‘सर्पसत्र’ श्रृंखला की शुरुआत ‘सर्पसत्र’ से हुई थी, जिसने पाठकों को एक ऐसे भविष्य में ले जाया जहाँ दो अलग-अलग कॉमिक्स के नायक—राज और तुलसी—एक ही धरातल पर खड़े नजर आए। इसके बाद ‘सर्पद्वन्द्व’ में उनके बीच टकराव दिखाया गया। अब ‘सर्पयज्ञ’ उस टकराव के नतीजों और पर्दे के पीछे चल रहे गहरे षड्यंत्रों को सामने लाती है। अनुपम सिन्हा जी ने यहाँ सिर्फ एक्शन नहीं, बल्कि कहानी में रहस्य और रोमांच का ऐसा तड़का लगाया है कि पाठक पन्ना पलटने से खुद को रोक नहीं पाता।
कथानक का विस्तार (Plot Analysis)
कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ ‘सर्पद्वन्द्व’ खत्म हुई थी। इसके दो मुख्य ध्रुव हैं:
पाताल लोक में नागराज: नागराज पाताल विष से संक्रमित है और उपचार की तलाश में ‘माया जगत’ में फंस गया है। यहाँ वह ‘माया दर्पण’ के अंदर एक ऐसी दुनिया से लड़ रहा है जो असली नहीं, लेकिन उसे मिलने वाला दर्द और मौत का खतरा बिल्कुल असली है। नागराज का संघर्ष सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है।

सतह (पृथ्वी) पर तौसी: दूसरी तरफ, तौसी अपनी पत्नी अप्सरा (श्री) की तलाश में अंधा होकर तबाही मचा रहा है। उसे विसर्पी ने अपने ‘राजदंड’ की ताकत से बंदी बना लिया है। विसर्पी को शक है कि एडवोकेट तिरुमला ही असली अप्सरा हो सकती है।
‘सर्पयज्ञ’ में कहानी का मुख्य केंद्र वह ‘यज्ञ’ है जिसे वेदाचार्य और नागाबाबा जैसे ज्ञानी पुरुष इस महाविनाश को रोकने के लिए कर रहे हैं। लेकिन असली खेल तो कालचक्र, नागपाशा और मिस किलर जैसे खलनायक खेल रहे हैं। कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है जब तौसी के मित्र G-18 को पता चलता है कि तौसी संकट में है। वह उसे बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।
चरित्र चित्रण और विकास (Character Development)
नागराज: विवशता और वीरता का संगम
इस भाग में नागराज को एक ऐसे योद्धा के रूप में दिखाया गया है जो भीतर से विष के कारण टूट रहा है, लेकिन बाहर से मजबूत है। माया दर्पण के दृश्यों में नागराज की बुद्धिमानी और उसकी ‘इच्छाधारी’ शक्तियों का शानदार उपयोग देखने को मिलता है। अनुपम सिन्हा ने नागराज के ‘संयमित’ व्यक्तित्व को बहुत खूबसूरती से उभारा है।
तौसी: प्रेम की आग
तौसी इस कहानी का ‘इमोशनल इंजन’ है। उसका क्रोध जायज लगता है क्योंकि वह अपनी पत्नी से दूर है। लेकिन उसका उतावलापन उसे खलनायकों के जाल में फंसा देता है। तौसी का चरित्र हमें सिखाता है कि बिना सोचे-समझे किया गया साहस अक्सर खतरे में डाल देता है।

विसर्पी: न्याय की रखवाली
विसर्पी यहाँ न्यायाधीश की भूमिका में है। वह सिर्फ नागद्वीप की रक्षा नहीं कर रही, बल्कि सत्य तक पहुँचने के लिए तौसी पर मुकदमा चलाने का साहस भी दिखाती है। नागराज की अनुपस्थिति में वह एक मजबूत नेता के रूप में उभरती है।
खलनायक (The Manipulators):
मिस किलर और कालचक्र की योजनाएं इतनी जटिल हैं कि पाठक भी उलझ जाता है। तिरुमला का रहस्य—कि वह असली अप्सरा है या नहीं—पूरी कॉमिक्स में एक सस्पेंस की तरह बना रहता है।
कला और चित्रांकन (Art and Illustration)

अनुपम सिन्हा का आर्टवर्क हमेशा की तरह इस कॉमिक्स की जान है। हर पैनल अपनी ऊर्जा से रोमांच पैदा करता है। G-18 और नागराज के साथियों के बीच युद्ध हो या माया दर्पण के राक्षसों से नागराज का मुकाबला, दृश्य बहुत जीवंत हैं। चित्रों की ताकत संवादों से भी ज्यादा असर डालती है—तौसी के चेहरे का क्रोध और बेबसी, विसर्पी की गंभीरता और वेदाचार्य का तेज, सब चरित्र को जीवन देती है। इसके अलावा पाताल लोक के काल्पनिक संसार और शहर की ऊँची इमारतों का अंतर कलाकार की दूरदर्शिता दिखाता है; खासकर ‘यज्ञ’ के दौरान आग और धुएँ का चित्रण इतना सजीव है कि पाठक खुद उस दृश्य की गर्मी और प्रभाव महसूस कर सकता है।
संवाद और संपादन (Dialogues and Editing)
कॉमिक्स के संवाद बहुत प्रभावशाली हैं। खासकर वो दृश्य जहाँ पौराणिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का टकराव होता है। जैसे—”यज्ञ केवल अग्नि का खेल नहीं, यह इच्छाशक्ति की आहुति है”—ऐसे वाक्य कहानी को और गहराई देते हैं। मनोज गुप्ता का संपादन बहुत सटीक है; कहानी कहीं भी भटकती नहीं है और हर उप-कहानी (Sub-plot) मुख्य कहानी को मजबूती देती है।
‘सर्पयज्ञ‘ के मुख्य आकर्षण (Key Highlights)

सुपरहीरो कॉमिक्स के सामान्य ढांचे से हटकर पार्किंग लॉट में ‘नाग अदालत’ का दृश्य देखना एक बेहद मौलिक और नया विचार है, जो विसर्पी की प्रशासनिक ताकत और न्यायप्रियता को दिखाता है। कहानी में G-18 का तौसी के प्रति अटूट समर्पण उसे सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि एक सच्चे मित्र के रूप में दर्शाता है, जो भावनात्मक गहराई जोड़ता है। अंत में नागराज और तौसी के साथ होने वाली रहस्यमयी घटनाएं पाठकों को एक बेहतरीन ‘क्लिफहैंगर’ पर ला खड़ा करती हैं, जो अगले भाग ‘सर्पयुग’ के लिए उत्सुकता और तड़प को चरम पर पहुँचाती हैं।
तकनीकी पक्ष: प्रिंटिंग और पैकेजिंग
राज कॉमिक्स बाय मनोज गुप्ता ने इस संस्करण की गुणवत्ता पर खास ध्यान दिया है। चमकदार पन्ने (Glossy Pages) और बेहतरीन रंगों का इस्तेमाल चित्रों को और आकर्षक बनाता है। फोंट का चयन और पन्नों पर प्लेसमेंट ऐसा है कि पढ़ते समय आँखों पर जोर नहीं पड़ता। कवर पेज अपने आप में मास्टरपीस है, जो पूरी श्रृंखला का सार समेटे हुए है।
समीक्षा: क्यों यह पढ़ना जरूरी है?
‘सर्पयज्ञ’ सिर्फ एक कॉमिक्स नहीं है, बल्कि उन लाखों प्रशंसकों के लिए उपहार है जिन्होंने बचपन में नागराज और तौसी की अलग-अलग कहानियाँ पढ़ी थीं। यह कॉमिक्स:

- नॉस्टेल्जिया (Nostalgia) और आधुनिकता का सही मेल है।
- इसमें सिर्फ ‘मारधाड़’ नहीं, बल्कि एक मज़बूत कहानी (Strong Plot) है।
- यह भारतीय कॉमिक्स की उस विरासत को आगे बढ़ाती है जिसे विदेशी कॉमिक्स (Marvel/DC) के दौर में भूलाया जा रहा था।
कुछ कमियाँ (Minor Critiques)
इतनी बेहतरीन कृति में भी कुछ छोटी बातें खटक सकती हैं। जैसे, कुछ पात्रों की संख्या इतनी ज्यादा है कि नए पाठकों के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि कौन किसका साथी है। ‘पूर्वसार’ दिया गया है, लेकिन कहानी इतनी घनी है कि आपको पिछले दोनों भाग (सर्पसत्र और सर्पद्वन्द्व) पढ़े बिना इसका पूरा आनंद नहीं मिलेगा।
अंतिम निष्कर्ष (Final Verdict)
‘सर्पयज्ञ’ राज कॉमिक्स की एक ‘कल्ट क्लासिक’ बनने की क्षमता रखती है। यह हमें एक ऐसी यात्रा पर ले जाती है जहाँ प्रेम, ईर्ष्या, कर्तव्य और छल का अद्भुत प्रदर्शन है। अनुपम सिन्हा जी ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि नागराज के चरित्र के साथ वे जो न्याय कर सकते हैं, वह कोई और नहीं कर सकता।
मनोज गुप्ता का यह प्रयास भी सराहनीय है कि वे इन महागाथाओं को नए अंदाज़ में पेश कर रहे हैं। अगर आप कॉमिक्स प्रेमी हैं, तो ‘सर्पयज्ञ’ आपके संग्रह का गौरव होना चाहिए। यह भाग आपको रोमांचित करेगा, भावुक करेगा और अंत में एक बड़े सवाल के साथ छोड़ देगा।
रेटिंग: 4.9/5 (एक ऐसी शानदार कृति जिसे मिस करना किसी कॉमिक्स प्रेमी के लिए अपराध के समान है!)
