राधा कॉमिक्स की कालजयी कृति ‘शक्तिपुत्र और लोहे का अजगर’ पर आधारित यह विस्तृत ब्लॉग समीक्षा उन सभी पाठकों के लिए है जो आज भी 90 के दशक के उस जादुई दौर को अपनी यादों में संभालकर रखते हैं।
राजनगर की वीरानियों में गूँजती मौत की चीख!

कहानी की शुरुआत शक्तिपुत्र के एक साधारण और शांत दिखने वाले सुबह के भ्रमण से होती है, जहाँ वह अपने वफादार घोड़े दिलावर के साथ शहर के शोर-शराबे से दूर कुदरत की शांति का आनंद ले रहा होता है। लेकिन शांति का यह पल तब टूट जाता है जब हवा में एक असहाय स्त्री की रूह कंपा देने वाली चीख गूँजती है।
शक्तिपुत्र, जो हमेशा दूसरों की रक्षा के लिए तैयार रहता है, बिना एक पल गंवाए उस दिशा में दौड़ पड़ता है जहाँ कुछ दरिंदे एक मासूम बच्चे और उसकी माँ को अपना निशाना बना रहे थे। यहाँ प्रीणा फीचर्स के कलाकारों ने अपनी कूची से दहशत के उस मंजर को इतनी जीवंतता से दिखाया है कि पाठक खुद को उस वीराने में खड़ा महसूस करने लगता है। नायक का इन गुंडों पर कहर बनकर टूटना और अपनी युद्ध कला दिखाना यह साफ करता है कि राजनगर के इस रक्षक के लिए न्याय से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
दहशत का नया नाम: जब लोहे के अजगर ने जकड़ा शक्तिपुत्र को!

जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, शक्तिपुत्र उस स्त्री और बच्चे को सुरक्षित जगह पहुँचाने की कोशिश में एक रहस्यमयी सुरंग के मुहाने पर पहुँचता है। सुरंग का वह अंधेरा और उससे बाहर निकलते ही सामने खड़ा वह अजीब जीव कहानी में ऐसा मोड़ लाता है जिसकी कल्पना पाठक ने भी नहीं की होती। वह जीव, जिसे ‘लोहे का अजगर’ कहा गया है, कोई साधारण प्राणी नहीं बल्कि एक विशाल और खौफनाक राक्षस था।
उस जीव की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने महाबली शक्तिपुत्र को किसी छोटे खिलौने की तरह हवा में उछाल दिया। यह मुकाबला केवल ताकत का नहीं था, बल्कि यहाँ नायक की सहनशक्ति और धैर्य की भी कड़ी परीक्षा हो रही थी क्योंकि उस प्राणी की पकड़ किसी भी सामान्य इंसान की हड्डियाँ तोड़ने के लिए काफी थी।
90 के दशक का वो खूनी सस्पेंस जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते थे!

यह कॉमिक्स उस दौर की याद दिलाती है जब सस्पेंस और थ्रिलर का मेल पाठकों को रोमांचित कर देता था। लोहे के अजगर का वह खौफनाक रूप और उसके द्वारा शक्तिपुत्र को जकड़ने के दृश्य आज भी पुरानी यादें ताजा कर देते हैं। कॉमिक्स का आर्टवर्क, जिसमें ‘तड़ाक’ और ‘जन्न’ जैसे ध्वनि सूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, लड़ाई के दृश्यों में अलग ही जान डाल देता है।
90 के दशक की इन कहानियों में अक्सर नायक को ऐसी मुश्किल परिस्थितियों में डाल दिया जाता था जहाँ से निकलना नामुमकिन लगता था, और ठीक वैसा ही यहाँ भी होता है जब वह राक्षस शक्तिपुत्र को गहरे पानी के अंदर खींच ले जाता है ताकि वह उसे डुबोकर मार सके। यह सस्पेंस कि क्या नायक इस बार बच पाएगा या नहीं, पाठक की उत्सुकता को चरम पर पहुँचा देता है।
डॉ. पद्मनाभन का अद्भुत आविष्कार या कुदरत का कहर?

जैसे-जैसे संघर्ष गहराता है, शक्तिपुत्र की उन गुप्त शक्तियों का खुलासा होता है जो उसे डॉ. पद्मनाभन के वैज्ञानिक प्रयोगों और उनकी कृपा से मिली थीं। जब लोहे का अजगर उसे पानी की गहराइयों में ले जाता है, तब पता चलता है कि शक्तिपुत्र का शरीर बहुत कम ऑक्सीजन में भी जीवित रहने के लिए तैयार किया गया है। यह वैज्ञानिक पहलू कहानी को सिर्फ फंतासी न रखकर उसे एक ‘सुपर-सोल्जर’ की कहानी बना देता है।
यदि यह खास क्षमता उसके पास न होती, तो शायद राजनगर का यह वीर योद्धा उसी गहरे पानी में खत्म हो गया होता। यह हिस्सा दिखाता है कि उस समय के लेखक विज्ञान और फंतासी का बेहतरीन मिश्रण अपनी कहानियों में किया करते थे।
मौत के साये में शक्तिपुत्र की वज्र–धातु तलवार का तांडव!
जब शक्तिपुत्र को एहसास होता है कि केवल ताकत उस दानव को हराने के लिए काफी नहीं है, तब वह अपनी प्रसिद्ध ‘वज्र-धातु’ से बनी तलवार का इस्तेमाल करता है। इस तलवार की धार और शक्ति के सामने बड़े से बड़े दुश्मन के पैर डगमगा जाते थे। पानी के अंदर और बाहर, शक्तिपुत्र का निशाना इतना सटीक था कि वह मौत के साये में भी अपने लक्ष्य को भेद सकता था।
वह अपनी तलवार के प्रहारों से उस राक्षस को घायल कर देता है, जिससे वह प्राणी और भी ज्यादा खतरनाक और गुस्से में आ जाता है। यहाँ की गई आर्टवर्क की बारीकियाँ, जैसे तलवार की चमक और नायक के चेहरे पर दृढ़ निश्चय, इसे एक यादगार एक्शन सीक्वेंस बना देती हैं।
क्या गहरे पानी में दम तोड़ देगा राजनगर का यह मसीहा?
संघर्ष का सबसे कठिन क्षण वह था जब शक्तिपुत्र पानी की गहराइयों में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था। दुश्मन का इरादा उसे पूरी तरह खत्म करने का था, लेकिन शक्तिपुत्र की चिंता केवल अपनी जान की नहीं, बल्कि उस मासूम बच्चे की भी थी जो ऊपर अकेला और असुरक्षित रह गया था। नायक की यही परोपकारी भावना उसे अन्य सुपरहीरोज से अलग बनाती है।
वह अपनी पूरी ताकत लगा देता है ताकि वह उस जकड़न से मुक्त होकर वापस ऊपर जा सके और उस बच्चे की रक्षा कर सके जिसे उसने मौत के मुँह से निकाला था। पानी के अंदर का वह दमघोंटू माहौल और शक्तिपुत्र का साहस मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं जो किसी भी कॉमिक्स प्रेमी के लिए अविस्मरणीय है।
इतिहास के पन्नों से निकली एक रूह कंपा देने वाली दास्तान!
अंत में, यह कॉमिक्स केवल एक नायक और विलेन की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह बलिदान, कर्तव्य और अदम्य साहस की एक मिसाल है। शक्तिपुत्र का अपने घोड़े दिलावर के साथ सफर और उसकी जाँबाजी की यह कहानी हमें उन दिनों में वापस ले जाती है जब कॉमिक्स ही हमारे मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन हुआ करती थीं। ‘शक्तिपुत्र और लोहे का अजगर’ की यह समीक्षा अधूरी होगी यदि हम इसके उस प्रभावशाली निष्कर्ष की बात न करें जो पाठक को इसकी अगली कड़ी ‘शक्तिपुत्र का अपहरण’ पढ़ने के लिए उत्सुक छोड़ देता है।
यदि आप आज की भागदौड़ भरी जिंदगी से थोड़ा समय निकालकर फिर से उस वीरतापूर्ण युग का अनुभव करना चाहते हैं, तो इस कॉमिक्स के पन्ने पलटना आपके लिए एक बेहतरीन अनुभव साबित होगा। यह आज भी उतनी ही प्रासंगिक और रोमांचक है जितनी कि यह अपने प्रकाशन के समय थी।
