राज कॉमिक्स ने अपनी शुरुआत में कई पौराणिक और जादुई कहानियाँ (Mythological/Fantasy) निकाली थीं, और “बारह घोड़ों का रथ” उन्हीं में से एक बेहद शानदार कहानी है। यह कॉमिक्स हमें खांडवप्रस्थ के पुराने साम्राज्य में ले जाती है, जहाँ राजा, राजकुमार, राक्षस, देवता और दिव्य शक्तियाँ एक साथ नज़र आती हैं।
तिलिस्म देव सीरीज की कहानियाँ आमतौर पर अच्छाई और बुराई की लड़ाई के इर्द-गिर्द घूमती हैं, जहाँ तिलिस्म देव जैसे दैवीय नायक मुसीबत में फँसे लोगों की मदद करते हैं। इस कॉमिक्स में सिर्फ रोमांच ही नहीं, बल्कि भक्ति, प्यार और त्याग का सुंदर मेल भी दिखता है। दिलीप कदम और जयप्रकाश जगताप की ड्राइंग इसे देखने में बहुत खूबसूरत बनाती है।
आज जिसकी हम बात कर रहे हैं, वह है “बारह घोड़ों का रथ”। यह कॉमिक्स सिर्फ एक एडवेंचर स्टोरी नहीं है, बल्कि इसमें पौराणिक किरदार, ईश्वरीय वरदानों के दांव-पेच और बुराई पर अच्छाई की जीत—सबकुछ मिलकर एक मज़ेदार कहानी बनाते हैं। तरुण कुमार वाही की लिखावट और दिलीप कदम–जयप्रकाश जगताप की कला इस कहानी को पूरी तरह ज़िंदा कर देती है।
कहानी
कहानी की शुरुआत खांडवप्रस्थ राज्य से होती है, जहाँ राजा अश्वप्रस्त को शिकार का बहुत शौक है। उनका यह शौक इतना गहरा है कि वे कई बार अकेले ही जंगल में निकल जाते हैं। इसी जंगल में एक और शिकारी भी घूम रहा है—लेकिन वह जानवरों को नहीं, इंसानों को मारता है। यह है खतरनाक राक्षस खोपड़दंत।

कहानी का असली संघर्ष तब शुरू होता है जब इस जंगल में दोनों शिकारी आमने-सामने आ जाते हैं—एक तरफ राजा अश्वप्रस्त, जो अपनी तीरंदाजी पर घमंड करते हैं, और दूसरी तरफ खोपड़दंत, जो अपनी राक्षसी ताकत में चूर है। खोपड़दंत का शरीर इतना मजबूत है कि राजा के तीर उस पर असर ही नहीं करते। आखिरकार एक दुखद मोड़ आता है—राजा अश्वप्रस्त मारे जाते हैं। यही घटना उनके बेटे और कहानी के नायक, राजकुमार अतुलप्रस्त के लिए प्रतिशोध की आग जगा देती है।
लेकिन कहानी सिर्फ बदले तक सीमित नहीं रहती। एक बड़ा ट्विस्ट तब आता है जब नारद मुनि अनजाने में खोपड़दंत के मन में एक नई इच्छा जगा देते हैं। वे बताते हैं कि तीनों लोकों में भगवान सूर्य के “बारह घोड़ों का रथ” से तेज कोई नहीं है। बस यहीं से खोपड़दंत का लक्ष्य बदल जाता है—अब वह सिर्फ जानवर या इंसान नहीं, बल्कि सूर्य का रथ पाना चाहता है।
पात्र विश्लेषण (Character Analysis)
इस कॉमिक्स के सभी किरदार अपने-अपने तरीके से बहुत साफ, यादगार और असरदार हैं। हर एक किरदार कहानी को आगे बढ़ाने में खास भूमिका निभाता है।

राजकुमार अतुलप्रस्त: एक आदर्श नायक
अतुलप्रस्त एक आज्ञाकारी और जिम्मेदार राजकुमार है। वह शुरुआत से ही अपने पिता की शिकार की आदत को लेकर परेशान रहता है और उन्हें समझाने की कोशिश भी करता है। जब उसके पिता जंगल से वापस नहीं लौटते, तो वह पीछे हटने के बजाय खुद ही उनकी तलाश में निकल पड़ता है।
अतुलप्रस्त का असली विकास तब दिखता है जब वह पिता के दुख को हिम्मत और संकल्प में बदल देता है। वह बिलकुल नहीं डरता—जब पहली बार खोपड़दंत जैसा विशाल राक्षस सामने आता है, तो भागने की जगह वह अपनी तलवार निकालकर सामने खड़ा हो जाता है।
खोपड़दंत: महत्वाकांक्षी और क्रूर खलनायक
खोपड़दंत इस कॉमिक्स का सबसे दमदार हिस्सा है। उसे सिर्फ एक हिंसक दानव की तरह नहीं दिखाया गया, बल्कि एक चालाक और महत्वाकांक्षी विलेन के रूप में पेश किया गया है। शुरुआत में वह सिर्फ पेट भरने के लिए इंसानों और जानवरों को मारता है, लेकिन नारद मुनि की बातें सुनकर उसका सपना बड़ा हो जाता है।
वह भगवान विष्णु की कठोर तपस्या करता है—ये दिखाता है कि वह सिर्फ ताकतवर ही नहीं, बल्कि ज़िद्दी और लक्ष्य के प्रति पक्का भी है। उसके दिमाग की तेज़ी तब दिखती है जब वह भगवान विष्णु से ऐसा वरदान मांगता है जो उसे लगभग अमर बना दे—
“किसी ईश्वरीय शक्ति के हाथों मृत्यु न हो”।
नारद मुनि: कथा के उत्प्रेरक
हमेशा की तरह, इस कहानी में भी नारद मुनि वही किरदार हैं जो पूरी कहानी की डोर थामे रखते हैं। उनका मकसद खोपड़दंत के पापों को बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे उसके कर्मों का फल दिलाना था। जब वे देखते हैं कि खोपड़दंत एक निर्दोष प्राणी की हत्या कर रहा है, तो वे तय करते हैं कि अब इसे सबक सिखाना ही चाहिए।
इसी सोच से वे बड़ी चालाकी से सूर्य के रथ का जिक्र करते हैं, जिससे खोपड़दंत एक ऐसे रास्ते पर चल पड़ता है जहाँ उसका नाश तय है। उनकी एक छोटी सी बात पूरी कहानी का रुख बदल देती है।

पौराणिक संदर्भ और वरदान का पेंच (Mythology and The Boon)
भारतीय कॉमिक्स की सबसे खूबसूरत खासियत यही है कि फैंटेसी में पौराणिक तत्वों को बहुत खूबसूरती से मिलाया जाता है। “बारह घोड़ों का रथ“ भी इसका बेहतरीन उदाहरण है।
सूर्य का रथ:
कहानी का मुख्य आधार “सूर्य का रथ” ही है। लेखक ने एक दिलचस्प तथ्य इस्तेमाल किया है—कि शरद पूर्णिमा की रात सूर्य की पुत्री, सूर्यदा, पृथ्वी पर आती है। यही वह मौका है जब खोपड़दंत के पास रथ छीनने का मौका बनता है।
विष्णु का वरदान:
खोपड़दंत भगवान विष्णु से ऐसा वरदान मांगता है कि कोई भी “ईश्वरीय शक्ति” उसे मार न सके। यही वरदान आगे चलकर कहानी का क्लाइमेक्स तय करता है।
जब खोपड़दंत सूर्यदा को उठा ले जाता है, तो खुद भगवान सूर्य भी उसका कुछ नहीं कर पाते क्योंकि उनकी विनाशकारी किरणें भी “ईश्वरीय शक्ति” का हिस्सा हैं।
देवताओं का असहाय होना ही कहानी में तिलिस्म देव की एंट्री की वजह बनता है।
यह वरदान और उसका नियम पूरी कहानी को बहुत तार्किक बनाता है (कॉमिक्स की दुनिया के हिसाब से)। कई बार बुराई को हराने के लिए देवताओं को भी अपने तय नियमों से बाहर निकलकर सोचना पड़ता है—यह कॉमिक्स वही बात दिखाती है।
तिलिस्म देव की भूमिका (Role of Tilism Dev)
जब भगवान सूर्य और विष्णु दोनों ही खोपड़दंत के वरदान से बंध जाते हैं, तो समाधान निकलता है तिलिस्म देव के रूप में।
भगवान विष्णु बताते हैं कि —
“तिलिस्म देव वह शक्ति है जो ईश्वर नहीं है।“
यह लाइन बहुत चतुर लिखी गई है। यही वजह है कि अतुलप्रस्त, जो एक इंसान है, को तिलिस्म देव की शक्तियाँ दी जाती हैं।
चूँकि अतुलप्रस्त देवता नहीं है और तिलिस्म देव की शक्तियों को परंपरागत “ईश्वरीय शक्ति” की श्रेणी में नहीं रखा गया, इसलिए वरदान का नियम उस पर लागू नहीं होता।
इसी वजह से खोपड़दंत को हराने का रास्ता बन पाता है।
अतुलप्रस्त को अग्नि-ताप शक्ति मिलती है, जिससे वह खोपड़दंत के धातु से बने शरीर को पिघलाने योग्य बन जाता है। यही उसकी जीत की कुंजी साबित होती है।

चित्रांकन और प्रस्तुति (Art and Presentation)
दिलीप कदम और जयप्रकाश जगताप की जोड़ी ने 80–90 के दशक में राज कॉमिक्स को जो खास विजुअल स्टाइल दिया था, वह इस कॉमिक्स में पूरे दम से नज़र आता है।
एक्शन सीन बेहद जीवंत और तेज़ हैं—खासकर अतुलप्रस्त बनाम खोपड़दंत की लड़ाई में। जिसमें अतुलप्रस्त के शरीर से उठती आग, राक्षस की कलाई पकड़ने वाला दृश्य और दोनों के बीच ताकत की भिड़ंत बेहद प्रभावशाली लगती है।
किरदारों का डिज़ाइन भी बढ़िया है—
- खोपड़दंत का खोपड़ी जैसा चेहरा और लंबा, भारी शरीर उसे बहुत डरावना बनाता है।
- वहीं सूर्यदा और अतुलप्रस्त को खूबसूरत, पारंपरिक हीरो-हीरोइन के रूप में दिखाया गया है।
रंगों का इस्तेमाल भी कहानी के मूड को बहुत अच्छी तरह सेट करता है—
जंगल के लिए हरे-पीले, रात के लिए नीले-काले, और सूर्य देव से जुड़े दृश्यों में चमकीले पीले-नारंगी रंग—सबकुछ एकदम फिट बैठता है।
पैनलिंग भी तेज रफ्तार कहानी के अनुकूल है, खासकर पेज 16–17 में सूर्य देव की किरणों के प्रहार और उस रोशनी के वापस लौटने वाला सीन—यह लेआउट के हिसाब से कमाल है।
संवाद और लेखन शैली (Dialogue and Writing Style)
तरुण कुमार वाही की लिखावट हमेशा की तरह नाटकीय, बहती हुई और असरदार है। संवाद छोटे हैं, लेकिन असर छोड़ते हैं।
राजा अश्वप्रस्त के संवादों में हल्का-फुल्का हास्य और व्यंग्य झलकता है—
जैसे उनकी यह लाइन:
“लगता है हमें देखते ही सब छुट्टी पर चले गए हैं।”
यह उनके आत्मविश्वास और मस्तमौला स्वभाव दोनों को दिखाती है।
वहीं खोपड़दंत के संवाद उसके घमंड, क्रूरता और बड़ी सोच को उजागर करते हैं—
जैसे उसकी चुनौती:
“चूहा होकर शेर से लड़ता है?”
या उसका घमंडी दावा:
“अब स्वयं भगवान विष्णु भी मेरा अहित नहीं कर सकते।”
कहानी में भावनात्मक असर भी है, खासकर अतुलप्रस्त के संवादों में।
अपने पिता का शव देखकर उसका यह कहना—
“पिताश्री! सामने क्यों नहीं आते?”
पाठक के मन में गहरी भावनाएँ जगा देता है।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण (Critical Analysis)
तरुण कुमार वाही की लिखावट में एक अच्छी-सी नाटकीयता और बढ़िया फ्लो है। उनके संवाद छोटे हैं, लेकिन असरदार हैं। जैसे राजा अश्वप्रस्त का मजाकिया-व्यंग्य वाला संवाद—
“लगता है हमें देखते ही सब छुट्टी पर चले गए हैं“
ये उनकी ओवरकॉन्फिडेंट और हल्की-फुल्की सोच को दिखाता है।
वहीं खलनायक खोपड़दंत के ताने—
“चूहा होकर शेर से लड़ता है?”
उसके घमंड और क्रूर स्वभाव को सामने लाते हैं।

दूसरी तरफ, अतुलप्रस्त का अपने पिता के शव के सामने बोला गया भावुक संवाद पाठक को अंदर तक छू जाता है और कहानी को एक भावनात्मक गहराई देता है।
कॉमिक्स कमाल की है, पर थोड़ी आलोचनात्मक बातें भी हैं। जैसे—
राजा अश्वप्रस्त की मौत बहुत जल्दी हो जाती है। शायद इसका कारण यह था कि कहानी को जल्दी से अतुलप्रस्त पर फोकस में लाना था।
नारद मुनि का हस्तक्षेप थोड़ा ज़बरदस्ती का प्लॉट डिवाइस लगता है, हालांकि पौराणिक कहानियों में ऐसा होना आम बात है।
क्लाइमेक्स भी थोड़ी जल्दी में निपटाया हुआ लगता है। जैसे ही अतुलप्रस्त को शक्तियाँ मिलती हैं, वह खोपड़दंत पर बहुत जल्द हावी हो जाता है—जबकि यह वही खोपड़दंत है जिसे भगवान विष्णु भी वरदान के कारण नहीं रोक पाए थे। यहां थोड़ा और संघर्ष दिखता तो मज़ा और बढ़ जाता।
साथ ही, खोपड़दंत का धातु-जैसा शरीर और अतुलप्रस्त के अग्नि-भरे हाथों से उसे हराना—विज्ञान की नजर से शायद फिट न बैठे, पर फैंटेसी लॉजिक में बिल्कुल स्वीकार्य लगता है।
कहानी का संदेश (Theme and Message)
यह कॉमिक्स कई स्तरों पर अच्छे संदेश देती है। सबसे बड़ा संदेश—अहंकार का पतन।
राजा अश्वप्रस्त का अपने शिकार कौशल पर घमंड, और खोपड़दंत का अपनी अमरता पर घमंड—दोनों ही उनके विनाश का कारण बनते हैं।
अतुलप्रस्त का अपने पिता के लिए प्रेम, उनकी मौत का दर्द, और न्याय पाने का दृढ़ संकल्प—ये कहानी की रीढ़ हैं। यह पिता-पुत्र के रिश्ते की गहराई को बहुत खूबसूरती से दिखाता है।
इसके ऊपर, यह कॉमिक्स वही शाश्वत संदेश देती है कि—
बुराई कितनी भी ताकतवर क्यों न बन जाए… अच्छाई हमेशा कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेती है।
खोपड़दंत वरदानों से बचा हुआ था, ताकतवर भी था, लेकिन आखिरकार एक इंसान (अतुलप्रस्त) और तिलिस्म देव की शक्ति मिलकर उसे खत्म कर देती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
“बारह घोड़ों का रथ“ एक पूरा मनोरंजक पैकेज है। यह आपको सीधा उस जमाने में ले जाती है, जब कहानियाँ सरल होती थीं लेकिन मज़ा भरपूर देती थीं। इसमें एक्शन है, जादू है, देवता हैं और एक दमदार राक्षस भी है।
सकारात्मक पक्ष:

इस कॉमिक्स के कई मजबूत पॉइंट हैं— दिलीप कदम का शानदार आर्टवर्क, जो हर दृश्य को जीवंत बना देता है।
खोपड़दंत का डरावना और यादगार खलनायक डिज़ाइन कहानी को एक मजबूती देता है। पौराणिक तत्वों और फैंटेसी का बढ़िया संतुलन कहानी को और रोचक बनाता है। तिलिस्म देव की शक्तियों का दिलचस्प उपयोग कहानी में अप्रत्याशित मोड़ और नायक के विकास—दोनों को मज़बूत करता है।
नकारात्मक पक्ष:
- राजा अश्वप्रस्त का रोल बहुत छोटा रह जाता है।
- कहानी का अंत थोड़ा अनुमानित लगता है।
अगर आप राज कॉमिक्स के पुराने फैन हैं या हिंदी फैंटेसी कहानियों में दिलचस्पी रखते हैं, तो यह कॉमिक्स आपकी लाइब्रेरी में जरूर होनी चाहिए। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि याद दिलाती है कि कैसे सिर्फ 30–40 पन्नों में भी आपको एक महाकाव्य जैसी फील दी जा सकती है। अतुलप्रस्त और सूर्यदा का मिलना, और खोपड़दंत का खत्म होना—कहानी को एक संतोषजनक और मीठा अंत देता है, जिससे पढ़ने वाले के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।
अंतिम फैसला:
4/5 सितारे — एक क्लासिक, जो आज भी उतनी ही रोमांचक लगती है।
