथ कार में जा रहा होता है। एक भयंकर तूफानी रात में, बिजली गिरने और खराब मौसम की वजह से उनकी कार का एक्सीडेंट हो जाता है, जिसमें विशाल के माता-पिता की मौत हो जाती है। विशाल अब पूरी तरह अकेला हो जाता है।
विशाल के दो चाचा हैं। पहला है ‘जादूगर खोका’, जो दिल का बहुत नेक इंसान है और विशाल को अपने बेटे की तरह प्यार करता है। दूसरा है ‘डॉक्टर शिवाना’, जो एक दुष्ट वैज्ञानिक है। शिवाना का ध्यान विशाल के माता-पिता के पांच लाख रुपये के बीमा पर है। वह कानूनी लड़ाई के ज़रिए विशाल की कस्टडी अपने पास कर लेता है, ताकि पैसे का इस्तेमाल अपने गुप्त वैज्ञानिक प्रयोगों में कर सके।
डॉ. शिवाना एक पागल वैज्ञानिक है, जो अंतरिक्ष के ब्लैक होल से किसी परग्रही या शैतानी शक्ति को पृथ्वी पर लाना चाहता है। वह विशाल को कैद कर लेता है और प्रताड़ित करता है। लेकिन विशाल किसी तरह उसकी पकड़ से बच निकलता है। भागते हुए वह एक पुराने सब-वे या तहखाने जैसी जगह पर पहुँचता है, जहाँ उसकी मुलाकात ‘काभूम’ नाम के 5000 साल पुराने दिव्य पुरुष से होती है।

काभूम विशाल को बताता है कि वह सदियों से एक योग्य बालक की तलाश में था जो उसकी शक्तियों का उत्तराधिकारी बन सके। काभूम विशाल को अपनी सारी मानसिक और योगिक शक्तियां सौंप देता है। अब जब भी विशाल ‘काभूम’ शब्द बोलता है, आकाश से बिजली गिरती है और वह एक शक्तिशाली महामानव ‘विध्वंस’ में बदल जाता है।
कहानी आगे बढ़ती है और डॉ. शिवाना अपने प्रयोग में सफल हो जाता है। वह ‘काकोरा’ नाम का प्राचीन शैतान मुक्त कर देता है। काकोरा दुनिया को नष्ट करने की धमकी देता है और वैज्ञानिकों से भरे एक हवाई जहाज को हाईजैक कर लेता है। यहीं से विध्वंस और काकोरा के बीच की जंग शुरू होती है। विध्वंस अपनी शक्तियों से वैज्ञानिकों को बचाता है, लेकिन काकोरा भागने में सफल रहता है। कहानी एक सस्पेंस के साथ खत्म होती है, जो अगले भाग की नींव रखती है।
पात्रों का विश्लेषण (Character Analysis)

विशाल/विध्वंस: मुख्य किरदार का विकास भावनात्मक है। एक डरे हुए बच्चे से शक्तिशाली योद्धा बनने का उसका सफर रोमांचक है। विध्वंस विशालकाय और मस्कुलर है, जो शक्ति का प्रतीक है।
डॉक्टर शिवाना: कहानी का मुख्य खलनायक। लालची, क्रूर और बेहद चालाक। उसका किरदार क्लासिक ‘मैड साइंटिस्ट’ जैसा है।
जादूगर खोका: कहानी में नैतिकता और प्यार का प्रतीक। उसका जादू सिर्फ मनोरंजन के लिए है, जबकि शिवाना का विज्ञान विनाश के लिए।
काकोरा: एक डरावना और शक्तिशाली विलेन, जिसकी शक्तियां विध्वंस के बराबर दिखाई गई हैं।
कला और चित्रण (Art and Illustration)

नरेश कुमार का चित्रण उस समय के हिसाब से काफी प्रभावी है। सुपरहीरो ‘विध्वंस’ को मस्कुलर और ताकतवर दिखाया गया है, जो पाठकों को खींचता है। बिजली गिरने के दृश्य और विध्वंस के बदलाव के सीन को जीवंत बनाया गया है। कुछ पैनलों में रंग थोड़ा चटक हैं, लेकिन 90 के दशक की कॉमिक्स की यह अपनी एक खास शैली थी।
विदेशी कॉमिक्स से प्रेरणा या नकल? (Inspiration or Copy?)

‘विध्वंस’ की कहानी और पात्रों का जब ध्यान से विश्लेषण किया जाए, तो साफ़ लगता है कि यह कॉमिक्स DC Comics के प्रसिद्ध किरदार ‘Shazam’ (पहले Captain Marvel) से प्रेरित या कहें कि उसकी भारतीय ‘नकल’ है।
ट्रांसफॉर्मेशन का तरीका:
शाज़म में बिली बैटसन, जो कि एक बच्चा है, ‘Shazam’ शब्द बोलते ही सुपरहीरो में बदल जाता है। बिल्कुल उसी तरह, यहाँ विशाल ‘Kaboom’ (काभूम) बोलकर ‘विध्वंस’ बन जाता है। दोनों ही कहानियों में बदलाव के दौरान बिजली कड़कती है और एक साधारण बच्चा अचानक ताकतवर वयस्क महामानव में बदल जाता है। यह समानता इतनी साफ़ है कि इसे संयोग कह पाना मुश्किल है।
मेंटर (गुरु):
शाज़म की कहानी में एक प्राचीन जादूगर ‘Wizard Shazam’ रहता है, जो अपनी शक्तियाँ बिली को सौंपता है। वहीं इस कॉमिक्स में ‘काभूम’ नाम का 5000 साल पुराना बुजुर्ग विशाल को अपनी शक्तियाँ देता है। दोनों ही मामलों में गुरु रहस्यमय, प्राचीन और अलौकिक व्यक्तित्व का होता है, जो अगली पीढ़ी को शक्ति देकर खुद पीछे हट जाता है।

विलेन का नाम:
यह शायद सबसे बड़ा सबूत है। शाज़म का मुख्य दुश्मन ‘Dr. Sivana’ है, जबकि इस कॉमिक्स में विलेन का नाम ‘Dr. Shiwana’ रखा गया है। नाम में सिर्फ ‘V’ और ‘W’ का फर्क है, जो साफ़ तौर पर नकल की ओर इशारा करता है और कहानी की मौलिकता पर सवाल उठाता है।
शक्तियों का स्रोत:
दोनों ही किरदारों को शक्तियाँ किसी वैज्ञानिक प्रयोग से नहीं, बल्कि प्राचीन, जादुई और दैवीय स्रोत से मिलती हैं। ये शक्तियाँ सामान्य इंसान की समझ से परे होती हैं और सीधे किसी पुराने रहस्य या तपस्वी परंपरा से जुड़ी होती हैं।
कॉस्टयूम:
विध्वंस का कॉस्टयूम भी शाज़म की याद दिलाता है। उसकी केप और छाती पर बिजली जैसा निशान—जो कवर पेज पर साफ दिखता है—सीधे शाज़म के कॉस्टयूम से मिलता-जुलता है। यह समानता सिर्फ विचारों तक सीमित नहीं, बल्कि दृश्य स्तर पर भी नज़र आती है।
यह उस दौर में भारतीय कॉमिक्स प्रकाशकों के बीच आम था। वे अक्सर विदेशी किरदारों (जैसे सुपरमैन, बैटमैन, फैंटम) को भारतीय परिवेश में ढालकर पेश करते थे। ‘विध्वंस’ भी इसी श्रेणी में आता है।
संवाद और भाषा शैली (Dialogue and Language):
कॉमिक्स की भाषा सरल हिंदी में है, जिसमें बीच-बीच में उर्दू और अंग्रेजी के शब्द भी इस्तेमाल किए गए हैं। संवाद काफी नाटकीय हैं, जो उस समय के बच्चों को पसंद आते थे। उदाहरण: “सावधान हो जाओ दुनिया वालों! काकोरा 5000 साल बाद फिर धरती पर आ रहा है।” ऐसे संवाद कहानी में गंभीरता और रोमांच दोनों जोड़ते हैं।
कॉमिक्स का सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष:

सकारात्मक पक्ष:
कहानी की गति तेज है, जो पाठक को बांधे रखती है। भावनात्मक जुड़ाव (माता-पिता की मृत्यु और अकेलेपन का दर्द) अच्छी तरह दिखाया गया है। बच्चे के दृष्टिकोण से दुनिया को देखना और फिर शक्तिशाली बनना, बच्चों की कल्पना को पंख देता है।
नकारात्मक पक्ष:
मौलिकता की कमी। अगर आपने शाज़म पढ़ा है, तो इसमें कुछ नया नहीं मिलेगा। कुछ जगहों पर प्लॉट अनुमानित लगता है। विलेन ‘काकोरा’ का अचानक आना और वैज्ञानिकों को अगवा करना थोड़े और बेहतर तरीके से दिखाया जा सकता था।
निष्कर्ष (Conclusion):
‘विध्वंस’ मनोज कॉमिक्स के उन किरदारों में से है जिसे बहुत ज्यादा लोकप्रियता नहीं मिली, लेकिन शुरुआत में इसने उम्मीदें जगाई थीं। यह कॉमिक्स उन लोगों के लिए नॉस्टेल्जिया है जिन्होंने 90 के दशक में हिंदी कॉमिक्स पढ़ी हैं।
हालांकि यह DC के ‘शाज़म’ की स्पष्ट नकल है, फिर भी भारतीय परिवेश में इसे पेश करने का तरीका रोचक है। ‘जादूगर खोका’ जैसे किरदार कहानी में एक ‘देसी’ तड़का लगाते हैं। अगर आप मौलिकता की तलाश में नहीं हैं और सिर्फ एक्शन से भरी सुपरहीरो ओरिजिन स्टोरी पढ़ना चाहते हैं, तो ‘विध्वंस’ एक बार पढ़ने लायक है।
मनोज कॉमिक्स ने इसके ज़रिए दिखाने की कोशिश की थी कि वे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के सुपरहीरो कॉन्सेप्ट को भारतीय पाठकों तक ला सकते हैं। आज इसे दोबारा पढ़ते समय हमें उस दौर की झलक मिलती है, जब प्रयोग और प्रेरणा (या नकल) साथ-साथ चलती थीं।
