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Home » मारा गया डोगा Comic Review – मौत या साज़िश? राज कॉमिक्स की सबसे रहस्यमयी कहानी
Hindi Comics World Updated:30 October 2025

मारा गया डोगा Comic Review – मौत या साज़िश? राज कॉमिक्स की सबसे रहस्यमयी कहानी

राज कॉमिक्स की 1997 की क्लासिक कृति “मारा गया डोगा” में झाँकिए — जहाँ एक्शन, समाज और सच्चाई के मायने सब धुंधले हो जाते हैं।
ComicsBioBy ComicsBio23 October 2025Updated:30 October 202517 Mins Read
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“मारा गया डोगा” Raj Comics Review – क्या सच में मर गया मुंबई का डार्क हीरो?
डोगा – मुंबई का काला हीरो या समाज का गलत समझा गया रक्षक? “मारा गया डोगा” में छिपे सच की परतें खोलते हैं।
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राज कॉमिक्स द्वारा 1997 में प्रकाशित “मारा गया डोगा” सिर्फ अपने नाम से ही पाठकों के मन में एक सिहरन पैदा कर देती है। डोगा — मुंबई का सबसे डरावना और बेरहम एंटी-हीरो, जिसे अपराधी मौत का दूसरा नाम मानते हैं — क्या वो सच में मर सकता है? यही सवाल इस कॉमिक का असली आधार है और यही बात पाठकों को आख़िर तक जोड़े रखती है।
यह कॉमिक एक्शन, ड्रामा, सामाजिक कटाक्ष और भावनाओं का शानदार मेल है। यह कहानी सिर्फ डोगा की मौत की नहीं, बल्कि समाज की नज़रों में उसकी छवि के अंत की भी कहानी है।

कथानक का विस्तृत विश्लेषण

कहानी की शुरुआत मुंबई के एक आम-से इलाके ‘शास्त्री पार्क’ से होती है, जहाँ अपराध की एक नई नस्ल पनप रही है। शोला, डेजी, गफ्फूरा और सुक्का — ये चार नौजवान अपराधी, छात्रों को लीक हुए परीक्षा के पेपर बेचकर अपनी ‘इमेज’ बना रहे हैं। वे शिक्षा व्यवस्था के इस भ्रष्टाचार को अपनी कमाई का ज़रिया बना चुके हैं।
यहीं एंट्री होती है मुंबई के सबसे बड़े अपराध-संहारक — डोगा की।

डोगा की एंट्री हमेशा की तरह धमाकेदार होती है। वह इन चारों को सबक सिखाता है, लेकिन यहाँ लेखक तरुण कुमार वाही डोगा के किरदार में एक नई गहराई जोड़ते हैं। डोगा सिर्फ मारकाट करने वाला इंसान नहीं है — वह इन युवाओं की आँखों में भटकाव देखता है और उन्हें सुधारने का एक मौका देना चाहता है। वह उनसे उनके सरगना ‘ब्लैक फेस’ के बारे में पूछता है।

यहीं से कहानी में मज़ेदार मोड़ आता है। ये चारों लड़के, डोगा की ताकत से डरकर और अपमानित महसूस करते हुए, एक झूठी कहानी बना देते हैं। वे डोगा से वादा करते हैं कि अब वे सुधर जाएंगे और उसे अपने बनावटी सरगना ‘ब्लैक फेस’ से मिलवाने का वादा करते हैं — ताकि डोगा उसे खत्म कर दे और वे आज़ाद हो जाएं।
डोगा, जिसने खुद ज़िंदगी में बहुत तकलीफ़ें झेली हैं, शायद उनकी बातों में सच्चाई तलाशना चाहता है या फिर उन्हें परखना चाहता है। इसलिए वह उनके जाल में फँसने के लिए तैयार हो जाता है।

इसके बाद शोला और उसके दोस्त डोगा से बदला लेने के लिए एक खतरनाक चाल चलते हैं। वे अपने पुराने साथी पप्पन, जो एक ‘स्ट्रीट गैंग’ का लीडर है, उसे ‘ब्लैक फेस’ बनने के लिए राज़ी कर लेते हैं। उनकी प्लानिंग यह थी कि जब डोगा डायमंड टॉवर के ‘रिवॉल्वर’ नामक रेस्तरां में पप्पन से मिलने आएगा, तब पप्पन और उसका गैंग मिलकर डोगा को खत्म कर देंगे।

कॉमिक का बीच वाला हिस्सा एक्शन और रोमांच से भरपूर है। डोगा रेस्तरां पहुँचता है और जल्द ही उसे एहसास हो जाता है कि उसके साथ धोखा हुआ है। इसके बाद जो लड़ाई शुरू होती है, वह भारतीय कॉमिक्स के सबसे बेहतरीन एक्शन सीक्वेंस में गिनी जा सकती है।
मनु का चित्रांकन यहाँ पूरी जान डाल देता है — मेज़, कुर्सियाँ, बोतलें — सब हथियार बन जाते हैं। डोगा अकेला ही दर्जनों गुंडों पर भारी पड़ता है। यह लड़ाई रेस्तरां से निकलकर इमारत के बाहर और फिर एक निर्माणाधीन ढांचे तक पहुँच जाती है।

लेकिन असली खेल मैदान में नहीं, बल्कि नीचे खड़ी भीड़ के दिमाग में चल रहा था। शोला और उसके साथी दूर से यह सब देखते हुए एक नई कहानी फैलाने लगते हैं। वे वहाँ मौजूद छात्रों और आम लोगों को भड़काते हैं कि डोगा निर्दोष लोगों को मार रहा है और शहर में तबाही फैला रहा है। धीरे-धीरे लोग उनकी बातों पर यक़ीन करने लगते हैं।
कहानी का यह हिस्सा बहुत सोचने पर मजबूर करता है — यह दिखाता है कि कैसे सच को मोड़कर झूठ बनाया जा सकता है और कैसे एक रक्षक को भी लोगों की नज़रों में खलनायक बना दिया जाता है।

कहानी का क्लाइमेक्स एक विशाल होर्डिंग (बिलबोर्ड) पर होता है, जहाँ डोगा और पप्पन के बीच आख़िरी लड़ाई छिड़ती है। डोगा अपनी खास बेरहमी और ताकत से पप्पन को हरा देता है। लेकिन नीचे खड़ी भीड़, जो पहले ही शोला के फैलाए झूठ से पूरी तरह गुमराह हो चुकी होती है, कुछ और ही देख रही होती है। उन्हें लगता है कि डोगा एक और निर्दोष इंसान की जान ले रहा है।

गुस्साई और भटकी हुई भीड़, जिसे लगता है कि कानून इस “शैतान” को नहीं रोक पाएगा, खुद ही इंसाफ करने का फैसला करती है। वे उस बड़े होर्डिंग के सपोर्ट काट देते हैं, जिस पर डोगा खड़ा होता है। एक ज़बरदस्त धमाके के साथ, लोहे का वो भारी ढांचा डोगा को अपने साथ नीचे गिरा देता है।

कुछ देर बाद पुलिस पहुँचती है, मलबा हटाया जाता है, और उसके नीचे से डोगा का लहूलुहान, निश्चेष्ट शरीर निकाला जाता है। शहर में खबर आग की तरह फैल जाती है — “मारा गया डोगा!” अपराधी खुशी मनाते हैं, पुलिस चैन की साँस लेती है, और आम जनता सोचती है कि अब एक बड़ा खतरा खत्म हो गया।

लेकिन क्या डोगा सच में मर गया? कॉमिक्स के आख़िरी पन्ने इस रहस्य को ज़िंदा रखते हैं, और पाठक जानते हैं — डोगा इतनी आसानी से मरने वाला नहीं है। यह अंत अगली कहानी “करेंगे डोगा के दुश्मन” के लिए एक शानदार शुरुआत तैयार करता है।

चरित्र चित्रण

डोगा: इस कॉमिक में डोगा का किरदार अपने सबसे मज़बूत रूप में नज़र आता है। वह एक तरफ “बेरहमी नाम का मरहम” लगाने वाला सख्त और डराने वाला विजिलेंट है, तो दूसरी तरफ भटके हुए युवाओं को सुधारने का मौका देने वाला एक संवेदनशील इंसान भी। उसका घायल होना और जनता द्वारा गलत समझा जाना उसे एक ट्रैजिक हीरो बना देता है — ऐसा नायक जो सिस्टम से लड़ता है, लेकिन वही सिस्टम उसे अपना दुश्मन समझ बैठता है।

शोला और उसका गिरोह: ये किरदार आज के समाज का सटीक आईना हैं। ये कोई आम अपराधी नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे नौजवान हैं जो जल्दी अमीर और मशहूर होने का शॉर्टकट ढूंढते हैं। इनकी असली ताकत इनके मसल्स नहीं, बल्कि लोगों के दिमाग से खेलने की कला है। वे दिखाते हैं कि झूठ और अफवाहें कितने खतरनाक हथियार बन सकती हैं।

जनता (भीड़): इस कहानी में जनता सिर्फ दर्शक नहीं है, बल्कि कहानी की अहम खिलाड़ी है। यह कॉमिक्स “भीड़-तंत्र” यानी Mob Mentality पर एक जोरदार टिप्पणी है। यह दिखाती है कि कैसे जानकारी की कमी और अफवाहों की वजह से आम लोग भी हिंसक भीड़ में बदल सकते हैं।

कला और लेखन

तरुण कुमार वाही का लेखन शुरुआत से अंत तक कसा हुआ और प्रभावशाली है। डायलॉग्स तीखे, यथार्थ से जुड़े और डोगा के अंदाज़ में दमदार हैं। कहानी की रफ्तार इतनी तेज़ है कि एक पल के लिए भी बोरियत महसूस नहीं होती। उन्होंने एक्शन के साथ-साथ समाज की एक गंभीर समस्या को बहुत खूबसूरती से पिरोया है।

मनु का आर्टवर्क इस कॉमिक की जान है। एक्शन सीन में उनकी कलाकारी देखने लायक है — हर पैनल में एनर्जी, मूवमेंट और इमोशन है। डोगा के गुस्से, दर्द और उसकी लड़ाई की क्रूरता को उन्होंने जबरदस्त तरीके से दिखाया है। मुंबई का शहरी माहौल भी उन्होंने बहुत सजीव बनाया है, जिससे कहानी और असली लगती है।

निष्कर्ष

“मारा गया डोगा” सिर्फ एक मनोरंजक एक्शन कॉमिक नहीं है, बल्कि अपने वक्त से आगे की कहानी है। यह मीडिया ट्रायल, पब्लिक ओपिनियन और “कानून हाथ में लेने” जैसे मुश्किल सवालों से जूझती है। यह दिखाती है कि हीरो और विलेन के बीच की रेखा कितनी धुंधली हो सकती है — और सच हमेशा इस बात पर निर्भर करता है कि कहानी कौन सुना रहा है।

इसका शीर्षक सिर्फ एक मार्केटिंग चाल नहीं था; यह कहानी का असली सार था। इसने डोगा की अजेय छवि को तोड़ा और उसे एक इंसान की तरह हमारे सामने पेश किया — कमजोर, गलत समझा गया, लेकिन जज़्बे से भरा हुआ।
यह कॉमिक आज भी उतनी ही असरदार और प्रासंगिक है जितनी 90 के दशक में थी। हर कॉमिक प्रेमी, खासकर भारतीय सुपरहीरोज़ के फैन के लिए यह एक ज़रूर पढ़ने वाली कहानी है।
यह आपको सोचने पर मजबूर करती है — असली अपराधी कौन है? वो जो कानून तोड़ता है, या वो समाज जो बिना सोचे-समझे किसी को दोषी ठहरा देता है?

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