डायमंड कॉमिक्स के साथ-साथ तुलसी कॉमिक्स ने भी ऐसे कई किरदार रचे हैं, जिन्होंने बच्चों और किशोरों की कल्पना को नई दिशा दी। इन्हीं में से एक खास नायक है ‘बाज़’ (Baaz), जो आम तौर पर दिखने वाले पारंपरिक सुपरहीरो से थोड़ा अलग है। इस किरदार का असली नाम ‘देव’ है और उसका अतीत एक पेशेवर हत्यारे (Professional Killer) का रहा है। यही बात बाज़ को बाकी नायकों से अलग और थोड़ा रहस्यमय बनाती है।
प्रस्तुत कॉमिक्स “बाज़ का आतंक” (Baaz Ka Aatank), बाज़ की शक्तियों, उसके सोचने के तरीके और उसके न्याय के नजरिये को समझने के लिए एक बेहद अहम अंक है। यह कॉमिक्स संख्या 474 है और उस दौर में इसकी कीमत 20 रुपये थी। कहानी और चित्रों में जिस तरह की गहराई दिखाई गई है, वही वजह है कि यह कॉमिक आज भी एक शानदार ‘कलेक्टर्स आइटम’ मानी जाती है।
कथानक का विस्तृत विश्लेषण (Storyline Overview)
कहानी की शुरुआत एक रहस्यमयी माहौल से होती है। मुख्य किरदार देव एक पेशेवर हत्यारा है, जिसे कुछ अज्ञात और रहस्यमयी शक्तियाँ ‘राजकुमार’ समझकर एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं। यह जगह सामान्य इंसानी दुनिया से बिल्कुल अलग है, जिसे ‘रहस्यलोक’ कहा गया है, जहाँ भूत, प्रेत और जिन्न जैसे अद्भुत प्राणी रहते हैं। यहीं देव को खास तरह का प्रशिक्षण दिया जाता है और उसे एक अनोखी पोशाक दी जाती है। यही पोशाक उसे ‘बाज़’ की असाधारण शक्तियाँ देती है।

कॉमिक्स के शुरुआती पन्नों में हम देखते हैं कि बाज़ अपनी नई पहचान और शक्तियों के साथ वापस मानव जगत में लौटता है। वह खुद को ‘भूतों का राजकुमार’ कहता है। उसकी पोशाक में कई जबरदस्त खूबियाँ हैं, जैसे गोलियों का असर न होना, बिजली जैसी रफ्तार से दौड़ना और दीवारों पर चढ़ जाना। कहानी तब और तेज हो जाती है जब देव यानी बाज़ को अपनी असली पहचान छुपाकर शहर में अपनी हरकतें अंजाम देनी पड़ती हैं।
जंगल में देव को एक लावारिस लाल रंग की कार मिलती है, जिसका नंबर SPS 1094 होता है। शहर पहुँचने के लिए वह उस कार को ले लेता है, लेकिन उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं होता कि उस कार की डिक्की में एक लाश छुपी हुई है। जैसे ही वह पुलिस चेकपोस्ट पर पहुँचता है, तलाशी के दौरान लाश मिल जाती है। यहीं से बाज़ और पुलिस के बीच एक रोमांचक पीछा और बचाव का खेल शुरू हो जाता है। बाज़ अपनी ताकतों का इस्तेमाल करके पुलिस के घेरे को तोड़ता है। वह ऊँची इमारतों पर चढ़ता है, रस्सियों पर दौड़ता है और आखिर में नदी में कूदकर पुलिस को चकमा दे देता है।

इसके बाद बाज़ ‘काले खान’ नाम के अपराधी के अड्डे पर पहुँचता है। काले खान बाज़ की वापसी से हैरान रह जाता है। यहीं कहानी में एक बड़ा खुलासा होता है, जब ‘ईगल इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन’ का ज़िक्र आता है। काले खान बताता है कि दुनिया के कई खतरनाक संगठन मिलकर एक बहुत बड़ी सुपारी दे चुके हैं। यह सुपारी पूरे 10 मिलियन डॉलर की है और इसका निशाना है भारत का एक बेहद प्रभावशाली व्यक्ति।
इस साजिश की सच्चाई जानने के लिए बाज़ एक गुप्त मिशन पर निकल पड़ता है। उसे ‘ब्लैक टाइगर’ नाम के संगठन के सरगना से मिलना होता है। इसके लिए वह ‘सलाम टापू’ (Salaam Island) जाता है। यहाँ बाज़ अपनी चालाकी और दिमाग से संगठन का भरोसा जीत लेता है। उसे बताया जाता है कि जिसे उसे मारना है, वह असल में उसका ही हमशक्ल (Double) है। यह मोड़ कहानी में एक गहरा मानसिक और रहस्यमयी तनाव पैदा करता है।
कहानी का असली केंद्र ‘खान बहादुर’ नाम का व्यक्ति है, जो कभी राज्य का मुख्यमंत्री रह चुका है। बाहर से वह एक इज़्ज़तदार और प्रतिष्ठित इंसान लगता है, लेकिन सच्चाई यह है कि वह देशद्रोही कामों और हथियारों की तस्करी में शामिल है। वह सेब की पेटियों से लेकर ताबूतों तक में हथियार छुपाकर उनकी सप्लाई करता है। जब बाज़ को यह कड़वी सच्चाई पता चलती है, तो उसका मकसद बदल जाता है। अब वह सिर्फ एक हत्यारा नहीं रहता, बल्कि देश की रक्षा करने वाला एक रक्षक बन जाता है।
कहानी के आख़िरी हिस्से में बाज़, खान बहादुर के बंगले में घुस जाता है। यहाँ वह एक ‘कंकाल’ का रूप लेकर अपराधियों के दिलों में डर बैठा देता है। वह वैज्ञानिक उपकरणों और अपनी शारीरिक ताकत का इस्तेमाल करके ताबूतों के रहस्य को सबके सामने ला देता है। अंत में बाज़ अपराधियों को पॉप म्यूज़िक की धुन पर नचाने जैसी अजीब लेकिन मज़ेदार सज़ा देता है और उनके सारे अपराध रिकॉर्ड कर लेता है। इस तरह बाज़ यह साबित कर देता है कि वह देश के गद्दारों के लिए किसी काल से कम नहीं है।
पात्र चित्रण (Character Sketches)
देव/बाज़: वह इस कहानी का मुख्य नायक है। उसका किरदार पूरी तरह काला या सफेद नहीं, बल्कि ग्रे-शेड (Grey Shade) में है। वह कोई आदर्शवादी सुपरहीरो नहीं है, बल्कि ऐसा इंसान है जो अपराध की दुनिया को बहुत करीब से जानता और समझता है। उसकी शक्तियाँ उसे अलौकिक बनाती हैं, लेकिन उसकी असली ताकत उसकी बुद्धि है, जो उसे एक बेहद खतरनाक शिकारी बना देती है।

खान बहादुर: वह कहानी का क्लासिक विलेन है। उसका किरदार राजनीति और अपराध के गहरे गठजोड़ को दिखाता है। बाहर से सफेद कपड़ों में एक शरीफ और इज़्ज़तदार नेता, लेकिन अंदर से उसके कारनामे पूरी तरह काले हैं। उसका सफेद लिबास बस उसके गुनाहों पर पड़ा हुआ एक नकाब है।
काले खान: कहानी में वह एक मुखबिर और बिचौलिए की भूमिका निभाता है। वही बाज़ को बाहरी दुनिया में चल रही साज़िशों और अपराधी गतिविधियों की जानकारी देता है और कहानी को आगे बढ़ाने में अहम कड़ी बनता है।
सामरा और अन्य गुर्गे: ये किरदार मुख्य रूप से बाज़ की ताकत और एक्शन को दिखाने के लिए इस्तेमाल किए गए हैं। इन्हें कहानी में लगभग ‘पंचिंग बैग’ की तरह पेश किया गया है, जिससे एक्शन सीन और ज़्यादा दमदार और मज़ेदार बनते हैं।
चित्रांकन और कला पक्ष (Art and Illustration)
इस कॉमिक्स का चित्रांकन विकास–पंकज (Vikas–Pankaj) की जोड़ी ने किया है। तुलसी कॉमिक्स की एक पहचान रही है कि उनके नायक बेहद मस्कुलर (Muscular) और दमदार शरीर वाले दिखते हैं, और यहाँ भी वही बात साफ नजर आती है।

एक्शन सीक्वेंस: पन्नों पर जिस तरह बाज़ को इमारतों के बीच छलांग लगाते हुए या पुलिस की गाड़ियों को चकमा देते हुए दिखाया गया है, वह काफी तेज़ और गतिशील (Dynamic) लगता है। ‘धूम’, ‘धम्म’ और ‘तड़ाक’ जैसे शब्द एक्शन सीन में जान डाल देते हैं।
रंग संयोजन: 90 के दशक की तकनीक के हिसाब से रंगों का इस्तेमाल काफी चटकीला है। बाज़ की नीली और स्लेटी पोशाक उसे एक डार्क (Dark) लेकिन साथ ही आकर्षक लुक देती है।
इमोशन्स: किरदारों के चेहरे पर डर, गुस्सा और चालाकी जैसे भाव साफ दिखाई देते हैं। खासतौर पर खान बहादुर के चेहरे पर दिखने वाली धूर्तता को कलाकारों ने बहुत अच्छी तरह उकेरा है।
लेखन और संवाद (Writing and Dialogues)
कहानी की पटकथा काफी तेज़ रफ्तार वाली है। संवादों में एक तरह का ‘फिल्मी’ अंदाज़ है, जो उस दौर के पाठकों को बहुत पसंद आता था। उदाहरण के लिए, बाज़ का यह कहना कि “मैं भूतों का राजकुमार हूँ” या अपराधियों को सज़ा देते समय उसके तंज भरे संवाद, कहानी के मनोरंजन स्तर को और बढ़ा देते हैं।

कहानी में देशभक्ति और गद्दारी जैसे विषयों को बिना ज़्यादा भारी बनाए, बड़ी समझदारी से पिरोया गया है। यह साफ संदेश दिया गया है कि कानून की नज़र में कोई भी इंसान, चाहे वह कितना ही बड़ा नेता क्यों न हो, अपराध करके बच नहीं सकता।
समीक्षात्मक टिप्पणी: क्यों पढ़ें यह कॉमिक्स?

“बाज़ का आतंक” सिर्फ एक सुपरहीरो की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस समय के समाज में फैले भ्रष्टाचार और संगठित अपराध पर एक सीधा और सटीक तंज भी है।
खूबियां:
बाज़ को उसकी शक्तियाँ न तो किसी प्रयोगशाला से मिलती हैं और न ही किसी एलियन से, बल्कि एक काल्पनिक रहस्यलोक के ‘भूतों’ से मिलती हैं। यही बात उसे बाकी देसी सुपरहीरो से अलग बनाती है। कहानी के अंत तक यह उत्सुकता बनी रहती है कि क्या बाज़ सच में अपने हमशक्ल की हत्या करेगा या फिर उसे बचाएगा। कॉमिक्स का लगभग हर दूसरा पन्ना जबरदस्त एक्शन से भरा हुआ है, जो किशोर पाठकों को लगातार बांधे रखता है।
कमियां:
कुछ जगहों पर तर्क (Logic) की कमी थोड़ी खटकती है, जैसे बाज़ का अचानक कंकाल का रूप ले लेना या अपराधियों को संगीत बजाकर पकड़ने का तरीका। हालांकि, कॉमिक्स की दुनिया में ‘सस्पेंशन ऑफ डिसबिलीफ’ (Suspension of Disbelief) के तहत ऐसी बातों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।
कहानी का अंत थोड़ा जल्दी-जल्दी समेटा हुआ लगता है, जिससे ऐसा महसूस होता है कि लेखक अगली कॉमिक्स “बाज़ और बाज़” के लिए पाठक को जल्द उत्सुक करना चाहता था।
निष्कर्ष (Final Verdict)
कुल मिलाकर, “बाज़ का आतंक” तुलसी कॉमिक्स की एक ऐसी विरासत है जिसे हर कॉमिक्स प्रेमी को कम से कम एक बार ज़रूर पढ़ना चाहिए। यह हमें उस दौर में ले जाती है, जहाँ बुराई से लड़ने के लिए सिर्फ कानून ही नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘बाज़’ की भी ज़रूरत थी जो अंधेरे में रहकर उजाले की हिफ़ाज़त कर सके।
इस कॉमिक्स का अगला भाग “बाज़ और बाज़” (Baaz Aur Baaz) इस कहानी को एक नए स्तर पर ले जाता है, जिसका इशारा अंतिम पन्ने में ही दे दिया गया है। अगर आप भारतीय कॉमिक्स के इतिहास और खासतौर पर देसी सुपरहीरो संस्कृति को समझना चाहते हैं, तो यह अंक आपके लिए ज़रूरी पढ़ाई है।
रेटिंग: 4.5/5

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