भारतीय कॉमिक्स के स्वर्ण युग में मनोज कॉमिक्स ने अपनी कहानियों के दम पर पाठकों के दिलों में एक खास जगह बनाई थी। जहाँ राज कॉमिक्स अपने सुपरहीरो की ताकत और शक्तियों के लिए पहचानी जाती थी, वहीं मनोज कॉमिक्स की पहचान उसकी फंतासी, भावनाओं और साहसिक यात्राओं से भरी कहानियाँ थीं। ‘आक्रोश’ इसी पब्लिकेशन का एक ऐसा नायक है जो सिर्फ शारीरिक रूप से ताकतवर नहीं है, बल्कि नैतिक रूप से भी बेहद मजबूत है। इसकी पिछली कड़ी ‘आक्रोश और अम्बर’ में हमने देखा था कि कैसे दो योद्धा, जो कभी एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन थे, सच्चाई सामने आने के बाद दोस्त बन जाते हैं। ‘धधक उठा आक्रोश’ उसी दोस्ती की आगे की कहानी है, जहाँ एक नया रोमांच और भी बड़ी परीक्षा उनका इंतज़ार कर रही है।
कथानक का विस्तार: प्यास से लेकर युद्ध तक
कहानी की शुरुआत एक अजीब और वीरान ग्रह से होती है, जहाँ आक्रोश और उसका नया मित्र अम्बर अपने घोड़े ‘विद्युत’ के साथ भटकते हुए नज़र आते हैं। यहाँ लेखक तिलक ने नायक को बिल्कुल ज़मीन से जोड़े रखा है—महाबली होने के बावजूद आक्रोश और अम्बर को प्यास लगती है। पानी की तलाश उन्हें एक बेहद सुंदर जलाशय तक ले जाती है, लेकिन फंतासी कहानियों में अक्सर यही सुंदरता किसी बड़े खतरे का संकेत होती है।

जैसे ही अम्बर पानी पीने के लिए जलाशय में उतरता है, एक विशाल और डरावना जलचर राक्षस उस पर हमला कर देता है। इस दृश्य में अम्बर की बेबसी और आक्रोश की वीरता साफ दिखाई देती है। आक्रोश अपनी तेज़ फुर्ती और तलवार के घातक वार से उस राक्षस का अंत कर देता है। यह शुरुआती टकराव ही पाठक को कहानी की रफ्तार से जोड़ देता है और आगे के रोमांच के लिए तैयार करता है।
इसके बाद कहानी अपने असली मकसद की ओर बढ़ती है—अम्बर के ‘शक्ति शास्त्र’ की खोज। अम्बर बताता है कि प्लेटो ग्रह के विनाश के समय उसका तिलिस्मी हथियार कहीं खो गया था, और कालगुरु खटारो को हराने के लिए उस हथियार का मिलना बेहद ज़रूरी है। इसी तलाश में वे अपनी यात्रा जारी रखते हैं और ‘इन्द्रधनुषी घेरे’ का पीछा करते हुए ‘उल्लूक ग्रह’ तक पहुँच जाते हैं।
उल्लूक ग्रह का संकट और षड्यंत्र का जाल
उल्लूक ग्रह पर कदम रखते ही कहानी एक अलग ही मोड़ ले लेती है और यहाँ यह मर्डर मिस्ट्री और पॉलिटिकल थ्रिलर का रूप ले लेती है। ग्रह का सम्राट रातोक अपने पुत्र, राजकुमार निशोच की हत्या से टूट चुका है। इसी मौके का फायदा उठाता है सेनापति खजूरा, जो इस कहानी का एक अहम खलनायक है। वह बड़ी चालाकी से सारा दोष आक्रोश पर मढ़ देता है और उसे राजकुमार का हत्यारा घोषित कर देता है।

कहानी का सबसे भावनात्मक और तनाव से भरा हिस्सा तब आता है जब आक्रोश, जो हमेशा न्याय का प्रतीक रहा है, खुद एक झूठे कलंक के नीचे दबा दिया जाता है। सम्राट की हत्या के प्रयास के आरोप में—जो असल में एक बड़ा छलावा था—उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है। यहाँ लेखक आक्रोश के संयम और धैर्य को खूबसूरती से दिखाते हैं। आक्रोश चाहता तो पूरी सेना को पल भर में खत्म कर सकता था, लेकिन वह निर्दोष नागरिकों और सैनिकों पर वार नहीं करता। वह न्याय का इंतज़ार करता है, चाहे उसे कालकोठरी में डाल दिया जाए या भीड़ उस पर पत्थर बरसाए।
अम्बर का शौर्य और सम्राट रातोक का रहस्य
जब आक्रोश संकट में फँस जाता है, तब अम्बर एक सच्चे दोस्त की तरह उसके लिए ढाल बनकर खड़ा होता है। वह अकेले ही खजूरा की सेना और आक्रोश को मारने पर उतारू भीड़ का सामना करता है। अम्बर का साइबॉर्ग जैसा रूप और उसकी उन्नत बैसाखी से निकलने वाले हथियार इन युद्ध दृश्यों को और भी रोमांचक बना देते हैं।
इसी बीच कहानी में एक बड़ा मोड़ आता है, जब एक रहस्यमयी नकाबपोश बूढ़ा व्यक्ति आक्रोश और अम्बर की मदद करता है। जल्द ही पता चलता है कि यह कोई और नहीं, बल्कि असली सम्राट रातोक हैं। यहीं कहानी की सारी परतें खुलती हैं। सेनापति खजूरा ने पड़ोसी ग्रह के क्रूर तानाशाह सम्राट पूंछल के साथ मिलकर सत्ता हथियाने की साजिश रची थी। उन्होंने राजकुमार की हत्या कर दी और सम्राट रातोक को कैद कर लिया। पूंछल की शैतानी सेना उल्लूक ग्रह के नागरिकों को अपना भोजन बनाने के लिए तैयार बैठी थी।
चरमोत्कर्ष (Climax): न्याय की जीत

कहानी का अंत एक भयानक महायुद्ध के साथ होता है। एक तरफ पूंछल की डरावनी राक्षसी सेना है, और दूसरी तरफ अपनी प्रजा के लिए लड़ने वाले सम्राट रातोक के साथ आक्रोश और अम्बर खड़े हैं। इसी युद्ध के दौरान अम्बर को आखिरकार अपना खोया हुआ ‘शक्ति शास्त्र’ मिल जाता है—एक बेहद शक्तिशाली गदा—जिससे वह सेनापति खजूरा का वध कर उसे उसके कर्मों की सज़ा देता है। वहीं आक्रोश अपनी जादुई शक्तियों और शानदार तलवारबाज़ी से अहंकारी सम्राट पूंछल को पराजित कर देता है।
युद्ध के बाद सम्राट रातोक को उनका सिंहासन वापस मिल जाता है और वे आक्रोश से अपने किए की क्षमा माँगते हैं। इसी के साथ कहानी इस रोमांचक वचन पर खत्म होती है कि अब आक्रोश और अम्बर अपने असली और सबसे बड़े दुश्मन—कालगुरु खटारो—की ओर कदम बढ़ाएँगे।
पात्रों का गहन विश्लेषण
आक्रोश (Aakrosh):
इस कॉमिक्स में आक्रोश का एक नया और गहरा रूप सामने आता है। वह सिर्फ एक योद्धा नहीं, बल्कि एक सच्चा ‘त्यागी’ भी है। जब भीड़ उसे पत्थर मारती है, तब उसके संवाद (Page 16) उसके चरित्र की महानता को साफ दिखाते हैं—“ईश्वर! मुझे मृत्यु का खौफ नहीं है, किन्तु क्या हत्यारे के कलंक के साथ होगी मेरी मौत?” यह संवाद बताता है कि आक्रोश को अपनी जान से ज़्यादा अपने सम्मान और सत्य की चिंता है। उसका धैर्य और संयम उसे दूसरे सुपरहीरोज से बिल्कुल अलग बनाता है।

अम्बर (Ambar):
अम्बर इस शृंखला की सबसे बड़ी खोज साबित होता है। एक अपाहिज योद्धा होकर भी उसका इतना शक्तिशाली और साहसी होना बेहद प्रेरणादायक है। आक्रोश के प्रति उसकी निष्ठा ही इस कहानी की असली जान है। वह अपने मित्र के सम्मान के लिए पूरे ग्रह से भिड़ जाने का साहस रखता है और यही बात उसे एक यादगार किरदार बनाती है।
सेनापति खजूरा:
खजूरा एक क्लासिक किस्म का विलेन है—लालची, धोखेबाज़ और सत्ता का भूखा। वह पीठ में छुरा घोंपने से भी नहीं हिचकता। उसकी चालाकी और साज़िशें कहानी में ज़रूरी तनाव पैदा करती हैं और पाठक को लगातार चौकन्ना बनाए रखती हैं।
सम्राट पूंछल:
सम्राट पूंछल का चरित्र चित्रण बेहद डरावना है। वह क्रूरता और तानाशाही का प्रतीक है। उसकी राक्षसी सेना बच्चों के मन में एक साथ रोमांच और डर दोनों पैदा करती है, जो फंतासी कॉमिक्स की पहचान मानी जाती है।
चित्रांकन और कला: दिलीप कदम का मास्टरक्लास

दिलीप कदम और जयप्रकाश जगताप की जोड़ी ने इस कॉमिक्स के विजुअल्स में सचमुच कमाल कर दिया है। अम्बर का घोड़े पर सवार होकर भीड़ को चीरते हुए निकलना, एक्शन सीक्वेंस में गति का जबरदस्त अहसास देता है। तलवारों के टकराने के ध्वनि प्रभाव कहानी को और ज़्यादा जीवंत बना देते हैं। जलचर राक्षसों और सम्राट पूंछल की सेना का कल्पनाशील डिजाइन, उनकी डरावनी आँखें और भयानक आकृतियाँ उस दौर की कला का शानदार उदाहरण पेश करती हैं। वहीं सम्राट रातोक का अपने पुत्र के कंकाल से लिपटकर रोने वाला दृश्य—खासकर पीले और काले बैकग्राउंड का इस्तेमाल—दुख और पीड़ा को सीधे पाठक के दिल तक पहुँचा देता है।
लेखन और संपादन
लेखक तिलक ने इस कहानी को बहुत ही संवेदनशील और संतुलित तरीके से गढ़ा है। संवादों में शुद्ध हिंदी का प्रयोग किया गया है, जो उस समय की कॉमिक्स की एक खास पहचान हुआ करती थी। संपादन (सावन-संदीप) इतना कसावदार है कि कहानी कहीं भी ढीली नहीं पड़ती। हर पेज पर कोई न कोई नया मोड़ या सस्पेंस पाठक को अगले पन्ने की ओर खींच ले जाता है।
‘धधक उठा आक्रोश’ के प्रमुख संदेश

यह कॉमिक्स सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भीतर कई गहरे संदेश छिपे हुए हैं। अम्बर द्वारा विपरीत परिस्थितियों में आक्रोश का साथ देना यह दिखाता है कि सच्ची मित्रता का असली मतलब क्या होता है। वहीं आक्रोश का चरित्र हमें यह सिखाता है कि सत्य को साबित करने के लिए कभी-कभी अपमान और कष्ट भी सहने पड़ते हैं, लेकिन अंत में जीत हमेशा सत्य की ही होती है। सम्राट पूंछल और खजूरा का पतन इस बात को दोहराता है कि तानाशाही का अंत तय है और छल-कपट से हासिल की गई सत्ता कभी भी स्थायी नहीं रहती।
तकनीकी पक्ष: उस दौर की मार्केटिंग
कॉमिक्स में दिए गए विज्ञापन और ‘फ्री गिफ्ट’ (वॉटर बॉटल) का ज़िक्र करना ज़रूरी है। उस समय के बच्चों के लिए ये चीज़ें किसी बड़े आकर्षण से कम नहीं थीं। कॉमिक्स के अंत में ‘कालगुरु खटारो’ का नाम लेकर अगली कड़ी के लिए उत्सुकता पैदा करना उस दौर की एक बेहद स्मार्ट मार्केटिंग रणनीति थी।
जहाँ पिछली कड़ी ‘आक्रोश और अम्बर’ इन दोनों नायकों के परिचय और उनके बीच की गलतफहमी को दूर करने पर केंद्रित थी, वहीं ‘धधक उठा आक्रोश’ उनकी टीम-वर्क को मजबूती से दिखाती है। इस कॉमिक्स में एक्शन का स्तर काफी ऊँचा है और ‘शक्ति शास्त्र’ का मिलना कहानी में एक नया पावर-अप जोड़ देता है।
हालाँकि कहानी बहुत मजबूत है, लेकिन कुछ पाठकों को यह बात थोड़ी फिल्मी लग सकती है कि सम्राट रातोक का नकाब पहनकर इतनी आसानी से जेल से निकल जाना और आक्रोश की जगह किसी और को रख देना थोड़ा अविश्वसनीय है। फिर भी, कॉमिक्स की दुनिया में ऐसे प्लॉट ट्विस्ट आम बात हैं और यही चीज़ें रोमांच को और बढ़ाती हैं।
निष्कर्ष: एक अनिवार्य मास्टरपीस
‘धधक उठा आक्रोश’ मनोज कॉमिक्स की उन चुनिंदा कहानियों में से एक है जिसे हर उम्र का पाठक पसंद कर सकता है। यह कहानी हमें ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ता है और दोस्ती के लिए जान तक की बाज़ी लगानी पड़ती है।
अगर आप पुराने ज़माने की कॉमिक्स के शौकीन हैं और आक्रोश के प्रशंसक हैं, तो यह कॉमिक्स आपके कलेक्शन में एक अनमोल रत्न की तरह है। इसका शानदार आर्टवर्क, भावनाओं की गहराई और दमदार एक्शन सीक्वेंस इसे 10 में से 9.5 रेटिंग के पूरी तरह काबिल बनाते हैं।
आक्रोश का क्रोध सिर्फ विनाश का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह बुराई को जलाने वाली एक पवित्र अग्नि है। ‘धधक उठा आक्रोश’ नाम पूरी तरह सार्थक लगता है, क्योंकि अंत में आक्रोश का न्यायप्रिय क्रोध ही सारी बुराइयों को भस्म कर देता है।
