भारतीय कॉमिक्स के स्वर्ण युग, यानी 80 और 90 के दशक में, जब राज कॉमिक्स, डायमंड कॉमिक्स और मनोज कॉमिक्स जैसे बड़े नाम बाज़ार पर छाए हुए थे, उसी दौर में मेरठ की ‘दुर्गा पॉकेट बुक्स’ ने भी अपनी एक अलग और थोड़ी हटके पहचान बनाई। दुर्गा कॉमिक्स ने ऐसे किरदार रचे जो पूरी तरह देसी थे और जिनमें पल्प-फिक्शन का तड़का और पौराणिक कल्पना का जबरदस्त मेल देखने को मिलता था। इसी धारा से निकला एक बेहद लोकप्रिय और अलग किस्म का किरदार था—‘महाबली लंगूरा’।
इस लेख में हम ‘महाबली लंगूरा’ के पहले अंक की विस्तार से समीक्षा करेंगे। यह अंक सिर्फ किसी सुपरहीरो के जन्म की कहानी नहीं है, बल्कि उस समय के कॉमिक्स जगत की सोच, लेखन का अंदाज़, आर्ट की समझ और पाठकों की पसंद को भी सामने लाता है। एक तरह से कहा जाए तो यह उस दौर का एक ज़िंदा दस्तावेज़ है, जो आज भी पढ़ने पर पुरानी यादों को ताज़ा कर देता है।
कथानक और मूल पृष्ठभूमि (Plot Summary)
कहानी की शुरुआत ‘आमेर’ नाम की एक आदिवासी बस्ती से होती है। लेखक ने इस बस्ती को बड़े ही सजीव और असरदार ढंग से पेश किया है। कबीले के लोग ‘शरद पूर्णिमा’ की रात ‘यूनो’ नाम का त्योहार मना रहे हैं। चारों तरफ नाच-गाना, ढोल-नगाड़े और उत्सव का माहौल है, लेकिन इसी के साथ कुलदेवता को खुश करने के लिए पशु बलि की परंपरा भी दिखाई गई है। यही चीज़ कहानी के देसी और थोड़ा रॉ मिज़ाज को शुरुआत में ही सेट कर देती है।

उत्सव के अगले दिन कबीले में अलग-अलग तरह की प्रतियोगिताएँ होती हैं, जिनमें तीरंदाज़ी और मल्ल युद्ध यानी कुश्ती खास तौर पर दिखाई जाती है। ‘लुका’, ‘डागू’ और ‘रुआ’ जैसे किरदारों के ज़रिए आदिवासी योद्धाओं की ताकत और बहादुरी सामने आती है। लेकिन कहानी में असली तनाव तब पैदा होता है जब ‘दारा’ नाम का एक योद्धा जंगल से वापस नहीं लौटता। उसे ढूँढने गए लुका, डागू और रुआ भी रहस्यमयी तरीके से गायब हो जाते हैं।
यहीं से कहानी में डर और रहस्य का रंग गहराने लगता है। कबीले का सरदार अपने कुछ साथियों के साथ जंगल में खोज के लिए निकलता है, जहाँ उनका सामना ‘कटीला’ नाम के एक विशालकाय राक्षस से होता है। कटीला, जो ‘राक्षसनी डायन’ का भाई है, बेहद खूंखार और ताकतवर दिखाया गया है। उसका मकसद अपनी बहन के कहने पर कबीले के सौ तंदुरुस्त आदमियों को पकड़ना है, ताकि उन्हें ‘शैतान’ को जगाने के लिए बलि चढ़ाया जा सके।
जब कबीले के योद्धा और खुद सरदार भी कटीला का सामना करने में नाकाम हो जाते हैं, तब उन्हें अपने आख़िरी सहारे ‘महाबली लंगूरा’ की याद आती है। वे नगाड़े बजाकर और खास तरीके से उसे पुकारते हैं। कंधार की पहाड़ियों में रहने वाला महाबली लंगूरा अपनी योगशक्ति से यह पुकार सुन लेता है और आदिवासियों की मदद के लिए तुरंत उड़ान भरता है।

कहानी का दूसरा हिस्सा लंगूरा और कटीला के बीच होने वाले ज़बरदस्त युद्ध पर टिका है। जहाँ कटीला अपनी जानवरों जैसी कच्ची ताकत पर भरोसा करता है, वहीं लंगूरा अपनी फुर्ती, उड़ने की क्षमता और समझदारी से लड़ाई लड़ता है। आखिरकार लंगूरा यह समझ जाता है कि कटीला की असली ताकत उसके सींगों में है। एक साहसी चाल चलते हुए वह कटीला के सींग उखाड़ देता है, जिससे राक्षस की मौत हो जाती है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि एक रोमांचक मोड़ पर जाकर रुकती है, जहाँ ‘पिशाचनी डायन’ अपने भाई की मौत का बदला लेने की कसम खाती है और अगले अंक ‘महाबली लंगूरा और पिशाचनी डायन’ की ज़मीन तैयार हो जाती है।
चरित्र चित्रण (Character Analysis)
महाबली लंगूरा (The Hero):
लंगूरा का किरदार भारतीय कॉमिक्स में एक बिल्कुल नया और साहसी प्रयोग था। नीली त्वचा, पीठ पर बड़े-बड़े पंख और बंदरों जैसी फुर्ती उसे बाकी सुपरहीरोज़ से अलग बनाती है। वह सिर्फ ताकतवर ही नहीं है, बल्कि उसके पास टेलीपैथी यानी विचारों को पढ़ने की शक्ति और योगशक्ति जैसी मानसिक ताकतें भी हैं। वह आदिवासियों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं है और जैसे ही वे उसे पुकारते हैं, वह बिना देर किए मदद के लिए पहुँच जाता है। उसका स्वभाव शांत है, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर वह पूरी दृढ़ता के साथ खड़ा होता है।
कटीला (The Brute):
कटीला इस अंक का मुख्य खलनायक है। उसका हरा रंग, बड़े सींग और विशाल शरीर उसे एक क्लासिक मॉन्स्टर जैसा लुक देते हैं। वह बेहद क्रूर है और आदिवासियों को ‘मच्छर’ और ‘चूहे’ जैसे शब्दों से बुलाता है, जिससे उसका घमंड साफ झलकता है। उसकी ताकत का राज उसके सींगों में होना एक जाना-पहचाना फैंटेसी एलिमेंट है, जो कहानी को सरल लेकिन प्रभावी बनाता है।
पिशाचनी डायन और जहरीली:
ये दोनों खलनायक परदे के पीछे से खेल खेलने वाले किरदार हैं। डायन काले जादू और तंत्र-मंत्र की प्रतीक है। इसी अंक में उसकी बेटी ‘जहरीली’ का भी परिचय मिलता है, जो आगे चलकर लंगूरा के लिए एक बड़ी मुसीबत बनने वाली है।
कबीले के लोग:
आदिवासी सरदार और उसके साथी भले ही सीमित संसाधनों वाले हों, लेकिन उन्हें बहादुर और आत्मसम्मानी दिखाया गया है। वे जानते हैं कि कटीला बेहद ताकतवर है, फिर भी उससे भिड़ने से पीछे नहीं हटते। यह बात पाठक के मन में उनके लिए सम्मान पैदा करती है।
चित्रांकन और कला पक्ष (Art and Illustration)

‘महाबली लंगूरा’ के इस अंक में हरविन्द्र मांकड़ का चित्रांकन खास तौर पर ध्यान खींचता है। उनकी ड्रॉइंग में एक अलग ही तरह की गति और ऊर्जा महसूस होती है। रंगों की बात करें तो कॉमिक्स में प्राइमरी कलर्स का खुलकर इस्तेमाल किया गया है। लंगूरा के नीले शरीर और कटीला के गहरे हरे रंग के बीच का कंट्रास्ट पन्नों पर बहुत शानदार तरीके से उभरकर आता है।
एक्शन सीन बड़े ही भव्य हैं। चाहे लंगूरा का हवा में कलाबाज़ियाँ खाना हो या कटीला का पहाड़ों को उखाड़ फेंकना, हर फ्रेम में दम दिखाई देता है। ‘ढिश्शूम’, ‘धड़ाम’ और ‘कड़ाक’ जैसे साउंड इफेक्ट्स उस दौर की कॉमिक्स की पहचान थे और यहाँ भी वे एक्शन को और ज़्यादा मज़ेदार बना देते हैं। पैनलिंग भले ही सरल हो, लेकिन कहानी का फ्लो कहीं टूटता नहीं। खास तौर पर पेज 29 पर लंगूरा द्वारा कटीला के सींग उखाड़ने वाला सीन काफी ज़्यादा असरदार और ग्राफिक बन पड़ा है, जो लंबे समय तक याद रहता है।
भाषा और संवाद (Language and Dialogues)

कॉमिक्स की भाषा सीधी-सादी हिंदी है, जिसमें उर्दू के शब्द भी बड़ी सहजता से घुले-मिले हैं। संवादों में हल्का सा नाटकीयपन है, जो इसे पल्प फिक्शन वाली फील देता है। “तेरा यही अंत होना था दुष्ट कटीला!” जैसे संवाद वीर रस को अच्छे से उभारते हैं। लेखक डी.डी. पोखरियाल ने ‘जम्मा हो’, ‘हरया हो’ और ‘यूनो’ जैसे आदिवासी शब्दों का इस्तेमाल करके कहानी में एक अलग जान डाल दी है। ये शब्द न सिर्फ माहौल को असली बनाते हैं, बल्कि आदिवासियों की संस्कृति और आस्था को भी सम्मान के साथ पेश करते हैं।
थीम और सामाजिक संदर्भ (Themes and Social Context)

यह कॉमिक्स अच्छाई और बुराई की लड़ाई को अपने केंद्र में रखती है, जहाँ अंततः जीत अच्छाई की ही होती है। पूरी कहानी जंगल और पहाड़ों की पृष्ठभूमि में घटती है, जो इंसान और प्रकृति के रिश्ते को मज़बूती से दिखाती है। सामूहिक एकता का संदेश भी साफ दिखाई देता है, क्योंकि जब आदिवासी अकेले कुछ नहीं कर पाते, तब सब मिलकर अपने रक्षक को पुकारते हैं। डायन, राक्षस और जादुई तत्व भारतीय लोककथाओं से प्रेरित हैं, जो बच्चों की कल्पना को नई उड़ान देते हैं और कहानी को और रोचक बना देते हैं।
आलोचनात्मक विश्लेषण (Critical Analysis)
खूबियाँ:
इस कॉमिक्स की सबसे बड़ी ताकत इसका अनोखा नायक है। लंगूरा उस दौर के आम इंसानी सुपरहीरोज़ से बिल्कुल अलग था, इसलिए वह तुरंत ध्यान खींचता है। कहानी की रफ्तार तेज़ है और कहीं भी बोरियत महसूस नहीं होती। विज़ुअल स्टोरीटेलिंग इतनी मजबूत है कि बिना संवाद पढ़े भी काफी कुछ समझ आ जाता है।

कमियाँ:
कुछ जगहों पर लॉजिक की कमी साफ दिखती है। जैसे कटीला के सींग उखड़ते ही उसका मर जाना थोड़ा अचानक लगता है। उसकी ताकतों का कोई ठोस आधार नहीं दिया गया है, हालाँकि उस समय की फैंटेसी कॉमिक्स में यह आम बात थी। इसके अलावा आदिवासियों को कुछ हद तक पुराने स्टीरियोटाइप में दिखाया गया है, हालाँकि उन्हें योद्धा के रूप में सम्मान देकर इस कमी को संतुलित करने की कोशिश की गई है।
निष्कर्ष और विरासत
‘महाबली लंगूरा’ अंक-1 सिर्फ एक कॉमिक नहीं है, बल्कि यह 90 के दशक की उस रचनात्मक आज़ादी की मिसाल है, जहाँ प्रकाशक नए और जोखिम भरे प्रयोग करने से नहीं डरते थे। सीमित साधनों के बावजूद दुर्गा कॉमिक्स ने ऐसा किरदार गढ़ा जिसने बच्चों के बचपन को रंगीन बना दिया।
आज के डिजिटल दौर में, जब हर तरफ CGI और हाई-ग्राफिक्स का बोलबाला है, तब महाबली लंगूरा जैसी कॉमिक्स अपने हाथ से बने चित्रों और सीधी कहानियों के कारण एक खास नॉस्टेल्जिया पैदा करती हैं। यह अंक याद दिलाता है कि अच्छी कहानी के लिए सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि कल्पना और दिल से जुड़े किरदार ज़रूरी होते हैं।
अगर आप भारतीय कॉमिक्स के इतिहास को समझना चाहते हैं, तो ‘महाबली लंगूरा’ का यह पहला अंक ज़रूर पढ़ना चाहिए। वीरता, जादू और रोमांच का यह मेल आज भी उतना ही असरदार है। दुर्गा कॉमिक्स का यह तूफानी करैक्टर सच में बार-बार पढ़े जाने लायक है।
