क्या है ‘स्त्री-भू’ का वह खौफनाक सच? जहाँ मर्दों का प्रवेश है मौत को दावत!
कहानी की शुरुआत एक ऐसी कल्पना से होती है जो किसी के भी रोंगटे खड़े कर दे। अनुपम सिन्हा ने ‘स्त्री-भू’ के रूप में एक ऐसी सभ्यता बनाई है जो बाहरी दुनिया से हजारों सालों से पूरी तरह कटी हुई है। यह जगह पाँच जागते ज्वालामुखियों के बीच बसी है, जहाँ की ‘वाष्प की दीवार’ (Wall of Vapors) इसे किसी भी रडार या उपग्रह की नजर से बचाए रखती है।
लेकिन इस जगह की सबसे बड़ी खासियत इसका भूगोल नहीं, बल्कि इसका ‘सामाजिक ढांचा’ है। यहाँ सत्ता पूरी तरह स्त्रियों के हाथ में है। लेखक ने यहाँ ‘मातृसत्तात्मक समाज’ (Matriarchal Society) का बेहद चरम रूप दिखाया है। यहाँ पुरुष अपने ‘अधिकारों’ के लिए सड़कों पर प्रदर्शन करते नजर आते हैं, जो हमारे आज के पुरुष-प्रधान समाज पर सीधा और तीखा व्यंग्य है। कॉमिक्स के शुरुआती पन्ने ही साफ कर देते हैं कि यह कोई साधारण सुपरहीरो कहानी नहीं है।
सुपर कमांडो ध्रुव की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा: जब नायक की ताकत ही बन गई उसकी दुश्मन!

हमेशा शांत रहने वाला और अपनी तेज बुद्धि से बड़े-बड़े अपराधियों को मात देने वाला सुपर कमांडो ध्रुव इस कहानी में ऐसी चुनौती से टकराता है जिसका हल उसके ‘दिमाग’ के पास भी नहीं है।
‘शक्तिरूपा’—एक रहस्यमयी दिव्य ऊर्जा, जो मठ के गर्भगृह में मौजूद है। इसका नियम बेहद कठोर है: यह पुरुषों की शारीरिक ताकत को सोख लेती है और स्त्रियों को दैवी शक्ति दे देती है। ध्रुव, जिसे अपनी फुर्ती और शारीरिक क्षमता पर पूरा भरोसा है, यहाँ खुद को बेबस महसूस करता है। उसका शरीर भारी होने लगता है, साँसें उखड़ने लगती हैं। अनुपम सिन्हा ने ध्रुव के इस मानवीय पहलू को बहुत खूबसूरती से दिखाया है—एक ऐसा नायक जो अपनी कमजोरी मानता है, लेकिन फिर भी पीछे हटने का नाम नहीं लेता।
‘देवीना’—राजनगर जेल में मचा वह खूनी तांडव, जिसने पुलिस प्रशासन की नींद उड़ा दी!

कहानी का सबसे रहस्यमयी और ताकतवर किरदार है देवीना। पाँच साल तक कोमा में रहने वाली यह स्त्री जैसे ही ‘शक्तिरूपा’ की तरंगों के संपर्क में आती है, उसके अंदर एक भयानक ऊर्जा जाग उठती है। जेनेटिक सेंटर से उसका भागना और जेल की ऊँची दीवारों को खिलौने की तरह तोड़ देना कॉमिक्स के सबसे दमदार एक्शन सीन में से एक है।
देवीना कोई साधारण विलेन नहीं है। वह एक ऐसी बेटी है जो अपनी माँ ‘राधा’ (जुपिटर सर्कस की सदस्य) को पाने के लिए तड़प रही है। उसका गुस्सा उस व्यवस्था के खिलाफ है जिसने उसे और उसकी माँ को अलग कर दिया। जब वह जेल के अंदर अपराधियों और पुलिस—दोनों को एक साथ धूल चटाती है, तो पाठक के मन में उसके लिए डर और सहानुभूति दोनों एक साथ पैदा होते हैं।
ब्लैक कैट की ‘विनाशकारी रिंग्स’ और मठ का वह रहस्यमयी धमाका!

ध्रुव की पुरानी दुश्मन ब्लैक कैट यहाँ एक ट्रिगर की तरह काम करती है। उसकी महत्वाकांक्षा और चोरी की माहिर कला ही ‘शक्तिरूपा’ को उसकी जगह से हिला देती है। ब्लैक कैट की ‘फ्लाइंग किस रिंग्स’ और उसके हाई-टेक गैजेट्स दिखाते हैं कि राज कॉमिक्स ने उस दौर में भी तकनीक और स्मार्ट चोरी को कितने शानदार तरीके से पेश किया था। मठ के अंदर होने वाला धमाका और उससे उठता धुआँ पूरी कहानी को नया मोड़ दे देता है, जिससे ‘स्त्री-भू’ और ‘राजनगर’ के बीच की कड़ी जुड़ जाती है।
अनुपम सिन्हा की जादुई कूची: हर पन्ने से झांकती है सजीव मौत और विनाश!

इस कॉमिक्स की सफलता का लगभग आधा श्रेय इसके चित्रांकन को जाता है, जहाँ अनुपम सिन्हा की आर्ट स्टाइल में जबरदस्त ‘मस्कुलरिटी’ और बारीक डिटेलिंग देखने को मिलती है—जो उस दौर की कई कॉमिक्स में कम ही नजर आती थी। जब देवीना जोरदार लात मारती है या सुपर कमांडो ध्रुव हवा में गोता लगाता है, तो एक्शन पैनलों में मूवमेंट सचमुच महसूस होता है।
इसके अलावा स्त्री-भू के प्राचीन मंदिर, ज्वालामुखियों से उठता धुआँ और राजनगर की आधुनिक जेल—इन पूरी तरह अलग दुनियाओं को सिन्हा ने बैकग्राउंड में बहुत बारीकी से उकेरा है। धमाकों के समय ‘धड़ाक’ और ‘धड़ाम’ जैसे शब्दों का बड़ा और बोल्ड इस्तेमाल पाठक को ऐसा एहसास कराता है जैसे शोर सीधे कानों में गूंज रहा हो।
लिंग-भेद पर कड़ा प्रहार: क्या शक्ति का संतुलन ही शांति का एकमात्र रास्ता है?

‘स्त्री-भू’ एक गहरा सवाल उठाती है—क्या पुरुष और स्त्री कभी सच में बराबर हो सकते हैं? कहानी दिखाती है कि अगर प्रकृति ने स्त्रियों को ज्यादा शारीरिक ताकत दी होती, तो क्या वे भी पुरुषों की तरह ही ‘दमनकारी’ (Oppressive) बन जातीं?
स्त्री-भू साम्राज्य में पुरुषों की हालत देखकर पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि वर्चस्व चाहे किसी भी लिंग का हो, अंत में वह अन्याय ही पैदा करता है। महारानी सयानी देवी का यह डर कि “शक्ति का असंतुलन विनाश लाएगा,” पूरी कॉमिक्स का मुख्य दर्शन बनकर सामने आता है। कहानी साफ संदेश देती है कि ‘शक्ति’ और ‘अधिकार’ के साथ ‘संयम’ होना भी उतना ही जरूरी है।
विज्ञान और मिथक का अद्भुत संगम: म्यूटेशन या दैवीय चमत्कार?

कॉमिक्स का बड़ा हिस्सा विज्ञान पर टिका हुआ है। वैज्ञानिक देवीना के डीएनए को ‘अननोन डीएनए’ और ‘म्यूटेशन’ बताते हैं और उसे लैब में समझने की कोशिश करते हैं। दूसरी तरफ मठ के लोग इसे ‘शक्तिरूपा’ की कृपा मानते हैं।
अनुपम सिन्हा ने बहुत समझदारी से इन दोनों सोचों को साथ रखा है। यह आज के आधुनिक भारत की झलक देता है—जहाँ एक तरफ हम अंतरिक्ष तक पहुँच रहे हैं और दूसरी तरफ अपनी परंपराओं और आस्था से भी जुड़े हुए हैं। शक्तिरूपा की ऊर्जा को ‘विकिरण’ (Radiation) के रूप में दिखाना कहानी को साफ तौर पर साइंस-फिक्शन का फ्लेवर देता है।
जुपिटर सर्कस का वह नॉस्टैल्जिक जुड़ाव: ध्रुव के अतीत की गलियों में वापसी!

पुराने पाठकों के लिए देवीना का जुड़ाव ‘जुपिटर सर्कस’ से होना एक मजबूत इमोशनल कनेक्शन बनाता है। ध्रुव का बचपन सर्कस में बीता है, और जब उसे पता चलता है कि देवीना की माँ राधा उसी सर्कस का हिस्सा थी, तो यह लड़ाई उसके लिए निजी हो जाती है। अब ध्रुव सिर्फ एक केस नहीं सुलझा रहा—वह अपने अतीत के बिखरे टुकड़ों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
दिश्ती—एक नन्हीं बच्ची के हाथ में ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्ति!

कॉमिक्स का क्लाइमैक्स किसी फिल्मी सस्पेंस से कम नहीं है। ध्रुव की छोटी बहन दिश्ती, जो अब तक साइड कैरेक्टर लग रही थी, अनजाने में ‘शक्तिरूपा’ को अपने भीतर समेट लेती है।
एक छोटी बच्ची के अंदर इतनी खतरनाक ऊर्जा का होना भविष्य के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। क्या दिश्ती इस शक्ति को संभाल पाएगी? या वह भी देवीना की तरह तबाही का कारण बनेगी? यही सवाल पाठकों को इस श्रृंखला के अगले भाग ‘सिंधुनाद’ की तरफ खींच ले जाता है।
फाइनल वर्डिक्ट: क्यों ‘स्त्री-भू’ आज भी हर कॉमिक्स प्रेमी की पहली पसंद है?
‘स्त्री-भू’ सिर्फ एक कॉमिक्स नहीं, बल्कि पूरा अनुभव है। इसकी दमदार कहानी के जरिए लिंग-भेद और शक्ति संतुलन जैसे गंभीर विषयों को बेहद रोचक अंदाज में पेश किया गया है—जो भारतीय कॉमिक्स में बहुत कम देखने को मिलता है। यहाँ कोई भी पात्र पूरी तरह ‘ब्लैक’ या ‘व्हाइट’ नहीं है; हर किसी के अपने कारण और मजबूरियाँ हैं।
साथ ही यह अनुपम सिन्हा के करियर की बेहतरीन कलात्मक कृतियों में गिनी जाती है, जो नारी सशक्तिकरण का मजबूत संदेश देने के साथ-साथ सत्ता के गलत इस्तेमाल के प्रति भी चेतावनी देती है।
निष्कर्ष:
राज कॉमिक्स की ‘शक्तिरूपा श्रृंखला’ का यह पहला भाग आगे आने वाली पूरी गाथा की मजबूत नींव रखता है। अगर आप ध्रुव के फैन हैं, तो यह आपके लिए किसी गीता से कम नहीं। और अगर आप नए पाठक हैं, तो यह कॉमिक्स आपको भारतीय ग्राफिक नॉवेल्स की असली ताकत से परिचित कराएगी।
यह कॉमिक्स मानो चीख-चीख कर कहती है—
“शक्ति जब सीमाएँ तोड़ती है, तो सृष्टि का अंत तय हो जाता है, चाहे वह शक्ति किसी भी हाथ में क्यों न हो!”
