‘प्रलयंकारी योशो’ और ‘योशो की जंग’ के बाद, इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी ‘योशो पृथ्वी लोक में’ (संख्या ५४५) पाठकों के लिए कहानी में एक नया और रोमांचक मोड़ लेकर आती है। यह कॉमिक्स इसलिए भी खास हो जाती है क्योंकि यहाँ नायक पहली बार अपने जन्म स्थान ‘सूर्यग्रह’ को छोड़कर अपने पिता की मातृभूमि ‘पृथ्वी’ पर कदम रखता है। ३१ पृष्ठों की इस कॉमिक्स में लेखक ऋतुराज और चित्रकार संजय शिरोडकर ने मिलकर एक ऐसी कहानी रची है जो सिर्फ ज़बरदस्त एक्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि नायक के मन में चल रहे संघर्ष, उलझन और बदले की आग को भी साफ़-साफ़ सामने रखती है।
कथानक का विस्तृत विश्लेषण:
कहानी की शुरुआत एक दमदार और वैज्ञानिक माहौल के साथ होती है। ‘योशो’, जो सूर्यग्रह की राजकुमारी ‘शौर्या’ और पृथ्वी के मानव ‘योगराज’ का पुत्र है, अपने पिता की तलाश में अंतरिक्ष यान के ज़रिए पृथ्वी पर आता है। उसका यान हिमालय की बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों, यानी नीलाम्बर पर्वत, में उतरता है। यहाँ लेखक बड़ी समझदारी से योशो के किरदार की बुनियाद रखता है। योशो सिर्फ एक ताकतवर योद्धा नहीं है, बल्कि वह दो अलग-अलग ग्रहों की शक्तियों और संस्कृतियों का मेल है।

हिमालय का संघर्ष और शक्तियों का परिचय:
कॉमिक्स के शुरुआती पन्नों में हम देखते हैं कि योशो हिमालय की गुफाओं में बैठकर पृथ्वी के इतिहास और यहाँ की महान विभूतियों, जैसे राम और कृष्ण, के बारे में पढ़ रहा है। इसी दौरान उस पर जंगली जानवरों, खास तौर पर भालू और भेड़ियों, का हमला हो जाता है। यह सीन योशो की शक्तियों को दिखाने के लिए बहुत असरदार तरीके से रचा गया है। योशो के शरीर से आग की लपटें निकलती हैं और उसकी आँखों से गोलियाँ बुलेट की तरह दनादन निकलती हैं। वह जानवरों को आसानी से हरा देता है, लेकिन साथ ही उसे यह एहसास भी होता है कि पृथ्वी के जानवर इंसानों के मुकाबले उतने खतरनाक नहीं हैं।
दाढ़ी बाबा के साथ रहस्यमयी मुलाकात:
इसके बाद योशो की मुलाकात ‘दाढ़ी बाबा’ नाम के एक रहस्यमयी तपस्वी से होती है। यहीं कहानी में जादुई यथार्थवाद का अच्छा-सा तड़का लगता है। दाढ़ी बाबा की लंबी दाढ़ी सिर्फ बाल नहीं है, बल्कि लोहे की ज़ंजीरों जैसी मज़बूत है, जो योशो को जकड़ लेती है। योशो और बाबा के बीच एक छोटा लेकिन ज़बरदस्त मुकाबला होता है, जहाँ योशो अपनी अग्नि शक्ति से बाबा को प्रभावित कर देता है। दाढ़ी बाबा ही वह कड़ी बनते हैं जो योशो को उसके पिता योगराज के बारे में पहली ठोस जानकारी देते हैं। वे बताते हैं कि योगराज ‘क्रॉस लाइन’ के पास लापता हुआ था और उसे खोजने के लिए योशो को ‘सारंग’ नाम के व्यक्ति से मिलना होगा।
शहर का सफर और ‘होटल सारंग’ का हंगामा:
पहाड़ों से निकलकर योशो अब आधुनिक शहर में कदम रखता है। यहाँ उसे अपनी उन्नत सभ्यता और पृथ्वी की पिछड़ी तकनीक के बीच का फर्क साफ़ दिखाई देता है। वह सीधे ‘होटल सारंग’ पहुँचता है और सारंग से मिलने के लिए ज़बरदस्त हंगामा कर देता है। होटल का रजिस्टर वह अपनी मुट्ठी में दबाकर जला देता है और मार्शल आर्ट में माहिर योद्धाओं की पूरी टुकड़ी को अकेले ही धूल चटा देता है। उसकी यह आक्रामकता और ताकत का प्रदर्शन आखिरकार सारंग को कमरे से बाहर आने पर मजबूर कर देता है।

सारंग का विश्वासघात और ‘ऑपरेशन रेड लाइन’:
सारंग, जो बाहर से एक जासूसी एजेंसी का बड़ा अफसर लगता है, योशो का स्वागत करता है। वह उसे बताता है कि योगराज का यान प्रशांत महासागर के खतरनाक ‘क्रॉस लाइन’ इलाके में समा गया था, जहाँ से आज तक कोई भी ज़िंदा वापस नहीं लौटा। इसके बाद सारंग योशो को एक मिशन पर भेजता है, जिसका नाम है ‘ऑपरेशन रेड लाइन’। यहीं से कहानी एक नया मोड़ लेती है। पाठक धीरे-धीरे समझने लगता है कि सारंग जितना मददगार दिखाई दे रहा है, असल में उतना भरोसेमंद नहीं है।
क्लाइमैक्स और सस्पेंस:
योशो को हेलीकॉप्टर के ज़रिए समुद्र के बीच एक जहाज़ तक ले जाया जाता है। वहीं से वह ‘रेड लाइन’ के खतरनाक इलाके में प्रवेश करता है। समुद्र के भीतर उसे खून चूसने वाली लताओं से लड़ना पड़ता है और आखिरकार वह एक रहस्यमयी टापू पर पहुँच जाता है। वहाँ एक विशाल यांत्रिक पक्षी उसे पकड़ लेता है। कहानी का अंत एक दमदार क्लिफहैंगर पर होता है, जहाँ सारंग का असली चेहरा सामने आता है। अब यह साफ़ होने लगता है कि वह या तो योशो को उसके पिता की तरह खत्म करना चाहता है, या फिर उसे अपने मकसद के लिए एक मोहरे की तरह इस्तेमाल करना चाहता है।
पात्रों का चित्रण:
योशो: इस भाग में योशो एक खोजी और योद्धा—दोनों रूपों में उभरता है। उसके मन में अपने पिता को लेकर गुस्सा और नफरत है, लेकिन फिर भी वह अपने कर्तव्यों को लेकर गंभीर रहता है। उसकी शक्तियों में विज्ञान और अध्यात्म का जो मेल है, वही उसे बाकी नायकों से अलग और खास बनाता है।

दाढ़ी बाबा: वे कहानी में रहस्य और जादुई माहौल जोड़ते हैं। उनकी दाढ़ी को हथियार के रूप में दिखाना एक बेहद अनोखा और यादगार आइडिया है। वे योशो के लिए गुरु और मार्गदर्शक की तरह सामने आते हैं, हालाँकि अंत में उनका संदिग्ध रूप कहानी को और गहराई देता है।
सारंग: वह एक क्लासिक जासूसी बॉस की तरह है—चालाक, मौके का फायदा उठाने वाला और रहस्यों से भरा हुआ। योशो की शक्तियों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की उसकी चाह उसके स्वार्थी स्वभाव को साफ़ दिखाती है।
चित्रांकन और कला पक्ष (Art & Visuals):

संजय शिरोडकर और रोहित का कला पक्ष वाकई काबिले-तारीफ है। हिमालय के दृश्यों में बर्फ़ की सफेदी और नीले आसमान का मेल एक शांत लेकिन भव्य माहौल बनाता है। एक्शन सीन्स में भालू और भेड़ियों के साथ हुई लड़ाइयों को बेहद जीवंत तरीके से दिखाया गया है, जहाँ ‘तड़-तड़’, ‘धड़ाम’ और ‘साईं’ जैसे ध्वनि-सूचक शब्द पन्नों में जान डाल देते हैं। कहानी की वैज्ञानिक विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए योशो का यान, हेलीकॉप्टर और समुद्र के भीतर के दृश्य आधुनिक तकनीक के साथ दिखाए गए हैं। साथ ही पात्रों की बनावट पर भी बारीकी से काम किया गया है—योशो का काला और गुलाबी सूट उसकी पहचान बनता है, जबकि दाढ़ी बाबा के चेहरे और उनकी लंबी दाढ़ी के डिटेल्स बेहद खूबसूरती से उकेरे गए हैं।
समीक्षात्मक टिप्पणी:

‘योशो पृथ्वी लोक में’ की कहानी को लेखक ऋतुराज ने बहुत समझदारी और संतुलन के साथ आगे बढ़ाया है। उन्होंने पूरे कथानक को तीन अहम स्तरों में बाँट दिया है—प्रकृति के साथ संघर्ष (हिमालय), अध्यात्म के साथ टकराव (दाढ़ी बाबा), और आधुनिक विज्ञान से मुठभेड़ (शहर और रेड लाइन)। इन तीनों स्तरों की वजह से कहानी एक ही दिशा में नहीं चलती, बल्कि हर मोड़ पर नया अनुभव देती है। कहानी की रफ्तार काफ़ी तेज़ है, जिससे पाठक की दिलचस्पी आख़िरी पन्ने तक बनी रहती है। खास तौर पर, जब योशो अपने पिता योगराज के लिए “मक्कार” शब्द का इस्तेमाल करता है, तो यह उसके भीतर छिपे गहरे मानसिक दर्द और गुस्से को साफ़ दिखाता है। यही भावनात्मक पहलू इस कॉमिक्स को एक साधारण सुपरहीरो कहानी से आगे ले जाकर एक ऐसे बेटे की खोज बना देता है, जहाँ नफरत और कर्तव्य दोनों साथ-साथ चलते हैं।
सकारात्मक पक्ष:
इस कॉमिक्स में योशो की आग से जुड़ी शक्तियों और उसकी आँखों से निकलने वाली गोलियों (Eye Bullets) का इस्तेमाल बेहद प्रभावशाली ढंग से किया गया है, जो उसे बाकी सुपरहीरो से अलग पहचान देता है। दाढ़ी बाबा का किरदार कहानी में सिर्फ रोचक ही नहीं है, बल्कि रहस्य और मार्गदर्शन का ऐसा अनोखा मेल पेश करता है जो पूरी कथा को और मज़बूत बनाता है। दृश्य स्तर पर हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों से लेकर समुद्र की गहराइयों तक की अलग-अलग सेटिंग पाठकों को एक बड़ा और रोमांचक अनुभव देती है। अंत में कहानी को एक दमदार क्लिफहैंगर पर छोड़ना लेखक की एक सफल चाल साबित होती है, जो अगले अंक को पढ़ने की चाह को और तेज़ कर देती है।

नकारात्मक पक्ष:
शहर में योशो का व्यवहार कुछ जगहों पर ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामक लगता है, जैसे होटल का रजिस्टर जला देना, जो एक राजकुमार की गरिमा के हिसाब से थोड़ा खटक सकता है। इसके अलावा, कहानी बहुत जल्दी खत्म हो जाती है, जिससे ऐसा लगता है कि यह किसी बड़ी कहानी की सिर्फ एक भूमिका या शुरुआत भर है।
निष्कर्ष:
तुलसी कॉमिक्स की यह प्रस्तुति अपने दौर की एक बेहतरीन ‘क्रॉस-ओवर’ कहानी मानी जा सकती है। यह योशो को सिर्फ एक दूसरे ग्रह के योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे नायक के तौर पर स्थापित करती है जिसकी कहानी सीधे पृथ्वी से जुड़ती है। ‘योशो पृथ्वी लोक में’ यह याद दिलाती है कि ९० के दशक की भारतीय कॉमिक्स सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे कल्पना की उन ऊँचाइयों तक पहुँच रही थीं जहाँ विज्ञान और भारतीय संस्कृति, जैसे योग और साधु परंपरा, आपस में घुल-मिल जाते थे।
अगर आप जासूसी, समुद्री रहस्यों और एक बेहद शक्तिशाली योद्धा की बदले से भरी कहानी पढ़ना चाहते हैं, तो यह कॉमिक्स आपके लिए एक यादगार अनुभव साबित हो सकती है।
रेटिंग: ४.५/५
