मनोज कॉमिक्स की कहानियाँ हमेशा से फंतासी, साइंस-फिक्शन और पौराणिक अंदाज़ का मज़ेदार मेल रही हैं। इसी सिलसिले में ‘आक्रोश और अम्बर’ (संख्या 935) एक ऐसी कॉमिक्स है, जो अपने समय के पाठकों को किसी बिल्कुल अलग ही दुनिया में ले जाती है। यह कहानी सिर्फ एक सुपरहीरो कॉमिक नहीं है, बल्कि बदले, गलतफहमी और भावनात्मक टकराव की एक गहरी दास्तान भी है।
कहानी का सारांश: प्रतिशोध और गलतफहमी की जंग
कहानी की शुरुआत होती है एक ज़बरदस्त और डरावने विस्फोट से। ल्यूका (Lyuka) नाम के ग्रह पर एक रहस्यमयी वस्तु आकर टकराती है, जिससे पूरे ग्रह पर भूकंप जैसा हाल हो जाता है। जब ल्यूका के शासक सम्राट ल्यूकोदर्मा और उनके सेनापति व्यूपा घटनास्थल पर पहुँचते हैं, तो मलबे के बीच उन्हें एक घायल और अधमरा योद्धा मिलता है।
यह योद्धा कोई और नहीं, बल्कि राजकुमार अम्बर होता है। अम्बर की हालत बेहद खराब होती है। उसकी एक टाँग कट चुकी है और पूरा शरीर गहरे घावों से भरा है। ल्यूका के डॉक्टर उसकी जान तो बचा लेते हैं, लेकिन जब अम्बर को होश आता है और वह अपनी कटी हुई टाँग देखता है, तो वह अंदर से पूरी तरह टूट जाता है। गहरा अवसाद और गुस्सा उसे घेर लेता है। वह खुद को दोषी मानते हुए आत्महत्या करने की कोशिश करता है, लेकिन सम्राट ल्यूकोदर्मा उसे समय रहते रोक लेते हैं।

अम्बर के दिल में अब सिर्फ बदले की आग जल रही है। उसे लगता है कि उसके ग्रह ‘प्लेटो’ की तबाही और उसकी यह हालत सब ‘अमोघ’ की वजह से हुई है, जिसे वह आक्रोश समझ बैठता है। सम्राट ल्यूकोदर्मा अम्बर को सहारा देने के लिए एक खास तरह की बैसाखी और अत्याधुनिक कवच देते हैं। यह कवच असल में हथियारों से लैस एक पूरा कॉम्बैट सूट होता है। अब जो अम्बर कभी अपाहिज था, वही एक घातक मशीन की तरह ताकतवर बन चुका है।
उधर दूसरी तरफ, कहानी का असली नायक आक्रोश अपनी साथी चाँदनी को खोजते हुए भटक रहा होता है। इसी दौरान उसे ऋषि जामवल से सच्चाई पता चलती है कि इन सभी विनाशकारी घटनाओं के पीछे असली खेल किसी और का है। असली मास्टरमाइंड है कालगुरु खटारो, जिसने न सिर्फ प्लेटो ग्रह को नष्ट किया, बल्कि अम्बर के दिमाग में आक्रोश के खिलाफ नफरत भी भर दी।
कहानी अपने चरम पर तब पहुँचती है जब अम्बर पृथ्वी पर आकर सीधे आक्रोश पर हमला कर देता है। उस समय आक्रोश पहले ही भयानक राक्षसी जीवों से लड़ रहा होता है। अम्बर की जबरदस्त ताकत और तकनीक देखकर आक्रोश भी चौंक जाता है। दोनों के बीच ज़बरदस्त और यादगार युद्ध होता है, जहाँ एक तरफ हाई-टेक मशीनरी है और दूसरी तरफ वीरता और नैतिक शक्ति। आखिरकार आक्रोश अम्बर को सच्चाई समझाने में सफल हो जाता है कि वे दोनों ही खटारो की साजिश का शिकार बने हैं। कहानी इस उम्मीद और संकल्प के साथ खत्म होती है कि अब दोनों मिलकर अपने असली दुश्मन खटारो का अंत करेंगे।
पात्र चित्रण: जटिलता और गहराई
इस कॉमिक्स की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदार हैं, जो सिर्फ अच्छे-बुरे तक सीमित नहीं रहते, बल्कि भावनाओं से भरे हुए लगते हैं।

अम्बर (Ambar): अम्बर का किरदार एक सच्चे ‘ट्रैजिक हीरो’ जैसा है। एक राजकुमार का अचानक अपाहिज हो जाना और फिर बदले की आग में जलकर खुद को मशीन में बदल लेना, पाठकों के मन में उसके लिए सहानुभूति भी पैदा करता है और रोमांच भी। उसका साइबॉर्ग-सा लुक उस दौर के हिसाब से काफी नया और प्रभावशाली लगता है।
आक्रोश (Aakrosh): आक्रोश मनोज कॉमिक्स के सबसे ताकतवर पात्रों में से एक है। वह सिर्फ ताकत का नहीं, बल्कि संयम और न्याय का भी प्रतीक है। इस कहानी में उसे केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक समझदार इंसान के रूप में दिखाया गया है, जो बिना वजह खून-खराबे के बजाय बात-चीत और सच्चाई पर भरोसा करता है।
सम्राट ल्यूकोदर्मा: यह किरदार रहस्यमयी है। बाहर से वह अम्बर का मददगार दिखता है, लेकिन अंदर ही अंदर उसके अपने स्वार्थ और भविष्य की योजनाएँ छिपी हैं। वह अम्बर को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहता है ताकि अमोघ यानी आक्रोश को खत्म किया जा सके।
कला और चित्रांकन: दिलीप कदम का जादू
इस कॉमिक्स के शानदार चित्रांकन का श्रेय दिलीप कदम और जयप्रकाश जगताप को जाता है। उन्होंने ल्यूका ग्रह, मशीनों, लैब और स्पेस के दृश्यों को बिल्कुल किसी स्पेस-ओपेरा फिल्म की तरह बड़े विस्तार से दिखाया है। एक्शन सीन में जबरदस्त ऊर्जा नजर आती है, खासकर तब जब अम्बर अपनी बैसाखी से लेजर और चेन-वेपन का इस्तेमाल करता है। कलाकारों ने अम्बर के चेहरे पर हार का दर्द, शारीरिक पीड़ा और बदले की चमक जैसी भावनाओं को भी बेहद असरदार ढंग से उकेरा है।
लेखन और संवाद: तिलक की लेखनी

लेखक तिलक ने कहानी को बहुत संतुलित और सधे हुए अंदाज़ में लिखा है। संवादों में वीरता और भावनाओं का अच्छा तालमेल देखने को मिलता है। जब अम्बर कहता है,
“मेरे अपाहिज जिस्म पर लदे मौत के एक-एक शस्त्र पर केवल तेरा ही नाम लिखा है आक्रोश!”
तो यह संवाद सीधे दिल में उतर जाता है। कहानी की रफ्तार तेज है और पढ़ते वक्त कहीं भी बोरियत महसूस नहीं होती।
तकनीकी पक्ष और संपादन
सावन-संदीप के संपादन में यह कॉमिक्स काफी चुस्त और टाइट लगती है। कहानी का एक ग्रह से दूसरे ग्रह और फिर पृथ्वी तक आना बहुत स्मूथ तरीके से दिखाया गया है। साथ ही उस दौर के मशहूर फ्री गिफ्ट्स (जैसे भूत का डिब्बा या वॉटर बॉटल) के विज्ञापन उस समय की मार्केटिंग रणनीति की याद दिलाते हैं, जो बच्चों को कॉमिक्स खरीदने के लिए और ज़्यादा उत्साहित करते थे।
आलोचनात्मक विश्लेषण: क्या अच्छा रहा और कहाँ कमी रही?
सकारात्मक पक्ष:
इस कॉमिक्स का कॉन्सेप्ट अपने आप में काफी अलग और साहसी है। एक ऐसे नायक को दिखाना जो एक पैर से विकलांग है, लेकिन उसे आधुनिक और खतरनाक हथियारों से लैस कर एक शक्तिशाली योद्धा बना दिया जाता है, उस दौर के हिसाब से बड़ा प्रयोग था। साथ ही लेखक ने असली विलेन कालगुरु खटारो को ज़्यादातर समय पर्दे के पीछे रखकर कहानी में सस्पेंस बनाए रखा है और अगली कड़ियों के लिए पाठकों की उत्सुकता भी कायम रखी है।
यह कहानी एक गहरा नैतिक संदेश भी देती है कि गलतफहमी और बिना सच्चाई जाने लिया गया बदला आखिरकार विनाश ही लाता है, चाहे इरादा कितना भी सही क्यों न हो।

नकारात्मक पक्ष:
कुछ जगहों पर विज्ञान और जादू का मिला-जुला रूप थोड़ा कन्फ्यूज़ कर सकता है। ल्यूका ग्रह को एक बेहद उन्नत तकनीकी दुनिया के रूप में दिखाया गया है, लेकिन बाद में अम्बर का राक्षसों से लड़ना पूरी तरह फंतासी की तरफ चला जाता है, जिससे टोन थोड़ी असंतुलित लग सकती है।
इसके अलावा, क्लाइमेक्स में अम्बर का इतनी जल्दी सच्चाई मान लेना कुछ पाठकों को अटपटा लग सकता है, क्योंकि पूरी कहानी में उसे बेहद जिद्दी और बदले की आग में डूबा हुआ दिखाया गया है।
कॉमिक्स की विरासत और महत्व
‘आक्रोश और अम्बर’ सिर्फ एक मनोरंजन से भरी कहानी नहीं है, बल्कि यह मनोज कॉमिक्स की उस रचनात्मक सोच का सबूत है, जहाँ वे अपने किरदारों और कहानियों के साथ नए-नए प्रयोग करने से नहीं डरते थे। अम्बर का किरदार आगे चलकर कई और कहानियों में दिखाई देता है और इस कॉमिक्स के बाद आक्रोश की लोकप्रियता और भी बढ़ जाती है।
यह कॉमिक्स हमें यह एहसास कराती है कि भारतीय कॉमिक्स इंडस्ट्री में भी मार्वल और डीसी की तरह अपना एक मजबूत और जुड़ा हुआ यूनिवर्स बनाने की पूरी क्षमता थी।
निष्कर्ष: एक अनिवार्य संग्रह
अगर आप 90 के दशक के कॉमिक्स प्रेमी हैं, तो ‘आक्रोश और अम्बर’ आपके कलेक्शन में जरूर होनी चाहिए। यह बदले, त्याग और वीरता की ऐसी कहानी है जो आज भी पढ़ने पर उतनी ही प्रभावशाली लगती है। इसका आर्टवर्क, कहानी का उतार-चढ़ाव और किरदारों की भावनात्मक गहराई इसे एक सच्चा कल्ट क्लासिक बनाते हैं।
मनोज कॉमिक्स ने इस कहानी के ज़रिए यह साबित किया कि एक नायक सिर्फ अपनी शारीरिक ताकत से नहीं, बल्कि अपने संकल्प और सही-गलत की पहचान से महान बनता है। आक्रोश और अम्बर की यह टक्कर असल में सच्चाई और झूठ की जंग थी, जिसका अंत दोस्ती और एक बड़े उद्देश्य के लिए साथ आने के रूप में होता है।
रेटिंग: 4.5/5
