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Home » हवलदार बहादुर और जलजीवड़ा Comic Review– हंसी, रहस्य और रोमांच से
Editor's Picks Updated:28 October 2025

हवलदार बहादुर और जलजीवड़ा Comic Review– हंसी, रहस्य और रोमांच से

मनोज कॉमिक्स का क्लासिक रोमांच जहाँ हवलदार बहादुर अपने दिमाग़ और मज़ाकिया अंदाज़ से भूतों और अपराधियों को मात देता है।
ComicsBioBy ComicsBio28 October 2025Updated:28 October 202508 Mins Read
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हवलदार बहादुर और जलजीवड़ा समीक्षा | Manoj Comics Classic Review in Hindi
हवलदार बहादुर – मनोज कॉमिक्स का वो मजाकिया लेकिन समझदार हीरो, जिसने बिना सुपरपावर के ही सबको हँसाते-हँसाते सच्चाई उजागर कर दी।
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 मनोज, तुलसी और डायमंड कॉमिक्स जैसे प्रकाशक कभी हर घर में पहचाने जाते थे। इन्हीं में से एक था ‘मनोज कॉमिक्स’, जिसने हमें कई मजेदार और यादगार किरदार दिए। इन्हीं में से एक है – हवलदार बहादुर। अपनी अनोखी हरकतों, समझदारी और मजाकिया अंदाज़ के लिए मशहूर हवलदार बहादुर उस दौर के सबसे लोकप्रिय पात्रों में से एक थे।
आज हम उनके एक शानदार किस्से – “हवलदार बहादुर और जलजीवड़ा” – की विस्तृत समीक्षा करने जा रहे हैं। यह कहानी हंसी, रहस्य और रोमांच का शानदार मेल है। ये सिर्फ़ मनोरंजक कॉमिक नहीं, बल्कि उस दौर की सीधी लेकिन असरदार कहानी कहने की कला और चित्रांकन का बेहतरीन उदाहरण भी है।

रहस्यमयी टापू और नकली भूत

कहानी शुरू होती है डंडोमार और परलोपार द्वीप समूह के एक छोटे टापू “टाटो” से। यहाँ के लोग मछली पकड़कर और समुद्र से मोती निकालकर अपना गुज़ारा करते हैं। इस टापू का खुद-घोषित रक्षक है थानेदार लोम्बू, जो असल में डरपोक, लालची और बेहद आलसी पुलिसवाला है। वह सुरक्षा के नाम पर टापूवासियों से ज़बरदस्ती हफ्ता (टैक्स) वसूलता है।

कहानी की शुरुआत में ही टापूवासी उसकी इस जबरदस्ती से तंग आकर हफ्ता देने से मना कर देते हैं। गुस्से में लोम्बू धमकी देता है कि अगर आगे कोई मुसीबत आई तो वह उनकी मदद नहीं करेगा — और वहाँ से चला जाता है।

लेकिन उसी रात कुछ अजीब होता है। समुद्र में एक पुराना, विशाल जहाज दिखाई देता है जो आग की लपटों से घिरा होता है। उस पर कुछ लोग ऐसे नाचते दिखते हैं मानो वे पानी पर चल रहे हों। टापू का शराबी निवासी हुड़कू यह डरावना नज़ारा देखकर घबरा जाता है और पूरे टापू में खबर फैला देता है कि समुद्र में “भूत” आ गए हैं।

सारे टापूवासी जब समुद्र किनारे पहुंचते हैं, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। पानी पर आग और नाचते हुए भूत देखकर सबके रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

अब उन्हें याद आता है अपने थानेदार लोम्बू की। वे उसे नींद से उठा कर मदद के लिए लाते हैं। जो थानेदार हमेशा बड़ी-बड़ी बातें करता था, वही अब इस भूतिया नज़ारे को देखकर खुद कांपने लगता है। वह पानी पर चलने की हास्यास्पद कोशिश करता है और धड़ाम से डूब जाता है। किसी तरह नाव लेकर जहाज के पास पहुँचता है, तो जहाज से कोई चमकता हुआ गोला उसकी नाव पर फेंका जाता है। डर के मारे लोम्बू वापस भाग आता है।

अब यह रहस्यमयी जहाज और उस पर मौजूद “भूत” — जिन्हें टापूवासी “जलजीवड़ा” नाम देते हैं — टापू में दहशत फैला देते हैं। वे टापू के मुखिया काकोटा को धमकी देते हैं कि अगर उन्हें सारे मोती और कीमती सामान नहीं मिला, तो वे पूरे टापू को तबाह कर देंगे।

हवलदार बहादुर की एंट्री

यहीं पर कहानी में असली हीरो की एंट्री होती है — हवलदार बहादुर की। कमिश्नर साहब उसे इस रहस्यमयी मामले की जांच के लिए भेजते हैं।

हवलदार बहादुर पैराशूट से टापू पर उतरता है और सबसे पहले उसकी मुलाकात होती है थानेदार लोम्बू से। लोम्बू उसे पहचान नहीं पाता और एक आम आदमी समझकर उस पर रौब झाड़ने लगता है। नतीजा यह होता है कि दोनों के बीच एक मजेदार झगड़ा हो जाता है।

थोड़ी देर बाद जब हवलदार बहादुर अपनी पहचान बताता है, तो लोम्बू के होश उड़ जाते हैं। इसके बाद बहादुर चालाकी से उसे खुश करने के लिए “गुरुजी” कहने लगता है ताकि उससे आसानी से जानकारी मिल सके।

जलजीवड़ा का रहस्य

अब हवलदार बहादुर अपनी तेज दिमागी चालें चलना शुरू करता है। उसे जल्दी ही शक हो जाता है कि ये कोई असली भूत नहीं हैं, बल्कि किसी ने विज्ञान का इस्तेमाल करके डर का नाटक रचा है। वह लोम्बू और टापूवासियों को साथ लेकर जलजीवड़ा से निपटने की योजना बनाता है।

धीरे-धीरे उसे पता चलता है कि ये सब एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है। जलजीवड़ा और उसके साथी असल में डाकू हैं जो एक खतरनाक अपराधी धरमपेटा के लिए काम कर रहे हैं। वे होलोग्राफिक प्रोजेक्टर और दूसरी वैज्ञानिक मशीनों की मदद से भूत बनने का नाटक कर रहे थे, ताकि टापूवालों को डराकर उनका खज़ाना लूट सकें और तस्करी का माल जहाज में छिपा सकें।

कहानी का क्लाइमेक्स आता है जब हवलदार बहादुर एक समझदारी भरी योजना बनाता है। वह भेष बदलकर धरमपेटा के ठिकाने तक पहुँच जाता है। वहाँ एक जोरदार और रोमांचक लड़ाई होती है, जिसमें आखिरकार बहादुर धरमपेटा और उसके साथियों को पकड़ लेता है।

धमाकेदार क्लाइमेक्स

फिर वह टापूवासियों के साथ मिलकर जलजीवड़ा के जहाज पर धावा बोल देता है। अपनी चालाकी और दिमाग से वह उनका “भूत वाला जादू” तोड़ देता है और सबके सामने सच लाकर रख देता है — कि ये सब भूत नहीं, बल्कि इंसान हैं जो धोखा दे रहे थे।

आख़िर में, हवलदार बहादुर सब अपराधियों को पकड़ लेता है और टापू में दोबारा शांति लौट आती है।

पात्र विश्लेषण

हवलदार बहादुर: कहानी का हीरो, हवलदार बहादुर, दिखने में तो एक आम पुलिस हवलदार है, लेकिन उसकी सोच और काम करने का तरीका बिल्कुल अलग है। वह बहुत ताकतवर नहीं है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत है उसका तेज दिमाग, चीज़ों को ध्यान से देखने की आदत और उसका मजाकिया स्वभाव। वह मुश्किल हालात में भी घबराता नहीं, बल्कि हँसी और समझदारी से हल निकालता है। इस कहानी में भी वह अंधविश्वास को तर्क और विज्ञान से चुनौती देता है, और दिखाता है कि असली ताकत दिमाग और ज्ञान में होती है, न कि डर में।

थानेदार लोम्बू: लोम्बू इस कॉमिक्स का सबसे मजेदार किरदार है। वह हवलदार बहादुर का एकदम उल्टा है — जहाँ बहादुर समझदार और बहादुर है, वहीं लोम्बू मूर्ख, डरपोक, लालची और थोड़ा चालाक किस्म का इंसान है। उसकी डींगें और मुसीबत के वक्त उसकी फज़ीहत देखकर हँसी छूट जाती है। उसका “गुर्रऽऽऽ” वाला डायलॉग तो उसकी पहचान बन गया था। वह कहानी में हंसी का सबसे बड़ा ज़रिया है। हालांकि कई बार अनजाने में ही सही, लेकिन आख़िर में वही बहादुर की मदद भी करता है।

जलजीवड़ा और धरमपेटा: ये दोनों इस कहानी के असली खलनायक हैं। जलजीवड़ा पहले तो बहुत रहस्यमय लगता है, जैसे कोई समंदर का भूत हो। लेकिन बाद में असली दिमाग़ निकलता है धरमपेटा, जो साइंस और टेक्नोलॉजी का गलत इस्तेमाल करके अपने अपराधों को अंजाम देता है। ये किरदार उस वक्त के हिसाब से काफी आगे का और आधुनिक था, क्योंकि यह दिखाता है कि अपराधी भी अब पुराने तरीकों से नहीं, बल्कि नए वैज्ञानिक तरीकों से चालें चल रहे हैं।

कला और चित्रांकन

इस कॉमिक्स का चित्रांकन किया है बेदी जी ने — जो मनोज कॉमिक्स के जाने-माने कलाकारों में से एक थे। उनकी ड्रॉइंग की खासियत है — सादगी, साफ़ रेखाएँ और भावनाओं को अच्छे से दिखाने की कला।
पात्रों के चेहरे के हावभाव बहुत असरदार हैं, खासकर लोम्बू के डर और घबराहट वाले एक्सप्रेशन इतने मजेदार हैं कि कहानी और भी जीवंत लगती है।
एक्शन वाले सीन भी बहुत अच्छे बने हैं — उनमें मूवमेंट और जोश दोनों हैं।
रंगों का इस्तेमाल ज़बरदस्त है। खासकर रात के सीन में नीले और काले शेड्स का प्रयोग रहस्य और डर का माहौल बनाने में कमाल करता है।
कुल मिलाकर, बेदी जी की आर्ट कहानी के मूड और फ्लो को बखूबी आगे बढ़ाती है।

विषय–वस्तु और सामाजिक संदेश

“हवलदार बहादुर और जलजीवड़ा” सिर्फ़ एक मजेदार कॉमिक नहीं है, बल्कि इसमें कुछ अच्छे संदेश भी छिपे हैं। इसका मुख्य विषय है — विज्ञान बनाम अंधविश्वास।
कहानी खूबसूरती से दिखाती है कि कैसे जलजीवड़ा का भूतिया जहाज दरअसल एक तकनीकी चाल होती है। इससे यह सीख मिलती है कि डर और अंधविश्वास को मिटाने के लिए ज़रूरी है ज्ञान और तर्क।
थानेदार लोम्बू के ज़रिए कहानी सरकारी तंत्र के छोटे-छोटे भ्रष्टाचार पर भी मजाकिया तरीके से वार करती है।
वहीं हवलदार बहादुर का किरदार सिखाता है कि असली ताकत मसल्स में नहीं, बल्कि दिमाग और हिम्मत में होती है। वह बिना किसी सुपरपावर के, सिर्फ अपनी समझदारी और हाज़िरजवाबी से अपराधियों को हरा देता है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, “हवलदार बहादुर और जलजीवड़ा” मनोज कॉमिक्स की एक क्लासिक पेशकश है, जो आज भी उतनी ही मजेदार और प्रासंगिक लगती है।
लेखक अंसार अख्तर की टाइट स्क्रिप्ट और बेदी जी की ज़िंदा आर्टवर्क इस कॉमिक को यादगार बना देते हैं।
यह कहानी हमें उस सुनहरे दौर की याद दिलाती है, जब कॉमिक्स की कहानियाँ सीधी-सादी होती थीं, लेकिन उनमें मनोरंजन और संदेश का बेहतरीन संतुलन होता था।
यह सिर्फ़ हवलदार बहादुर के फैंस के लिए नहीं, बल्कि उन सभी के लिए खास है जो भारतीय कॉमिक्स की विरासत को समझना और महसूस करना चाहते हैं।
यह हंसी, रहस्य और रोमांच का ऐसा कॉमिक कॉकटेल है, जिसका स्वाद आज भी पाठकों के दिल में ताज़ा है।

जहाँ बिना सुपरपावर वाला पुलिस हवलदार अपने हाज़िरजवाबी और दिमाग़ी चालों से अंधविश्वास और अपराध दोनों को मात देता है। मनोज कॉमिक्स का यह शानदार अंक “हवलदार बहादुर और जलजीवड़ा” 80 के दशक के क्लासिक हास्य और रहस्य को जीवंत करता है
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