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Home » नकलची और तिरंगा की टकराहट – क्या न्याय या बदला जीतेगा? | Comics Review
Don't Miss Updated:20 September 2025

नकलची और तिरंगा की टकराहट – क्या न्याय या बदला जीतेगा? | Comics Review

1998 की ये राज कॉमिक्स सिर्फ एक सुपरहीरो की कहानी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, बदले और एंटी-हीरो के जन्म की दर्दभरी कहानी है।
ComicsBioBy ComicsBio20 September 2025Updated:20 September 202518 Mins Read
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नकलची – तिरंगा सीरीज़ की यादगार राज कॉमिक्स और एंटी-हीरो कहानी
1998 की यादगार कॉमिक्स ‘नकलची’ – न्याय, बदला और एंटी-हीरो का अनोखा सफर।
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90 का दशक भारतीय कॉमिक्स की दुनिया का सुनहरा समय था। इसी दौर में देशभक्ति और जिम्मेदारी की पहचान बनकर एक सुपरहीरो सामने आया, जिसका नाम था ‘तिरंगा’। तिरंगा सिर्फ एक सुपरहीरो नहीं था, बल्कि एक सोच और विचारधारा का प्रतीक था, जो भारतीय मूल्यों, एकता और इंसाफ के लिए खड़ा होता था।

1998 में आई कॉमिक्स ‘नकलची’ तिरंगा सीरीज़ की सबसे यादगार और भावुक कहानियों में गिनी जाती है। इसे हनीफ अजहर और विवेक मोहन ने लिखा था और इसके शानदार चित्र बनाए थे दिलीप चौबे ने। यह कॉमिक्स सिर्फ एक सुपरहीरो की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें भ्रष्टाचार, बदले और एक एंटी-हीरो के जन्म की दर्दभरी कहानी भी देखने को मिलती है।

कथासार: जब न्याय का गला घोंटा गया

कहानी की शुरुआत होती है मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के ईमानदार और जिम्मेदार निजी सहायक राकेश डांगे के घर से। राकेश का बेटा, विशेष, बेहद होशियार है – उसके पास एक अनोखी कला है। वह किसी भी आवाज़ की हूबहू नकल (मिमिक्री) कर सकता है।

कहानी के शुरू के कुछ पन्नों में ही विशेष अपने इस हुनर का मजेदार इस्तेमाल करता है। वह मुख्यमंत्री की आवाज़ में अपने पापा को फोन करके चौंका देता है। यह पल हल्का-फुल्का और मजेदार लगता है, लेकिन उसी वक्त राकेश डांगे के मुंह से निकले शब्द आने वाले डरावने भविष्य की ओर इशारा कर देते हैं –
“देखना, इसकी ये कला एक दिन हमें किसी बड़ी मुसीबत में फंसा देगी।”

इसके बाद कहानी अचानक एक गंभीर मोड़ लेती है। राकेश डांगे अपने बेटे को लेकर मुख्यमंत्री निवास पहुंचता है। वहां वह अनजाने में मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और शहर के माफिया बॉस विक्रम गवली के दाहिने हाथ गरदरखान के बीच चल रही एक खतरनाक डील का गवाह बन जाता है।

मुख्यमंत्री, अगले चुनाव में जीत पक्की करने के लिए, शहर को अपराधियों के हवाले करने तक को तैयार है। एक सच्चे देशभक्त की तरह, राकेश डांगे इस गंदे खेल का विरोध करता है और मुख्यमंत्री को बेनकाब करने की धमकी देता है। लेकिन सत्ता के नशे में डूबे मुख्यमंत्री को अपनी असलियत सामने आने का डर होता है। इसी डर और लालच में वह अपने सबसे वफादार साथी राकेश डांगे की बेरहमी से हत्या कर देता है।

यह खौफनाक मंजर विशेष अपनी आंखों से देख लेता है। इससे पहले कि वह समझ पाता या संभल पाता, मुख्यमंत्री उसे भी खत्म करने के लिए उस पर टूट पड़ता है। किसी तरह विशेष अपनी जान बचाकर वहां से भागने की कोशिश करता है, लेकिन मुख्यमंत्री चालाकी दिखाते हुए अलार्म बजा देता है और झूठा आरोप लगा देता है कि हमला तो विशेष ने ही किया था।

इसी अफरा-तफरी के बीच वहां पहुंचता है न्याय का पहरेदार – ‘तिरंगा’। लेकिन मुख्यमंत्री की बनाई झूठी कहानी पर भरोसा करके तिरंगा विशेष को अपराधी समझ लेता है। वह उस पर हमला करता है और फिर उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर देता है।

यहीं से विशेष की पूरी दुनिया उजड़ जाती है। उसके पिता की हत्या हो चुकी है और हत्यारा बेखौफ घूम रहा है। उसकी माँ को भी गवाह मिटाने के लिए मार दिया जाता है। ऊपर से, खुद विशेष पर हत्या के प्रयास का झूठा इल्जाम लगाकर उसे जेल में डाल दिया जाता है।

एक ही पल में, एक होनहार और मासूम किशोर की जिंदगी पूरी तरह नर्क बन जाती है। अब उसे साफ समझ आने लगता है कि जिस कानून और सिस्टम पर उसके पिता को भरोसा करते थे, वह अंदर से पूरी तरह सड़ चुका है और यहां उसे असली न्याय कभी नहीं मिलने वाला।

हवालात में बैठे हुए, जब विशेष अपने भविष्य को अंधेरे में और अपने माता-पिता के हत्यारे को सत्ता की कुर्सी पर देखता है, तो उसका मासूम दिल नफरत और बदले की आग में धीरे-धीरे पत्थर बन जाता है।

वह अपनी उसी अद्भुत कला – आवाज़ की हूबहू नकल करने की ताकत – का इस्तेमाल जेल से भागने के लिए करता है। डी.सी.पी. साहब की आवाज़ निकालकर वह संतरियों को धोखा देता है और आज़ाद हो जाता है।

लेकिन यह आज़ादी एक नए और खतरनाक किरदार का जन्म देती है – ‘नकलची’। अब ‘विशेष’ नाम का वो मासूम लड़का मर चुका है। उसके जीवन का अब सिर्फ एक ही मकसद है – बदला।

चरित्र-चित्रण: नायक, खलनायक और एंटी-हीरो

विशेष / नकलची: इस कॉमिक्स का दिल और आत्मा है विशेष। वह एक त्रासद नायक (Tragic Hero) है। कहानी की शुरुआत में वह एक आम किशोर है, जो अपनी कला से सबको हंसाता है। लेकिन जब वह अपने पिता की क्रूर हत्या का गवाह बनता है, तो उसका बदल जाना सच में रोंगटे खड़े कर देने वाला है। उसका दर्द, उसकी मजबूरी और फिर उसका क्रोध पाठक को गहराई से महसूस होता है।

जब वह ‘नकलची’ बनता है, तो वह पारंपरिक खलनायक नहीं है। वह एक एंटी-हीरो है – उसके इरादे गलत हो सकते हैं, लेकिन पीछे की वजह इतनी मजबूत है कि पाठक उसके साथ सहानुभूति रखे बिना नहीं रह पाता। उसकी ताकत शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और कलात्मक है, जो उसे बाकी खलनायकों से अलग बनाती है।

तिरंगा: तिरंगा इस कहानी में देशभक्ति और आदर्शवाद का प्रतीक है। लेकिन नकलची की कहानी उसे एक दिलचस्प दुविधा में डाल देती है। शुरुआत में वह मुख्यमंत्री जैसे शक्तिशाली व्यक्ति के जाल में आसानी से फंस जाता है। यह उसे अधिक मानवीय और भरोसेमंद बनाता है, जो गलतियाँ कर सकता है। उसका टकराव नकलची से सिर्फ शारीरिक नहीं है, बल्कि वैचारिक भी है। तिरंगा व्यवस्था के भीतर रहकर न्याय चाहता है, जबकि नकलची उस व्यवस्था को अपना दुश्मन मानता है, जिसने उसके साथ अन्याय किया।

मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह: कहानी का मुख्य खलनायक है मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह। सत्ता के मुखौटे के पीछे छिपा वह एक शैतान है। भ्रष्टाचार, क्रूरता और सत्ता का दुरुपयोग उसके चरित्र का प्रतीक है। अपने वफादार सहायक की हत्या करते समय उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं दिखाई देता, जो उसकी नीचता को दिखाता है। वह ऐसा खलनायक है जिससे पाठक को घृणा होती है – और यही एक अच्छे खलनायक की पहचान है।

कला और चित्रांकन: दिलीप चौबे का जादू

दिलीप चौबे का आर्टवर्क राज कॉमिक्स के उस समय की पहचान था। उनके बनाए चित्र कहानी में जान डाल देते हैं। एक्शन के सीन गतिशील और ऊर्जा से भरे हुए हैं। पात्रों के चेहरे पर आने वाले भाव – जैसे विशेष का डर, राकेश डांगे की जिम्मेदारी, मुख्यमंत्री का कपट और तिरंगा का गुस्सा – सब बहुत प्रभावी ढंग से दिखाए गए हैं।

नकलची का कॉस्ट्यूम (बैंगनी और काला) उसे एक रहस्यमयी और खतरनाक लुक देता है, जबकि तिरंगा की वेशभूषा देशभक्ति के भाव को जगाती है। “धड़ाक”, “आहऽऽ”, “खटाक” जैसे ध्वनि प्रभावों का इस्तेमाल एक्शन सीन को और भी जिंदा और रोमांचक बना देता है।

विषय और संदेश: भ्रष्टाचार और बदले की गाथा

‘नकलची’ सिर्फ एक मजेदार कॉमिक्स नहीं है, बल्कि अपने समय के समाज पर तीखी टिप्पणी भी करती है।

राजनीतिक भ्रष्टाचार: कहानी का मुख्य विषय राजनीतिक भ्रष्टाचार है। यह दिखाती है कि कैसे सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अपने निजी फायदे के लिए देश और समाज को बेच सकते हैं। मुख्यमंत्री, जिसे जनता का रक्षक होना चाहिए, वही सबसे बड़ा भक्षक बन जाता है।

न्याय बनाम बदला: यह कहानी न्याय और बदले की महीन रेखा को दिखाती है। क्या विशेष का बदला लेना सही है? जब सिस्टम ही भ्रष्ट हो और न्याय की कोई उम्मीद न हो, तो क्या कोई व्यक्ति कानून अपने हाथ में लेने का हक़ रखता है? यह कॉमिक्स ऐसे कठिन सवाल उठाती है और पाठक को सोचने पर मजबूर करती है।

एक एंटी-हीरो का उदय: नकलची का किरदार भारतीय कॉमिक्स में एक बड़ा मोड़ था। वह एक ऐसा “खलनायक” है, जिसे पढ़कर पाठक सहानुभूति महसूस करता है। उसकी कहानी दिखाती है कि कैसे अन्याय और त्रासदी एक आम इंसान को असाधारण और खतरनाक रास्ते पर धकेल सकती है।

निष्कर्ष

‘नकलची’ राज कॉमिक्स और तिरंगा श्रृंखला का एक मील का पत्थर है। यह एक तेज़-तर्रार, भावनात्मक और एक्शन से भरपूर कहानी है, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1998 में थी। इसकी सबसे बड़ी ताकत है इसका मुख्य पात्र ‘नकलची’, जो एक जटिल और यादगार चरित्र है।

यह कॉमिक्स सिर्फ मार-धाड़ और सुपरहीरो की जीत के बारे में नहीं है। यह सिस्टम की खामियों, एक मासूम के दर्द और बदले की आग में जलते इंसान की कहानी भी है। इसका अंत पाठक को एक रोमांचक मोड़ पर छोड़ देता है, जहां मुख्यमंत्री के आदेश पर पूरी पुलिस फोर्स तिरंगा को पकड़ने निकल पड़ती है।

यह कॉमिक्स भारतीय कॉमिक्स के प्रेमियों के लिए एक अनमोल रत्न है। यह साबित करती है कि कॉमिक्स केवल बच्चों के मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि सार्थक और गंभीर कहानियाँ कहने का एक शक्तिशाली माध्यम भी हो सकती हैं।

एंटी-हीरो कॉमिक्स समीक्षा तिरंगा नकलची बदला भारतीय सुपरहीरो भ्रष्टाचार राज कॉमिक्स
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