राज कॉमिक्स के विशाल संसार में ‘भेड़िया’ का किरदार हमेशा से अलग पहचान रखता है। वह सिर्फ एक ताकतवर योद्धा नहीं है, बल्कि ऐसा इंसान है जो हर वक्त अपने अंदर के ‘जानवर’ और ‘इंसान’ के बीच फंसा रहता है। इसी अंदरूनी लड़ाई को खास तौर पर दिखाता है यह विशेषांक ‘कोबी और भेड़िया’। यह कॉमिक सिर्फ एक सुपरहीरो की कहानी नहीं है, बल्कि किस्मत, पुराने पापों के पछतावे और खुद से खुद की जंग की बहुत भावुक कहानी है।
लगभग 90 पन्नों का यह विशेषांक तरुण कुमार वाही की दमदार कहानी और धीरज वर्मा के यादगार चित्रों का नतीजा है। 90 के दशक में इन दोनों की जोड़ी ने भारतीय कॉमिक्स की दुनिया में अलग ही हलचल मचा दी थी। यह अंक उसी दौर की ताकत को फिर से महसूस कराता है। आइए, इस पूरी कहानी को थोड़ा गहराई से लेकिन आसान शब्दों में समझते हैं।
दार्शनिक और ब्रह्मांडीय शुरुआत: फोबोस और मोबोस

कहानी की शुरुआत किसी छोटी-मोटी घटना से नहीं होती, बल्कि सीधे ब्रह्मांड की शक्तियों से होती है। पहले ही पन्नों में हमें अनंत आकाश और रहस्यमयी ताकतों के बारे में बताया जाता है। यहाँ ‘फोबोस’ और ‘मोबोस’ का जिक्र है, जिनके नाम मंगल ग्रह के दो उपग्रहों पर रखे गए हैं। लेखक के मुताबिक, फोबोस विनाश और डर की शक्ति है, जबकि मोबोस शांति और सृजन की ताकत का प्रतीक है।
ये दोनों ताकतें धरती पर एक ऐसे शरीर की तलाश में आती हैं जिसमें वे अपना असर दिखा सकें। उन्हें वह माध्यम ‘भेड़िया’ में मिलता है। यहीं से कहानी का असली विषय शुरू होता है—अंदर की लड़ाई। भेड़िया के भीतर जो हर समय टकराव चलता है, एक तरफ खूंखार जानवर और दूसरी तरफ दयालु इंसान, वह दरअसल इन दोनों ब्रह्मांडीय शक्तियों का असर है।
कहानी की यह शुरुआत साफ कर देती है कि आगे जो भी होने वाला है, वह सिर्फ एक्शन नहीं होगा। इसमें सोचने वाली बातें होंगी, अंदर झांकने वाली बातें होंगी। पाठक समझ जाता है कि वह एक साधारण कहानी नहीं, बल्कि एक गहरी यात्रा पर निकल रहा है।
अहिंसा की कसम और भेड़िया की मजबूरी

कहानी का मुख्य आधार पिछले भाग ‘जानवर’ से जुड़ा हुआ है। भेड़िया अपनी प्रेयसी जेन से बहुत प्यार करता है। लेकिन जेन को उसके अंदर के ‘जानवर’ से नफरत है। वह हिंसा और खून-खराबा पसंद नहीं करती। जेन की नजरों में अच्छा और महान बनने के लिए भेड़िया एक बहुत कठिन फैसला लेता है। वह कसम खाता है कि अब वह कभी हिंसा नहीं करेगा और अपने गुस्से को काबू में रखेगा।
यहीं से कहानी में असली तनाव शुरू होता है। जो भेड़िया पहले जंगल का रक्षक था, जिसके नाम से शिकारी कांपते थे, वही अब अपनी कसम की वजह से कमजोर पड़ने लगता है। साधारण डाकू भी उसका मजाक उड़ाने लगते हैं। धुर्रा और उसके साथी उसे गालियां देते हैं, उकसाते हैं, लेकिन वह अपनी कसम नहीं तोड़ता।
यह हिस्सा बहुत असरदार है क्योंकि यहाँ भेड़िया की अंदरूनी पीड़ा साफ दिखाई देती है। एक तरफ उसकी प्रतिज्ञा है, दूसरी तरफ जेन और फूजो बाबा की सुरक्षा की जिम्मेदारी। वह जानता है कि अगर उसने हाथ उठाया तो उसकी कसम टूट जाएगी, लेकिन अगर नहीं उठाया तो उसके अपने लोग खतरे में पड़ सकते हैं।
यह सवाल अपने आप पाठक के मन में आता है—क्या हर हाल में अहिंसा सही रास्ता है? क्या बुराई के सामने चुप रहना भी एक तरह की गलती नहीं है? कहानी हमें सीधा जवाब नहीं देती, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है।
अतीत की परछाईं: फजीहत सिंह और धुर्रा

कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है जब फूजो बाबा का अतीत सामने आता है। अब तक जिन्हें हम एक शांत, समझदार और दयालु बुजुर्ग के रूप में देखते आए थे, उनका असली नाम ‘फजीहत सिंह’ निकलता है। वह कभी एक खतरनाक डाकू हुआ करता था।
उसका पुराना साथी धुर्रा अचानक फिर से उसकी जिंदगी में लौट आता है। धुर्रा को उस सोने के खजाने की तलाश है जिसे फजीहत सिंह ने सालों पहले कहीं छिपा दिया था। यही लालच उसे वापस जंगल तक खींच लाता है।
फूजो बाबा का फ्लैशबैक कहानी का सबसे भावुक हिस्सा बन जाता है। वह बताते हैं कि एक डकैती के दौरान हुई एक भयानक घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी। उस हादसे में एक गर्भवती महिला और एक पुलिस इंस्पेक्टर के बेटे की जान चली गई थी। वही पल था जब फजीहत सिंह का दिल टूट गया और उसका मन अपराध से भर गया।
उसी पछतावे ने उसे ‘फूजो बाबा’ बना दिया। उसने हथियार छोड़ दिए और जंगल के जानवरों और लोगों की सेवा में अपना जीवन लगा दिया। यह बदलाव सिर्फ नाम का नहीं था, बल्कि आत्मा का था। यहाँ कहानी ‘प्रायश्चित’ यानी पापों के प्रायश्चित की बात को मजबूती से दिखाती है।

दूसरी ओर धुर्रा लालच, क्रूरता और पुराने पापों की याद का प्रतीक है। वह फूजो बाबा के शांत जीवन में फिर से जहर घोलने आता है। उसके लिए सोना ही सब कुछ है, जबकि फूजो बाबा के लिए अब शांति और सेवा ही असली दौलत है।
यहीं कहानी और गहरी हो जाती है। एक तरफ भेड़िया अपने अंदर के जानवर से लड़ रहा है, दूसरी तरफ फूजो बाबा अपने पुराने पापों की छाया से। दोनों की लड़ाइयां अलग हैं, लेकिन दर्द एक जैसा है। यही इस विशेषांक को खास बनाता है—यह सिर्फ बाहरी दुश्मनों की कहानी नहीं, बल्कि अंदर के दुश्मनों की भी कहानी है।
महा-विभाजन: कोबी का जन्म
इस विशेषांक का सबसे जबरदस्त और यादगार पल वह है जब भेड़िया के शरीर से उसका हिंसक रूप अलग होकर ‘कोबी’ बन जाता है। जब भेड़िया अपनी अहिंसा की कसम पर डटा रहता है और बाहर की मुश्किलें हद से ज्यादा बढ़ जाती हैं, तब उसके अंदर की दोनों ताकतें—फोबोस और मोबोस—आपस में भिड़ जाती हैं। यह टकराव इतना तेज होता है कि भेड़िया का शरीर ही दो हिस्सों में बंट जाता है।

एक तरफ है ‘कोबी’—जिसके पास भेड़िया की पूरी ताकत, तेज नाखून, पूंछ और वह जंगली सोच है जो किसी से नहीं डरती। दूसरी तरफ है ‘भेड़िया’—जो अब एक आम इंसान जैसा शरीर लेकर खड़ा है, जिसके पास न तो सुपर पावर है और न ही जानवर वाली ताकत, बस उसके पास है उसका वादा, उसकी नैतिकता और अहिंसा का इरादा।
कोबी का रूप बहुत डरावना और असरदार दिखाया गया है। वह खुद को वूल्फानो राज्य का असली राजकुमार मानता है और किसी की भी हुकूमत स्वीकार नहीं करता। वह न जेन की भावनाओं की परवाह करता है और न ही भेड़िया की कसम की। कोबी का जन्म भारतीय कॉमिक्स के लिए बहुत बड़ा मोमेंट है, क्योंकि यहीं से एक नए एंटी-हीरो का आगमन होता है। वह खलनायक भी है और नायक भी—बस उसका तरीका अलग है।
तिलिस्मी सफर और वूल्फानो का इतिहास

अब जब कोबी आजाद हो चुका है, वह जेन का अपहरण कर लेता है। उसका इरादा साफ है—वह जेन को अपनी रानी बनाकर अपने पुरखों के राज्य ‘वूल्फानो’ ले जाना चाहता है। यहीं से कहानी में फैंटेसी और एडवेंचर का तड़का लग जाता है।
भेड़िया, जो अब साधारण इंसान रह गया है, फूजो बाबा यानी गुरुराज भाटिकी के साथ उस रहस्यमयी रास्ते पर निकल पड़ता है जो वूल्फानो तक जाता है। यह सफर आसान नहीं है। इसमें जादू है, रहस्य है और हर मोड़ पर खतरा है।
वूल्फानो का इतिहास कोबी के किरदार को और मजबूत बनाता है। उसके पिता वुल्फा और माता सूर्या की कहानी किसी पुरानी दास्तान जैसी लगती है। एक श्राप की वजह से कोबी पत्थर की मूर्ति बन गया था। हजारों साल तक वह उसी हाल में रहा। फिर 50,000 साल बाद एक कुंवारी कन्या के खून की बूंदों से वह दोबारा जिंदा हुआ। यहाँ जेन उस भविष्यवाणी का प्रतीक बनती है।
यह पूरा हिस्सा कहानी को सिर्फ एक्शन कॉमिक नहीं रहने देता, बल्कि इसे पौराणिक और रहस्यमयी रंग भी दे देता है। पाठक को लगता है कि वह किसी लोककथा और सुपरहीरो कहानी का मिला-जुला रूप पढ़ रहा है।
संघर्ष और त्रिवुक्क से सामना

वूल्फानो पहुंचने के रास्ते में एक बड़ा खतरा सामने आता है—त्रिवुक्क। यह तीन सिर वाला अजीब और डरावना जीव है, जो उस तिलिस्म का रक्षक है।
अब सबसे खास बात यह है कि भेड़िया के पास इस समय कोई सुपर पावर नहीं है। वह सिर्फ अपनी ट्रेनिंग और दिमाग के भरोसे खड़ा है। गुरुराज भाटिकी ने उसे जो युद्ध कला सिखाई थी, वही उसके काम आती है।
त्रिवुक्क से लड़ाई सिर्फ ताकत की नहीं है, यह हिम्मत और समझ की भी परीक्षा है। भेड़िया हर वार सोच-समझकर करता है। वह साबित करता है कि नायक बनने के लिए सिर्फ ताकत काफी नहीं होती, इरादा और आत्मविश्वास भी उतने ही जरूरी हैं।
इस लड़ाई में भेड़िया पहले से ज्यादा इंसानी लगता है। उसकी कमजोरी ही उसकी ताकत बन जाती है। वहीं धीरज वर्मा ने इस पूरे युद्ध को जिस तरह चित्रित किया है, वह देखने लायक है। त्रिवुक्क के तीन सिर, उसका विशाल शरीर और भेड़िया की फुर्ती—हर फ्रेम में रोमांच भरा हुआ है।
चरमोत्कर्ष: कोबी बनाम भेड़िया
आखिरकार कहानी उस बड़े टकराव तक पहुंचती है जिसका इंतजार शुरू से था। एक तरफ कोबी है, जो जेन को जबरदस्ती शादी के लिए तैयार करना चाहता है। दूसरी तरफ भेड़िया है, जो अपनी जान की परवाह किए बिना उसे बचाने आया है।

यह लड़ाई सिर्फ दो शरीरों की नहीं है। यह दो सोच की लड़ाई है। कोबी मानता है कि ताकत ही सब कुछ है। जो शक्तिशाली है, वही सही है। वहीं भेड़िया मानता है कि ताकत का इस्तेमाल सही कारण के लिए होना चाहिए।
जब भेड़िया बुरी तरह घायल होकर गिर जाता है, तब जेन की भूमिका अहम हो जाती है। वह उसे उसकी मुखकमर पट्टिका पहनाती है, जिससे वह फिर से संभल पाता है। यह दृश्य बहुत भावुक है क्योंकि यहाँ जेन समझ जाती है कि कोबी और भेड़िया दोनों एक ही अस्तित्व के हिस्से हैं।
कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि इंसान के अंदर अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं। कोबी की हिंसा जरूरी है ताकि वह बुराई का सामना कर सके, लेकिन भेड़िया की शांति जरूरी है ताकि वह इंसान बना रहे। दोनों का संतुलन ही असली जीत है।
कलात्मक पक्ष: धीरज वर्मा का कमाल
इस विशेषांक में धीरज वर्मा का काम सच में शानदार है। उन्होंने कोबी के शरीर की बनावट, उसकी मांसपेशियों का खिंचाव और चेहरे के गुस्से को इतने असरदार तरीके से दिखाया है कि वह सच में खतरा महसूस होता है।
तिलिस्मी महल, घना जंगल, डाकुओं के अड्डे—हर जगह पर बारीकी से काम किया गया है। रंग भी इतने चमकीले और सटीक हैं कि पूरी कहानी का जादुई माहौल और मजबूत हो जाता है। हर पन्ना ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ी फिल्म का दृश्य हो।
संवाद और कहानी कहने का अंदाज

तरुण कुमार वाही ने इस कॉमिक में बहुत संतुलित और गहरे संवाद लिखे हैं, लेकिन भाषा इतनी भारी नहीं लगती कि समझ में न आए। कोबी की बातों में घमंड और ताकत की झलक साफ दिखती है। भेड़िया के शब्दों में दर्द और करुणा है। फूजो बाबा के संवादों में अनुभव और पछतावा नजर आता है।
कहानी की रफ्तार तेज है। करीब 90 पन्नों की होने के बावजूद कहीं भी कहानी धीमी या उबाऊ नहीं लगती। हर मोड़ पर कुछ ऐसा होता है कि पाठक अगला पन्ना पलटे बिना नहीं रह सकता।
निष्कर्ष: एक यादगार गाथा
‘कोबी और भेड़िया’ सिर्फ एक कॉमिक नहीं है, यह इंसान के अंदर चलने वाली जंग का आईना है। यह हमें समझाती है कि अपने अंदर की बुराई को खत्म करना जरूरी नहीं, बल्कि उसे काबू में रखना जरूरी है।
यह अंक भेड़िया सीरीज का सबसे खास और बड़ा अध्याय माना जा सकता है। इसी कहानी ने कोबी जैसे किरदार को जन्म दिया, जो आगे चलकर राज कॉमिक्स के सबसे लोकप्रिय चेहरों में शामिल हुआ।
अगर कोई पाठक सच में भेड़िया को समझना चाहता है, उसकी ताकत और कमजोरी दोनों को महसूस करना चाहता है, तो यह विशेषांक पढ़ना जरूरी है।
आखिर में यही बात दिल को छूती है कि सबसे बड़ी जीत बाहर के दुश्मन को हराने में नहीं, बल्कि खुद पर काबू पाने में है। भेड़िया का अपने ही हिंसक रूप से लड़ना और अंत में संतुलन बनाना ही उसे सच्चा नायक बनाता है।
राज कॉमिक्स के इतिहास में ‘कोबी और भेड़िया’ का नाम हमेशा खास रहेगा।
