80 और 90 के दशक में भारतीय कॉमिक्स इंडस्ट्री अपने पूरे जोश पर थी। एक तरफ जहाँ ‘राज कॉमिक्स’ ने ‘नागराज’ जैसा जबरदस्त सुपरहीरो देश को दिया, वहीं दूसरी ओर देश के अलग-अलग हिस्सों से कई छोटे प्रकाशक भी सामने आए। मेरठ से निकलकर आया ‘राधा कॉमिक्स’ भी उन्हीं में से एक था। इसी दौर में आई कॉमिक्स ‘नागेश’ एक ऐसी रचना है जिसे देखकर साफ समझ आ जाता है कि यह राज कॉमिक्स के ‘नागराज’ से काफी हद तक प्रेरित है, या कहें कि उसकी सीधी-सी कॉपी लगती है। 32 पन्नों की यह कॉमिक्स न सिर्फ एक नए सुपरहीरो के जन्म की कहानी सुनाती है, बल्कि उस समय के कॉमिक्स लेखन और ड्रॉइंग के स्तर को भी दिखाती है।
कथानक और मूल कहानी (Plot Overview)
कहानी की शुरुआत डॉक्टर नागपाल से होती है, जो एक म्यूज़ियम में लोगों को ‘नागमणि’ दिखाने के लिए एक खास कार्यक्रम रखते हैं। नागमणि, जो हमारी लोककथाओं और नाग-कथाओं में हमेशा से एक ताकतवर चीज़ मानी जाती रही है, यहाँ भी एक बेहद शक्तिशाली वस्तु के रूप में दिखाई गई है। लेकिन कार्यक्रम के दौरान अचानक कुछ नकाबपोश लुटेरे वहाँ हमला कर देते हैं। वे नागमणि तो चुरा ही लेते हैं, साथ ही बेगुनाह डॉक्टर नागपाल की बेरहमी से हत्या भी कर देते हैं।

यहीं से कहानी में एंट्री होती है असली विलेन ‘प्रोफेसर अमरीश’ की। वह एक खतरनाक अपराधी वैज्ञानिक है, जिसका मकसद नागमणि की ताकत से एक ऐसा ‘नाग-मानव’ बनाना है जो पूरी तरह उसके कंट्रोल में रहे। अमरीश के पास ‘अर्जुन’ नाम के एक मरे हुए सर्कस कलाकार का शरीर होता है। वह नागमणि को अर्जुन के दिमाग में ट्रांसप्लांट करता है और अपनी आधुनिक मशीनों की मदद से उसमें दोबारा जान डालने की कोशिश करता है।
कहानी का दूसरा पहलू ‘नागेंद्र बाबा’ से जुड़ा हुआ है, जो एक सिद्ध योगी हैं। उन्होंने एक कमंडल में एक शक्तिशाली नाग की आत्मा को बंद कर रखा होता है और उसकी शांति के लिए तपस्या कर रहे होते हैं। लेकिन प्रोफेसर अमरीश के खतरनाक प्रयोग का असर इतना गहरा होता है कि वह आत्मा कमंडल तोड़कर बाहर निकल जाती है और सीधे अर्जुन के मृत शरीर में प्रवेश कर जाती है। इसी तरह जन्म होता है—‘नागेश’ का।
इसके बाद प्रोफेसर अमरीश नागेश को अपनी पहली परीक्षा देता है। वह उसे अपने दुश्मन ‘मार्को’ का सामान बंदरगाह पर लूटने भेजता है। यहाँ नागेश अपनी अनोखी ताकतों का खुलकर प्रदर्शन करता है—गोलियों से बचना, अपने शरीर से जहरीले सांप छोड़ना और दुश्मनों को पल भर में खत्म कर देना। मार्को का पूरा गिरोह तहस-नहस हो जाता है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, नागेंद्र बाबा के दखल और नागेश के अंदर जागते इंसान की वजह से उसे समझ आने लगता है कि उसका इस्तेमाल गलत कामों के लिए किया जा रहा है। आखिरकार वह प्रोफेसर अमरीश के चंगुल से निकलकर सही रास्ते पर चलने का फैसला करता है।
नागराज की प्रतिलिपि: एक विस्तृत तुलना

जैसा कि यूज़र ने भी कहा है, ‘नागेश’ काफी हद तक ‘नागराज’ की कॉपी लगता है। इसके कई ऐसे कारण हैं जो किसी भी कॉमिक्स रीडर को तुरंत नज़र आ जाते हैं।
नाम की समानता सबसे पहला पॉइंट है। ‘नागराज’ और ‘नागेश’ दोनों ही नाम सांपों के राजा या नागों के देवता की भावना देते हैं।
शक्तियों की बात करें तो यहाँ भी काफी समानता दिखती है। नागराज की तरह नागेश भी अपने शरीर से हजारों सांप निकाल सकता है। कॉमिक्स में उसे ‘नाग-रस्सी’ का इस्तेमाल करते हुए और दुश्मनों पर सांपों की बरसात करते दिखाया गया है, जो साफ-साफ नागराज का ट्रेडमार्क स्टाइल है।
उत्पत्ति की कहानी भी लगभग वही है। नागराज को प्रोफेसर नागमणि ने एक हथियार के रूप में बनाया था, जिसे बाद में बाबा गोरखनाथ ने सही रास्ता दिखाया। उसी तरह नागेश को प्रोफेसर अमरीश बनाता है और नागेंद्र बाबा उसे इंसानियत और न्याय का मतलब समझाते हैं।
वेशभूषा भी काफी मिलती-जुलती है। हरा सूट, शरीर पर सांपों जैसी धारियाँ और कमरबंद—सब कुछ नागराज के शुरुआती लुक की याद दिलाता है। यहाँ तक कि नागेश के माथे पर बनी ‘तीसरी आँख’ भी नागराज की खास शक्तियों की ओर इशारा करती है।
पात्र चित्रण (Character Analysis)
नागेश (अर्जुन) इस कहानी का हीरो है, लेकिन शुरुआत में वह सिर्फ एक मोहरा होता है। लेखक ने उसके अंदर के संघर्ष को दिखाने की कोशिश की है। एक मरे हुए इंसान का दोबारा ज़िंदा होना और फिर अपनी पहचान को लेकर उलझन में रहना, कहानी को थोड़ा इमोशनल और दिलचस्प बनाता है।

प्रोफेसर अमरीश एकदम क्लासिक कॉमिक्स विलेन है—गंजा, बेरहम और ताकत का भूखा। उसका साइंटिफिक बैकग्राउंड उसे और भी खतरनाक बनाता है। उसके लिए नागेश सिर्फ एक हथियार है, कोई इंसान या बेटा नहीं।
नागेंद्र बाबा कहानी में एक मेंटर की भूमिका निभाते हैं। उनकी शांति, योग शक्ति और सोच प्रोफेसर अमरीश की मशीनों और लालच के बिल्कुल उलट खड़ी दिखाई देती है। उनकी बेटी ‘कामिनी’ भी कहानी में एक अहम सहयोगी बनकर सामने आती है।
मार्को और जम्बो जैसे किरदार छोटे अपराधी हैं, जिन्हें कहानी में खास तौर पर नागेश की ताकत दिखाने के लिए लाया गया है। ये लोग बस यह साबित करने का ज़रिया बनते हैं कि नागेश कितना खतरनाक और शक्तिशाली हो सकता है।
कला और चित्रकारी (Art and Illustrations)

किशोर ओबराय द्वारा बनाई गई इस कॉमिक्स की चित्रकारी 80 के दशक की सीमित तकनीक और कम संसाधनों के बावजूद काफ़ी ठीक-ठाक और संतोषजनक कही जा सकती है। उस दौर की ज़्यादातर कॉमिक्स की तरह इसमें भी प्राथमिक रंगों—लाल, नीला, पीला और हरा—का खूब इस्तेमाल हुआ है। साथ ही बैकग्राउंड में पीले और चमकीले रंगों का प्रयोग दृश्यों को ज़्यादा उभरकर सामने लाता है और कॉमिक्स को उसी दौर की पहचान देता है।
नागेश के एक्शन सीन, हवा में उड़ते सांप और गोलियों की बौछार को काफी तेज़ और एनर्जेटिक अंदाज़ में दिखाया गया है। ‘तड़-तड़’ और ‘धड़ाक’ जैसे साउंड इफेक्ट्स पढ़ते समय एक अलग ही मज़ा देते हैं और सीन को ज़्यादा ज़िंदा महसूस कराते हैं। हाँ, कुछ जगहों पर शरीर की बनावट यानी एनाटॉमी में हल्की गड़बड़ी नज़र आती है, लेकिन इसके बावजूद किरदारों के चेहरों पर डर, गुस्सा और हैरानी जैसे भाव साफ़-साफ़ दिखते हैं, जो कलाकार की मेहनत को दर्शाते हैं।
संवाद और भाषा (Dialogue and Language)

इस कॉमिक्स की कहानी टीका राम ने लिखी है। संवाद ज़्यादा भारी-भरकम नहीं हैं, बल्कि सीधी और आसान हिंदी में लिखे गए हैं। बीच-बीच में उर्दू के शब्द जैसे ‘मुजरिम’, ‘खौफनाक’ और ‘ईजाद’ भी सुनने को मिलते हैं, जो उस समय की कॉमिक्स की आम खासियत थी।
उस दौर की शैली के अनुसार इसमें लंबे-लंबे टेक्स्ट बॉक्स भी दिए गए हैं, जो कहानी का बैकग्राउंड और हालात समझाने का काम करते हैं। कई जगह संवाद काफी नाटकीय हो जाते हैं, जैसे— “आज से हम अपराध जगत में तहलका मचा देंगे!” या “नहीं कुत्तों… कमीनों… तुम्हारे ये ख्वाब कभी पूरे नहीं होंगे!”। आज के हिसाब से ये डायलॉग थोड़े ओवर लग सकते हैं, लेकिन उस समय के पाठकों को यही ड्रामा और जोश सबसे ज़्यादा आकर्षित करता था।
समीक्षा और आलोचनात्मक विश्लेषण

‘नागेश’ पढ़ने में एक मनोरंजक कॉमिक्स ज़रूर है, लेकिन इसमें नयापन यानी ओरिजिनैलिटी की काफी कमी महसूस होती है। जिस तरह से किरदार, उनकी ताकतें और पूरी सेटिंग बनाई गई है, उससे साफ लगता है कि यह ‘नागराज’ की ज़बरदस्त लोकप्रियता को भुनाने की एक कोशिश थी।
सकारात्मक पक्ष:
कहानी की रफ्तार बहुत तेज़ है। पहले पन्ने से लेकर आख़िरी पन्ने तक घटनाएँ लगातार होती रहती हैं, जिससे 32 पन्नों की यह कॉमिक्स कहीं भी बोर नहीं करती। नागमणि और कमंडल जैसे तत्वों का इस्तेमाल कहानी में अच्छे तरीके से किया गया है, जो भारतीय लोककथाओं और पौराणिक सोच से जुड़ाव महसूस कराते हैं। इसके अलावा, अंत में बुराई पर अच्छाई की जीत और एक अपराधी का सुधर जाना, समाज के लिए एक साफ़ और सकारात्मक संदेश देता है।

नकारात्मक पक्ष:
एक पाठक के तौर पर नागेश के किरदार में नागराज की छाया साफ दिखाई देती है, जिससे इसकी अपनी अलग पहचान थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। इसके अलावा, कहानी में विज्ञान और जादू का जो मेल दिखाया गया है—जैसे मशीनों की मदद से किसी मृत शरीर में आत्मा का प्रवेश—वह काफी अतार्किक लगता है। हालाँकि फैंटेसी कॉमिक्स के हिसाब से इसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। साथ ही, किरदारों को बहुत जल्दी-जल्दी पेश किया गया है, जिस वजह से पाठक उनके साथ गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता।
निष्कर्ष
‘नागेश’ सिर्फ एक कॉमिक्स नहीं है, बल्कि उस दौर की सोच और माहौल का आईना है, जब मेरठ और दिल्ली जैसे शहरों के प्रकाशक भारतीय बच्चों के लिए अपने-अपने देसी सुपरहीरो गढ़ने में लगे हुए थे। भले ही यह नागराज की एक साफ झलक लिए हुए कॉमिक्स हो, लेकिन राधा कॉमिक्स ने इसे अलग नाम और थोड़ा अलग माहौल देने की कोशिश ज़रूर की है।
किशोर ओबराय की ड्रॉइंग और टीका राम की कहानी मिलकर ऐसा अनुभव देती हैं, जो आज के पाठकों के लिए किसी नॉस्टेल्जिया ट्रिप से कम नहीं है।
अगर आप पुराने ज़माने की कॉमिक्स के शौकीन हैं और भारतीय कॉमिक्स के विकास को समझना चाहते हैं, तो ‘नागेश’ को अपने कलेक्शन में शामिल करना एक अच्छा विचार हो सकता है। यह कॉमिक्स दिखाती है कि कैसे एक ही कॉन्सेप्ट, यानी ‘नाग-मानव’, को अलग-अलग प्रकाशकों ने अपने-अपने तरीके से पेश किया। नागेश की यह पहली लड़ाई सिर्फ अपराधियों से नहीं थी, बल्कि अपनी खुद की पहचान बनाने की भी थी। कहानी का अंत आने वाली अगली कड़ी ‘ऐलान-ए-जंग’ के वादे के साथ होता है, जो उस समय के पाठकों के उत्साह को बनाए रखने के लिए काफी था।
कुल मिलाकर, ‘नागेश’ भारतीय चित्रकथाओं के इतिहास का एक ऐसा भूला-बिसरा लेकिन दिलचस्प अध्याय है, जिसे जानना और पढ़ना दोनों ही अपने आप में मज़ेदार अनुभव है।
