भारतीय कॉमिक्स की दुनिया में ‘योद्धा’ (Yoddha) की कहानी किसी पौराणिक महाकाव्य से कम नहीं लगती। जहाँ ‘आरम्भ’ ने इस दुनिया की नींव रखी और ‘सूर्यांश’ ने इसके किरदारों को गहराई दी, वहीं इस श्रृंखला का तीसरा भाग ‘सृष्टि’ (Srishti) कहानी को एक नए और ऊँचे मुकाम पर ले जाता है। यह कॉमिक सिर्फ नायकों और राक्षसों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह विकास, तकनीक (लोहे का आविष्कार), सुंदरता की रक्षा और प्रकृति के संतुलन की एक प्रभावशाली कथा है। राज कॉमिक्स के बैनर तले संजय गुप्ता द्वारा प्रस्तुत और तरुण कुमार वाही द्वारा लिखित यह अंक पाठकों को उस प्राचीन समय में ले जाता है, जहाँ जादू, वीरता और ईश्वरीय नियम एक साथ चलते हैं।
कथानक का विस्तृत विश्लेषण:

इस अंक की कहानी कई अहम उप-कथाओं को एक साथ आगे बढ़ाती है, जो धीरे-धीरे एक बड़े उद्देश्य की ओर बढ़ती हैं।
लोह-युग का उदय और शुक्राचार्य का परीक्षण:
कहानी की शुरुआत दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आश्रम से होती है। यहाँ शुक्राचार्य अपने शिष्यों, यानी दिति के पुत्रों—भूकम्पका, नरकटा, ब्रह्ममुष्ठि आदि—की परीक्षा लेते हैं। अब तक युद्धों में पत्थर और लकड़ी से बने हथियारों का इस्तेमाल होता आया था, लेकिन शुक्राचार्य उन्हें पहली बार लौह (Iron) से परिचित कराते हैं। वे ज्वालामुखी की अग्नि से लोहे को पिघलाकर उससे घातक शस्त्र बनाना सिखाते हैं। यह दृश्य कहानी में एक बड़ी तकनीकी क्रांति को दर्शाता है। शुक्राचार्य का यह कहना— “यह धातु तुम्हारी विजय का प्रतीक बनेगी”—आने वाले भयानक युद्धों का साफ संकेत देता है।
अप्सराओं का जन्म और तामस का आतंक:
सृष्टि के विस्तार के लिए प्रजापति के आदेश पर दिव्य अप्सराओं—मेनका, उर्वशी, रंभा आदि—का जन्म होता है। लेकिन उनकी सुंदरता को देखकर तामस नाम का एक क्रूर राक्षस उन पर हमला कर देता है। तामस की शक्ति है रूप और यौवन को चुरा लेना। वह अप्सराओं की सुंदरता छीनकर उन्हें वृद्ध बना देता है। यह हिस्सा कहानी में सुंदरता और अंधकार के टकराव को बेहद प्रभावी ढंग से दिखाता है।

शिरोमणि (योद्धा) का शौर्य और संयम:
जब देवराज इंद्र तामस को रोकने में असफल रहते हैं और उनका बाण उल्टा उन्हीं पर लौट आता है, तब शिरोमणि (योद्धा) का प्रवेश होता है। वह न सिर्फ इंद्र की जान बचाता है, बल्कि अपनी बुद्धि और पराक्रम से तामस का वध भी करता है। इसी दौरान शिरोमणि के चरित्र का एक बेहद अहम पहलू सामने आता है—संयम। जब एक अप्सरा उसके घावों पर औषधि लगाने के लिए उसे स्पर्श करना चाहती है, तो वह विनम्रता से पर-स्त्री स्पर्श से इनकार कर देता है। यह दृश्य उसे सिर्फ एक वीर योद्धा नहीं, बल्कि एक महायोगी योद्धा के रूप में स्थापित करता है।
दैत्यों का अभियान और माता का बलिदान:
दूसरी ओर दैत्य बालक अपनी बढ़ती शक्ति के नशे में चूर हैं। वे घोड़ाक्ष (आधे घोड़े, आधे राक्षस) जैसी जातियों को पराजित कर उन्हें अपना वाहन बना लेते हैं। एक भयंकर युद्ध के बाद जब कई दैत्य वीर मारे जाते हैं, तब उनकी माता—दनु या दिति—अपने प्राणों का बलिदान देकर उन्हें फिर से जीवित कर देती है। यह दृश्य ममता के उस डरावने रूप को दिखाता है, जहाँ अधर्म को बचाने के लिए माँ खुद को मिटा देती है। इसके बाद शुक्राचार्य उन्हें पूरी पृथ्वी पर अधिकार करने का आदेश देते हैं।
ऋषि पोषक और नाभिक्ष का संकट:
कहानी का सबसे असरदार भाग ऋषि पोषक से जुड़ा है। ऋषि पोषक अपनी श्वास से अमृत-वर्षा करते हैं, जिससे पृथ्वी हरी-भरी रहती है। लेकिन नाभिक्ष नाम का राक्षस उनकी नाभि में छिपकर उस पोषण शक्ति को चूसने लगता है। नतीजा यह होता है कि धरती बंजर होने लगती है और अकाल फैल जाता है। भूख से परेशान प्राणी एक-दूसरे को खाने लगते हैं। इस भयावह संकट को खत्म करने के लिए गुरु बृहस्पति शिरोमणि और अन्य देवों को भेजते हैं।
चरित्र चित्रण (Character Development):

शिरोमणि (योद्धा): इस भाग में वह एक परिपक्व और जिम्मेदार नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरता है। उसकी ताकत अब सिर्फ हथियारों में नहीं, बल्कि उसके सिद्धांतों और सोच में भी दिखाई देती है। तामस और नाभिक्ष के खिलाफ उसकी लड़ाई यह साबित करती है कि वह धर्म और प्रकृति दोनों का रक्षक है।
इंद्र: इंद्र यहाँ एक उत्साही लेकिन जल्दबाजी करने वाले युवा देव के रूप में नजर आते हैं। शिरोमणि के प्रति उनका सम्मान धीरे-धीरे बढ़ता है, जो आगे चलकर उनके संबंधों की मजबूत नींव बनता है।
शुक्राचार्य: वे ऐसे गुरु हैं जो अपने शिष्यों को जीतना सिखाते हैं, चाहे उसके लिए प्रकृति के नियमों से ही क्यों न खेलना पड़े। लोहे का आविष्कार उनके विनाशकारी सोच को साफ दिखाता है।
नाभिक्ष: यह एक अलग तरह का खलनायक है। उसके शरीर से निकलने वाले केशाक्षस (बालों से बने राक्षस) बेहद डरावना माहौल बनाते हैं। उसे हराने के लिए शिरोमणि को सिर्फ ताकत ही नहीं, बल्कि बृहस्पति के ज्ञान का भी सहारा लेना पड़ता है।
कला और चित्रांकन (Art and Visuals):

नितिन मिश्रा का आर्टवर्क इस अंक की आत्मा है। ज्वालामुखी में पिघलता लोहा, अप्सराओं का दिव्य सौंदर्य और बंजर धरती का भयावह चित्रण बेहद बारीकी से उकेरा गया है। शिरोमणि और केशाक्षस के बीच का युद्ध बहुत ही गतिशील लगता है, खासकर केशाक्षस के फैले हुए बालों का पन्नों पर जाल पाठकों को सिहरन दे देता है। शादाब और गोविंद का रंग संयोजन इस अनुभव को और गहरा बना देता है—जहाँ दैत्य शिविरों में गहरे और उग्र रंग दिखते हैं, वहीं अप्सराओं और ऋषियों के दृश्यों में शांत और सात्विक रंग कहानी के माहौल को जीवंत बना देते हैं।
प्रमुख संदेश और दर्शन:

‘सृष्टि’ अपने भीतर कई गहरे दार्शनिक संदेश समेटे हुए है।
‘सूर्यांश’ के जरिए संतुलन, नैतिकता और चरित्र की जो समझ दी गई है, वही इसे एक कालजयी गाथा का रूप देती है। ऋषि पोषक और नाभिक्ष की कथा सृष्टि में देने वाले (Giver) और केवल लेने वाले (Consumer) के बीच के संतुलन को साफ तौर पर दिखाती है। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो उसका नतीजा विनाश के रूप में सामने आता है।
शस्त्र और नैतिकता के संदर्भ में कहानी यह बात स्पष्ट करती है कि लोहे जैसी शक्ति अगर नैतिक मूल्यों से खाली हो, तो वह सिर्फ ‘वध’ का साधन बन जाती है। जहाँ दैत्य इसे साम्राज्य फैलाने और हिंसा के लिए इस्तेमाल करते हैं, वहीं नायक उसी शक्ति को रक्षा और संरक्षण का आधार बनाता है।
अंत में, योद्धा के चरित्र को नए सिरे से परिभाषित करते हुए यह संदेश दिया गया है कि सच्चा पराक्रम शत्रु को मारने में नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों पर विजय पाने में है—जैसा कि शिरोमणि अप्सरा के प्रसंग में दिखाकर साबित करता है।
समीक्षात्मक मूल्यांकन:

सकारात्मक पक्ष:
‘सूर्यांश’ (योद्धा श्रृंखला) की सबसे बड़ी ताकत इसकी विविधता है। यह तकनीक, सौंदर्य की रक्षा का भाव, युद्ध और दर्शन—इन सभी को एक दुर्लभ और संतुलित मिश्रण में पेश करती है। इस श्रृंखला का विश्व-निर्माण (World Building) बेहद विस्तृत है, जहाँ ‘घोड़ाक्ष’ और ‘शुरजर’ (गोरिल्ला) जैसे नए और अनोखे जीवों का परिचय इस ब्रह्मांड को और भी जीवंत व जटिल बना देता है।
कहानी की पेसिंग (Pacing) इतनी सटीक है कि यह कहीं भी ढीली नहीं पड़ती। हर पन्ने पर घटने वाली नई घटनाएँ पाठकों के रोमांच को लगातार बनाए रखती हैं।
नकारात्मक पक्ष:
इतने सारे पात्रों और उप-कथाओं के बीच मुख्य नायक ‘सूर्यांश’ को कभी-कभी अपेक्षाकृत कम स्क्रीन-टाइम मिलता है। हालाँकि, यह एक ‘एन्सेम्बल कास्ट’ (Ensemble Cast) वाली कहानी है, इसलिए यह कमी बहुत बड़ी नहीं लगती।
कुछ दृश्य—जैसे अकाल के कारण इंसानों का एक-दूसरे को खाना—छोटे बच्चों के लिए थोड़े विचलित करने वाले हो सकते हैं।
निष्कर्ष:
राज कॉमिक्स की ‘सृष्टि’ एक बेहतरीन कृति है, जो पाठक को सिर्फ मनोरंजन नहीं देती, बल्कि सोचने पर भी मजबूर करती है। यह केवल एक ‘सुपरहीरो’ की कहानी नहीं है, बल्कि हमारी सभ्यता के विकास और उसमें नैतिकता की भूमिका की भी कथा है। शिरोमणि द्वारा नाभिक्ष को ‘काल-छिद्र’ (Black Hole) में फेंकना विज्ञान और कल्पना का शानदार संगम पेश करता है।
अंक के अंत में ‘काल रथ’ पर सवार एक नए शत्रु का उदय और ‘स्वर्ग पात्र’ की घोषणा अगले भाग के लिए जबरदस्त उत्सुकता पैदा करती है। अगर आप भारतीय पौराणिक कथाओं को एक आधुनिक और फैंटेसी से भरपूर नज़रिए में देखना चाहते हैं, तो ‘योद्धा’ सीरीज का यह भाग आपको जरूर रोमांचित करेगा।
यह कॉमिक यह भी साबित करती है कि राज कॉमिक्स के पास कहानियों का ऐसा भंडार है, जो हॉलीवुड के किसी भी ‘सिनेमैटिक यूनिवर्स’ को कड़ी टक्कर दे सकता है।
अंतिम रेटिंग: 4.9/5
