९० के दशक में जब नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव और डोगा जैसे दिग्गज भारतीय कॉमिक्स की दुनिया पर छाए हुए थे, उसी दौर में एक ऐसा नायक सामने आया जिसने भारतीय तिरंगे को सिर्फ़ अपनी पोशाक नहीं, बल्कि अपनी ताक़त बना लिया—वह था ‘तिरंगा’। तिरंगा सीरीज़ की कॉमिक्स ‘कफ़न’ (अंक संख्या ६६०) सिर्फ़ एक एक्शन से भरी कहानी नहीं है, बल्कि यह भावनाओं, बदले और देशभक्ति के टकराव की एक बेहद दर्दनाक और असरदार दास्तान भी है। १९९६ में प्रकाशित यह कॉमिक, जिसे ‘नागराज वर्ष’ के नाम से भी जाना जाता है, आज भी अपने मजबूत कथानक और दमदार प्रस्तुति की वजह से खास जगह रखती है।
कथानक का विस्तार (Plot Summary):
कहानी की शुरुआत एक दिल दहला देने वाले हादसे से होती है। बापू खादी ग्रामोद्योग के भवन में तीन पूर्व स्वतंत्रता सेनानी मौजूद होते हैं, तभी वहाँ एक भयानक विस्फोट हो जाता है। इस धमाके में उन बुजुर्ग क्रांतिकारियों के चीथड़े उड़ जाते हैं। यह कोई हादसा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साज़िश होती है। इसके कुछ ही समय बाद देश के एक और बड़े देशभक्त, ‘राजन बाबू’, की उनके ड्राइवर समेत बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। हत्यारा कोई मामूली अपराधी नहीं है। वह ज़हरीले तीरों का इस्तेमाल करता है और खुद को ‘कफ़न’ कहता है।

कहानी के नायक अभय, जो तिरंगा की असली पहचान है, को इस पूरे मामले की भनक तब लगती है जब उसकी सहपाठी सबा के पिता अचानक लापता हो जाते हैं। सबा के पिता एक देशभक्त गीतकार हैं, जिनकी आवाज़ और शब्दों से लोगों में जोश भरता है। बाहर की दुनिया में अभय एक सीधा-सादा, पढ़ाई में डूबा रहने वाला छात्र लगता है, लेकिन हकीकत में वही ‘तिरंगा’ बनकर इंसाफ़ की रक्षा कर रहा होता है।
‘कफ़न’ नाम का यह विलेन एक अजीब और डरावनी वेशभूषा पहनता है। उसकी पोशाक तिरंगे के रंगों से प्रेरित है, लेकिन उसके सीने पर बनी खोपड़ी यह साफ़ दिखा देती है कि उसकी सोच कितनी ज़हरीली है। वह खुद को देशभक्तों का दुश्मन मानता है। वह महान स्वतंत्रता सेनानी रामानंद सागर पर हमला करता है, जहाँ पहली बार तिरंगा और कफ़न आमने-सामने आते हैं। इस भिड़ंत में पाठकों को पता चलता है कि कफ़न सिर्फ़ घातक हथियारों जैसे क्रॉसबो और ज़हरीले तीरों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह लड़ाई की कला में भी पूरी तरह माहिर है।
कहानी का सबसे भावुक और अहम हिस्सा कफ़न की पृष्ठभूमि, यानी उसकी ओरिजिन स्टोरी है। कफ़न का असली नाम अबराज खान है। उसके दादा और पिता आज़ाद हिंद फौज का हिस्सा रहे थे। लेकिन किसी गलतफहमी या गद्दारी के शक में, क्रांतिकारियों ने ही उसके पिता शाहबाज़ खान पर देशद्रोह का आरोप लगा दिया। उन्हें मारने की कोशिश की गई, जिससे वे अपाहिज हो गए और बाकी ज़िंदगी गरीबी और अपमान में गुज़ारने को मजबूर हुए। मरते वक्त शाहबाज़ खान ने अपने बेटे अबराज से कसम ली कि वह उन सभी तथाकथित देशभक्तों को खत्म करेगा जिन्होंने उनके साथ अन्याय किया। यही नफ़रत और बदले की आग अबराज को ‘कफ़न’ बना देती है।

कॉमिक्स का चरमोत्कर्ष एक कॉलेज समारोह में होता है, जहाँ स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित किया जाना था। कफ़न ने वहाँ एक खतरनाक जाल बिछा रखा है, जिसमें अशोक चक्र और नुकीले तीरों का जानलेवा मेल है। एक तरफ तिरंगा इन बुजुर्गों की जान बचाने में लगा होता है, तो दूसरी तरफ कफ़न के गुंडे अभय के घर पर हमला कर देते हैं, जहाँ उसके पिता हवलदार रामनाथ मौजूद होते हैं। कहानी एक बेहद दुखद मोड़ पर खत्म होती है, जहाँ तिरंगा देश को तो बचा लेता है, लेकिन अपनी निजी ज़िंदगी में बहुत बड़ी कीमत चुकाता है—उसके पिता की मौत हो जाती है और उसका घर जलकर राख हो जाता है।
चरित्र चित्रण (Character Analysis):
तिरंगा (अभय): तिरंगा का किरदार भले ही देखने में ‘कैप्टन अमेरिका’ से प्रेरित लगे, लेकिन उसकी जड़ें पूरी तरह भारतीय ज़मीन में धंसी हुई हैं। अभय का शांत, सादा स्वभाव और तिरंगा का उग्र, जुनूनी देशभक्ति वाला रूप मिलकर एक शानदार संतुलन बनाते हैं। इस कॉमिक में उसकी बेबसी उस वक्त साफ़ दिखती है, जब वह एक तरफ अपने पिता को बचाना चाहता है और दूसरी तरफ देश के दुश्मनों को रोकने की ज़िम्मेदारी भी उसके कंधों पर होती है।

कफ़न (अबराज): कफ़न कोई सीधा-सादा काला या सफ़ेद विलेन नहीं है। वह एक ट्रैजिक विलेन है, जिसकी नफ़रत की जड़ें उसके पिता के साथ हुए अन्याय में छिपी हैं। वह तिरंगे का ही एक विकृत रूप है, जो यह दिखाता है कि जब देशभक्ति की जगह नफ़रत ले लेती है, तो उसका अंजाम कितना भयावह हो सकता है। उसका नाम ‘कफ़न’ खुद इस बात का संकेत है कि वह देशभक्तों के लिए मौत बनकर आया है।
हवलदार रामनाथ: अभय के पिता एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मी हैं। उनका और अभय का रिश्ता बेहद गहरा है। वे अभय को कायर समझते हैं, क्योंकि उन्हें उसकी असली पहचान का पता नहीं होता, फिर भी वे उसे दिल से चाहते हैं। उनका बलिदान इस कहानी को एक ऐसी भावनात्मक गहराई देता है, जो पाठक को लंबे समय तक अंदर तक झकझोरती रहती है।
लेखन और संवाद (Writing and Dialogues):

हनीफ अजहर का लेखन बेहद चुस्त और कसावदार है। कहानी की रफ्तार तेज़ बनी रहती है और पढ़ते वक्त कहीं भी बोरियत महसूस नहीं होती। संवादों में देशभक्ति साफ़ झलकती है, लेकिन वे भाषण जैसे भारी या उपदेश देने वाले नहीं लगते। खासकर कफ़न के संवाद, जहाँ वह क्रांतिकारियों पर “नकली देशभक्ति” का आरोप लगाता है, समाज के एक ऐसे नज़रिए को सामने रखते हैं जिस पर आम तौर पर बात नहीं होती। ये संवाद पाठक को सोचने पर मजबूर करते हैं। मनीष गुप्ता का संपादन कहानी की गति और बहाव को संतुलित बनाए रखता है, जिससे कहानी बिना रुके आगे बढ़ती रहती है।
कला और चित्रांकन (Artwork and Presentation):

मिलिंद और बिट्टू का चित्रांकन ९० के दशक की राज कॉमिक्स की पहचान को पूरी तरह दर्शाता है। कफ़न की वेशभूषा का डिज़ाइन बेहद असरदार है—वह एक साथ डरावना भी लगता है और याद रह जाने वाला भी। लड़ाई के दृश्य, खासतौर पर अशोक चक्र से जुड़े युद्ध के सीन, बहुत ही खूबसूरती और समझदारी से बनाए गए हैं। रंगों का चयन, जो ज़्यादातर तिरंगे के रंगों के आसपास घूमता है, कहानी की थीम और शीर्षक के साथ पूरा न्याय करता है। पृष्ठ संख्या ७ पर गिरती हुई ईंटें और पृष्ठ ९ पर कफ़न का हमला, विज़ुअल स्टोरीटेलिंग के शानदार उदाहरण हैं, जहाँ बिना ज़्यादा शब्दों के ही सब कुछ समझ आ जाता है।
थीम और संदेश (Themes and Message):

तिरंगा की यह कहानी प्रतिशोध और कर्तव्य के बीच चलने वाले उस पुराने संघर्ष को बहुत असरदार ढंग से दिखाती है। कफ़न का किरदार उस अंधे बदले की आग का प्रतीक है, जो सही और गलत के बीच की रेखा मिटा देती है। वहीं दूसरी तरफ तिरंगा का मजबूत कर्तव्यबोध उसे सबसे मुश्किल हालात में भी अपने सिद्धांतों से डिगने नहीं देता। कहानी यह कड़वा सच भी सामने लाती है कि बचपन में पैदा हुई एक गलतफहमी और अपनों द्वारा ठुकराया जाना कैसे एक मासूम इंसान को अपराध की राह पर धकेल सकता है। अंत में यह कहानी पाठकों को देशभक्ति की असली परिभाषा पर सोचने के लिए मजबूर करती है—क्या देशभक्ति सिर्फ़ नारों और प्रतीकों तक सीमित है, या फिर वह उन कठिन फैसलों और निस्वार्थ कर्मों में छुपी है, जहाँ निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर सही काम किया जाता है।
समीक्षात्मक विश्लेषण (Critical Analysis):

‘कफ़न’ सिर्फ़ एक सुपरहीरो की जीत की कहानी नहीं है। यह एक ऐसी जीत की कहानी है, जिसकी कीमत बहुत भारी होती है। यहाँ नायक जीत तो जाता है, लेकिन बदले में बहुत कुछ खो देता है। भारतीय कॉमिक्स में अक्सर नायकों को हर हाल में अजेय दिखाया जाता है, लेकिन इस कहानी में तिरंगा को भावनात्मक रूप से टूटते हुए दिखाया गया है। यही बात उसे ज़्यादा इंसानी और असली बनाती है।
कॉमिक्स का कवर पेज, जिसमें तिरंगा को अशोक चक्र पर तीरों से बिंधा हुआ दिखाया गया है, बेहद प्रतीकात्मक है। यह दृश्य भीष्म पितामह की शरशय्या की याद दिलाता है और पहले ही पन्ने से कहानी की गंभीरता को साफ़ कर देता है।
हालाँकि कुछ पाठकों को यह लग सकता है कि कफ़न के हृदय परिवर्तन या उसकी कहानी के अंत को थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता था, लेकिन ३२ पृष्ठों की सीमित जगह में लेखक ने अपना काम बहुत अच्छे से निभाया है।
निष्कर्ष:
राज कॉमिक्स की ‘कफ़न’ एक बेहतरीन और यादगार रचना है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आज़ादी और सुरक्षा की असली कीमत क्या होती है। यह कॉमिक सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करती, बल्कि भीतर तक झकझोर भी देती है। अगर आप भारतीय कॉमिक्स के प्रशंसक हैं और आपने तिरंगा की यह कहानी नहीं पढ़ी है, तो यकीन मानिए आपने ९० के दशक के कॉमिक्स इतिहास का एक बहुत अहम हिस्सा मिस कर दिया है।
यह कहानी अभय के जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत है, जहाँ वह सिर्फ़ एक नायक नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसा बेटा बन जाता है जिसने अपने पिता को खो दिया है। यही दर्द उसे और ज़्यादा मजबूत और दृढ़ बनाता है। ‘कफ़न’ वाकई एक ऐसी कॉमिक है, जो खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक आपके दिमाग में घूमती रहती है।
रेटिंग: ४.५/५
