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Home » प्रलयंकारी योशो: योशो कॉमिक्स सीरीज़ का दूसरा भाग, विज्ञान और फैंटेसी का धमाका
Don't Miss Updated:4 January 2026

प्रलयंकारी योशो: योशो कॉमिक्स सीरीज़ का दूसरा भाग, विज्ञान और फैंटेसी का धमाका

योशो की दूसरी कॉमिक्स ‘प्रलयंकारी योशो’ में विज्ञान, पौराणिकता और साहसिकता का शानदार मिश्रण दिखता है, जहां नायक बनता है असाधारण।
ComicsBioBy ComicsBio4 January 2026Updated:4 January 2026111 Mins Read
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प्रलयंकारी योशो (Part 2) समीक्षा: विज्ञान, फैंटेसी और पौराणिकता का धमाका
योशो कॉमिक्स का दूसरा भाग ‘प्रलयंकारी योशो’ दिखाता है कैसे विज्ञान, पौराणिकता और साहस मिलकर बनाते हैं एक सुपरहीरो की जन्मकथा।
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योशो की दूसरी कॉमिक्स ‘प्रलयंकारी योशो’ सिर्फ एक नायक के जन्म की कहानी नहीं है, बल्कि यह विज्ञान, फैंटेसी और पौराणिक कल्पना का एक शानदार मेल है। इस कॉमिक्स में हमें एक ऐसे हीरो की झलक मिलती है जिसका जन्म ही असाधारण हालात में हुआ है। इस समीक्षा में हम इस ४७ पन्नों की कॉमिक्स की कहानी, इसके पात्रों, इसकी आर्ट और इसके असर को विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।

कथानक और भूमिका

कहानी की शुरुआत एक बेहद रोचक पृष्ठभूमि से होती है। ‘सूर्यग्रह’ नाम का एक उन्नत और विकसित ग्रह है, जहाँ वैज्ञानिक सोच रखने वाले सम्राट ‘राजा त्रिभुज’ का राज है। राजा त्रिभुज की बेटी ‘शौर्या’ का विवाह पृथ्वी से आए एक अंतरिक्ष यात्री ‘योधराज’ से होता है। यह अंतरग्रहीय विवाह कहानी को सिर्फ भावनात्मक ही नहीं, बल्कि एक बड़ा वैज्ञानिक और वैश्विक रूप भी देता है।

कहानी में असली मोड़ तब आता है जब ‘तामा’ नामक दुश्मन ग्रह का सम्राट सूर्यग्रह पर हमला कर देता है। इस हमले में विश्वासघात का एंगल भी जुड़ जाता है, क्योंकि सूर्यग्रह का सेनापति ‘नैन्जा’ गद्दारी करके तामा से मिल जाता है। नैन्जा का किरदार एक ठेठ खलनायक जैसा है—सत्ता का लालची, महत्वाकांक्षी और राजकुमारी शौर्या को अपनी रानी बनाने की चाह रखने वाला। हालात इतने खराब हो जाते हैं कि योधराज को अपनी जान बचाकर पृथ्वी वापस भागना पड़ता है, जबकि गर्भवती शौर्या अपने पिता राजा त्रिभुज और राजगुरु की देखरेख में सूर्यग्रह पर ही रह जाती है।

शुरुआती पन्नों में दिखाई गई अंतरिक्ष की लड़ाई उस दौर के हिसाब से काफी आधुनिक और प्रभावशाली लगती है। राजा त्रिभुज जिस यान का इस्तेमाल करते हैं, वह ‘मानसिक तरंगों’ यानी ब्रेन वेव्स से चलता है। यह आइडिया तुलसी कॉमिक्स की रचनात्मक सोच और साइंस-फिक्शन अप्रोच को साफ दिखाता है। यह पूरा हिस्सा पाठकों को यह एहसास कराता है कि योशो का जन्म किसी आम माहौल में नहीं, बल्कि युद्ध, तबाही और संघर्ष के बीच हुआ है।

योशो का जन्म और बचपन
युद्ध के कठिन समय में राजकुमारी शौर्या एक पुत्र को जन्म देती है, जिसका नाम ‘योशो’ रखा जाता है। राजगुरु की भविष्यवाणी के अनुसार, योशो आगे चलकर एक बेहद शक्तिशाली राजा बनेगा, जो अग्नि, वायु और जल जैसे तत्वों पर अधिकार रखेगा।

यहीं से कहानी में पौराणिक और चमत्कारिक रंग और गहरा हो जाता है। योशो को ‘अग्नि मंदिर’ ले जाया जाता है, जहाँ स्वयं ‘अग्नि देवता’ उसे अपना आशीर्वाद देते हैं। यह दृश्य पूरी कॉमिक्स के सबसे दमदार और यादगार दृश्यों में से एक है, जब अग्नि देवता योशो के मुख में अपनी दिव्य शक्ति भर देते हैं।

जैसे-जैसे योशो बड़ा होता है, उसकी शिक्षा और प्रशिक्षण शुरू हो जाता है। उसे सिर्फ शस्त्र और शास्त्रों का ज्ञान ही नहीं दिया जाता, बल्कि वैज्ञानिक सोच वाले राजा त्रिभुज उसे आधुनिक विज्ञान की समझ भी देते हैं ताकि वह भविष्य के लिए पूरी तरह तैयार हो सके। योशो का यह प्रशिक्षण उसे एक ऑल-राउंड नायक बनाता है—वह तलवार चलाने में माहिर है, गदा युद्ध में निपुण है और उसका शरीर वज्र जैसा मजबूत है।

सप्तगिरी की चुनौतियाँ: नायक की अग्निपरीक्षा
कॉमिक्स का सबसे बड़ा और अहम हिस्सा योशो की ‘सप्तगिरी’ यानी सात पर्वतों की यात्रा पर आधारित है। यह हिस्सा किसी पौराणिक साहसिक यात्रा या ‘क्वेस्ट’ जैसा महसूस होता है। राजगुरु योशो को इन सात खतरनाक और दुर्गम पहाड़ों को पार करने के लिए भेजते हैं, ताकि वह सूर्यग्रह का सबसे शक्तिशाली योद्धा बन सके।

इस यात्रा पर निकलने से पहले राजा त्रिभुज योशो पर एक खास वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं। वे एक ऐसा फॉर्मूला तैयार करते हैं, जिसकी मदद से योशो अपनी आंखों से गोलियां चला सकता है। यही शक्ति आगे चलकर योशो की सबसे बड़ी पहचान बन जाती है। उस समय के बच्चों के लिए यह आइडिया बेहद रोमांचक और कल्पना को उड़ान देने वाला था।

योशो की सप्तगिरी यात्रा के मुख्य पड़ाव निम्नलिखित हैं:

जहरी और विषैली झील
पहले पड़ाव पर योशो का सामना ‘जहरी’ नाम के एक अजीब और खतरनाक जीव से होता है, जो पूरे पानी को जहरीला बना देता है। यह जीव झील को इतना विषैला कर देता है कि कोई भी सामान्य इंसान उसके पास भी नहीं जा सकता। लेकिन योशो अपनी जबरदस्त सहनशक्ति और समझदारी से जहरी का सामना करता है और अंत में उसे पराजित कर देता है। इस लड़ाई की सबसे दिलचस्प बात यह है कि जहरी का ज़हर योशो को नुकसान पहुँचाने के बजाय उस पर उल्टा असर डालता है और उसे पहले से भी ज़्यादा ताकतवर बना देता है।

चुड़ैल त्रिजटा
दूसरे पर्वत पर योशो का सामना ‘त्रिजटा’ नाम की भयानक चुड़ैल से होता है, जिसके बालों में तीन ज़िंदा नाग लिपटे हुए होते हैं। यह लड़ाई काफी डरावनी और रोमांच से भरी हुई है। त्रिजटा के नागों का ज़हर इतना खतरनाक है कि वह पत्थर तक को पिघला सकता है। इसके बावजूद योशो अपनी अदृश्य होने की शक्ति का इस्तेमाल करके उन नागों को खत्म कर देता है। अंत में, मरते समय त्रिजटा यह स्वीकार करती है कि योशो ही उसके विनाश का कारण बनने वाला था।

शतायु – सौ शस्त्रों का स्वामी
अगले पड़ाव पर योशो का सामना ‘शतायु’ से होता है, जिसके पास सौ तरह के अस्त्र-शस्त्र हैं। यह मुकाबला योशो की ताकत से ज़्यादा उसकी मानसिक एकाग्रता को सामने लाता है। यहाँ वह अपनी आंखों से निकलने वाली गोलियों की शक्ति का खुलकर प्रदर्शन करता है और शतायु के हर हमले को हवा में ही रोक देता है। यह युद्ध साबित करता है कि योशो सिर्फ बलशाली ही नहीं, बल्कि पूरी तरह नियंत्रण में रहने वाला योद्धा भी है।

अजगरा और मायावी बकरा
इसके बाद योशो का सामना ‘अजगरा’ नाम के एक विशाल सांप और एक मायावी बकरे से होता है। इन दोनों से लड़ते समय योशो केवल अपनी शारीरिक ताकत पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि अपनी बुद्धि का भी पूरा इस्तेमाल करता है। वह लकड़ी का पुतला बनाकर दुश्मनों को भ्रमित करता है और मौके का फायदा उठाकर उन्हें पराजित करता है। यह हिस्सा दिखाता है कि योशो मुश्किल हालात में दिमाग से भी उतनी ही अच्छी लड़ाई लड़ सकता है।

मृत्युराज का सामना
योशो का सबसे कठिन और खतरनाक मुकाबला ‘मृत्युराज’ से होता है, जो देखने में कंकाल जैसा डरावना खलनायक है। मृत्युराज योशो को आग में जलाकर खत्म करने की कोशिश करता है। लेकिन योशो को पहले ही अग्नि देवता का आशीर्वाद मिल चुका होता है, और साथ ही शतायु से उसे सौ वर्ष की अतिरिक्त आयु का वरदान भी प्राप्त होता है। ये दोनों शक्तियाँ मिलकर योशो को इस युद्ध में लगभग अजेय बना देती हैं।

अग्नि का पुल
अंतिम और सबसे बड़ी परीक्षा के रूप में योशो को एक ऐसे पुल को पार करना होता है, जो चारों तरफ से भयंकर आग में घिरा होता है। सीधा चलना नामुमकिन होता है, इसलिए योशो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करता है और पुल के नीचे लटककर उसे पार करता है। इसी दौरान साक्षात अग्नि देवता प्रकट होते हैं और योशो को अग्नि का स्वामी होने का वरदान देते हैं। वे कहते हैं कि आने वाले समय में योशो के शरीर से अग्नि निकलेगी और उसके शत्रुओं का पूरी तरह नाश करेगी।

घर वापसी और कड़वा सच
सप्तगिरी की सात साल लंबी कठिन तपस्या और सभी चुनौतियों पर विजय पाने के बाद, जब योशो अपने महल की ओर लौटता है, तो उसे उम्मीद होती है कि उसका भव्य स्वागत होगा। लेकिन जैसे ही वह ‘त्राटक पुल’ पार करता है, उसे चारों ओर सन्नाटा और वीरानी मिलती है।

कुछ समय बाद उसे अपनी माँ ‘शौर्या’ एक गुफा में छिपी हुई मिलती है। यहीं कहानी एक दुखद मोड़ लेती है। शौर्या उसे बताती है कि उसके जाने के बाद नैन्जा और तामा के सम्राट ने मिलकर सूर्यग्रह पर कब्ज़ा कर लिया। राजा त्रिभुज को बंदी बना लिया गया और पूरे राज्य में भयानक नरसंहार हुआ। लोगों के सामने यह घोषणा कर दी गई थी कि योशो मर चुका है।

कॉमिक्स का अंत एक बेहद दमदार संकल्प के साथ होता है। योशो, जो अब अग्नि, जल, वायु और विष पर विजय पा चुका है, अपने नाना और अपने राज्य को मुक्त कराने की कसम खाता है। आख़िरी पैनल में वह गरजते हुए कहता है—
“आग मुझे जला नहीं सकती, पानी मुझे डुबो नहीं सकता… नैन्जा मेरे हाथों से कैसे बच पाएगा!”

पात्र विश्लेषण:

योशो:
योशो एक सच्चा ‘सुपरह्यूमन’ नायक है। उसका चरित्र साहस, धैर्य और अनुशासन का प्रतीक है। वह सिर्फ अपनी शक्तियों पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि मुश्किल हालात में अपनी समझ और रणनीति का भी पूरा इस्तेमाल करता है। उसकी आंखों से गोलियां चलने वाली शक्ति उसे बाकी कॉमिक नायकों से बिल्कुल अलग पहचान देती है।

शौर्या:
शौर्या एक मजबूत और धैर्यवान माँ का रूप दिखाती है। पति से बिछड़ने और पिता के बंदी बनने के बावजूद उसने योशो को सुरक्षित रखा और उसे महान बनने के लिए प्रेरित किया। उसका किरदार भावनात्मक रूप से कहानी को गहराई देता है।

राजा त्रिभुज और राजगुरु:
ये दोनों पात्र विज्ञान और अध्यात्म के संतुलन को दर्शाते हैं। राजा त्रिभुज आधुनिक तकनीक और प्रयोगों पर भरोसा करते हैं, जबकि राजगुरु प्राचीन ज्ञान और दिव्य शक्तियों का मार्ग दिखाते हैं। दोनों मिलकर योशो के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं।

नैन्जा:
हालाँकि इस भाग में नैन्जा ज़्यादा सामने नहीं आता, लेकिन उसकी गद्दारी पूरी कहानी की नींव है। वह ऐसा शत्रु है जो बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से वार करता है।

कला और चित्रांकन (Artwork):

संजय शिरोडकर का चित्रांकन इस कॉमिक्स की असली जान है। तुलसी कॉमिक्स की पहचान मानी जाने वाली विस्तृत और जीवंत कला शैली यहाँ पूरी तरह नज़र आती है। योशो की काले और गुलाबी रंग की पोशाक उसे एक क्लासिक योद्धा जैसा लुक देती है। वहीं मृत्युराज और त्रिजटा जैसे खलनायकों का डरावना डिज़ाइन बच्चों के मन में डर और रोमांच दोनों पैदा करता है। रंगों के इस्तेमाल में भी खास ध्यान दिया गया है—अग्नि से जुड़े दृश्यों में नारंगी और पीले रंगों की चमक, और अंतरिक्ष युद्ध में गहरे नीले-बैंगनी रंगों का फैलाव बेहद प्रभावी लगता है। साथ ही ‘तड़-तड़’, ‘धड़ाम’ और ‘खचाक’ जैसे साउंड इफेक्ट्स के साथ बने एक्शन सीन कहानी की गति और रोमांच को लगातार बनाए रखते हैं।

समीक्षा और प्रभाव:

‘प्रलयंकारी योशो’ सिर्फ एक एक्शन-भरी कॉमिक्स नहीं है, बल्कि यह एक मजबूत और अच्छी तरह गढ़ी गई ‘ओरिजिन स्टोरी’ है। लेखक ऋतुराज ने कहानी की रफ्तार कहीं भी धीमी नहीं होने दी। सात पर्वतों की चुनौती वाला हिस्सा कहानी को रोमांच की चरम सीमा तक ले जाता है।

सकारात्मक पक्ष:
आंखों से गोलियां चलाना और ज़हर का असर न होना जैसी अनोखी शक्तियाँ उस दौर के पाठकों के लिए बिल्कुल नई और बेहद रोमांचक थीं। कहानी का वर्ल्ड-बिल्डिंग भी काफी प्रभावशाली है, जहाँ सूर्यग्रह, तामा ग्रह और सप्तगिरी जैसे काल्पनिक स्थान पूरी कथा को एक भव्य और अलौकिक रूप देते हैं। इन सब के बीच कहानी का भावनात्मक पहलू भी उतना ही मजबूत है। एक बेटे का अपनी माँ के दर्द को देखकर बदले की आग में जल उठना पाठकों को योशो से गहराई से जोड़ता है और इस कॉमिक्स को सिर्फ फैंटेसी नहीं, बल्कि एक भावनात्मक मानवीय संघर्ष की कहानी बना देता है।

नकारात्मक पक्ष:
कहानी की रफ्तार काफी तेज रखी गई है। इसी वजह से ४७ पन्नों में बहुत सारी अहम घटनाओं को समेटने की कोशिश की गई है। इसका असर यह होता है कि अजगरा और मायावी बकरे जैसी कुछ लड़ाइयाँ बहुत जल्दी खत्म हो जाती हैं। अगर इन मुकाबलों को थोड़ा और समय और विस्तार मिलता, तो रोमांच का स्तर और भी ऊपर जा सकता था। इसके अलावा, कुछ दृश्यों और किरदारों की बनावट में ‘ही-मैन’ (He-Man) या उस दौर की विदेशी कॉमिक्स का हल्का असर साफ नजर आता है। हालाँकि यह बात ९० के दशक की लगभग हर भारतीय कॉमिक्स में देखने को मिलती है, फिर भी मौलिकता के लिहाज़ से यह चीज़ थोड़ी खटकती है।

निष्कर्ष:

‘प्रलयंकारी योशो’ तुलसी कॉमिक्स की एक यादगार और कालजयी रचना है। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि दुश्मन चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो, अगर आपके पास साहस, ज्ञान और सही मार्गदर्शन यानी गुरु का आशीर्वाद हो, तो हर मुश्किल को पार किया जा सकता है।

कॉमिक्स का अंत ‘योशो की जंग’ नाम की अगली कड़ी के विज्ञापन के साथ होता है, जो पाठकों की उत्सुकता को और बढ़ा देता है। अगर आप ९० के दशक की नॉस्टैल्जिया को फिर से महसूस करना चाहते हैं और ऐसी कहानी पढ़ना चाहते हैं जहाँ विज्ञान और फैंटेसी का शानदार मेल देखने को मिले, तो यह कॉमिक्स आपके लिए एक बेहतरीन पसंद साबित हो सकती है।

योशो का यह सफर सिर्फ एक ग्रह को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसकी अपनी पहचान और विरासत को दोबारा हासिल करने की कहानी भी है। इस पहली कड़ी ने एक मजबूत नींव रखी, जिसने आगे चलकर योशो को तुलसी कॉमिक्स का सबसे बड़ा ‘सुपरस्टार’ बना दिया।

रेटिंग: ४.५/५ ⭐

अनोखी शक्तियाँ इस ब्लॉग में हमने ‘प्रलयंकारी योशो’ की पूरी समीक्षा दी है चित्रांकन और भावनात्मक गहराई का विस्तार से विश्लेषण किया गया है। जिसमें उसके साहसिक कारनामे जो योशो कॉमिक्स सीरीज़ का दूसरा भाग है सप्तगिरी यात्रा
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