राज कॉमिक्स के सबसे क्रूर, सख्त और ज़मीन से जुड़े नायक ‘डोगा’ की कहानियाँ हमेशा से समाज की गंदगी साफ करने के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं। डोगा कभी भी चमकदार हीरो नहीं रहा, बल्कि वह अंधेरी गलियों में पनपते अपराध का जवाब रहा है। लेकिन तरुण कुमार वाही द्वारा लिखित और संजय गुप्ता द्वारा प्रस्तुत “अपना भाई डोगा” श्रृंखला कुछ अलग ही स्तर पर जाती है। यहाँ डोगा सिर्फ अपराधियों से नहीं लड़ रहा, बल्कि वह एक ऐसी सोच और एक ऐसे भ्रम से टकरा रहा है जो पूरे मुंबई शहर को जलाकर राख कर देने की ताकत रखता है।
तरुण कुमार वाही की लेखनी और संजय गुप्ता की प्रस्तुति में बनी ‘अपना भाई डोगा’ कोई साधारण एक्शन कॉमिक नहीं है। यह ‘डोगा हिंदू है’ की अगली कड़ी है और भारतीय कॉमिक्स इतिहास के उन गिने-चुने अंकों में शामिल है जो सीधे तौर पर धर्म, राजनीति, दंगे और सांप्रदायिकता जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर वार करती है।
इस समीक्षा में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि कैसे एक एंटी-हीरो की छवि को सोची-समझी साजिश के तहत ‘जातिवादी’ बनाने की कोशिश की जाती है और कैसे वही नायक अपने अस्तित्व, अपनी पहचान और अपने न्याय की परिभाषा को बचाने के लिए संघर्ष करता है।
कथानक का विस्तार: एक मानवीय त्रासदी से नफरत के बाजार तक
कहानी की शुरुआत एक झकझोर देने वाली घटना से होती है। सूरज की आँखों के सामने एक स्कूल वैन का भयानक एक्सीडेंट हो जाता है, जिसमें कई मासूम बच्चे बुरी तरह घायल हो जाते हैं। यहीं से लेखक समाज की पहली बड़ी बीमारी को सामने लाते हैं—भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता। ब्लड बैंक का इंचार्ज और खून के दलाल इंसानियत की सेवा करने के बजाय मौत का सौदा करते नज़र आते हैं। वे बिना पैसे लिए खून देने से साफ इनकार कर देते हैं।

यहीं से सूरज यानी डोगा के भीतर का गुस्सा जन्म लेता है। रात होते ही वह उन दलालों को सबक सिखाता है, लेकिन कहानी असली खतरनाक मोड़ तब लेती है जब मुख्य खलनायक ‘ब्लडमैन’ की एंट्री होती है। ब्लडमैन सिर्फ एक अपराधी नहीं है, वह नफरत फैलाने वाला एक शातिर दिमाग है। वह डोगा द्वारा घायल किए गए एजेंटों में से पाँच मुस्लिम एजेंटों की हत्या कर देता है और जानबूझकर हिंदू एजेंटों को ज़िंदा छोड़ देता है। यह सब एक गहरी साजिश का हिस्सा है, ताकि पूरे शहर में यह संदेश फैल जाए कि डोगा एक ‘हिंदू रक्षक’ है और दूसरे धर्म के लोगों का दुश्मन।
इसके बाद पूरा शहर सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस उठता है। ‘रामबस्ती’ और ‘रहीम बस्ती’ के लोग, जो कभी एक-दूसरे के साथ रहते-खाते थे, अब एक-दूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं। अस्पताल, जो ज़िंदगी बचाने की जगह होता है, वही नफरत और ज़हर का अड्डा बन जाता है।
दंगा, अफवाह और मनोविज्ञान
इस समीक्षा का एक अहम पहलू यह है कि यह कॉमिक दिखाती है कि अफवाह कितनी ताकतवर हो सकती है। इस अंक में साफ तौर पर दिखाया गया है कि कैसे एक झूठी बात—कि डोगा ने सिर्फ मुसलमानों को मारा है—पूरे समाज के ताने-बाने को तोड़कर रख देती है। अस्पताल के अंदर तक खून का बँटवारा अब इंसानियत के आधार पर नहीं, बल्कि धर्म और जाति के आधार पर होने लगता है।

ब्लडमैन इस हालत का पूरा फायदा उठाता है। वह जानबूझकर दंगे भड़काता है ताकि घायल लोगों की संख्या बढ़े और उसका खून का धंधा और ज़्यादा मुनाफा कमा सके। यह हमारे समाज के उन सफेदपोश अपराधियों की सच्ची तस्वीर है जो लाशों पर अपनी राजनीति और व्यापार खड़ा करते हैं।
डोगा का आंतरिक द्वंद्व और अस्तित्व का संकट
डोगा के लिए यह लड़ाई सिर्फ बंदूक और मुक्कों की नहीं रह जाती। जब वह दंगे वाली जगह पर पहुँचता है, तो हिंदू भीड़ उसे ‘अपना भाई’ कहकर बुलाती है और उसे अपना मसीहा मानने लगती है। यही बात डोगा के लिए सबसे बड़ा अपमान और सबसे बड़ा संकट बन जाती है। डोगा का हमेशा से एक ही सिद्धांत रहा है—
“मैं कानून नहीं मानता, मैं सिर्फ जुर्म मिटाता हूँ।”
लेकिन जब उसे एक धर्म विशेष का रक्षक बना दिया जाता है, तो उसके न्याय की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो जाते हैं।

डोगा के शब्द—“क्या डोगा जातिवादी होने का कलंक साथ लेकर अपराध से लड़ पाएगा?”—उसकी अंदरूनी बेचैनी को साफ दिखाते हैं। उसे डर है कि अगर आज वह इस दाग को नहीं मिटा पाया, तो आने वाले समय में जब भी वह किसी अपराधी को सजा देगा, लोग उसे धर्म की नज़र से ही देखेंगे। एक नायक के लिए इससे बड़ी हार कुछ नहीं हो सकती, जब उसका काम उसकी पहचान के नीचे दब जाए।
सहायक पात्रों की भूमिका: अदरक चाचा, मोनिका और चीता
कहानी में अदरक चाचा का किरदार एक तरह से नैतिक रोशनी का काम करता है। जब वे खुद रक्तदान करने जाते हैं और भीड़ उन पर हमला कर देती है, तो यह दृश्य इंसानियत की हार को बेहद दर्दनाक तरीके से दिखाता है। अदरक चाचा सूरज को समझाते हैं कि कई बार हालात को और बिगड़ने से बचाने के लिए पीछे हटना ही असली बहादुरी होती है।
वहीं मोनिका और चीता सूरज को समझाने की कोशिश करते हैं कि उसे यह मामला पुलिस पर छोड़ देना चाहिए। लेकिन सूरज का विद्रोही स्वभाव और न्याय के लिए उसकी तड़प उसे चुप बैठने नहीं देती। वह जानता है कि पुलिस दंगाइयों को पकड़ तो सकती है, लेकिन उस ज़हर को नहीं निकाल सकती जो ब्लडमैन ने समाज के दिमाग में भर दिया है।
विलेन विश्लेषण: ‘ब्लडमैन’ – आधुनिक युग का राक्षस

ब्लडमैन एक प्रतीकात्मक विलेन है। वह उन लोगों का चेहरा है जो समाज में दरारें डालकर अपना फायदा निकालते हैं। उसका नाम ‘ब्लडमैन’ सिर्फ उसके खून के धंधे को ही नहीं दिखाता, बल्कि उस भूख को भी दर्शाता है जो लोगों की आपसी नफरत और टकराव से शांत होती है। उसका अंत डोगा के हाथों होना सिर्फ एक अपराधी का मारा जाना नहीं है, बल्कि उस सोच की हार है जो नफरत को बेचकर जिंदा रहती है।
कला, छायांकन और सुलेख (Art and Visuals)
‘अपना भाई डोगा’ का चित्रण स्टूडियो इमेज द्वारा किया गया है। चित्रों में जो कच्चापन (Rawness) दिखाई देता है, वह मुंबई—डोगा की कर्मभूमि—के तनाव और अराजकता को बहुत अच्छे से पकड़ता है।

दंगों वाले सीन में लाल और नारंगी रंगों का इस्तेमाल आग, गुस्से और तबाही के माहौल को प्रभावी ढंग से सामने लाता है।
सूरज के चेहरे पर दिखने वाली हताशा और डोगा के नकाब के पीछे छिपी उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति को कलाकार ने बारीकी से उकेरा है। सुनील पाण्डेय का सुलेखन संवादों की ताकत को और बढ़ा देता है। खासतौर पर उन दृश्यों में, जहाँ डोगा भीड़ को संबोधित करता है, शब्दों का चयन बेहद असरदार बन पड़ता है।
सामाजिक और राजनीतिक प्रासंगिकता
यह कॉमिक्स आज के दौर में और भी ज़्यादा मायने रखती है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ सोशल मीडिया पर फैली एक छोटी-सी अफवाह भी बड़े दंगों की वजह बन सकती है। ‘अपना भाई डोगा’ पाठकों को चेतावनी देती है कि किसी भी नायक या घटना को धर्म के चश्मे से देखना कितना खतरनाक साबित हो सकता है।

कॉमिक्स बहुत साफ संदेश देती है कि “अपराधी का कोई धर्म नहीं होता।” अगर कोई मुसलमान अपराध करता है, तो वह अपराधी है, और अगर कोई हिंदू अपराध करता है, तो वह भी अपराधी ही है। डोगा का ‘कुत्ते’ वाला मुखौटा इसी बात का प्रतीक है कि वह इंसानियत के उस स्तर पर खड़ा है जहाँ वह सिर्फ वफादारी (न्याय के प्रति) और गद्दारी (जुर्म) को पहचानता है।
कहानी की कमियाँ और खूबियाँ

खूबियाँ:
उस समय सांप्रदायिकता जैसे संवेदनशील विषय पर कॉमिक्स लिखना एक बड़ा जोखिम था, जिसे राज कॉमिक्स ने पूरी मजबूती से उठाया।
डोगा को सिर्फ एक लड़ने वाली मशीन की तरह नहीं, बल्कि सोचने, सवाल करने और परेशान होने वाले इंसान के रूप में दिखाया गया है। कहानी की रफ्तार तेज है, जो पाठक को शुरू से लेकर अंत तक बांधे रखती है।
कमियाँ:
कुछ दृश्यों में हिंसा ज़्यादा है, जो शायद बहुत छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त न हो।
अंत को थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता था, खासकर जहाँ समाज के दोबारा संभलने और जुड़ने पर ज़ोर होता।
निष्कर्ष: एक अमर कृति
‘अपना भाई डोगा’ सिर्फ एक कॉमिक बुक नहीं है, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज की तरह सामने आती है। यह हमें बताती है कि नफरत की आग में सबसे पहले सत्य और न्याय ही जलते हैं। डोगा का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि एक बेहतर समाज बनाने के लिए हमें अपनी छोटी और संकीर्ण सोच से ऊपर उठना होगा।
राज कॉमिक्स ने इस विशेषांक के ज़रिये यह साबित कर दिया कि कॉमिक्स सिर्फ बच्चों के मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि गंभीर और ज़रूरी मुद्दों पर बात करने का मजबूत माध्यम भी हो सकती हैं। डोगा का यह अंक हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो समाज में फैली नफरत की राजनीति को समझना चाहता है।
समीक्षा के अंत में बस यही कहा जा सकता है कि डोगा “हमारा” भाई इसलिए है, क्योंकि वह हमारे भीतर के उस डर और चुप्पी को तोड़ता है जो हम अक्सर अन्याय देखकर ओढ़ लेते हैं। यह कॉमिक्स डोगा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने लायक कहानी है।
रेटिंग: 9.5/10

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